विश्व मौसम विज्ञान संगठन के अनुसार जलवायु परिवर्तन पृथ्वी के औसत दैनिक तापमान और मौसमी घटनाओं में दीर्धकालिक परिवर्तन है। वास्तव में अगर धरती के जलवायविक इतिहास का विश्लेषण किया जाये तो पृथ्वी पर प्राकृतिक तौर पर जलवायु परिवर्तन के प्रमाण मिलते रहे हैं जो की पृथ्वी के अपने अक्ष पर झुकाव तथा कार्बन डाई ऑक्साइड की मात्रा में परिवर्तन के कारण होता रहा है, किन्तु पिछले कुछ दशकों से मानवजनित कारणों से पृथ्वी का तापमान अप्रत्याशित रूप से बढ़ा है। मानवजनित कारणों में ऊर्जा के परम्परागत स्रोतों जैसे जीवाश्म ईंधन, कोयला, तेल, गैस इत्यादि प्रमुख हैं। वैश्विक उष्मन में ग्रीन हॉउस गैसों के उत्सर्जन में ये लगभग 75 प्रतिशत योगदान देते हैं साथ ही मानवीय गतिविधियों के फलस्वरूप प्रति वर्ष बिलियन टन (रिकॉर्ड स्तर पर ) कार्बन डाई ऑक्साइड गैस का उत्सर्जन हो रहा है जिसमें कमी आने के कोई संकेत नहीं दिखाई रहे हैं। जिसकी वजह से जलवायु संकट दिन-प्रतिदिन तीव्र गति से बढ़ रहा है तथा चरम मौसमी घटनाओं की बारम्बारता में वृद्धि देखी गयी है। बीते वर्ष 2024 में भी अनेक ऐसी अवांछित मौसमी घटनाएं देखने को मिलीं जो की जलवायु परिवर्तन के प्रत्यक्ष प्रमाण को प्रदर्शित करती हैं। इन चरम मौसमी घटनाओं के कारण बड़ी आपदाएँ और मानवीय क्षति दर्ज की गई ।
साल 2024 में विश्व के विभिन्न हिस्सों में रिकॉर्ड स्तर पर तापमान दर्ज किया गया। यूरोपीय जलवायु एजेंसी कोपरनिकस के अनुसार, 2024 अब तक का सबसे अधिक गर्म वर्ष रहा और यह पहला वर्ष है जब वैश्विक औसत तापमान निर्धारित पूर्व-औद्योगिक स्तर 1.5 डिग्री सेल्सियस से अधिक रहा। इसके अतिरिक्त अन्य जलवायु वैज्ञानिक समूहों जैसे वर्ल्ड वेदर एट्रिब्यूशन (WWA) और क्लाइमेट सेंट्रल की वार्षिक समीक्षा रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2024 में औसत से 41 दिन अधिक गर्मी के दिनों की संख्या दर्ज की गयी जब तापमान अपने अधिकतम स्तर पर था। भारत समेत विश्व के कई देशों में हीट वेव दर्ज किया गया। विभिन्न वैज्ञानिक अध्ययनों एवं रिपोर्ट के अनुसार बीते वर्ष करीब- करीब 219 चरम जलवायविक घटनाओं की पहचान की गयी जिससे 3700 लोगों की मृत्यु हुई और अनगिनत लोग विस्थापित हुए। इसके साथ ही कई विकासशील एवं द्वीपीय देशों को 130 से अधिक अतिरिक्त गर्म दिनों का सामना करना पड़ा। तापमान का यह बढ़ा हुआ स्तर न केवल महाद्वीपीय बल्कि महासागरीय क्षेत्रों में भी देखने को मिला। विदित है की महासागर मानव-जनित कारणों से उत्सर्जित अतिरिक्त ऊष्मा के शोषण का प्रमुख साधन है साथ ही ये बड़े पैमाने पर (लगभग एक चौथाई) कार्बनडाई ऑक्साइड का अवशोषण भी करते हैं कित्नु इन्हीं कारणों से महासागरीय तापमान में वृद्धि भी देखी जा रही है। जिससे समुद्री पारिस्थितिक तंत्र नकारात्मक रूप में प्रभावित हो रहा है एवं कोरल ब्लीचिंग जैसी समस्या भयावह गति से बढ़ रही हैं। साथ ही समुद्र के जलस्तर में भी निरंतर वृद्धि हो रही है जो की कई द्वीपीय देशों के अस्तित्व के लिए चिंताजनक विषय है।
इसी तरह पृथ्वी के दोनों ध्रुव जो की सतत रूप से जमी हुई बर्फ के चादर के रूप में पाए जाते हैं जिनका वैश्विक जलवायु को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण योगदान है, पिछले कुछ दशकों से वैश्विक उष्मन कि प्रक्रिया स्वरुप ये क्षेत्र (क्रायोस्फेर) खतरे में हैं। 2024 में उत्तरी ध्रुवी क्षेत्र (आर्कटिक प्रदेश) में अब तक का दूसरा अधिकतम उच्च तापमान दर्ज किया गया जिसकी वजह से यह सफ़ेद बर्फीला ध्रुवी क्षेत्र नीले रंग में परिवर्तित हो रहा है जो कि मूल रूप से बर्फ के पिघलने के परिणामस्वरूप हो रहा है। इस क्षेत्र में सन 1978 से ही बर्फ के पिघलने कि प्रक्रिया शुरू हो गयी थी जिसकी दर 12 प्रतिशत प्रति दशक है अर्थात एक दशक में लगभग 80,000 स्क्वायर किलोमीटर कि दर से बर्फ पिघल रही है। वैज्ञानिकों के अनुमान के अनुसार वो दिन दूर नहीं जब आर्कटिक प्रदेश बर्फ मुक्त हो जायेगा और ऐसा उनके द्वारा की गयी कल्पना से बहुत पहले (आने वाले साल 2027 कि ग्रीष्म ऋतु में ) देखने को मिल सकता है। यही नहीं पृथ्वी का दूसरा दक्षिणतम सिरा भी जलवायु परिवर्तन की चपेट में है। जहाँ एक तरफ आर्कटिक प्रदेश नीले रंग में परिवर्तित हो रहा है वहीं दूसरी तरफ अंटार्कटिक क्षेत्र हरे रंग में परिवर्तित हो रहा है। वैश्विक उष्मन के परिणामस्वरुप बर्फ की सतह कम होने से इस क्षेत्र में लाइकेन और मोसेस तेजी से वृद्धि कर रहे हैं और साल 2024 में इनके बढ़ने की प्रक्रिया 10 गुना तेजी से पायी गयी। इसी तरह काई (एल्गल ब्लूम) की विस्तारित सतह ने अंटार्कटिक के सफ़ेद बर्फीले परत को बड़े पैमाने पर हरे सतह में परिवर्तित कर दिया है। अतः हम देख सकते हैं की जलवायु परिवर्तन का परिणाम हमें न केवल रिहाइशी क्षेत्रों में बल्कि सुदूरतम निर्जन क्षेत्र में भी दिखाई दे रहा है।
इसी तरह साल 2024 में पृथ्वी के अन्य हिस्सों में भी असामन्य घटनाएं घटित हुईं। जैसे की अफ्रीका के सहारा प्रदेश में तीव्र बारिश। हम सभी जानते के हैं की सहारा क्षेत्र धरती पर सबसे सूखा और निर्जन प्रदेश है, बीते वर्ष यहाँ भी तीव्र एवं मूसलाधार वर्षा के कारण बाढ़ की स्थिति देखने को मिली जो की कई दशकों में पहली बार हुई थी। हालाँकि सहारा प्रदेश में भी कुछ इंच प्रति वर्ष की दर से वर्षा होती रहती है पर पिछले साल सितम्बर महीने में सहारा के कुछ हिस्सों में 8 इंच तक की बारिश देखने को मिलीं चूँकि यह वर्षा तीव्र एवं अकस्मात थी अतः इसने सहारा के मरू प्रदेश में भी बाढ़ जैसी गंभीर स्थिति उत्पन्न कर दी। किसी भी वैज्ञानिक समुदाय ने इस घटना का अंदाजा तक नहीं लगाया होगा जो हमें पिछले वर्ष देखने को मिला है। हालाँकि सहारा प्रदेश में हुई यह बारिश एक सुखद घटना होगी या त्रासदी इसका अनुमान कुछ सालों पश्चात संभावित रिसर्च के माध्यम से ही किया जा सकता है पर फ़िलहाल के लिए तो इसे एक मौसमी चरम घटना की श्रेणी में ही वर्गीकृत किया गया है जो की जलवायु परिवर्तन के परिणामों को समझने का एक महत्वपूर्ण माध्यम हो सकता है। सहारा में बाढ़ के कारण सूडान, नाइजीरिया, नाइजर, कैमरून और चाड देशों में कम से कम 2000 लोगों की मृत्यु हुई थी जो की जलवायु परिवर्तन के कारण हुए तीव्र मौसमी घटनाओं में से महज एक घटना थी फिर भी इससे होने वाले जान-माल की क्षति ज्यादा थी। अध्ययन में पाया गया है की यदि ग्लोबल वार्मिंग की दर 2 डिग्री सेल्सियस से अधिक हो जाती है तो इस सूखे प्रदेश में भी ऐसी वर्षा एवं बाढ़ सामान्य घटनाएं हो जाएंगी।
अतः यदि 2024 का समाकलन किया जाये तो भीषण गर्मी के कई रिकॉर्ड टूटे उसी तरह विश्व के कई मेट्रोपोलिटन शहरों में प्रदूषण रिकॉर्ड स्तर पर दर्ज किया गया। जंगल की आग से लेकर बाढ़, सूखा, भूस्खलन, चक्रवात इत्यादि सभी प्राकृतिक घटनाओं ने तबाही मचाई। अनुमानतः 2030 तक इन चरम घटनाओं की उपस्थिति 560 सालाना या प्रतिदिन 1.5 तक पहुँच जाएगी। जो की न केवल दैनंदिन क्रियाकलाप को प्रभावित करती हैं बल्कि आजीविका को नष्ट कर एवं परिवारों को विस्थापित कर बड़े पैमाने पर आर्थिक रूप से क्षति पहुंचाती हैं।
जलवायु परिवर्तन से होने वाले इन प्राकृतिक घटनाओं का खामियाजा विकासशील एवं पिछड़े देशों को ज्यादा मात्रा में भुगतना होता है, क्योंकि ये देश अभी भी गरीबी, भुखमरी से नहीं उबर पा रहे हैं। इन देशों की आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण ये अभी भी ऊर्जा के पारम्परिक स्रोतों पर ही निर्भर करते हैं। यदि विश्व के इन हिस्सों में ऊर्जा के पारम्परिक स्रोतों का इस्तेमाल होता रहा तो वैश्विक उष्मन के निर्धारित लक्ष्य को प्राप्त करना अपने आप में एक दुरूह राह हो जाएगी। अतः विश्व मंच को जलवायु परिवर्तन की समस्या से निपटने का सकारात्मक समाधान करने के लिए सबसे पहले आर्थिक, सामजिक, सांस्कृतिक (जीवन यापन के तरीकों में बदलाव) एवं तकनिकी चुनौतियों को दूर करना होगा साथ ही विकसित देशों को इसकी बागडोर सम्भालनी होगी तभी इस भयावह समस्या की तीव्रता को आने वाले कुछ दशकों में चरणबद्ध तरीके से कुछ हद तक सीमित या नियंत्रित किया जा सकता है। जैसा की अंतोनियो गुटेरेस ने नए साल की पूर्व संध्या पर अपने सम्बोधन में भी कहा " विश्व को विभाजित नहीं बल्कि एकजुट होकर संकल्पित होना होगा अतः जलवायु परिवर्तन को रोकना आवश्यक है और यह संभव है।"

स्मृति उपाध्याय
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)
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