महेंद्र तिवारी
विश्व अर्थव्यवस्था आज ऐसे दौर से गुजर रही है, जहाँ विकास की संभावनाओं के साथ अनिश्चितताओं का दायरा भी लगातार बढ़ रहा है। एक ओर तकनीकी प्रगति, नए निवेश और व्यापारिक गतिविधियाँ आर्थिक वृद्धि को गति दे रही हैं, तो दूसरी ओर युद्ध, ऊर्जा संकट, बढ़ता सरकारी ऋण और वित्तीय बाजारों में अस्थिरता वैश्विक आर्थिक व्यवस्था की परीक्षा ले रहे हैं। बैंकॉक में 13 से 17 अक्टूबर 2026 के दौरान आयोजित अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक की वार्षिक बैठकों में इन्हीं चुनौतियों पर गंभीर विचार-विमर्श हुआ। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की अक्टूबर 2026 की विश्व आर्थिक परिदृश्य रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर 2026 में 3.1 प्रतिशत रहने का अनुमान है, जबकि 2027 में इसके बढ़कर 3.4 प्रतिशत होने की संभावना व्यक्त की गई है। इसके बावजूद संस्था ने चेतावनी दी है कि मौजूदा आर्थिक मजबूती को स्थायी मान लेना उचित नहीं होगा। युद्ध, महँगाई, ऋण और तकनीकी निवेश से जुड़े जोखिम इस वृद्धि को प्रभावित कर सकते हैं।
वैश्विक अर्थव्यवस्था की पहली बड़ी चुनौती युद्ध और उससे उत्पन्न ऊर्जा संकट है। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष ने कच्चे तेल की आपूर्ति, समुद्री परिवहन और अंतरराष्ट्रीय व्यापार के सामने नई कठिनाइयाँ पैदा की हैं। विशेष रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग में किसी भी प्रकार का व्यवधान दुनिया के अनेक देशों की अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकता है। इस मार्ग से होने वाला ऊर्जा व्यापार बाधित होने पर तेल और गैस की कीमतें बढ़ सकती हैं। इसका प्रभाव केवल पेट्रोल और डीजल तक सीमित नहीं रहता, बल्कि परिवहन, बिजली उत्पादन, कृषि, उर्वरक निर्माण और औद्योगिक उत्पादन की लागत पर भी पड़ता है।
ऊर्जा की कीमतों में वृद्धि का सबसे अधिक बोझ उन देशों पर पड़ता है, जो अपनी आवश्यकताओं के लिए दूसरे देशों से तेल और गैस आयात करते हैं। भारत भी इस श्रेणी में आता है। यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल महँगा होता है, तो देश का आयात व्यय बढ़ सकता है। इससे व्यापार संतुलन, रुपये की विनिमय दर और घरेलू महँगाई पर दबाव पड़ने की आशंका रहती है। वस्तुओं के परिवहन की लागत बढ़ने से खाद्य पदार्थों और दैनिक उपयोग की वस्तुओं के दाम भी प्रभावित हो सकते हैं। इस प्रकार युद्ध का प्रभाव युद्धक्षेत्र से हजारों किलोमीटर दूर रहने वाले सामान्य नागरिकों की रसोई तक पहुँच जाता है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने अक्टूबर की अपनी रिपोर्ट में 2026 के लिए वैश्विक महँगाई दर 4.7 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया है। इसके बाद 2027 में इसके घटकर 4.1 प्रतिशत होने की संभावना व्यक्त की गई है। हालांकि, ये अनुमान उपलब्ध आँकड़ों और मौजूदा परिस्थितियों पर आधारित हैं। यदि संघर्ष बढ़ता है, ऊर्जा आपूर्ति में लंबे समय तक बाधा आती है या व्यापारिक तनाव गहराता है, तो महँगाई पर दबाव अनुमान से अधिक हो सकता है। इसलिए सरकारों के सामने चुनौती केवल आर्थिक वृद्धि बनाए रखने की नहीं, बल्कि आम लोगों की क्रयशक्ति की रक्षा करने की भी है।
दूसरी बड़ी चुनौती बढ़ता सार्वजनिक ऋण है। अनेक देशों ने महामारी, आर्थिक मंदी, युद्ध और सामाजिक कल्याण योजनाओं के प्रभावों से निपटने के लिए भारी उधारी ली है। अब बढ़ती ब्याज दरों और महँगी होती उधारी के कारण उनके लिए ऋण चुकाना कठिन होता जा रहा है। जब सरकारी आय का बड़ा हिस्सा ब्याज और पुराने कर्ज की अदायगी में खर्च होता है, तब शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, आधारभूत संरचना और गरीबी उन्मूलन जैसी योजनाओं के लिए संसाधन सीमित हो जाते हैं।
विकासशील देशों की स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक है। इन देशों को एक ओर अपने नागरिकों की बुनियादी जरूरतें पूरी करनी हैं, वहीं दूसरी ओर आर्थिक विकास के लिए निवेश भी करना है। यदि विदेशी मुद्रा में लिया गया ऋण महँगा हो जाए या उनकी मुद्रा का मूल्य गिर जाए, तो ऋण चुकाने का बोझ और बढ़ जाता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। जरूरतमंद देशों को वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने के साथ उन्हें ऐसी नीतियाँ अपनाने में सहयोग देना आवश्यक है, जिनसे आर्थिक आत्मनिर्भरता बढ़े और भविष्य में अत्यधिक उधारी की आवश्यकता कम हो। 17 अक्टूबर को बैंकॉक में हुई अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की अंतरराष्ट्रीय मौद्रिक एवं वित्तीय समिति की बैठक के बाद जारी वक्तव्य में युद्ध से उत्पन्न आर्थिक कठिनाइयों और ऊँची ऊर्जा कीमतों का सामना कर रहे देशों को अधिक सहायता देने की आवश्यकता पर जोर दिया गया। समिति ने यह भी स्वीकार किया कि बढ़ते व्यापारिक तनाव और भू-राजनीतिक विभाजन से वैश्विक आपूर्ति शृंखलाएँ प्रभावित हो सकती हैं। इससे स्पष्ट है कि आर्थिक संकट का समाधान केवल अलग-अलग देशों की नीतियों से संभव नहीं है। इसके लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग और साझा जिम्मेदारी आवश्यक है।
तीसरी बड़ी चुनौती कृत्रिम बुद्धिमत्ता के क्षेत्र में तेजी से बढ़ता निवेश है। इस तकनीक ने उद्योग, चिकित्सा, शिक्षा, कृषि, बैंकिंग और संचार के क्षेत्र में नई संभावनाएँ पैदा की हैं। बड़ी कंपनियाँ आँकड़ा केंद्रों, उन्नत संगणक उपकरणों और नई तकनीकों पर भारी धन खर्च कर रही हैं। इससे निवेश, उत्पादन और व्यापार को प्रोत्साहन मिल रहा है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने भी माना है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता से संबंधित निवेश ने वैश्विक आर्थिक वृद्धि को सहारा दिया है। लेकिन इस विकास के साथ वित्तीय जोखिम भी जुड़े हैं। यदि निवेशकों की उम्मीदें वास्तविक उपलब्धियों से बहुत आगे निकल जाती हैं, तो कंपनियों के मूल्यांकन में असंतुलन पैदा हो सकता है। मान लीजिए कि किसी कंपनी में इस उम्मीद से भारी निवेश किया जाता है कि उसकी नई तकनीक भविष्य में बहुत अधिक लाभ देगी। यदि अपेक्षित लाभ नहीं मिलता, तो निवेशकों का विश्वास कमजोर पड़ सकता है। इसके परिणामस्वरूप कंपनियों के शेयरों की कीमतें गिर सकती हैं, निवेश घट सकता है और वित्तीय बाजारों में व्यापक अस्थिरता पैदा हो सकती है।
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की अक्टूबर रिपोर्ट में कृत्रिम बुद्धिमत्ता से संबंधित निवेश की संभावित गिरावट को वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण जोखिम बताया गया है। संस्था ने यह भी संकेत दिया है कि यदि इस तकनीक से अपेक्षित उत्पादकता लाभ मिलता है, तो आर्थिक वृद्धि को अतिरिक्त गति मिल सकती है। अर्थात इसके परिणाम दोनों दिशाओं में जा सकते हैं। समस्या तकनीकी विकास में नहीं, बल्कि वास्तविक क्षमता से अधिक उम्मीदें लगाने और जोखिमों की उपेक्षा करने में है।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता का एक दूसरा पक्ष रोजगार और आर्थिक असमानता से संबंधित है। नई तकनीक अनेक कामों को सरल और तेज बना सकती है, लेकिन कुछ पारंपरिक कार्यों की आवश्यकता भी घट सकती है। यदि श्रमिकों को समय पर प्रशिक्षण और नए कौशल प्राप्त करने के अवसर नहीं मिलते, तो रोजगार संबंधी कठिनाइयाँ बढ़ सकती हैं। तकनीकी निवेश का लाभ उन देशों और कंपनियों को अधिक मिल सकता है, जिनके पास पर्याप्त पूँजी, बिजली, डिजिटल आधारभूत संरचना और प्रशिक्षित कर्मचारी हैं। दूसरी ओर, कमजोर अर्थव्यवस्थाएँ इस परिवर्तन के साथ कदम मिलाने में पीछे रह सकती हैं। इसलिए तकनीकी प्रगति के साथ शिक्षा, प्रशिक्षण और सामाजिक सुरक्षा पर भी निवेश करना आवश्यक है।
भारत के लिए इन चुनौतियों में जोखिम के साथ अवसर भी छिपे हुए हैं। देश को ऊर्जा के विभिन्न स्रोतों का विकास करना चाहिए, ताकि किसी एक क्षेत्र या आपूर्तिकर्ता पर अत्यधिक निर्भरता न रहे। सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और अन्य स्वच्छ ऊर्जा विकल्पों को बढ़ावा देने से दीर्घकाल में आयात संबंधी जोखिम कम किए जा सकते हैं। साथ ही, सार्वजनिक व्यय में अनुशासन बनाए रखते हुए शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, अनुसंधान और रोजगार सृजन के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध कराना जरूरी है।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता के क्षेत्र में भारत अपनी युवा आबादी, तकनीकी प्रतिभा और व्यापक घरेलू बाजार का लाभ उठा सकता है। इसके लिए केवल नई तकनीक खरीदना पर्याप्त नहीं होगा। देश में अनुसंधान, कौशल विकास, सुरक्षित आँकड़ा व्यवस्था और स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप तकनीकी समाधान विकसित करने पर भी ध्यान देना होगा। छोटे उद्योगों और सामान्य नागरिकों तक तकनीकी लाभ पहुँचाना जरूरी है, ताकि इसका लाभ कुछ बड़ी कंपनियों तक सीमित न रहे।
अंततः वैश्विक अर्थव्यवस्था की वर्तमान स्थिति यह संदेश देती है कि आर्थिक वृद्धि अपने आप में पर्याप्त नहीं है। विकास तभी टिकाऊ माना जा सकता है, जब वह महँगाई को नियंत्रित करने, रोजगार बढ़ाने, सार्वजनिक ऋण को सँभालने और सामाजिक असमानता घटाने में भी सहायक हो। युद्ध और व्यापारिक तनावों को कम करने के लिए कूटनीतिक प्रयास, सार्वजनिक वित्त में अनुशासन तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता के जिम्मेदार उपयोग के लिए प्रभावी नियम समय की आवश्यकता हैं। विश्व के देशों को यह समझना होगा कि आज की परस्पर जुड़ी अर्थव्यवस्था में किसी एक क्षेत्र का संकट शीघ्र ही दूसरे क्षेत्रों तक पहुँच सकता है। सहयोग, दूरदर्शिता और संतुलित नीतियों के माध्यम से ही आर्थिक विकास की संभावनाओं को सुरक्षित रखा जा सकता है।
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)
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