नई दिल्ली: यूपी की सत्ता ..बड़े चेहरों की जंग ..वर्चस्व की लड़ाई.. कौन आएगा सत्ता में ...ये बड़े सवाल यूपी में आगामी चुनाव को लेकर तो हैं ही पर इन सबके परे यूपी में धरातल पर पार्टियों के बीच बड़ी और दिलचस्प जंग देखने को मिल रही है। आमतौर पर संडे को जनता के साथ ही नेता लोग बी रेस्ट मोड पर होते हैं पर यूपी में इन दिनों ऐसा जरा भी देखने को नहीं मिल रहा है। वर्चस्व कायम करने के लिए संडे एस ए ग्रेट वर्किंग डे का पाल हो रहा है। संडे को यूपी में सत्ता हो या फिर विपक्ष कोई भी लीडर छुट्टी पर नहीं था। सब के सब ओवरटाइम कर रहे थे। सीएम योगी ,अखिलेश यादव दोनों ही लखनऊ में अपने-अपने लीडरों के साथ यूपी को अपने झोली में डालने के लिए जुटे थे। अखिलेश यादव PDA में D पर जोर लगा रहे थे, तो ओवैसी कानपुर में मुस्लिम वोट गिन रहे थे। सब अपनी-अपनी ताकत दिखा रहे थे। अपने अपने वोटर को सेट कर रहे थे क्योंकि यूपी में एक एक वोट की लड़ाई है। कोई नेता नहीं कह सकता कि इस बार मेरे इस वोट सेंध नहीं लग पाएगी। हर वोट के कई दावेदार हैं। कोई नहीं बता सकता कि जाति जुड़ेगी या टूट जाएगी। कोई गारंटी नहीं कि मुसलमान बीजेपी को हराने के लिए ही वोट देगा। और क्या पुस्तैनी सीटें सुरक्षित हैं यह भी बड़ा सवाल है।

चुनाव में लॉ एंड ऑर्डर पर विपक्ष वोट मांगता है। लेकिन यूपी में उलटा हो रहा है। सीएम योगी लॉ एंड ऑर्डर के इस मुद्दे पर वोट मांग रहे हैं और अखिलेश इस मुद्दे से सीधे तौर पर भागते नजर आ रहे हैं। इस बीच 27 में 27 हजार वोट जोड़ने का एक नया फॉर्मूला आ गया है। पश्चिम से लेकर पूरब तक यूपी की सारी सियासी जमात मैदान में 2027 का हिसाब किताब निकालने में जुट गए हैं। सीएम योगी द्वारा पर्वों और त्योहारों की श्रृंखला ,स्थानीय स्तर पर होने वाले आयोजनों की सकुशल संपन्न होने की बात कही जा रही है। गौर करने वाली बात अब ये है कि यूपी अब वो यूपी नहीं हैं। 2017 के पहले यूपी का नक्शा कुछ और था और अब जाहिर तौर पर यूपी का नक्शा कुछ और है। कई जगहों पर क्षेत्रों में काम बड़े पैमाने पर हुए हैं, चाहे वो सुरक्षा हो, रोड ट्रांसपोर्ट की सुविधा हो या फिर शिक्षा । इसके अलावा भी कई क्षेत्रों में काम हुए है जो पूर्ववर्ती सरकार के दौरान नहीं हुए थे यही कारण था की 2017 के बाद 22 में भी यूपी की कमान सीएम योगी को मिली औऱ बीजेपी और राजनैतिक विशेषज्ञों के द्वारा यही एक बार फिर कहा जा रहा है कि इस बार भी यूपी में कमल खिलेगा।इन सबके परे अखिलेश यादव का कहना कुछ अलग ही है।
हम पोस्टर वार और AI जनरेटेड वीडियो तो देख ही रहे हैं जो एक के बाद एक आईटी टीम की ओर से बनाई जा रही है और तीखे वार किए जा रहे हैं। एक तरफ अखिलेश यादव जनता को लुभाने के लिए फ्रीबीस यानी की मुफ्त के योजनाओं का राग अलाप रहे हैं तो वहीं सीएम योगी अपने सरकार के बीते दो कार्यकाल के कड़े फैसलों और कामों की गितनी दे रहे हैं ।देखना यह होगा की कौन इस जंग का असली विजेता बनेगा और किसकी ताजपोशी होगी। जहां एक ओर बीजेपी धरातल पर अपनी टीम मजबूत कर जनता को काम के वादे दे रही है तो वहीं अखिलेश यादव भी कुछ ऐसा ही करते नजर आ रहे हैं। कॉमन चीज यह है कि दोनों ही गुटों के बीच कड़ी फाइट देखने को मिल रही है। मैंने पहले भी बताया था कि यूपी की सत्ता में ब्राह्मणों की भूमिका अहम होती है तो उस पक्ष को मजबूत करने के लिए भी यूपी में सभी गुटों के बीच कड़ा कॉम्पटिशन देखने मिल रहा है।

इनमें सबसे ज्यादा चर्चा रायबरेली की हो रही है, जिसका जिम्मा रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के छोटे बेटे नीरज सिंह को दिया गया है। हाल ही में वे बीजेपी के उपाध्यक्ष भी बने हैं। राहुल गांधी की लोकसभा सीट रायबरेली पर बीजेपी का जिला प्रभारी बनाया जाने का मतलब है, बीजेपी राहुल गांधी और अखिलेश को यादव किसी भी छूट देने के मूड में नहीं है। जीत ही मुख्य लक्ष्य है। हालांकि, अखिलेश यादव, समाजवादी पार्टी का हर रोज नया नया फॉर्मूला लेकर आ रहे हैं। अखिलेश यादव 2027 चुनाव को लेकर दो फॉर्मूले लेकर आए। पहला फॉर्मूला हर विधानसभा में सपा का 27 हजार वोट बढ़ाएंगे और बीजेपी का 27 हजार वोट कम करेंगे। दूसरा फॉर्मूले में अखिलेश ने PDA के D पर जोर लगाया। आरोप लगाया कि बीजेपी सरकार में सबसे ज्यादा अंबेडकर की मूर्तियां तोड़ी गईं। दावा किया कि 72 जिलों में 151 से अधिक डॉ. अम्बेडकर की मूर्तियां तोड़ी गई हैं। तो यह जाहिर करता है कि अखिलेश भी 1-1 वोट के लिए लड़ रहे हैं और नए नए फार्मूले ला रहे हैं। देखना यह होगा कि यह फार्मूले कितने काम आते हैं। उधर, असदुद्दीन ओवैसी का फोकस मुस्लिम वोटर्स को साधने पर है। और अगर ओवैसी इस बार मुस्लिम वोट पाने में कामयाब हो जाते हैं तो वो जीते या ना जीते, अखिलेश की साइकिल को कमजोर जरूर कर सकते हैं। खैर यह बात रही यूपी में सियासी हलचल की और वर्चस्व के लिए एड़ी चोटी के जोर लगाए जाने की क्योंकि गड़ है यूपी और फतह ही है सभी का लक्ष्य बस देखाना यह है कि जीत किसकी होगी काम की या फिर वादों की।
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