साल 2024 के आम चुनाव के दौरान कांग्रेस पार्टी को झटके पर झटके लग रहे हैं। एक-एक करके कांग्रेसी नेता पार्टी छोड़ते जा रहे हैं। इसकी कई वजहें गिनाई जा रही हैं। लेकिन सबसे बड़ा कारण है कांग्रेस में दिशाहीनता की स्थिति। जिसकी वजह से कांग्रेस नेता अपने भविष्य को लेकर सशंकित हैं और भ्रम का शिकार होते जा रहे हैं।
कांग्रेस पार्टी की उम्र लगभग 140 वर्ष हो चुकी है। सन् 1885 में बनी इस पार्टी ने बहुत से उतार चढ़ाव देखे। लेकिन आज उसे जो दिन देखना पड़ रहा है, उसके बारे में कांग्रेस के संस्थापकों ने कभी सोचा भी नहीं होगा। जब से लोकसभा चुनाव 2024 की तारीखों की घोषणा हुई है। तब से पार्टी छोड़ने वाले कांग्रेसियों की तो जैसे बाढ़ सी आ गई है। कांग्रेस छोड़ने वालों में रवनीत सिंह बिट्टू, गौरव वल्लभ, संजय निरुपम, अशोक तंवर, नवीन जिंदल, मिलिंद देवड़ा जैसे कई चर्चित और युवा चेहरे शामिल हैं। कांग्रेस को छोड़ते हुए इन नेताओं ने पार्टी संगठन पर कई तरह से आरोप लगाए। हालांकि ऐसा नहीं है कि कांग्रेस छोड़ने वाले सभी नेता दूध के धुले हैं। उनमें अवसरवादिता की कमी नहीं है और उन सभी में अपने भविष्य को लेकर चिंता बनी हुई है। लेकिन आखिर क्या वजह थी कि इन नेताओं को कांग्रेस में अपना भविष्य अंधकारमय दिख रहा था। इसके पीछे कई कारण हैं। आइए देखते हैं-
विचारधारा का संकट...

पिछले कुछ समय से कांग्रेस पार्टी विचारधारा के नाम पर बुरी तरह भ्रमित दिख रही है। एक ओर तो राहुल गांधी जाति आधारित जनगणना की बात करते हैं। जो कि उनके पिता राजीव गांधी और परदादा जवाहरलाल नेहरु जैसे नेताओं के विचारों के विरुद्ध है। दूसरी ओर राम मंदिर के लोकार्पण जैसे भव्य आयोजन का बहिष्कार करके पूरी तरह हिंदू विरोधी दिखने लगे हैं। जिसकी वजह से जनता में यह संदेश जा रहा है कि कांग्रेस एक विशेष मजहब परस्त नीतियों पर काम कर रही है। राहुल गांधी के जमाने की कांग्रेस का झुकाव वामपंथी विचारधारा की तरफ बढ़ गया है। जो कि कांग्रेस के मूल विचारों के लिए घातक साबित हो रहा है। वामपंथी लॉबी के ही प्रभाव में आकर राहुल गांधी विदेशी मंचों पर जाकर देश के विरुद्ध बयानबाजियां करते हैं। सर्जिकल स्ट्राइक पर सवाल उठाने के कांग्रेस के स्टैण्ड से पार्टी को नुकसान हुआ। चीन के संबंध में जो बात बंद दरवाजों के पीछे होनी चाहिए थी। उसे राहुल गांधी खुलेआम विदेशी मंचों से उठाते हैं। जो कि जनता को नागवार गुजरता है और कांग्रेस की छवि देशविरोधी होने लगती है।
इसी तरह आर्थिक मामलों में कांग्रेस नेताओं का रवैया ऐसा है, जैसे व्यापार करना और पूंजी इकट्ठा करना कोई गुनाह है। वर्तमान समय में कांग्रेस हमेशा देश के वेल्थ क्रिएटर्स को नीचा दिखाते हुए दिख रही है। यही वजह है कि कांग्रेस आज उन आर्थिक उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण (एलपीजी) नीतियों के खिलाफ खड़ी दिखाई दे रही है। जिसकी शुरुआत कांग्रेस ने ही की थी। देश में होने वाले हर विनिवेश पर पार्टी का नजरिया हमेशा नकारात्मक रहा।
अब विसंगति देखिए जो राहुल गांधी अडानी और अंबानी के खिलाफ जहर उगलते रहते है, वहीं राजस्थान में उनके विश्वस्त सहयोगी अशोक गहलोत और भूपेश बघेल जैसे मुख्यमंत्री अडानी का स्वागत करते हुए दिखाई दे रहे थे।
हिंदू विरोधी छवि कांग्रेस की मुश्किल का कारण

जब कांग्रेस ने पहली बार साल 2014 के चुनावों में मोदी के हाथों मात खाई थी, तब उस हार के कारणों की समीक्षा के लिए वरिष्ठ कांग्रेसी नेता एके एंटनी के नेतृत्व में एक कमेटी बनाई गई थी। एंटनी कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में बताया था कि कांग्रेस की छवि हिंदू विरोधी की होती जा रही है। रिपोर्ट में कहा गया कि पहले ऐसा नहीं था, इसमें सुधार की जरूरत है। लेकिन दस साल बीत गए इस छवि को सुधारने के लिए कोई काम नहीं किया गया। बल्कि राहुल गांधी को दत्तात्रेय गोत्र वाले जनेऊधारी ब्राह्मण साबित करने की असफल कोशिश की गई। उसपर से सबसे बुरा यह हुआ कि राम मंदिर के लोकार्पण कार्यक्रम से कांग्रेस ने दूरी बना ली। हाल के दिनों में जितने भी लोगों ने कांग्रेस छोड़ी है, उन सभी ने एक स्वर में कहा है कि राम मंदिर का विरोध करते रहना उनके लिए संभव नहीं हो सकता। क्योंकि इस देश में हिंदू बहुसंख्यक है, जिनके वोटों के बिना कांग्रेस समाप्त हो जाएगी। लेकिन आश्चर्य की बात है कि कांग्रेस आलाकमान इस बात पर विचार तक करने के लिए तैयार नहीं है।
नेतृत्व की अनुपलब्धता
कांग्रेस आलाकमान पर अक्सर यह आरोप लगता रहता है कि वह कार्यकर्ताओं और जमीनी स्तर के नेताओं के लिए अनुपलब्ध रहते हैं। उनसे संपर्क करने की कोशिश करने पर बहुत प्रयास के बाद ही सफलता मिल पाती है। खास तौर पर राहुल गांधी पर यह शुरू से ही आरोप रहा है कि जब पार्टी की जरूरत होती है तो वो गायब हो जाते हैं। जब पार्टी किसी विशेष अभियान की तैयारी कर रही होती है तो राहुल विदेश यात्रा पर होते हैं। हालांकि राहुल गांधी ने पिछले दिनों उन्होंने भारत जोड़ो यात्रा और भारत जोड़ो न्याय यात्रा के दौरान खूब मेहनत की। जिसका परिणाम भी देखने को मिला। लेकिन उनमें निरंतरता की कमी रहती है। कई बार वह जी जान से कोशिश करते हुए नजर आते हैं। लेकिन फिर अचानक गायब हो जाते हैं। भारत जोड़ो न्याय यात्रा के समापन के बाद राहुल गांधी लगातार कई दिन तक नहीं दिखे। जबकि उस समय लोकसभा चुनाव 2024 की सरगर्मियां जोरों पर थीं।
ठीक ऐसी ही समस्या प्रियंका वाड्रा के साथ भी है। कभी तो वह लगातार कई हफ्ते तक कार्यकर्ताओं के बीच दिखाई देंगी, फिर अचानक गायब हो जाएंगी। कांग्रेस पार्टी उहापोह की स्थिति में रहती है। जिसका असर उनके चुनावी प्रदर्शन पर साफ दिखाई देता है। जैसे कि कांग्रेस की परंपरागत सीटें जैसे उत्तर प्रदेश में रायबरेली और अमेठी से कौन चुनाव लडेगा, इसका फैसला अभी तक नहीं हो सका है। फैसलों को टालते रहना कांग्रेस की नीति का हिस्सा बन गया है। पार्टी नेताओं की शिकायत सुनना, उन शिकायतों की जांच करना आदि तभी संभव हो सकता है जब आप लगातार पार्टी कार्यकर्ताओं से मिलते रहते हैं। कांग्रेस नेता शिकायत करते हैं कि राहुल या प्रियंका से मुलाकात करने के लिए उन्हें महीनों कोशिश करनी होती है। ऐसी स्थिति में कार्यकर्ता या नेता बिदक कर दूसरी पार्टी का दामन थाम लें तो दोष उनका थोड़े ही है।
उनकी तुलना में भाजपा का शीर्ष नेतृत्व हमेशा अपने जमीनी कार्यकर्ताओं और नेताओं लिए उपलब्ध रहता है। जो कि पार्टी और नेताओं के बीच के संपर्क को मजबूत बनाता है।
परिवारवाद का दंश

कांग्रेस में रहे युवा नेता परिवारवाद का दंश झेलने के लिए मजबूर है। वह जानते हैं कि कांग्रेस पार्टी में राहुल गांधी चाहे कितनी बार भी फेल हो जाएं नेतृत्व उनके पास ही रहेगा। चाहे दूसरे नेता चांद तारे तोड़कर क्यों नहीं ला दें। उन्हें राहुल गांधी के नीचे ही काम करना होगा। ऐसा नहीं है कि कांग्रेस में प्रतिभावान नेताओं की कमी है। अगर गांधी परिवार के अंदर के लोगों को ही आगे बढ़ाना हो तो भी कई लोग हैं। लेकिन एक से लेकर दस नंबर तक राहुल गांधी ही काबिज हैं। उसके बाद उनके वफादारों का नंबर आता है। किसी और नेता का नंबर इसके बाद ही आ सकता है। लेकिन इतना इंतजार करने के लिए कांग्रेस की युवा पीढ़ी तैयार नहीं है। यह परिवारवाद का ही दंश है कि ज्योतिरादित्य सिंधिया, जितिन प्रसाद, मिलिंद देवड़ा,रवनीत सिंह बिट्टू जैसे कई ऊर्जावान नेता कांग्रेस पार्टी छोड़कर चले गए। विपक्ष द्वारा गिनाए गए आंकड़ों को मानें तो राहुल गांधी 27 बार अलग अलग चुनावों में कांग्रेस को हरवा चुके हैं। लेकिन कांग्रेस पार्टी अब भी राहुल गांधी के नाम का जादू चलने के इंतजार में है। सालों बाद कांग्रेस ने अपना अध्यक्ष बदलने के बारे में सोचा भी तो 80 साल के मल्लिकार्जुन खड़गे को लेकर आ गए। जिनकी भूमिका रबर स्टैम्प से ज्यादा कुछ नहीं है। यहां तक कि राहुल की जगह प्रियंका वाड्रा को लाने के लिए भी कांग्रेस तैयार नहीं है। ऐसे में गांधी परिवार के बाहर किसी नेता को कांग्रेस की कमान सौंपने की तो कोई सोच भी नहीं सकता है।
जमीनी संपर्क का टूटना
हाल ही में कांग्रेस छोड़ने वाले कई नेताओं ने आरोप लगाया कि कांग्रेस नेताओं का जमीनी संपर्क पूरी तरह से टूट चुका है। आज देश बदलाव के दौर से गुजर रहा है। लेकिन वर्तमान कांग्रेस नेतृत्व नये भारत की आकांक्षा को समझने में अक्षम है। यही वजह है कि ना तो पार्टी सत्ता में आ पा रही और ना ही मजबूत विपक्ष की भूमिका ही निभा पा रही है। इससे कार्यकर्ता हतोत्साहित हो रहे हैं। बड़े नेताओं और जमीनी कार्यकर्ताओं के बीच की दूरी पाटना कांग्रेस के लिए बेहद कठिन साबित हो रहा है। जब तक एक कार्यकर्ता अपने नेता को सीधे तौर पर सुझाव नहीं दे सकता, तब तक किसी भी प्रकार का सकारात्मक परिवर्तन संभव नहीं है। इसकी बजाए कांग्रेस नेता लगातार अपने चमचों से घिरे रहते हैं। जो कि उन्हें लगातार आसमान पर चढ़ा रहे होते हैं। कांग्रेस नेतृत्व इसी फील गुड में दिमागी तौर पर व्यस्त रहता है। जिसका नतीजा यह है कि पार्टी बर्बाद होती जा रही है।
अपना इस्तीफा देते हुए मुंबई से कांग्रेस के वरिष्ठ नेता संजय निरुपम ने साफ तौर पर कहा था कि गांधी परिवार में पांच पावर सेंटर हैं। जिसमें तीन पावर सेंटर तो गांधी परिवार के अंदर ही मौजूद है- सोनिया गांधी , राहुल गांधी और प्रियंका गांधी। इसके अलावा दो पावर सेंटर मल्लिकार्जुन खरगे और केसी वेणुगोपाल के बाहर से काम कर रहे हैं। राहुल और प्रियंका की लॉबी की टक्कर से कई नेता हाशिए पर चले गए। जिसमें से पंजाब के कद्दावर नेता अमरिंदर सिंह, नवजोत सिद्धू, हरियाणा के अशोक तंवर, राजस्थान के अशोक गहलोत और सचिन पायलट जैसे नाम प्रमुख हैं। इन राज्यों में कांग्रेस की दुर्गति का कारण पार्टी के अलग अलग पावर सेंटर का होना और पार्टी का जमीनी संपर्क टूटना है।
कांग्रेस छोड़ने वाले प्रमुख चेहरे
रवनीत सिंह बिट्टू

पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय बेअंत सिंह के पोते हैं और तीन बार से लोकसभा सदस्य हैं। बिट्टू ने 2009 में पहली बार श्री आनंदपुर साहिब सीट से लोकसभा चुनाव जीता था। इसके बाद 2014 और 2019 में लुधियाना लोकसभा सीट से दो बार से सांसद हैं। बिट्टू पंजाब यूथ कांग्रेस के अध्यक्ष भी रह चुके हैं। अब भाजपा से चुनाव लड़ रहे हैं।
गौरव वल्लभ

कांग्रेस के तेजतर्रार प्रवक्ता थे। अब भाजपा में शामिल हो चुके हैं। कांग्रेस छोड़ते वक्त उन्होंने कहा था कि पार्टी अपनी राह भटक गई है। 2019 में गौरव ने झारखंड की जमशेदपुर सीट से चुनाव लड़ा और हारे। 2013 में राजस्थान के उदयपुर से विधानसभा चुनाव लड़ा। मगर यहां भी भाजपा के हाथों हार गए।
नवीन जिंदल

देश के दिग्गज उद्योगपति और पूर्व सांसद नवीन जिंदल ने कुछ दिन पहले ही भाजपा ज्वाइन की। भाजपा ने जिंदल को हरियाणा के कुरुक्षेत्र लोकसभा सीट से टिकट दिया है। नवीन जिंदल कुरुक्षेत्र से दो बार लोकसभा का चुनाव जीत चुके हैं।
संजय निरुपम

2009 से 2014 तक मुंबई उत्तर से कांग्रेस सांसद रह चुके हैं। वह पहले शिवसेना में थे लेकिन 2005 में शिवसेना छोड़ दी और काग्रेस में शामिल हो गए। वह दो बार राज्यसभा सांसद भी रह चुके हैं। कांग्रेस और शिवसेना(यूबीटी) गठबंधन में उनकी सीट उद्धव की पार्टी के पास चली गई थी। जिसकी वजह से वह नाराज थे।
अशोक चव्हाण

8 दिसंबर 2008 से 9 नवंबर 2010 तक महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। आदर्श हाउसिंग घोटाले में नाम आने के बाद उन्हें इस्तीफा देना पड़ा था। महाराष्ट्र के दिग्गज कांग्रेसी नेता शंकरराव चव्हाण के पुत्र हैं। 1987 से अब तक कई बार सांसद और मंत्री रह चुके हैं।
अशोक तंवर

कभी हरियाणा में कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष रहे अशोक तंवर अब भाजपा में है। भाजपा ने उन्हें सिरसा लोकसभा सीट से प्रत्याशी घोषित किया है। 2019 में तंवर ने कांग्रेस छोड़ दी थी। अशोक तंवर 2009 से 2014 तक सिरसा से सांसद रहे।
जयवीर शेरगिल

कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता रहे जयवीर शेरगिल भी अब भाजपा में है। पंजाब से आने वाले जयवीर शेरगिल को कैप्टन अमरिंदर सिंह का करीबी माना जाता है। अमरिंदर सिंह भी अब परिवार समेत भाजपाई हो चुके हैं। जयवीर शेरगिल पेशे से वकील हैं। पंजाब के जालंधर में उनका जन्म हुआ।
मुक्केबाज विजेंदर सिंह

मुक्केबाज विजेंदर सिंह ने हाल ही कांग्रेस को छोड़ भाजपा का दामन थाम लिया है। विजेंदर सिंह हरियाणा के भिवानी जिले के रहने वाले हैं। कांग्रेस उन्हें यूपी की मथुरा सीट से उतारने की तैयारी में थी। मगर उससे पहले ही विजेंदर ने कांग्रेस छोड़ दिया।
इसी तरह मिलिंद देवड़ा, आरपीएन सिंह, जितिन प्रसाद, हार्दिक पटेल, ज्योतिरादित्य सिंधिया, शहजाद पूनावाला कांग्रेस को अलविदा कह चुके हैं।

अंशुमान आनंद
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