इस्लाम का वह बेड़ा, जिसकी ध्वजा विश्वभर में फहरा चुकी थी, किसी प्रकार का भय जिसका मार्ग न रोक सका था, जो अरब और बलूचिस्तान की मध्य वाली अम्मान की खाड़ी में भी नहीं रुका था और लालसागर में भी नहीं झिझका था, जिसने सातों समंदर अपनी ढ़ाल के नीचे कर लिये थे, वह गंगाजी के दहाने में आकर डूब गया।
ये पंक्तियां एक कट्टरपंथी मौलाना अल्ताफ हुसैन हाली ने 18वीं शताब्दी में लिखी थीं। जिसमें उसने इस बात पर बेहद अफसोस जाहिर किया था कि जिस इस्लाम ने सऊदी अरब, फारस यानी ईरान और मिस्र जैसे विशाल देशों को जीतकर उनका पूर्ण इस्लामीकरण करने में मात्र चंद साल लगाए, उसी इस्लाम की धार भारत आकर कुंद पड़ गई।
ऐसे ही ब्रिटिश इतिहासकार इयान ऑस्टिन लिखते हैं कि अगर इस्लाम के प्रति हिंदुओं का प्रतिरोध नहीं होता, तो संपूर्ण विश्व का इस्लामीकरण हो चुका होता।
यानी कि अगर सनातन हिंदू संस्कृति ने इस्लाम के बर्बर आक्रमण का प्रतिरोध नहीं किया होता, तो पूरा एशिया एक विवेकहीन और अंधे मजहबी कट्टरपंथ के परचम तले आतंक के अंधेरे में डूब चुका होता। वास्तव में यह संपूर्ण विश्व को हिंदू संस्कृति की सबसे बड़ी देन है कि उसने इस्लामी आक्रमणकारियों को जबरदस्त टक्कर देते हुए संसार को बचाए रखा। लेकिन इसका नतीजा क्या हुआ?
सदियों के संघर्ष में उलझा भारत
सनातनियों द्वारा इस्लाम को सफलतापूर्वक टक्कर देने का नतीजा यह हुआ कि सदियों के लिए भारत युद्ध का मैदान बन गया और सैकड़ो वर्षों से अपनी आस्था, परंपरा, संस्कृति पर हमले सहन कर रहा है। इस बात के प्रतीक हैं, हमारे मंदिर और मठ, जिन्हें तोड़कर उनके उपर मस्जिद और दरगाहें बना दी गईं। एक अनुमान के मुताबिक भारत में 30 हजार से ज्यादा मंदिरों का विनाश कर दिया गया। जिनमें काशी विश्वनाथ मंदिर के उपर बनी ज्ञानवापी मस्जिद (वाराणसी), केशवदेव मंदिर के उपर बनी शाही ईदगाह मस्जिद (मथुरा), संभल के हरिहर मंदिर पर बनी जामा मस्जिद, अजमेर के जैन और सरस्वती मंदिर के स्थान पर बना अढ़ाई दिन का झोपड़ा, वाग्देवी सरस्वती के मंदिर पर बनी मस्जिद(धार, मध्य प्रदेश), सूर्यदेव मंदिर पर बनी आलमगीरी मस्जिद(खजुराहो) और दिल्ली में 27 हिंदू मंदिरों को तोड़कर बनी कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद (कुतुब मीनार परिसर) कुछ प्रमुख उदाहरण हैं। यही नहीं हमारी आस्थाओं पर आज भी हमले किए जाते हैं। कभी पवित्र देव प्रतिमाओं को तोड़ने की कोशिश की जाती है, तो कभी धार्मिक जूलूस पर पथराव किया जाता है, सोशल मीडिया पर हिंदू आस्थाओं का मजाक बनाया जाता है और जब कोई सनातनी युवा क्रोध में आकर इस्लामी प्रतीकों का अपमान कर देते हैं तो 'सर तन से जुदा' जैसे नारे लगाए जाते हैं। यानी कि हमारा संघर्ष अब तक जारी है और हाल फिलहाल में इसका कोई अंत दिखाई नहीं देता। क्योंकि दोनों में कोई भी झुकने के लिए तैयार नहीं है।
मंदिर और मूर्तियों का तोड़ा जाना मनोवैज्ञानिक युद्ध
इस्लामी हमलावरों ने हिंदू मंदिरों को प्रमुख रुप से निशाना बनाया। यह सिलसिला 7वीं शताब्दी में मोहम्मद बिन कासिम के हमले से शुरु होकर, मोहम्मद गौरी, गजनी, कुतुबद्दीन ऐबक से होते हुए औरंगजेब से लेकर 17वीं शताब्दी तक चलता रहा। इस दौरान हजारों मंदिर तोड़े गए। हालांकि इस्लाम पूरे भारत पर काबिज होने में सफल नहीं हो पाया था। गांव-देहात और दूरदराज के इलाकों में बसे आम हिंदू अब भी इस्लाम का प्रखर प्रतिरोध कर रहे थे। लेकिन इस्लामी फौजों ने प्रमुख हिंदू शासकों को हरा कर शासन व्यवस्था अपने कब्जे में ले ली थी। जिसका नतीजा यह था कि इस्लाम भले ही भारतीयों के मनो-मस्तिष्क पर कब्जा नहीं कर पाया।

लेकिन प्रशासनिक तौर पर कट्टरपंथी मौलाना मजबूत हो चुके थे। उन्हें साफ तौर पर लगता था कि हिंदुओं के मंदिर यदि तोड़ दिए जाएं तो उनका मनोबल टूट जाएगा। हिंदू मंदिर तोड़े जाने के पीछे मनोवैज्ञानिक दबाव बना कर धर्मांतरण कराना एक प्रमुख मकसद हुआ करता था। मंदिरों को तोड़ने के बाद मुल्लों-मौलवियों द्वारा तकरीरें की जाती थीं कि जब तुम्हारा देवता खुद को नहीं बचा सकता तो तुम्हें कैसे बचाएगा। कई इस्लामी शासकों ने मंदिरों को तोड़कर और लोगों को अपमानित करके उन्हें इस्लाम स्वीकार करने के लिए मजबूर करने का भी प्रयास किया। इस तरह की कार्रवाई से हिंदुओं में असुरक्षा और भय की भावना पैदा होती थी। लेकिन यह कट्टरपंथी यह नहीं जानते थे कि एक सनातनी का हृदय स्थल ही उसके आराध्य का मंदिर होता है, जहां उसकी आस्था निश्शंक होकर विश्राम करती है। यही वजह है कि मंदिर तोड़े जाने से हिंदुओं का मनोबल नहीं टूटा। क्योंकि हमारे धर्मग्रंथों ने हमें पुनर्चक्रण का सिद्धांत दिया है। यानी कि हमारा संघर्ष इस जन्म तक नहीं बल्कि अगले जन्म और उसके बाद तक जारी रहेगा। इस आस्था ने हिंदुओं को कभी टूटने नहीं दिया। जिसका नतीजा है कि भारत भूमि पर सनातन धर्म शाश्वत है।
इसके अलावा मंदिरों को सिर्फ पूजा स्थल नहीं, बल्कि शक्ति, समृद्धि और संस्कृति का प्रतीक माना जाता था। कई मंदिरों में अकूत धन और संपत्ति होती थी। जिसे लूटने के लिए इस्लामी आक्रमणकारी मंदिरों पर हमला करते थे। इसके अलावा इस्लाम में मूर्तिपूजा को वर्जित माना गया है, इसी कारण कई मुस्लिम शासकों ने मूर्तियों और मंदिरों को तोड़ने के आदेश दिए। उनका मानना था कि वे अपने मजहबी कर्तव्य का पालन कर रहे हैं।
मंदिरों पर क्रूर इस्लामी प्रहार का प्रमुख प्रतीक ज्ञानवापी
प्राचीन काल से काशी विश्वनाथ मंदिर की महत्ता अक्षुण्ण रही। यहां श्रद्धालु दर्शन के लिए आते रहे। लेकिन इतिहास में मुस्लिम काल शुरु होने के बाद इस मंदिर पर संकट के बादल मंडराने लगे।
11वीं शताब्दी में महमूद गौरी ने बनारस के मंदिरों को तोड़ने का जिम्मा अपने गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक को दिया। जिसने प्राचीन अविमुक्तेश्वर मंदिर समेत बनारस के 1000(एक हजार) मंदिर तोड़ दिए। बाद में गोरी ने कुतुबुद्दीन को भारत का शासक बना दिया और लौट गया। सन् 1197 में कुतुबुद्दीन ने बनारस में एक मुस्लिम प्रशासक की नियुक्ति की। जिसने सनातन प्रतीकों पर काफी जुल्म किए।

1296 ईस्वी में बनारस के लोगों ने अविमुक्तेश्वर मंदिर को मुक्त करा लिया और उसपर फिर से भव्य मंदिर का निर्माण किया गया।
14वीं शताब्दी में अलाउद्दीन खिलजी के शासन काल में बनारस के मंदिर फिर से तोड़ दिए गए। उस समय जौनपुर के शर्की शासकों ने मंदिर तुड़वाने का जिम्मा उठाया। इसके बाद बहुत समय तक मंदिर खंडहर बना रहा। 15 वीं शताब्दी में सिकंदर लोदी के समय में फिर से बनारस के मंदिरों पर हमला किया।
साल 1585 ईस्वी में मुगल सम्राट अकबर के शासन काल के दौरान उनके नवरत्नों में से एक वित्त मंत्री टोडरमल से उनके गुरु नारायण भट्ट ने आग्रह किया कि भगवान विश्वेश्वर के मंदिर का पुनर्निर्माण कराया जाए। जिसके बाद शास्त्रीय विधि विधान से ज्ञानवापी कुंड के बगल में विश्वनाथ मंदिर को फिर से बनाया गया। जिसके बाद अगले 84 सालों तक वहां पूजा अर्चना होती रही। इस बीच जहांगीर और शाहजहां ने भारत पर शासन किया। लेकिन पूजा जारी रही।
लेकिन इसके बाद अकबर के धर्मांध पोते औरंगजेब का शासन काल शुरु हुआ। जिसने साल 1669 में बनारस के सभी मंदिरों को तोड़ने का आदेश जारी किया। उसी दौर में ज्ञानवापी के उपर मस्जिद का निर्माण किया गया। जो कि वर्तमान समय में भी खड़ी है। इस मस्जिद के निर्माण के लिए मंदिर के टूटे हुए मलबे का इस्तेमाल किया गया। जिसे वर्तमान समय में भी देखा जा सकता है।
हालांकि वर्तमान समय में मुसलमान मौलवी और कट्टरपंथी औरंगजेब द्वारा मंदिर ढहा दिए जाने को नकार रहे हैं। लेकिन उनका झूठ इसी बात से साबित हो जाता है कि औरंगजेब के जमाने में दर्ज इतिहास में मंदिर को तोड़ दिए जाने का उल्लेख मिलता है।
औरंगजेब ने 8 अप्रैल 1669 को अपने सूबेदार अबुल हसन को विश्वनाथ मंदिर तोड़ने का आदेश दिया। जिसके पांच महीने बाद यानी सितंबर 1669 को अबुल हसन ने औरंगजेब को जवाब में कि ‘मंदिर को तोड़ दिया गया है और उस पर मस्जिद बना दी गई है।’औरंगजेब का यह फरमान अपने मूल स्वरुप में एशियाटिक लाइब्रेरी, कोलकाता में आज भी सुरक्षित रखा हुआ है।
इसके अलावा औरंगजेब के दरबार में रोजनामचा दर्ज करने वाले इतिहासकार लेखक साकी मुस्तइद खां की लिखी हुई किताब ‘मआसिर-ए- आलमगीरी’ में विश्वनाथ मंदिर के ध्वंस का वर्णन है। मुस्तइद खान ने अपनी किताब में लिखा है कि औरंगजेब को ये सूचना मिली थी कि तत्ता, मुल्तान और विशेष तौर पर बनारस के ब्राह्मण झूठी शिक्षा (इस्लामी नजरिए से) का प्रसार कर रहे हैं और उनके बहकावे में मुसलमान भी आ रहे हैं। जिससे नाराज होकर आलमगीर ने बनारस के सभी मंदिरों को तोड़ने का आदेश दे दिया।
ऐतिहासिक ज्ञानवापी पर आज भी मस्जिद बनी हुई है। लेकिन अविमुक्तेश्वर मंदिर टूटने के बाद सनातनी जनता में बेहद निराशा फैल गई थी। जिसे दूर करने करने के लिए मंदिर टूटने के 108 साल बाद यानी साल 1777 में मालवा की महारानी ने प्राचीन ज्ञानवापी परिसर के बगल में काशी विश्वनाथ मंदिर का निर्माण कराया। जिसके बाद साल 1828 में नेपाल के राजा ने इस परिसर में नंदी को स्थापित किया। लाहौर के सनातनी सिख महाराजा रणजीत सिंह ने विश्वनाथ मंदिर के शिखर को सोने से मढ़वाया। यही मंदिर आज आस्था का केन्द्र बना हुआ है।
लेकिन अविमुक्तेश्वर का मूल स्थान और ज्ञानवापी कुंड पर आजादी के 75 सालों बाद भी हिंदुओं को पूजा का अधिकार नहीं मिल पाया है। जिसके लिए कानूनी लड़ाई चल रही है।
क्या है दूसरे विवादित स्थलों का हाल
अभी हाल ही में उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले के कोतवाली इलाके में मौजूद मकबरे को लेकर विवाद बढ़ गया है. हिंदुओं ने दावा किया है कि मंदिर के जगह पर मकबरा बनाया गया है। कुछ दिन पहले हिंदू पक्ष के लोगों ने मकबरे में तोड़फोड़ भी कर दिया। हालांकि प्रशासन की सूझबूझ से ज्यादा कुछ नहीं हुआ।

जौनपुर की शाही अटाला मस्जिद को हिंदू देवी अटाली का मंदिर होने का दावा किया गया है। इसको लेकर याचिकाएं भी दायर की गई हैं। लेकिन इस विवाद पर मंदिर मस्जिद प्रशासन का कहना है कि यहां 1398 से नियमित रूप से मुसलमान नमाज अदा कर रहे हैं। स्वराज वाहिन एसोसिएशन की तरफ से दायर की गई याचिका में बताया गया है कि यह पहले अटाला देवी मंदिर था, जिसे 13वीं सदी में राजा विजय चंद्र ने बनवाया था। उसी जगह यहां मस्जिद बना दी गई।
संभल की शाही जामा मस्जिद को लेकर भी खूब बवाल हुआ था। हालात यहां तक हो गए थे कि शहर में कर्फ्यू तक लगाने पड़े थे। शाही जामा मस्जिद के सर्वे को लेकर विवाद बढ़ गया था। हिंदुओं का दावा है कि यह मस्जिद नहीं बल्कि विष्णु भगवान का मंदिर है। हालांकि मुस्लिम पक्ष लगातार हिंदू पक्ष के दावों का खारिज करता रहा है।

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श्री सिंहा योगिनी

यह खंडित प्रतिमा मध्य प्रदेश के जबलपुर में भेड़ाघाट मंदिर में स्थित है। इस प्रतिमा को औरंगजेब के शासनकाल के दौरान तोड़ा गया था। अखंडित अवस्था में इस प्रतिमा का मुख सिंह यानी शेर के समान होता है। जो कि भगवान नरसिंह की नारी शक्ति को दर्शाता है। इस प्रतिमा का मुख विकृत किया गया है और दोनों हाथ भी तोड़ दिए गए हैं।
श्रीरुपिणी योगिनी

यह अत्यधिक सुंदर प्रतिमा भी मुगलों के द्वारा तोड़ी गई है। योगिनी देवी का यह स्वरुप माता लक्ष्मी के जैसा है, जो कि धन वैभव की देवी मानी जाती हैं। यह प्रतिमा व्याल पर आरुढ़ दर्शाई गई हैं। लेकिन देवी के चारों हाथ खंडित हैं और उनका चेहरा भी विकृत करने की कोशिश की गई है। यह प्रतिमा भी खंडित अवस्था में मध्य प्रदेश के भेड़ाघाट में स्थित है।
कामदा देवी

भारतीय परंपरा में अर्थ, धर्म और मोक्ष के अतिरिक्त काम को भी अत्यधिक महत्व दिया गया है। जबलपुर में स्थित यह प्रतिमा कामदा यानी काम प्रदान करने वाली देवी की है। जिनकी चार भुजाएं हैं। लेकिन विधर्मी आक्रांताओं ने कामदा देवी की इस प्रतिमा के स्तन और चारों हाथ खंडित कर दिए। क्योंकि वह नहीं चाहते थे कि भारतीय विरासत की प्रतीक यह सुंदर प्रतिमाएं दुनिया की नजरों के सामने आएं।

अंशुमान आनंद
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