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किसका इंडिया और किसका भारत

Whose India and Whose India?

भारत के राजनीतिक इतिहास में 17-18 जुलाई 2023 का दिन बाद में याद किया जाता रहेगा। इसी दिन कर्नाटक की राजधानी में सोनिया गान्धी अपनी सन्तानों  राहुल गान्धी और प्रियंका गान्धी   समेत बेंगलुरू में पधारी थीं । वहाँ देश के कुछ दूसरे नए पुराने राजवंश भी एकत्रित हुए थे। मसलन मरहूम मुलायम सिंह का राजवंश , लालू यादव का राजवंश , चौधरी चरण सिंह का राजवंश , मरहूम करुणानिधि का राजवंश। इसके अतिरिक्त कुछ ज्ञात-अज्ञात राजनीतिक दल भी हाज़िर थे। केजरीवाल की आम आदमी पार्टी उन्हीं में से एक है।  लेकिन केजरीवाल के लिए इंडिया का इतना ही मतलब था कि दिल्ली सर्विस बिल किसी तरह राज्य सभा में पारित हो जाए। राज्यसभा में भाजपा और उसके सहयोगी दलों का बहुमत नहीं है। इसलिए केजरीवाल कांग्रेस को धमका रहे थे। कांग्रेस इस बिल का विरोध करने को तैयार हो गई। लेकिन केजरीवाल का दुर्भाग्य ही कहना होगा कि यह बिल राज्य सभा में पास नहीं हो सका। पंजाब में कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष सार्वजनिक रूप से कह रहे हैं कि दिल्ली में कांग्रेस केजरीवाल के साथ समझौता कर सकती है लेकिन पंजाब में यह समझौता नहीं हो सकता। वैसे जो नए पुराने राजवंश भी आए थे उन्होंने भी देशकाल की जरुरत के अनुसार अपने अपने लिए राजनीतिक दल बना रखे  थे। कुछ ने स्वयं बनाए थे और कुछ ने बने बनाए राजनीतिक दल पर कब्जा कर लिया था। उदाहरण के लिए सोनिया गान्धी ने अपने पति की दुखद  मृत्यु के बाद देश के सबसे पुराने राजनीतिक दल इंडियन नैशनल कांग्रेस पर ही कब्जा कर लिया था। ये सभी दल किस लिए बेंगलुरू में एकत्रित हुए थे ? मुख्य मुद्दा को यही था कि राजवंशों को भारत के लोकतंत्र से किस प्रकार बचाया जाए ? पिछले कुछ वर्षों से भारत के लोगों में नई चेतना और जागृति देखी जा रही है। वे विदेशी उपनिवेशवाद मानसिकता से मुक्त होते दिखाई दे रहे हैं। इससे सबसे बड़ा धक्का देश के सबसे पुराने राजवंश , जिस पर सोनिया गान्धी ने येन केन प्रकारेण कब्जा कर लिया था, को ही लगा। यह राजवंश भारत के लोकतंत्र का शिकार होकर पक्षाघात की स्थिति में आने लगा था।  सोनिया गान्धी को इस बात का श्रेय देना होगा कि उन्होंने अपने देश इटली के ही मैकियावली के सभी तौर तरीक़ों का प्रयोग करते हुए , कम्युनिस्टों व कुछ अन्य छोटे मोटे दलों  की सहायता से दस साल तक इस राजवंश को किसी न किसी तरह परोक्ष रूप से ही सही मनमोहन सिंह को आगे करके  सत्ता पर बिठाए रखा था। लेकिन ऐसी आपाधापी में सभी को  यह डर लगा रहता है कि पता नहीं लोग उन्हें कब उखाड फेंकेंगे।  इसलिए इस  प्रकार के संक्रमण काल में आमतौर पर सत्ताधारी  समूह कोयलों की दलाली में मशगूल हो जाते हैं।  जाहिर है कोयलों की दलाली में मुँह तो काला होगा ही। वह हुआ और उनकी शिनाख्त भी हो गई। उसका जो परिणाम हो सकता था , वही हुआ। राजवंश सत्ता से बाहर हो गए।  उन्हें सत्ता से बाहर हुए लगभग दस साल हो गए हैं। इसी बीच राजकुंवर जवान हो गए। कई राजवंशों के राजकुंवर तो अधेड़ हो गए । कुछ राजकुमारों ने तो अपनी अपनी रियासतों में अपनी ताजपोशी कर ली है। लेकिन राहुल गान्धी का मामला जम नहीं रहा। पिछली बार तो अमेठी से लोकसभा का चुनाव ही हार गए थे। राजकुमारों का इससे मन दुखता है। इसलिए वे आजकल संसद में ही ‘फ्लाइंग किस” उछाल रहे हैं। लेकिन क्या किया जाए , भारत में सत्ता का रास्ता अब लोकतंत्र में से होकर ही गुज़रता है। राजकुमारों को भी आग का यह दरिया पार करना ही होता है। पिछली बार राहुल गान्धी इसी दरिया में डूब गए थे। गोताखोरों ने बडी मुश्किल से उन्हें सुदूर केरल के वायनाड में सही सलामत बाहर निकाला । लेकिन राजकुमारों के साथ एक और समस्या है। उनका अपनी वाणी पर नियंत्रण नहीं होता । मनप्रीत बादल ने ठीक कहा है कि धागा लम्बा हो तो उसे लपेट कर रखो और जीभ लम्बी हो तो उसे समेट कर रखो नहीं तो वे उलझ जाते हैं। लेकिन जीभ को लपेटना तो राजकुंवरों के लिए तौहीन ही कही जाएगी । इसी जीभ के कारण राहुल गान्धी क़ानून की पकड़ में आ गए । यह अलग बात है कि उनके वक़ील कहते हैं कि राजकुमारों पर लोकतंत्र के वे क़ानून लागू नहीं होते जो आम आदमी पर लागू होते हैं । उच्चतम न्यायालय ने राहुल गान्धी की सजा स्थगित करते हुए उन्हें पुन: लोकसभा अन्दर जाने का अवसर तो दे दिया लेकिन कांग्रेस की लोकसभा में एक सीट बढ़ जाने से सत्ता के शिखर तक तो नहीं पहुँचा जा सकता।  अब राहुल गान्धी पुन: सत्तारूढ़ होने के लिए हर प्रकार का टोना टोटका करते हुए घूम रहे हैं। कभी कह रहे हैं कि मैं मोहब्बत की दुकानें खोल रहा हूँ। शायद लोकसभा में उछाला गया हवाई चुम्बन इसी दुकान का अगला सामान है। वे कभी ट्रक में बैठ जाते हैं । कभी किसी खेत में घुस जाते हैं। कभी सर्दी में भी आधे बाँह की क़मीज़ पहन कर घूमते हैं। कभी दाढ़ी बढ़ाते हैं और अचानक कटवाने में भी देर नहीं लगाते। राजवंशों की परम्परा तो बेटे को गद्दी देने की ही है। अलबत्ता वंश में बेटा न हो तो अलग बात है। लेकिन यहाँ ‘अलग बात’ तो नहीं है। लेकिन राजवंश को लगता है कि इतने टोटकों के बाद भी लोकतंत्र का भरोसा नहीं है। राहुल गान्धी की  ताजपोशी होगी या नहीं ? इसलिए बेटी प्रियंका गान्धी को भी मैदान में उतार दिया है। भाई-बहन दोनों मिल कर हिन्दुस्तान पर राज करेंगे। लेकिन करेंगे कैसे ?


अब 2024 में लोकसभा के लिए चुनाव होने वाले हैं। राजवंशों को लगता है यह आख़िरी मौक़ा है। यदि इस बार चूक गए तो शायद फिर कभी मौक़ा न मिले। राजवंश पुरानी रियासतों की तरह इतिहास बन जाएँगे। आम लोगों के बलबूते बने राजनीतिक दल बचे रहेंगे। बेंगलुरु में जमावड़ा इसी हताशा में से निकला था । दरअसल इस देश में एक इंडिया है और दूसरा भारत है। इंडिया वह है जिसका निर्माण , उसकी पहचान अंग्रेज़ों ने इस देश पर अपने दो सौ साल के शासन काल में की है। अंग्रेज़ मानते थे कि भारत समाप्त हो चुका है , वह इतिहास के अन्धेरे में गुम हो चुका है। इस भूमि पर अलग अलग समुदायों के लोग रहते हैं जिनका आपस में कोई सम्बध नहीं है। वे एक दूसरे से अनजान ही नहीं बल्कि एक दूसरे के शत्रु भी हैं । उनका कोई इतिहास नहीं है , कोई संस्कृति नहीं है। उनमें से अधिकांश तो बाहर से ही आए हुए हैं । इसलिए रुडयार्ड किपलिंग कहा करते थे , ये लोग Whitman’s burden हैं। इनको सभ्य बना कर एक नए राष्ट्र का निर्माण करना पड़ रहा है । यदि आजादी की लडाई को ही देखा जाए तो जवाहर लाल नेहरु अपने को इंडिया की विरासत से जोड़कर देखते थे । वे भी कहा करते थे कि हम एक नंए राष्ट्र का निर्माण कर रहे हैं। लेकिन महात्मा गान्धी और सरदार पटेल अपने आप को भारत की विरासत से जोड़ते थे । यही कारण था कि नेहरु महात्मा गान्धी का सम्मान तो करते थे , जिसके अनेक राजनीतिक कारण हो सकते हैं लेकिन वे महात्मा गान्धी के चिन्तन को स्वीकार नहीं करते थे। यहाँ तक कि उन्होंने महात्मा गान्धी के हिन्द स्वराज के थीसिस को भी अस्वीकार कर दिया था।


 राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व सरसंघचालक सुदर्शन जी कहा करते थे कि हमारे देश में इंडिया और भारत में लडाई छिड़ी हुई है। इंडिया भारत को पराजित करना चाहता है। लेकिन इंडिया की आत्मा और विरासत इतनी सशक्त और प्राचीन है कि वह इसमें सफल नहीं हो पाता। लेकिन अंग्रेज़ों के चले जाने के बाद भारत की सत्ता जिन लोगों के हाथ में आई वे भारत का नहीं इंडिया का प्रतिनिधित्व करते थे। संविधान बनाते समय भी इंडिया और भारत की यह लडाई चलती रही । लेकिन बाबा साहिब आम्बेडकर ने अपने संविधान में स्पष्ट कर दिया कि जिसको तुम इंडिया कह रहे हो वह दरअसल भारत है । भारत प्राचीन है । उसी की विरासत को सम्भालने के लिए आम्बेडकर ने बहुत प्रयास करके संस्कृत सीखी थी । उसी की विरासत को बचाने के लिए आम्बेडकर ने नागपुर में दीक्षा ली थी । नेहरु के आम्बेडकर विरोध का एक कारण यह भी था कि नेहरु अंग्रेज़ों के बनाए  इंडिया से चिपके हुए थे और आम्बेडकर भारत की आत्मा से जुड़े थे । कांग्रेस के भीतर भी यदि किसी कालखंड में भारत का कोई प्रतिनिधि आ गया तो उसकी दुर्दशा ही हुई । सरदार पटेल व नेहरु का विवाद किसी से छिपा नहीं है ।  लालबहादुर शास्त्री की हत्या से आज तक पर्दा नहीं उठा है । नरसिम्हा राव का तो दाह संस्कार भी दिल्ली में नहीं हो सका । उन  की स्मृति का भी आज की कांग्रेस जिस प्रकार अपमान कर रही है , उसका भी यही कारण है ।


नरेन्द्र मोदी के केन्द्र में आ जाने से इंडिया हाशिए पर चला गया है और भारत केन्द्र में आ गया है । भारत की ज़ुबान सत्ता के गलियारों में भी सुनाई देने लगी है । संथाल भी राष्ट्रपति बन सकते हैं । मृतप्राय भारतीय भाषाओं में भी जान आने लगी है । भारत इंडिया की ज़ुबान अंग्रेज़ी को छोड़ कर अपनी जनभाषाओं में बोलने लगा है । भारतीय संस्कृति के प्रतीक पुन: नज़र आने लगे हैं । एक समय था जब पंडित जवाहर लाल नेहरु ने राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद को इसलिए हड़का दिया था कि वे कुम्भ में चले गए थे जो भारतीय संस्कृति का पुण्य प्रवाह है । सरदार पटेल को इसलिए अपमानित होना पड़ा था कि उन्होंने सोमनाथ के मंदिर को पुन: बनाने का प्रयास किया था । डा० राजेन्द्र प्रसाद के तो इस अवसर पर दिए गये भाषण का ही सरकारी आकाशवाणी ने बहिष्कार कर दिया था । वे दिन थे जब भारत पर इंडिया का राज था । लेकिन दिन बदले । भारत स्वयं ही जागृत हो गया । कभी सुभद्रा कुमारी चौहान ने लिखा था , बूढ़े भारत में भी आई फिर से नई जवानी थी । अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का शिलान्यास स्वयं भारत के प्रधानमंत्री कर रहे हैं । काशी विश्वनाथ का पुराना वैभव लौट आया है । उज्जैन में महाकाल लोक साकार हो उठा है । भारत जाग गया है । इसलिए इंडिया कसमसा रहा है । इसे इतिहास की नियति ही कहना होगा कि इंडिया को भारत पर लादने के प्रयास इतालवी मूल  की सोनिया गान्धी कर रही हैं । लगता है इतिहास ने अपना एक चक्र पूरा कर लिया है । संविधान सभा में बाबा साहिब आम्बेडकर का दिया अंतिम भाषण सभी को पढ लेना चाहिए , उसी में से रास्ता मिल जाएगा ।

 


डॉ. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री
(लेखक हिमाचल प्रदेश केन्द्रीय विश्वविद्यालय धर्मशाला के पूर्व कुलपति हैं)
(आलेख में व्यक्त विचार लेखकों के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)

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