तमाम राजनीतिक पंडितों के अनुमानों और एक्जिट पोल को धत्ता बताते हुए डोनाल्ड ट्रंप ने इतिहास रच दिया है। 132 साल बाद वे अमेरिका के दूसरे ऐसे राष्ट्रपति बनने जा रहे हैं, जो हार के बाद ह्वाइट हाउस में वापसी में कामयाब रहा। ट्रंप की जैसी राजनीति रही है, चुनाव अभियान के दौरान उन्होंने जो वायदे किए हैं,उनके आलोक में दुनिया में दो तरह के भाव हैं। जिन्हें शक है कि ट्रंप के भावी कदमों से उनकी राजनीति, अर्थनीति और निजी जिंदगी पर नकारात्मक असर पड़ सकता है, वे परेशान हैं। लेकिन एक बड़ा वर्ग ऐसा भी है, जिसे लगता है कि ट्रंप के कदमों से उनकी राजनीति, अर्थनीति, विदेश नीति और निजी जिंदगी पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। इससे वह वर्ग अपने भविष्य को लेकर उम्मीद से भर उठा है।
ट्रंप के पहले कार्यकाल के दौरान उनसे प्रधानमंत्री मोदी के रिश्ते गर्मजोशी भरे रहे हैं। जो ट्रंप की विजय के बाद प्रधानमंत्री के ट्वीटर संदेश में भी दिखा। ऐसे में यह उम्मीद बेमानी नहीं है कि ट्रंप के आने के बाद भारत से अमेरिका के रिश्ते बेहतर होंगे। लेकिन ट्रंप ने चुनाव अभियान के दौरान एक वायदा भी किया है। वायदा यह कि शपथ लेते ही वह दो करोड़ अप्रवासियों को अमेरिका से बाहर का रास्ता दिखाएंगे। इस वायदे से भारत के भी अप्रवासी आशंकित हैं। उन्हें डर है कि अपने चुनावी वायदे के मुताबिक अगर ट्रंप कदम उठाने लगे तो उनकी नौकरियों और एच-वन वीजा पर असर पड़ सकता है। ट्रंप की जीत में अमेरिकी लोगों को काम और रोजगार देने के वायदे ने भी बड़ी भूमिका निभाई है। इसलिए यह उम्मीद की जाती है कि अमेरिका के निम्न मध्यवर्गीय लोगों की हालत सुधारने के लिए अगर कदम उठाते हैं तो तय है कि इसका असर भारतीय मूल के उन लोगों की नौकरियों पर भी पड़ सकता है, जो अमेरिका में वर्क वीजा पर काम कर रहे हैं। इससे अमेरिका के वीजा नियम कड़े हो सकते हैं। जिसका भारत के भावी पेशेवरों के अमेरिकी सपने पर भी ब्रेक लग सकता है।
लेकिन ट्रंप की वापसी के बाद वैश्विक स्तर पर कुछ बड़े बदलाव संभव हैं। ट्रंप रूस-यूक्रेन युद्ध में नाटो की ओर से यूक्रेन को मिलने वाले सहयोग पर सवाल उठा चुके हैं। वे कह चुके हैं कि यूक्रेन के राष्ट्रपति रूस से लड़ाई के नाम अमेरिका आते हैं को अरबों की मदद लेकर लौट जाते हैं। वे सवाल उठा चुके हैं कि अमेरिकी पैसे पर यूक्रेन का युद्ध क्यों लड़ा जाए। ऐसे में आशंका जताई जा रही है कि ट्रंप यूक्रेन युद्ध से अमेरिकी कदम पीछे खींच सकते हैं। जिसकी वजह से जेलेंस्की को पीछे हटना पड़ सकता है। बेशक ट्रंप को अभी रूस से जीत की बधाई नहीं मिली है। लेकिन पुतिन और ट्रंप की दोस्ती को पूरी दुनिया जानती है। ऐसे में माना जा रहा है कि अब युद्ध रोकने के लिए आपसी वार्ताओं का दौर शुरू हो सकता है। जिसमें जेलेंस्की और यूक्रेन को घाटा उठाना पड़ सकता है। शांति लौट सकती है, लेकिन अब तक रूस यूक्रेन के बड़े हिस्से पर कब्जा कर चुका है। इसलिए हो सकता है कि शांति के लिए उसे अपनी जमीन गंवानी पड़े। क्योंकि पुतिन भी हठी हैं और वे शायद ही पीछे हटें।
ईरान के राष्ट्रपति पेजेशियन भले ही दावा कर रहे हों कि ट्रंप की वापसी के बाद उनकी राजनीति पर कोई असर नहीं पड़ेगा। लेकिन ईरान पर असर पड़ने की संभावना बढ़ गई है। ट्रंप पहले ही ईरान के नाभिकीय और परमाणु केंद्रों के खात्मे की वकालत कर चुके हैं। इजरायल से जारी जंग में अभी तक इजरायल को ईरान के न्यूक्लियर अड्डों पर हमले के संकेत नहीं हैं। लेकिन ट्रंप ऐसे संकेत दे सकते हैं। इसके बाद इजरायल ईरान पर हमला कर सकता है। इसके बाद हो सकता है कि युद्ध और भड़क जाए। लेकिन इसकी संभावना ज्यादा है। ट्रंप इजराइल पर दबाव डाल सकते हैं कि वह अपने शत्रुओं के खिलाफ कठोर कार्रवाई करे।
भारत के पड़ोसी बांग्लादेश की अंदरूनी राजनीति पर भी असर पड़ने के आसार बढ़ गए हैं। चुनाव अभियान के दौरान ट्रंप बांग्लादेश के अल्पसंख्यक हिंदुओं पर हमले और सरकारी कार्रवाई का विरोध कर चुके हैं। वैसे शेख हसीना भी कह चुकी हैं कि जो बाइडेन प्रशासन की ओर से एक द्वीप उनसे मांगा गया,जिसे उन्होंने नहीं दिया तो बाइडन प्रशासन की शह पर षडयंत्र के तहत उनकी सरकार गिरा दी गई। फिर बांग्लादेश के कार्यवाहक प्रधानमंत्री मोहम्मद यूनिस ट्रंप की आलोचना भी कर चुके हैं। ऐसे में उम्मीद की जा रही है कि ट्रंप प्रशासन बांग्लादेश में भी बदलाव की वकालत करना शुरू करेगा। माना यह भी जा रहा है कि अमेरिका जल्द ही बांग्लादेश में निष्पक्ष चुनाव के लिए दबाव डाल सकता है। इसकी वजह से यूनिस की सत्ता खतरे में पड़ सकती है।
वैश्विक इतिहास में ट्रंप पहले ऐसे अमेरिकी या वैश्विक नेता हैं, जिन्होंने हिंदुओं की सुरक्षा के मुद्दे को खुलकर उठाया है। चुनाव अभियान के दौरान ही वे बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचार पर सवाल उठा चुके हैं। अब माना जा सकता है कि हिंदू हितों के संदर्भ में भारत सरकार को उनका साथ मिल सकता है। वैसे कनाडा के मंदिरों पर हुए हमले को लेकर विदेश मंत्रालय और मोदी-दोनों कनाडा पर सवाल उठा चुके हैं। ट्रंप के चलते अब बांग्लादेश में जारी अल्पसंख्यक उत्पीड़न पर भी भारत सरकार प्रभावी कदम आसानी से उठा सकती है।
अमेरिकी नीतियों पर ब्रिटेन और कनाडा की नीतियां आधारित रही हैं। अमेरिका में ट्रंप की वापसी के बाद कनाडा की अंदरूनी राजनीति पर भी असर पड़ेगा। हो सकता है कि आगामी चुनावों में जस्टिन ट्रूडो की पार्टी को हार का मुंह देखना पड़े, जबकि कनाडा की कंजर्वेटिव पार्टी बड़ी चुनावी जीत हासिल कर सकती है। जब कनाडा से ट्रूडो सरकार की विदाई होगी तो भारत से उसकी तनातनी कम हो सकती है। कनाडा की धरती से खालिस्तानी अलगाववाद को समर्थन भी कम हो सकता है। चूंकि ट्रंप और मोदी के रिश्ते बेहतर हैं। इसलिए भारत में यह भी उम्मीद जताई जा रही है कि अमेरिकी धरती से अब खालिस्तानियों को पहले के समान छूट नहीं मिलेगी । न्यूयार्क में रह रहे खालिस्तानी गुरुपतवंत सिंह पन्नू की जुबान इन दिनों कुछ ज्यादा ही चल रही थी। लेकिन ट्रंप के आने के बाद उम्मीद है कि पन्नू को अमेरिकी सरकार का समर्थन नहीं मिल पाएगा। ऐसे में उसकी जुबान अब थमेगी।
अपनी जीत के बाद ट्रंप ने समर्थकों के बीच दिए पहले भाषण में अपने समर्थन के लिए अमेरिका के हर समुदाय का धन्यवाद किया। उन्होंने यह भी कहा कि वे पूरे अमेरिका के राष्ट्रपति होंगे।लेकिन यह भी सच है कि ट्रंप इस्लामिक आतंकवाद के खुले विरोधी हैं। उनके चुने जाने के बाद अमेरिका में इस्लामी इकोसिस्टम को झटका लगेगा । उसे सरकारी स्तर पर समर्थन मिलना कम होगा। इसकी वजह से अमेरिकी दक्षिणपंथी ताकतें इस्लाम पर वैचारिक हमले बढ़ा सकती हैं। इसका असर वैश्विक स्तर पर पड़ेगा।
ट्रंप के चुने जाने के बाद क्वाड को बढ़ावा मिलना तय माना जा रहा है। क्वाड में जापान, भारत, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया हैं। क्वाड के जरिए ट्रंप चीन को घेरने की कोशिश करेंगे। इससे चीन की परेशानी बढ़ सकती है। चीनी सामानों पर वे शुल्क बढ़ा सकते हैं। इसकी वजह से चीन के सामने अपने पड़ोसी देशों से सहज संबंध बनाए रखने का दबाव बढ़ेगा। पाकिस्तान अभी से ही ट्रंप से आर्थिक सहयोग की उम्मीद लगाए बैठा है। हो सकता है कि ट्रंप अंदरूनी राजनीतिक दबाव में पाकिस्तान की मदद करें, लेकिन पाकिस्तान को इसके लिए ट्रंप सरकार की शर्तें बढ़ जाएंगी, जिनमें एक शर्त निश्चित तौर पर यह होगी कि वह भारत से रिश्ते बेहतर रखे।
बेशक ट्रंप के रूख पर नाटो देशों की राजनीति तय होगी, इससे यूरोपीय राजनीति में हिचकोले बढ़ सकते हैं। लेकिन यह भी तय है कि दक्षिण एशिया में स्थितियां कुछ बेहतर होंगी।

उमेश चतुर्वेदी
कंसल्टेंट, प्रसार भारती, भारत सरकार
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)
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