
उमेश चतुर्वेदी
देश ही नहीं, पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन की समस्या से जूझ रही है। कुछ साल पहले तक देश का पश्चिमी इलाका जहां बारिश की कमी से जूझता रहता था, वहीं अब यह इलाका हर साल बाढ़ से जूझ रहा है। गुजरात के सूरत, केंद्र शासित प्रदेश दादरा नागर हवेली का सिलवासा इस बार भारी बरसात के बाद बाढ़ से जूझते रहे। मुंबई भी एक बारिश के बाद पानी-पानी हो गई। जबकि पहले जहां भारी बारिश होती थी, उन इलाकों मसलन पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार आदि बारिश की कमी से जूझ रहे हैं। उत्तर भारत के इलाकों में भी पहले की तुलना में कम बारिश हो रही है। ऐसी स्थित में देश में कहीं जल की कमी हो रही है तो कहीं जल की अधिकता हो रही है। इसका असर बरसात के बाद के दिनों में पूरे देश को भुगतना पड़ रहा है। किसी इलाके में पेयजल और सिंचाई के लिए पानी की कमी हो जा रही है तो किसी इलाके में पानी अधिक बरसने के बावजूद उसका इस्तेमाल नहीं हो पाता। ऐसे में पारंपरिक जल प्रबंधन प्रणालियों को पुनर्जीवित करने और चेक डैम जैसी छोटी जल संरचनाओं के निर्माण की ओर देश का ध्यान देना बेहद अनिवार्य समझा जा रहा है।
मौसम विभाग के आंकड़ों के अनुसार, भारत में प्रतिवर्ष औसतन लगभग 4,000 अरब घन मीटर यानी 4,000 घन किलोमीटर पानी वर्षा और बर्फबारी के रूप में बरसता है। देश में औसतन लगभग 117 से 120 सेंटीमीटर (या 1,170 मिमी) बारिश होती है। इस वर्षा का लगभग 75 प्रतिशत हिस्सा अकेले जून से सितंबर के बीच दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान बरसता है। लेकिन इस पानी का सिर्फ 1126 घन किलोमीटर ही इस्तेमाल या संचयन हो पाता है। कुल बरसे पानी में का ज्यादा हिस्सा या तो भाप बनकर उड़ जाता है या फिर नदियों और नालों के जरिए बहते हुए समुद्र में समा जाता है। लेकिन इस बारिश में भी अनियमितता होती है। किसी इलाके में जोरदार बारिश होती है तो किसी इलाके में औसत से भी कम। मौजूदा मानसून सीजन का ही उदाहरण लें तो चौंकाने वाले निष्कर्ष सामने आते हैं। देश में दक्षिण-पश्चिम मॉनसून धीरे-धीरे रफ्तार पकड़ रहा है और 29 जुलाई 2026 तक बारिश की राष्ट्रीय कमी घटकर 15 प्रतिशत रह गई है। खेती के लिए महत्वपूर्ण उत्तर-पश्चिम भारत में वर्षा की कमी केवल दस प्रतिशत और मध्य भारत में सिर्फ एक प्रतिशत रह गई है। इसके बावजूद देश के कई बड़े कृषि क्षेत्रों में अब भी बारिश का गंभीर संकट बना हुआ है।
इन पंक्तियों के लिखे जाते वक्त तक के भारत मौसम विभाग के ताजा आंकड़ों के अनुसार पूर्वी और उत्तर-पूर्वी भारत में सामान्य से 30 प्रतिशत कम बारिश हुई है। वहीं देश के दक्षिणी प्रायद्वीपीय इलाके में भी 26 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई है। खरीफ के सीजन में कम बारिश की वजह से कई राज्यों के किसानों की चिंता बढ़ गई है। इस बार के अभी तक के आंकड़ों पर भरोसा करें तो कई राज्य ऐसे हैं, जहां उनके औसत से कम बारिश हुई है। सबसे ज्यादा कमी बिहार में दिख रही है, जहां सबसे ज्यादा 41 प्रतिशत बारिश की कमी दर्ज की गई है। हैरत की बात है कि हिमालय के बीच बसे मेघालय राज्य में 58 प्रतिशत कम वर्षा हुई है जबकि मणिपुर और अरुणाचल प्रदेश में 41 और 41 प्रतिशत की कमी रिकॉर्ड की गई है.
आंध्र प्रदेश में 36 प्रतिशत, केरल में 35 प्रतिशत, नगालैंड में 35 प्रतिशत, गोवा में 35 प्रतिशत और पंजाब में 33 प्रतिशत कम बारिश हुई है। झारखंड में 30 प्रतिशत तथा असम में 29 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है। इसके अलावा तेलंगाना, हरियाणा, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश और मिजोरम भी कमजोर मॉनसून की मार झेल रहे हैं। देश के औसत बारिश के आंकड़ों को देखेंगे तो पता चलता है कि समूचे देश में करीब पंद्रह फीसद ही बारिश कम हुई है। लेकिन राज्यों के इन आंकड़ों से साफ है कि भारी बारिश उन राज्यों में हुई, जो अतीत में बारिश की कमी से जूझते रहते हैं। जाहिर है कि इसमें महाराष्ट्र, गुजरात, गोवा जैसे राज्य शामिल हैं।
ये तो भारत की बात है। इस साल यूरोप ने भी बदलते मौसम चक्र का नतीजा देखा है। जहां तापमान चालीस डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया था। फ्रांस में गरमी के चलते हजारों लोगों की जान गई। वैश्विक स्तर पर जलवायु परिवर्तन और अनियमित मानसून के चलते लंबे सूखे का सामना दुनिया को करना पड़ रहा है। भारत भी इसी वैश्विक समुदाय का हिस्सा है। इस वजह से वैश्विक स्तर पर पर जल संकट और मिट्टी का कटाव तेजी से बढ़ रहा है। ऐसे में विकेंद्रीकृत जल संचयन के लिए चेक डैम एक टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल समाधान पेश करते हैं।
दुनियाभर की संस्कृतियों में जल संचयन की परंपरा रही है। भारत में तो आधुनिक उदारीकरण आने के पहले तक समुदाय और ग्रामीण समाज अपने-अपने इलाके में जल संचयन की पारंपरिक, देसी और स्थानीय स्तर पर सहज सुलभ के साथ ही स्थानीय तकनीक और जरूरत के हिसाब से जलसंचयन तकनीक अपनाते रहे हैं। जल शक्ति मंत्रालय की पहली लघु सिंचाई और जल निकाय गणना रिपोर्ट के अनुसार, देश में जल संरक्षण योजनाओं, परक्युलेन तालाब और चेक डैम की कुल संख्या लगभग दो लाख 26 हजार 217 है। लेकिन ध्यान रहे, इतनी बड़ी संख्या होने के बावजूद देश के जल संचयन और निकायों का यह हिस्सा महज 9.3 प्रतिशत ही है। जल शक्ति मंत्रालय के अनुसार, देश में कुल जल निकायों की संख्या 24 लाख 24 हजार 540 दर्ज की गई है। इसमें तालाब, टैंक, जलाशय और चेक डैम आदि सभी शामिल हैं। सबसे ज्यादा ये ग्रामीण क्षेत्रों में हैं। जाहिर है कि भारतीय ग्रामीण समाज जल संचयन के लिए पहले से ही ज्यादा तैयार रहा है। उदारीकरण के बाद भारत में एक बदलाव आया। छोटी चीजों की बजाय हमारा फोकस बड़ी चीजों पर बढ़ने लगा। बड़े बांध, बड़े जलविद्युत उत्पादन केंद्र आदि की ओर ना सिर्फ सरकारी फोकस बढ़ा, बल्कि ग्रामीण समाज ऐसे ही सोचने लगा। लेकिन जिस तरह बारिश की अनियमितता बढ़ रही है, उससे जरूरी है कि छोटे चेक डैम और बनाए जाएं। स्थानीय स्तर पर समुदायों को इस प्रक्रिया से जोड़कर उन्हें इसके लिए तैयार किया जान चाहिए। वैसे मनरेगा, जो अब जीरामजी हो गया है, उसके तहत पहले से ही स्थानीय स्तर पर तालाब खुदवाने और भूजल स्तर को बढ़ाने के लिए स्थानीय स्तर पर काम किए जा रहे हैं। लेकिन इस कटु सत्य को भी स्वीकार किया जाना चाहिए कि मनरेगा में स्थानीय पंचायती स्तर से लेकर ब्लॉक स्तर तक घनघोर भ्रष्टाचार है। इसकी वजह से सरकारी मद से मिले पैसे खर्च तो दिख रहे हैं, लोगों को स्थानीय स्तर पर रोजगार तो मिलता दिख रहा है, लेकिन उस खर्च के जो जमीनी नतीजे होने और दिखने चाहिए, वे न तो दिख रहे हैं और न ही मिल रहे हैं। इसलिए जरूरत है कि इसमें भ्रष्टाचार रोकने के लिए कारगर तंत्र विकसित किया जाए।
भारत अपने बारिश और नदी आदि के जल का सिर्फ पच्चीस फीसद हिस्सा ही भूजल को रिचार्ज करने में इस्तेमाल कर पाता है। पंजाब और राजस्थान जैसे राज्यों में भूजल स्तर गंभीर स्तर तक गिर चुका है। फसलों के आधुनिक और विकसित किस्मों के प्रयोग के चलते इन राज्यों में पानी की जरूरत ज्यादा है। किसान भूजल का ही ज्यादा इस्तेमाल करते हैं। इसलिए जरूरी है कि चेक डैम बनाए जाएं और भूजल को रिचार्ज किया जाए।
भारत की गतिशील भूजल संसाधन मूल्यांकन रिपोर्ट के अनुसार, देश में कुल वार्षिक भूजल पुनर्भरण यानी रिचार्ज 448.52 बिलियन क्यूबिक मीटर है। इसमें सालाना निकासी के लिए जल की उपलब्धतता करीब 407.75 बिलियन क्यूबिक मीटर है। इनमें से वार्षिक भूजल निकासी 247.22 बिलियन क्यूबिक मीटर दर्ज की गई है, जिससे राष्ट्रीय औसत दोहन स्तर 60.63 फीसत प्रतिशत है। इसमें से देश खेती के लिए कुल भूजल निकासी के लगभग 87 प्रतिशत हिस्से का उपयोग कर पाता है। इस आंकड़े के अनुसार, देश में करीब 730 से अधिक इलाके ऐसे हैं, जहां भूजल का अत्यधिक दोहन किया जा रहा है। यह सौ प्रतिशत से भी ज्यादा है। इसमें पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे इलाके शामिल हैं। जिनमें भूजल का स्तर बेहद गंभीर स्थिति में है। इतना ही नहीं, कई क्षेत्रों में भूजल में तय सीमा से अधिक नाइट्रेट, फ्लोराइड और यूरेनियम की मात्रा पाई गई है। पूर्वी उत्तर प्रदेश के बलिया, बिहार के आरा, छपरा, बक्सर समेत कई इलाके के भूजल में खतरनाक स्तर तक आर्सेनिक पाया गया है। पश्चिम बंगाल के 24 परगना जिले का भी भूजल स्तर इस बीमारी से जूझ रहा है।
जाहिर है कि इन सब समस्याओं का समाधान छोटे चैक डैम बनाकर ही किया जा सकता है। बारिश के पानी को रोकने और भूजल को रिचार्ज करके ही स्थितियां बदली जा सकती हैं। बड़े बांध बनाने के लिए बड़ी पूंजी, बड़ा इलाका और वक्त चाहिए। इसलिए जरूरी है कि सरकारी स्तर पर भी छोटे चैक डैम बनाए जाएं। इससे भविष्य में भूजल का रिचार्ज बढ़ेगा, पानी की गुणवत्ता भी बढ़ेगी और खेती के साथ ही पेयजल के लिए भरपूर पानी उपलब्ध होगा। बदलते मानसून चक्र में भारत के लिए यह सोच जल की अमोल निधि को उपलब्ध कराने में मददगार होगी। इससे जहां देश का नक्शा बदलेगा, वहीं सूखे और कम बारिश की वजह से होने वाले खेती के नुकसान को भी रोका जा सकेगा।
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)
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