हालिया संपन्न महाराष्ट्र के विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी का अप्रत्याशित प्रदर्शन उनके रणनीतिक सामर्थ्य और बेहतर चुनाव प्रबंधन के बूते ही संभव हो पाया है। भाजपा का बंटेंगे तो कटेंगे नारे ने महाराष्ट्र में भाजपा गठबंधन (महायुति) की सत्ता में फिर से वापसी करा दी। देवेंद्र फडणवीस, एकनाथ शिंदे और अजीत पवार की त्रिमूर्ति ने महाविकास अघाड़ी के सभी समीकरणों को ध्वस्त कर दिया और महायुति के विधायकों की गिनती को 230 के बड़े आंकड़े तक पहुंचाया। महाराष्ट्र में शिवसेना, एनसीपी और भाजपा की संयुक्त शक्ति ने विपक्षी कांग्रेस नेतृत्व वाले गठबंधन को 46 के आंकड़े में समेट दिया। एक बड़े प्रदेश में फिर से सरकार बना कर मोदी-शाह की जोड़ी ने अपने ऊपर उठ रहे प्रश्नों को विराम दे दिया। महाराष्ट्र चुनावों में स्टार प्रचारक की भूमिका में रहे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ के बयानों और बुलडोजर एक्शन ने भी चुनावी हवा को अपनी पार्टी के अनुकूल बनाए रखने में सहायता की। कुल मिलाकर भाजपा ने महाराष्ट्र जैसे बड़े राज्य पर इतनी बड़ी जीत दर्ज कर के ये दिखा दिया की अभी विपक्ष में उसकी रणनीति को तोड़ने का सामर्थ्य कम ही दिख रहा है। महाराष्ट्र में एनडीए की यह बड़ी जीत यह भी दर्शाती है कि लोकसभा में जहां बीजेपी का प्रदर्शन बेंचमार्क से कम था, वहीं विधानसभा में बीजेपी ने अकेले दम पर रिकॉर्ड वोट प्रतिशत हासिल किया है। परिणामस्वरूप बीजेपी ने अकेले ही 132 सीटें महाराष्ट्र में अपने नाम की और देवेंद्र फडणवीस के एक बार फिर से वापसी का संकेत भी दे दिया।
बीजेपी गठबंधन की सरकार की लाडली बहिन योजना, चुनाव में बहुत काम आई। आम जनता के मन में ये भूमिका बनी कि मौजूदा सरकार महिलाओं के हितों का ध्यान रख रही है। महिलाओं के खातों में हर महीने रुपए पहुंचने से ये विश्वास दृढ़ हुआ, जो वोटों में तब्दील हो गया। बीजेपी गठबंधन ने ओबीसी वोट पर फोकस किया और ये कोशिश की, कि ये वोट कहीं जाने ना पाए। वहीं पीएम मोदी के नारे 'एक हैं तो सेफ हैं', ने भी कारगर काम किया और लोगों को एकजुट करते हुए बीजेपी गठबंधन का वफादार बना दिया। बीजेपी गठबंधन ने हिंदू और मुस्लिम वोटरों को साधने की सफल कोशिश की। एक तरफ बंटेंगे तो कटेंगे का नारा देकर हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण करने का प्रयास किया और दूसरी तरफ शिंदे सरकार ने मदरसों के शिक्षकों की सैलरी बढ़ाकर ये साफ कर दिया कि वह मुस्लिम विरोधी नहीं हैं। जिस वजह से बीजेपी गठबंधन को मुस्लिम और हिंदू दोनों का वोट मिला। बीजेपी ने महाराष्ट्र के चुनावों में नई रणनीति अपनाई और लोकल नेताओं से ही सबसे ज्यादा प्रचार करवाया। बीजेपी गठबंधन की तरफ से सबसे ज्यादा प्रचार देवेंद्र फडणवीस ने ही किया। केंद्रीय नेताओं को पीछे रखकर लोकल वोट साधने के लिए लोकल नेता की रणनीति काम आई और उसका फायदा वोटों के रूप में दिखाई दिया। महायुति की जीत का एक कारण ये भी है कि इस चुनाव में विपक्ष के पास मुद्दों की भी कमी रही। विपक्ष को सत्ता पक्ष को घेरने के लिए जो मेहनत करनी चाहिए, वह नहीं हो सकी। जिसका फायदा महायुति ने उठाया और वोटों को अपने पाले में कर लिया।

वहीं दूसरी ओर झारखंड चुनाव के परिणाम ने सभी को स्तब्ध कर दिया। कयासों के परे परिणाम देखने को मिला। शुरुआती रुझानों में एनडीए के आगे होने के बाद और फिर शेयर बाजार की तरह धड़ाम से नीचे आने पर सभी को झटका लगा। झारखंड मुक्ति मोर्चा ने सबसे बड़े दल के तौर पर उभर कर झारखंड राजनीति में हेमंत सोरेन की साख को मजबूत किया। हेमंत सोरेन ने ये साबित कर दिया की वो सिर्फ शिबू सोरेन के पुत्र ही नहीं अपितु एक कुशल रणनीतिकार और नेतृत्वकर्ता भी हैं। बड़ी बात ये नहीं की उन्होंने भ्रष्टाचार के आरोपों को झेलते हुए झारखंड मुक्ति मोर्चा को पुनः सत्ता तक पहुंचाया या इंडिया गठबंधन की लगभग सभी प्रदेशों में डूब रही नैय्या को संभाला। बड़ी बात ये है की उन्होंने भारतीय जनता पार्टी को हराते हुए सत्ता में वापसी की। भाजपा के तमाम घोषणाओं, वादों, दावों और स्टार प्रचारकों की भीड़ के सामने झारखंड अस्मिता और आदिवासी अपमान के नाम पर सोरेन ने JMM को न सिर्फ सबसे बड़े दल के तौर पर उभारा बल्कि कांग्रेस, राजद और भाकपा माले के साथ मिल कर 56 सीटों पर जीत दर्ज कर के सरकार बनाने के लिए वांछित आंकड़े को बहुत ही आसानी से पार किया ।
झारखंड चुनावों में झामुमो के द्वारा महिलाओं को दो जाने वाली निधि को बढ़ाकर 2500 करने और किसानों के कर्ज माफी ने इनकी वापसी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 200 यूनिट बिजली मुफ्त देने के वादे ने भी विधानसभा में इनके विधायकों की गिनती को बढ़ाया। जयराम महतो की पार्टी जेएमकेएम ने कई सीटों पर भाजपा और उसकी सहयोगी पार्टी आजसू की गणित को बिगाड़ दिया। जेएमकेएम की कैंची ने न सिर्फ महतो वोटों को काट दिया वरन भाजपा की जीत की उम्मीदों को भी चकनाचूर कर दिया। इस चुनाव ने ये सिद्ध कर दिया की झारखंड की राजनीति में JMM अभी लंबा चलेगी।
महाराष्ट्र और झारखंड विधानसभा के चुनाव परिणामों के बीच यूपी के उपचुनाव परिणामों ने भी सभी को अपनी ओर आकर्षित किया। उत्तर प्रदेश में 9 सीटों पर हुए उप चुनाव में 9 में से 7 सीटें भाजपा गठबंधन (6 सीटें भाजपा और 1 सीट रालोद) के पाले में गई है और 2 सीटों पर सपा ने जीत दर्ज की है। जो समाजवादी पार्टी के लिए एक बड़े झटके के समान था। करहल और सीसामऊ सीट पर सपा के उम्मीदवार जीते हैं। मीरापुर में आरएलडी, गाजियाबाद, खैर, फूलपुर और मझवां में बीजेपी को जीत मिली है। कुंदरकी में बीजेपी की बड़ी जीत हुई है। इन उप चुनावों ने योगी आदित्यनाथ सरकार की वैधता को बरकरार रखा है और सपा प्रमुख अखिलेश यादव के लिए और अधिक मेहनत का संकेत दिया है। उत्तर प्रदेश में ढांचागत सुविधाओं के विकास और मुफ्त राशन योजना ने भाजपा गठबंधन को जीत दिलाई है। उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग के बाहर मानकीकरण के विरोध में धरना दे रहे छात्रों का मुद्दा सरकार के विपक्ष में जा सकता था पर चुनाव से ठीक पहले आयोग अध्यक्ष के द्वारा उनकी मांगों को अंशतः स्वीकार कर लेने के कारण सरकार की ये छवि बरकरार रही की वो युवाओं के साथ है ना कि खिलाफ।
सत्यम त्रिपाठी
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)
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