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किसके हैं अंबेडकर? संसद में छिड़ी दिलचस्प जंग

 Whose is Ambedkar? Interesting battle broke out in Parliament

संसद के शीतकालीन सत्र 2024 में अंबेडकर के नाम की गूंज दिखी। मुझे लगता है कि आजादी के 75 साल बाद जब नरेन्द्र मोदी सत्ता में आए तब जाकर भारतीय संविधान के निर्माता बीआर अंबेडकर को भारतीय राजनीति में इतना ज्यादा महत्व मिला और अंबेडकर साहब की इच्छाएं पूरी होने लगीं। इतिहास गवाह है कि कांग्रेस पार्टी ने ही बी.आर अंबेडकर को सबसे ज्यादा अपमानित किया है। साथ ही यह भी एक स्थापित तथ्य है कि कांग्रेस शासकों ने कभी भी दलितों, अल्पसंख्यकों के विकास पर जोर नहीं दिया और गरीबी उन्मूलन के लिए कोई कदम नहीं उठाया।

पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी का गरीबी हटाओ नारा वास्तव में बहुत प्रेरणादायक था, लेकिन अब भी समाजशास्त्री ये विश्लेषण करने में लगे हैं कि क्या इस गंभीर मुद्दे के समाधान के लिए उन्होंने वास्तव में कोई कदम उठाया था या नहीं।  श्रीमती गांधी ने केवल गरीबी हटाओ का नारा दिया, जिसकी वजह से उन्हें वर्षों तक गरीबों-दलितों का समर्थन मिलता रहा। बिल्कुल ऐसा ही इस्तेमाल बीआर अंबेडकर साहब का भी किया गया। कांग्रेस ने आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों के सामाजिक उत्थान के अम्बेडकर की वास्तविक इच्छा को कभी लागू ही नहीं किया। अंबेडकर ने अपनी किताब में जाति के आधार पर आरक्षण के विरुद्ध विचार व्यक्त किए। वास्तव में, यदि कोई सामाजिक उत्थान की नीतियों को लागू करने के लिए सिद्धांतों को बारीकी से देखेगा, तो उसे साफ तौर पर समझ में आएगा कि अपने लंबे शासनकाल के वर्षों में, कांग्रेस ने गरीबी उन्मूलन और जाति-आधारित आरक्षण के बीआर अंबेडकर की ख्वाहिशों के विरुद्ध काम किया है।

अब भले ही प्रियंका गांधी वाड्रा का संसद भवन में कितना भी 'जय भीम' का नारा लगा लें। इससे बीआर अंबेडकर की इच्छाओं की पूर्ति नहीं होगी। कोई आसानी से कह सकता है कि यह सिर्फ प्रतीकात्मक राजनीति है, जैसा कि कांग्रेस आजादी के बाद से ही अपने पक्ष में वोट जुटाने के लिए करती आ रही  है, इससे ज्यादा कुछ नहीं।  बल्कि, सच तो ये है कि नरेंद्र मोदी ने भारत के प्रधान मंत्री बनने के बाद हमारे देश के दलितों, ओबीसी, एससी और एसटी को मजबूत करने के लिए नीतियों को कड़ाई से लागू किया। मोदी सरकार ने न केवल भारत में बल्कि वैश्विक स्तर पर बीआर अंबेडकर को प्रासंगिक बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।  कांग्रेस को ये जवाब देना होगा कि इतने लंबे शासनकाल के बावजूद वह मध्य प्रदेश में अंबेडकर के जन्मस्थान पर स्मारक बनाने में क्यों विफल रही?

कांग्रेस शासन में लगभग सभी राष्ट्रीय और राज्य के प्रमुख संस्थानों, राजमार्गों, पार्कों, इमारतों और स्मारकों के नाम नेहरू,  इंदिरा या राजीव जैसे गांधी परिवार के सदस्यों के नाम पर रखे गए।  कांग्रेस पार्टी यह भी दावा करती है कि अंग्रेजों से देश को आजादी कांग्रेस ने दिलाई, लेकिन वास्तविकता यह है कि स्वतंत्रता संग्राम के दौरान विभिन्न विचारधाराओं के सभी नेता, देशभक्त, लेखक और प्रमुख सामाजिक नेता एक साथ काम कर रहे थे। इसलिए स्वतंत्रता संग्राम का श्रेय स्वतंत्र रूप से कांग्रेस पार्टी को नहीं दिया जा सकता। आरएसएस कार्यकर्ताओं ने भी स्वतंत्रता संग्राम के लिए काम किया। 1962 में कांग्रेस सरकार ने चीन के साथ युद्ध के दौरान आरएसएस से मदद मांगी थी। भाजपा की पूर्ववर्ती जनसंघ में रहते हुए अटल बिहारी वाजपेयी ने राष्ट्रीय हितो के मुद्दे पर हमेशा कांग्रेस सरकार का समर्थन किया था।

अब विपक्ष के नेता राहुल गांधी को एक परिपक्व राजनेता की तरह व्यवहार करना चाहिए और उन्हें कम से कम अपनी पार्टी और परिवार के पूर्ववर्तियों और भाजपा से भी यह सीखना चाहिए कि रचनात्मक विपक्ष की भूमिका कैसे निभाई जानी चाहिए। भारत अब एक परिपक्व लोकतंत्र है जहां युवाओं की संख्या सबसे अधिक है। अब समय बदल गया है और राहुल गांधी को एक जिम्मेदार विपक्षी नेता की तरह व्यवहार करना चाहिए क्योंकि पूरी दुनिया की नजर भारत की प्रगति पर है। उन्हें भारत और भारतीय मूल्यों को समझना होगा। उन्हें भारत की सांस्कृतिक भावनाओं और इसकी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का सम्मान करना चाहिए। उन्हें पूरा भारतीय संविधान और साथ ही मनुस्मृति भी पढ़नी चाहिए।  क्योंकि मनुस्मृति में इस बात का विशेष तौर उल्लेख है कि कैसे एक महिला हर जगह विशेष सम्मान की हकदार होती है। नागालैंड की एक महिला सांसद ने लोकसभा अध्यक्ष को लिखा कि कैसे राहुल गांधी उन पर चिल्लाए और वह असुरक्षित महसूस कर रही थीं? संसद के मकर गेट पर हाथापाई करने के लिए  राहुल गांधी के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है। जिनकी वजह से 69 वर्षीय प्रताप चंद्र सारंगी और 55 वर्षीय मुकेश राजपूत जैसे दो सांसद आरएमएल अस्पताल नई दिल्ली के आईसीयू में भर्ती हैं। मनु स्मृति कहीं भी महिलाओं, बुजुर्गों का अपमान करने का उपदेश नहीं देती है। सदन में अनियंत्रित व्यवहार, अनुशासनहीनता पर लगाम लगनी चाहिए। निर्वाचित प्रतिनिधियों को, चाहे वे किसी भी दल के हों, अपने स्वाभिमान और अंततः हमारे महान राष्ट्र की छवि के प्रति जागरूक होना चाहिए।

क्योंकि राजनीति का उद्देश्य राष्ट्र की सेवा करना है न कि स्व-लक्ष्य प्राप्त करना। राष्ट्र प्रथम और स्वयं अंतिम... नारे का सभी निर्वाचित प्रतिनिधियों को पालन करना चाहिए। जब हम मानते हैं कि पूरी दुनिया हमारा परिवार है, तो हम पक्षपातपूर्ण राजनीति और प्रतीकवाद का समर्थन कैसे कर सकते हैं?





दीपक कुमार रथ

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