बि हार के चुनाव परिणामों ने सबको चौंका दिया। इन चुनाव परिणामों ने बताया कि बिहार में लालू यादव के राष्ट्रीय जनता दल को भले ही 25 सीटें मिली हैं। लेकिन उनका वोट प्रतिशत सबसे ज्यादा यानी 23 फीसदी है। जबकि BJP को मात्र 20% वोट मिले हैं। लेकिन वह 89 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी हैं। यही वो आंकड़ा है, जिसे सामने रखकर विपक्ष एक बार फिर से वोट चोरी का आरोप लगा रहा है।
तो भाजपा का वोट प्रतिशत बढ़ जाता
राष्ट्रीय जनता दल का वोट प्रतिशत इसलिए ज़्यादा है। क्योंकि तेजस्वी यादव ने भाजपा से 42 ज्यादा यानी 143 सीटों पर लड़ने का फैसला किया था। उधर BJP ने मात्र 101 सीटों पर चुनाव लड़ा, जिसपर उसे 20 फीसदी वोट मिले। अगर भारतीय जनता पार्टी भी 143 सीटों पर चुनाव लड़ती, तो उसका वोट शेयर राष्ट्रीय जनता दल से बहुत ज्यादा हो सकता था। यह एकमात्र तर्क बिहार में वोट चोरी के आरोप को खारिज कर देता है। लेकिन कहानी यहीं तक सीमित नहीं है।
बिहार में हुआ गठबंधनों का युद्ध
अगर आप गठबंधन की दृष्टि से देखें, तो बिहार का चुनाव राजनीतिक पार्टियों ने अलग-अलग नहीं बल्कि गठबंधन बनाकर लड़ा था। इसलिए एक तरफ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी NDA था, दूसरी तरफ महागठबंधन था। जिसमें से NDA को बिहार की जनता के कुल मतदान का 46 फीसदी वोट प्राप्त हुआ, जबकि महागठबंधन के खाते में आए 38% वोट। यानी दोनों गठबंधनों को मिले वोट प्रतिशत में 8 फीसदी का फर्क दिखाई दिया। चुनावी राजनीति में यह अंतर बहुत ज्यादा माना जाता है। क्योंकि आम तौर पर देखा जाता है कि चुनाव में 1 से 2 फीसदी वोट प्रतिशत बड़ा भारी उलटफेर करने की ताकत रखता है। जबकि यहां तो दोनों गठबंधनों के बीच 8 फीसदी के वोट प्रतिशत का फर्क है। जिसने बिहार की राजनीति कि दिशा बदल दी।
लोकसभा चुनाव में भी यही था ट्रेंड
खास बात ये है कि यह कोई नया ट्रेंड नहीं है। एक साल पहले यानी 2024 में जब लोकसभा चुनाव हुए थे। तब भी एनडीए और महागठबंधन को मिले वोट प्रतिशत के बीच 8 फीसदी का ही
फर्क था। बिल्कुल यही वोट प्रतिशत विधानसभा चुनाव के दौरान भी रहा क्योंकि महागठबंधन इस अंतर को पाट नहीं पाया। लोकसभा चुनाव के दौरान एनडीए को महागठबंधन से 34 लाख ज्यादा वोट मिले थे। जबकि विधानसभा चुनाव में उसे 44 लाख ज्यादा वोट मिले।
एनडीए नेताओं की मेहनत रंग लाई"
इसके पीछे कारण यह है कि बिहार में चुनाव की घोषणा होते ही भाजपा और जेडीयू दोनों ने ही इसे बेहद गंभीरता से लिया और चुनावी तैयारी में जुट गए। वहीं राहुल गांधी और तेजस्वी यादव अपनी टीम के साथ रोड शो, हेलीकॉप्टर शो और तालाब में डुबकियां लगाते रह गए।
एनडीए नेताओं ने कितनी मेहनत की थी। यह जानने के लिए साल 2020 यानी बिहार में पिछले विधानसभा चुनाव के आंकड़ों पर गौर करें, जब राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को 2020 में 12 हज़ार वोट ज़्यादा मिले थे। लेकिन इस बार उन्हें 44 लाख ज्यादा वोट मिले हैं। इसके पीछे एनडीए नेताओं की मेहनत तो है ही साथ ही चुनावी रणनीति भी काम आती हुई दिखाई दी।

चिराग-कुशवाहा का असर
NDA को वोटों को इस बढ़त के पीछे चिराग पासवान की पार्टी को मिले 5% वोट और उपेंद्र कुशवाहा की आरएलएसपी को मिले 1% वोटों के योगदान को कम करके नहीं देखा जाना चाहिए। क्योंकि जब बिहार में साल 2020 के विधानसभा चुनाव हो रहे थे, तब चिराग और कुशवाहा दोनों की ही पार्टियां NDA का हिस्सा नहीं थीं। इन दोनों पार्टियों ने ना केवल निजी तौर पर अच्छा प्रदर्शन किया, बल्कि पूरे प्रदेश में अपने समर्थक वोटों को एनडीए के पक्ष में ट्रांसफर भी कराया।
उधर विपक्ष की रणनीति पर गौर करें, तो आप पाएंगे कि कांग्रेस और आरजेडी जहां खड़े थे वहीं स्थिर दिखाई दिए। मोटे तौर पर देखा जाए तो महागठबंधन यानी कांग्रेस और आरजेडी के वोट कम नहीं हुए हैं, लेकिन NDA का वोट जरुर बढ़ गया है क्योंकि उसमें लोकजनशक्ति पार्टी और आरएलएसपी को वोट बैंक जुड़ गया।
महागठबंधन की यह थी कमजोरी
बिहार में 2025 के विधानसभा चुनाव ने एक बात यह भी साबित कर दी है कि आरजेडी का पुराना MY यानी मुस्लिम यादव का फॉर्मूला अब जिताऊ नहीं ऊबाऊ बन चुका है, क्योंकि वह अपने इस वोटबैंक के समर्थन में दूसरा वोटबैंक तैयार नहीं कर पाई। जिसका खमियाजा उसे इस बार के विधानसभा चुनाव में भुगतना पड़ा। जब तक आरजेडी और कांग्रेस अपने लिए अतिरिक्त वोट बैंक तैयार नहीं होता, तब तक महागठबंधन जीत नहीं पाएगा। जैसे कि नीतीश कुमार ने अपनी स्वजातीय वोट बैंक के साथ महादलित और महिलाओं को वोट बैंक को जोड़ा है। क्योंकि नीतीश कुमार की शराबबंदी की नीति महिलाओं के लिए बड़ी राहत लेकर आई है। साथ ही इन चुनावों में एक बात यह भी स्पष्ट हो गयी है कि बीजेपी के वोट बैंक में नए युवा वोटर भी जुड़ते जा रहे हैं। जिन्होंने भाजपा को बिहार में सबसे बड़ी पार्टी बनाया।
पलटी नहीं मार पाएंगे नीतीश कुमार
इस चुनाव का एक कड़ा संदेश और भी है और वह नीतीश कुमार के लिए है। जो कि पलटी मारने के लिए मशहूर हैं। लेकिन इस बार के चुनाव परिणाम ने नीतीश कुमार के लिए पलटी मारने का मौका छोड़ा ही नहीं है। क्योंकि महागठबंधन को उतनी सीटें मिली ही नहीं है कि नीतीश कुमार कभी भी पलटी मारने को सोच भी पाएं। निःसंदेह 20 साल मुख्यमंत्री रहकर फिर से जीत जाना मज़ाक नहीं है। लेकिन बिहार की जनता के जेहन में लालू यादव के जंगलराज की डरावनी यादें अब तक ताजा हैं। यही वो फैक्टर है जिसने बिहार की जनता को नीतीश कुमार को जोड़े रखा।
राहुल गांधी की निजी हार
निजी तौर पर देखा जाए तो राहुल गांधी एक बार फिर से फेल होते हुए दिखाई दिए। उनका बड़बोलापन और वोट चोरी के आरोप ने जनता को खिन्न किया और उनसे दूर कर दिया। बल्कि राहुल गाँधी की तुलना मे तेजस्वी यादव ज्यादा परिपक्व दिखाई दिए। जिन्होंने कम से कम वह मुद्दे तो उठाये जो राज्य से संबंधित थे। हालांकि उनकी बातों पर उनके पिता के जंगलराज की यादें भारी पड़ीं। इसलिए तेजस्वी कोई कमाल नहीं कर पाए। वैसे भी तेजस्वी यादव मुंह में चांदी की चम्मच लिए पैदा हुए हैं। इसलिए व्यवहारिक ज्ञान का अभाव उनमें हर जगह दिखाई देता रहा। 3 करोड़ परिवार को सरकारी नौकरी का असंभव का दिखने वाला आश्वासन इसका सबसे बड़ा सबूत है।
बफर जोन बनकर रह गई कांग्रेस
लेकिन लालू को अब ये सोचना पड़ेगा कि कांग्रेस को और कितना ढोना है? लाख समझाने के बाद भी राहुल गाँधी वोट चोरी जैसे असंबंधित मुद्दे उठाते रहे और इस वजह से लालू यादव का बिहार पर केन्द्रित एजेंडा भी प्रभावित हुआ। झूठे वादे करके और पैसे देकर भीड़ जुटाना अलग है और जननेता होना इससे बहुत अलग है। कांग्रेस को लेकर तो उस थ्योरी को बल मिल रहा है कि कांग्रेस अब बीजेपी और थर्ड फ्रंट के बीच बफर जोन मात्र है।
बिहार मे कांग्रेस अप्रासंगिक होकर भी लड़ती है। लालू बिहार मे दिखाना चाहते हैं कि उनकी पहुंच दिल्ली तक है। इसलिए वह कांग्रेस को इस्तेमाल कर रहे हैं। वास्तव मे कांग्रेस है ही नहीं वो बस एक बफर जोन का काम कर रही है। यही वजह है कि राहुल गाँधी के इतने बेबुनियाद आरोपों को झेलकर भी बीजेपी उन्हें अप्रासंगिक नहीं होने देना चाहती। उसके पीछे का खेल यही है। थर्ड फ्रंट को यह समझना होगा कि अगर उन्हें भाजपा का मुकाबला करना है तो ममता और स्टालिन जैसे नेताओं को ये समझना होगा कि राहुल गाँधी से दूर ही रहें। बिहार चुनाव के मुद्दे रोजगार, पलायन के इर्द गिर्द होते तो रिजल्ट कुछ और होता मगर चुनावी राजनीति से मुद्दे गायब रहे और गाली गलौज, वोट चोरी और समाज़वाद के आसपास सिमट गए। जिसका फायदा भाजपा जेडीयू ने उठाया।
जातीय रूढ़ि को तोड़ने का संदेश
बिहार के इस जनादेश में एक गंभीर संदेश छिपा हुआ है कि अब वक्त आ गया है कि बिहार की राजनीति को जातिवाद के दलदल से मुक्त कराया जा सकता है। जातिगत अहंकार का त्याग करने का वक्त आ गया है। बिहार की जनता के जनादेश ने यह साबित कर दिया है कि हिन्दू ही देश की असली पहचान है और देश की राजनीति आगे भी इसी के इर्द गिर्द घूमेगी। अब राजनेताओं तथा देश की जनता को दैनिक व्यवहार में खारिज करके हिंदुत्व की राजनीति को प्रश्रय देना ही पड़ेगा।

अंशुमान आनंद
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