देश की सबसे पुरानी पार्टी में इन दिनों भगदड़ की हालत है। एक आंकड़े के मुताबिक भारतीय जनता पार्टी में पिछले कुछ दिनों में दूसरे दलों से करीब 82 हजार नेता और कार्यकर्ता शामिल हुए हैं। इनमें सबसे ज्यादा कांग्रेस के ही नेता और कार्यकर्ता हैं। जितनी तेजी से कांग्रेस से नेता और कार्यकर्ता बाहर निकले हैं, उतनी तेजी से कांग्रेस में दूसरे दलों से नेताओं की आमद नहीं हुई है। बहुजन समाज पार्टी के नेता दानिश अली, कांग्रेस के पुराने और भाजपा के नवेले नेता रहे हरियाणा के वीरेंद्र सिंह, उनकी पत्नी और बेट के साथ ही झारखंड में बीजेपी के विधायक रहे जयप्रकाश पटेल ने ही कांग्रेस का हाथ थामा है। जबकि कांग्रेस छोड़ने वाले नेता पार्टी में दिग्गज रहे हैं। मुंबई कांग्रेस के अध्यक्ष और सांसद रहे संजय निरूपम, पार्टी की मीडिया और दूसरे मंचों पर धाकड़ प्रवक्ता की हैसियत से बचाव करते रहे गौरव बल्लभ और पिछले आम चुनाव में दक्षिण दिल्ली से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ चुके मुक्केबाज बिजेंद्र सिंह जैसे तमाम अहम नेताओं ने इस बीच कांग्रेस को छोड़ भाजपा में शामिल हो चुके हैं। मध्य प्रदेश के कई विधायक, मध्य प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष रहे सुरेश पचौरी आदि न जाने कितने नाम हैं, जो कांग्रेस को छोड़ चुके हैं। इसके पहले ज्योतिरादित्य सिंधिया की अगुआई में कांग्रेसी विधायकों का रेला ही भाजपा में शामिल हो चुका है।
कांग्रेसी नेताओं के लगातार भाजपा में शामिल होने से भाजपा के उन कार्यकर्ताओं में मायूसी है, जिन्हें लगता है कि आने वाले नेताओं की वजह से उनका अपना करीयर और भविष्य प्रभावित होगा। आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के निशाने पर भी भाजपा है। कांग्रेस ने तो भाजपा को वाशिंग मशीन का नाम ही दे दिया है और इसके इर्द-गिर्द अपना चुनावी अभियान भी चला रही है। कांग्रेस चाहे जो करे, लेकिन एक सवाल तो उठता ही है कि आखिर क्या वजह है कि उसके यहां से नेताओं की भागमभाग जारी है। आखिर कांग्रेस अपने नेताओं को रोक क्यों नहीं पा रही? अक्सर वह आरोप लगाती है कि प्रवर्तन निदेशालय, आयकर विभाग और सीबीआई का डर दिखाकर भाजपा इन नेताओं को अपने पाले में ला रही है। लेकिन सवाल यह है कि क्या कांग्रेस छोड़ दूसरे दलों में जो नेता जा रहे हैं, क्या उन पर भी यही दबाव है?
ऐसे सवाल उठाकर दरअसल कांग्रेस अपनी कमजोरियों को छिपाने की कोशिश कर रही है। कांग्रेस का संकट यह है कि भले ही मल्लिकार्जुन खरगे उसके अध्यक्ष हों, लेकिन पार्टी पर सिर्फ और सिर्फ पकड़ गांधी-नेहरू परिवार की ही है। सोनिया गांधी अपने स्वास्थ्य कारणों से इन दिनों ज्यादा सक्रिय नहीं हैं, लेकिन पार्टी पर तकरीबन पूरा नियंत्रण राहुल गांधी है। पार्टी में प्रियंका भी सत्ता के एक केंद्र के रूप में स्थापित हैं। कई मुद्दों पर पार्टी के इतने पावर सेंटरों में एका नहीं है। इन नेताओं के इर्द-गिर्द अपनी खेमेबाजी है। एक और तथ्य पर किसी का ध्यान नहीं जा रहा है। पार्टी पर पूर्ण नियंत्रण रखने वाले राहुल गांधी की सलाहकार मंडली में वामपंथी सोच के लोग भरे पड़े हैं, वहीं प्रियंका के इर्द-गिर्द भी युवा वामपंथियों की घेरेबंदी हैं। इन सलाहकारों का संकट यह है कि वे अपने नैरेटिव के इर्द-गिर्द सुझाव और सलाह देते हैं। कांग्रेस कुछ संदर्भों में भले ही नैरेटिव को बढ़ावा देने वाली पार्टी जरूर रही, लेकिन उसकी सोच पर जमीनी पकड़ और चिंतन वाले नेताओं का ज्यादा असर रहा। इसलिए कांग्रेस लगातार आगे बढ़ती रही। वह जमीन से जुड़ी रही। कांग्रेस में जमीन से जुड़े नेताओं और मुद्दों से विचलन 1986 से तेज होना दिखता है। तब नजमा हेपतुल्ला और बेगम आबिदा अहमद जैसी नेताओं की सलाह पर चलते हुए राजीव गांधी ने शाहबानो प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया। तब कांग्रेस के जमीनी नेताओं की नहीं सुनी गई। इसके बाद से जमीनी नेता कांग्रेस में लगातार किनारे होते चले गए। नरसिंह राव की स्थिति चूंकि खुद ही नाजुक थी, लिहाजा वे संतुलन बनाकर चलते रहे। उनके बाद पार्टी की लंबे समय तक कर्णधार रही सोनिया भी कुशलता पूर्वक वामपंथी सोच और जमीनी सोच में संतुलन बिठाती रहीं। लेकिन राहुल गांधी इससे आगे निकल गए। उनके इर्द-गिर्द बड़े और अनुभवी नेता भले हों, लेकिन उनकी चलती कम ही है। वे अपने युवा नेताओं की ही सलाह पर काम करते नजर आते हैं। इसीलिए वे भाजपा या प्रधानमंत्री मोदी पर जब हमला करते हैं तो उनकी भाषा भी कई बार असंयमित हो जाती है और कई बार मूल मुद्दे गायब हो जाते हैं। आज जमाना सोशल मीडिया का है। इस माध्यम का जो अलगोरिदम है,उसमें वामपंथी विचार पनपने और फैलने की गुंजाइश ज्यादा है। इसलिए राहुल की भाषा और उनके कदम भी वामपंथी अलगोरिदम वाले सोशल मीडिया पर वामपंथ के कथित चिंतकों के सहयोग से फैल जाते हैं। तब कांग्रेस की युवा ब्रिगेड इसकी तारीफ करते नहीं अघाती। इस पूरी प्रक्रिया कांग्रेस का आज का आलाकमान भूल जाता है कि वर्चुअल वर्ल्ड और जमीनी हकीकत में बहुत अंतर है। इस अंतर को पाटने में मौजूदा कांग्रेसी आलाकमान लगातार चूक रहा है और यही वजह है कि देश की सबसे पुरानी पार्टी इक्का-दुक्का मौकों को छोड़ दें तो लगातार चुनावी पराजय झेल रही है।
सवाल यह है कि जब पार्टी लगातार चुनावी पराजय का सामना कर रही हो, पार्टी के बेहतर लोग लगातार हाशिए पर जा रहे हों तो ऐसे में कोई नेता या कार्यकर्ता कितने दिनों तक अपना उत्साह बनाए रखेगा। अपने फैसलों और सोच में पार्टी कई बार अपने कार्यकर्ताओं को भी निराश करती है। जिस निराशा को संजय निरूपम और गौरव बल्लभ ने अपने तईं जाहिर भी किया है। फिर राहुल गांधी और उनके सलाहकार उचित मौके पर उचित कदम उठाने के आकलन में लगातार चूक रहे हैं।
कांग्रेस जैसी पार्टी के नेता को जब गठबंधन बनाना चाहिए था, उम्मीदवारों के नाम पर मंथन करना चाहिए था, तब वह न्याय यात्रा निकाल रहा था। नीतीश कुमार ने गैर भाजपा दलों को इंडिया गठबंधन के बैनर तले एक साथ लाने की कोशिश की। इसके बाद देश में मोदी विरोधी राजनीतिक ताकतों की उम्मीद भी बढ़ी थी। लेकिन राहुल को ही आगे रखने की सोच वाली कांग्रेसी सलाहकार मंडली ने नीतीश को संयोजक बनाने के मसले पर अनदेखा किया। फिर नीतीश ने अलग राह चुन ली। नीतीश का इंडिया गठबंधन से बाहर जाना कांग्रेसी सलाहकार मंडली की ही नाकामी है। पश्चिम बंगाल की धाकड़ नेता ममता बनर्जी कांग्रेस से गठबंधन की उम्मीद लगाए रखीं, लेकिन कांग्रेस आलाकमान न्याय यात्रा में मसरूफ रहा। ममता ने एकला चलो की राह अपना ली। राहुल गांधी को जब यात्रा पर निकलना चाहिए था, तब वे उम्मीदवारों और गठबंधन पर मंथन करते रहे। इससे पार्टी की उम्मीदें लगातार धूमिल होती गईं। जब पार्टी की उम्मीदें धूमिल होती रहें, जब पार्टी के दमदार नेताओं और कार्यकर्ताओं की उपेक्षा होती रहे, उनकी सलाह की कोई अहमियत ना रह जाए, जब उनकी दावेदारी ही नकार दी जाए तो फिर वह कितनी देर तक धैर्य रख पाएगा? यही वजह है कि कांग्रेस के नेता लगातार भाग रहे हैं।
नेताओं की भगदड़ को लेकर सवाल राजनीतिक विचारधारा का भी उठ रहा है। कहा जा रहा है कि राजनीतिक नेताओं की अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता नहीं रह गई। इसमें दो राय नहीं कि किसी भी दल के प्रति वैचारिक प्रतिबद्धता सिर्फ और सिर्फ उसके शीर्ष नेतृत्व में ही दिख रही है। बाकी नीचे के ज्यादातर लोग अनुयायी भर हैं, जिन्हें अपने करीयर को भी आगे बढ़ाना है। जब करीयर प्रभावी हो, जब नेतृत्व उम्मीद नहीं जगा पा रहा हो, जब नेतृत्व तक नेता और कार्यकर्ता की राय नहीं पहुंच रही हो और अगर पहुंच भी रही हो तो उसे अहमियत नहीं दी जा रही हो तो नेता फिर क्यों अपना समय बर्बाद करेगा। कांग्रेस से भाग रहे नेताओं का मूल कारण यही है। कांग्रेस आलाकमान की ओर से कार्यकर्ताओं की अनदेखी और उसकी वामपंथ केंद्रित सोच पर बढ़ती निर्भरता ही इस भगदड़ के लिए प्रमुख रूप से दोषी है। यह बात और है कि कांग्रेस का मौजूदा आलाकमान इन कारणों पर गौर ही नहीं कर रहा।

उमेश चतुर्वेदी
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)
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