वामपंथी विचारधारा की उपज है नक्सलवाद। गरीबी के कारण नक्सलवाद नहीं फैला, नक्सलवाद के कारण गरीबी फैली। कम्युनिस्ट पार्टी अन्याय का विरोध करने के लिए नहीं, बल्कि हमारी संसदीय प्रणाली का विरोध करने के लिए बनीं। ऐसे में अब नक्सली हिंसा करने वालों के दिन लद गए हैं।
नक्सलवाद का मूल कारण विकास की कमी नहीं बल्कि वामपंथी विचारधारा है, जिसे 1969 में राष्ट्रपति चुनाव जीतने के लिए तत्कालीन सत्तारूढ़ दल की नेता ने इसे स्वीकार कर लिया था। नक्सल-मुक्त भारत मोदी सरकार की सबसे बड़ी सफलताओं में से एक है। सोचने वाली बात यह है कि जिस कम्युनिस्ट पार्टी की नींव ही दूसरे देश की विचारधारा से प्रेरित हो, वो भारत का भला कैसे करेगी?
माओवादियों ने रेड कॉरिडोर भेदभाव का विरोध करने के लिए नहीं बल्कि सरकार की पहुँच कम होने के कारण चुना था। वामपंथी विचारधारा के समर्थकों ने भगवान बिरसा मुंडा, शहीद भगत सिंह या सुभाष चंद्र बोस को नहीं बल्कि “MAO” को अपना आदर्श माना। परिणाम यह हुआ ही बाह्य चुनौतियों के साथ भारत ने दसकों तक इस बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ा। पर देश में वर्तमान में मोदी सरकार है जो हथियार उठायेगा उसको हिसाब देना पड़ेगा।

लाल आतंक की परछाई थी इसलिए बस्तर विकास से पिछड़ गया था। ऐसे में लाल आतंक की परछाई अब हट गई है और बस्तर विकसित हो रहा है। नक्सलमुक्त भारत मोदी सरकार की सबसे ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण सफलता में से एक है। इसका पूरा श्रेय केन्द्रीय सशस्त्र पुलिस बलों, विशेषकर कोबरा और CRPF के जवानों, राज्य पुलिस, छत्तीसगढ़ पुलिस और DRG जवानों और स्थानीय आदिवासियों को जाता है। वामपंथी उग्रवादियों ने दशकों तक जहाँ विकास नहीं पहुंचने दिया, वामपंथी विचारधारा अपना आधार खो बैठी है इसलिए सारे वामपंथी अलग-अलग थ्योरी रच-रच कर अपने अस्तित्व को बचाने में लगे हैं। स्टेट, गवर्नेंस, संविधान और सिक्योरिटी का वैक्यूम खड़ा कर रक्तपात करना ही वामपंथी विचारधारा का उद्देश्य है, जो अब सफल नहीं होगा।
‘भारत के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा की चुनौतियां अब युद्ध के मैदान अथवा दूर सीमाओं तक ही सीमित नहीं हैं । आज सबसे गंभीर और संभावित संकट बाहरी शत्रुओं से नहीं, अपितु शहरों के भीतर काम करनेवाले वैचारिक रूप से प्रेरित ‘राष्ट्रघातियों’ से आता है, जो सामान्यतया ‘बौद्धिक कार्यकर्ता’ तथा ‘व्यवसायी’ होते हैं । यदा-कदा इन्हें ही ‘अर्बन नक्सली’ के रूप में संदर्भित किया जाता है ।
जब पूर्व रक्षा प्रमुख (सी.डी.एस., स्वर्गीय) जनरल विपिन रावत ने ‘ढाई मोर्चे का युद्ध
(टू एंड ए हाफ फ्रंट वॉर)’ शब्द गढ़ा था, तो उन्होंने इन नक्सलियों को भी ‘आधे’ मोर्चे में सम्मिलित किया था । स्वाभाविक रूप से, वे जिन दो मोर्चों का संकेत दे रहे थे, वे चीन तथा पाकिस्तान थे।
अर्बन (शहरी) नक्सली शब्द उन व्यक्तियों को संदर्भित करता है, जो बाहरी रूप से सम्मानजनक सामाजिक भूमिकाओं में काम करते हैं, किंतु जो संवैधानिक रूप से स्थापित सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए सशस्त्र माओवादी विद्रोह का प्रचार करते हैं, समर्थन करते हैं तथा उसे वैध बताते हैं। नक्सलवाद और अर्बन नक्सलवाद की समस्या ने दशकों से भारत को परेशान किया है । यह भारतीय राज्य के विरुद्ध काम करने वाले एक छद्म किंतु वास्तविक वैचारिक लोगों का पारिस्थिति के तंत्र एवं जाल (इकोसिस्टम और नेटवर्क) है, जो नागरिक स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और आदिवासी सुरक्षा इत्यादि के हित में काम करने का दावा करता है। इनकी राष्ट्र विरोधी गतिविधियों के विरुद्ध राज्य द्वारा की गई कोई भी कार्यवाही दमनकारी तथा जन विरोधी प्रचारित की जाती है। विवाद के पश्चात यह सूत्र ध्यान देने योग्य है – विशेष रूप से राष्ट्रीय सुरक्षा, नागरिक स्वतंत्रता तथा भारत के भविष्य को आकार देनेवाली वैचारिक लडाई के संदर्भ में।
जंगलों में युद्ध खुलेआम लड़ा जाता है। शहरों में युद्ध, गुप्त रूप से। शहरी नक्सली भारत के 'अदृश्य दुश्मन' हैं, उनमें से कुछ या तो पकड़े गए हैं या आंदोलन के लिए काम करने और भारतीय राज्य के खिलाफ विद्रोह फैलाने के लिए पुलिस के रडार पर हैं। उन सभी के बीच एक समान सूत्र यह है कि वे सभी शहरी बुद्धिजीवी, प्रभावशाली या महत्वपूर्ण कार्यकर्ता हैं।
सभी शहरी नक्सलियों की उपलब्धियों पर एक नज़र डालने से पता चलता है कि उन्होंने सामाजिक मुद्दों के बारे में चिंतित होने का नाटक करके युवाओं को प्रेरित किया है। हालांकि, मेरा अवलोकन यह है कि उन्होंने कभी भी सामाजिक समस्याओं का समाधान खोजने की कोशिश नहीं की। पूर्वनियोजित रणनीति के अनुसार, वे विरोध प्रदर्शन आयोजित करके और जनता को लामबंद करके स्थिति का फायदा उठाते हैं, जिसका उपयोग पार्टी निर्माण के लिए किया जा सकता है। वे छात्रों को विभिन्न कॉलेजों में प्रवेश लेने और असफल होने के लिए प्रोत्साहित करते हैं ताकि वे कॉलेज परिसर में लंबे समय तक जारी रह सकें।
एक गरीब या हाशिए की पृष्ठभूमि से आने वाले एक छात्र के लिए, एक बड़े शहर में एक सरकारी छात्रावास में रियायती दर पर रहना एक विलासिता है, जिसे वह अपने आकाओं के गुप्त उद्देश्यों पर सवाल उठाए बिना समाप्त कर देता है। इन छात्रों की मदद से वे नए छात्रों को आकर्षित करते हैं और 'बूट स्टडी कैंप' आयोजित करते हैं।
महाराष्ट्र आतंकवाद निरोधक दस्ते (एटीएस) द्वारा कुछ लोगों की गिरफ्तारी के मामले में की गई जांच में पता चला है कि प्रतिबंधित संगठन भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) ने 2010 के मध्य में पुणे में 15 दिवसीय शिविर का आयोजन किया था। 'शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रम' नामक 'अध्ययन शिविर' में सात पुरुषों और चार महिलाओं ने भाग लिया। शिविर के दौरान, मार्क् सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के एक शीर्ष राज्य कार्यकर्ता, मिलिंद तेलुम्बडे उर्फ ज्योतिराव उर्फ बड़ा दीपक और उनकी पत्नी एंजेलो सोनटक्के उर्फ साधना उर्फ राही उर्फ इस्कारा ने अपने नए पार्टी सदस्यों और संभावित भर्ती लोगों को नक्सली विचारधारा और नक्सलवाद पर पाठ पढ़ाया।
शिविर का स्थल पुणे जिले के खेड़ तालुका के बांगरवाड़ी में छोटे से कुडे बुर्द्रुक गांव में एक कमरा था, जो शहर से लगभग 50 किलोमीटर दूर स्थित है। यह कमरा एक स्थानीय किसान का था, जो धवला ढेंगले उर्फ दीपक डेंगले उर्फ प्रताप का रिश्तेदार था। इस उद्देश्य के लिए अपना कमरा देने वाले व्यक्ति को बताया गया कि यह आदिवासी मुद्दों का अध्ययन करने के लिए पुणे और मुंबई के शिक्षकों के लिए एक शिविर था। प्रताप पुणे नगर निगम (पीएमसी) के वाहन विभाग में कार्यरत थे और एटीएस ने मई 2011 की शुरुआत में नक्सलियों से कथित संबंधों के लिए उन्हें गिरफ्तार किया था। गायक और कवि ढेंगले पुणे स्थित सांस्कृतिक समूह कबीर कला मंच के सदस्य थे, जिसका इस्तेमाल कथित तौर पर भाकपा (नक्सल) द्वारा शहर के युवाओं के साथ बातचीत करने और उन्हें नक्सली विचारधारा में शामिल करने के लिए किया जाता था। शिविर में भाग लेने वाले कबीर कला मंच के संस्थापक पुणे निवासी चंदलिया ने अपने बयान में कहा, "साधना (एंजेला) और ज्योतिराव (मिलिंद) शिविर में आए थे। उन्होंने हमें नक्सली विचारधारा के बारे में बताया। उन्होंने हमें पुलिस और अर्धसैनिक बलों पर हमलों पर 'ब्लेज़िंग ट्रेल' नाम का एक वीडियो दिखाया।
नई रणनीति छह चरणों के दृष्टिकोण पर केंद्रित है जिसे एसएएआरआरसी कहा जाता है - सर्वेक्षण, जागरूकता, आंदोलन, भर्ती, प्रतिरोध और नियंत्रण। इस मुद्दे पर एक निबंध में पीवी रमना ने राज्य के एक खुफिया अधिकारी के हवाले से कहा, "उन्होंने सर्वेक्षण का पहला चरण पूरा कर लिया है, यानी लक्षित समूहों, असंतोष के संभावित क्षेत्रों और शहरी क्षेत्रों में फ्लैश-पॉइंट की पहचान करना। अब वे अपनी रणनीति के दूसरे और तीसरे चरण को लागू करने की प्रक्रिया में हैं।
सरकार ने नक्सली समस्या से मुक्ति के बाद के लिए जो रोड मैप तैयार किया है, उसके तहत 'माओवादियों के इकोसिस्टम' और 'अलगाववादियों और विध्वंसक तत्वों' का पूरी तरह से सफाया एक बड़ा लक्ष्य है। माना जाता है कि शहरी क्षेत्रों में ऐसे तत्वों ने अलग-अलग प्रमुख संस्थानों में गहरी जड़ें जमा रखी हैं। इनके 'अगुवा संगठनों' को तेजी से पहचानने और उनपर रोक लगाने के लिए इनके सर्विलांस, तेजी से जांच और मुकदमा चलाने की योजनाओं पर काम चल रहा है।

डॉ प्रीती
(लेखक अस्सिस्टेंट प्रोफेसर, दिल्ली विश्वविद्यालय, हैं)
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)
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