सुप्रीम कोर्ट ने नकारी मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग

डाॅ. विजय खैरा
संवैधानिक संस्थाएं सरकारी तंत्र से बिल्कुल अलग होती है और उन्हें स्वतंत्र रूप से कार्य करने का पूर्ण अधिकार होता है। विपक्ष अपनी शिकायत दर्ज करा सकता है, रोष प्रकट कर सकता है। संसद में उठा सकते हैं और शांतिपूर्ण प्रदर्शन आंदोलन तो सभी का अधिकार है। कोर्ट जाने का दरवाजा तो सदा खुला ही है। चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है।
सुप्रीम कोर्ट में जब मामला आया तो कोर्ट ने इसे मानते हुए उन्हें स्वतंत्र रूप से कानून के अंतर्गत एस आई आर पर काम करने पर कोई एतराज नहीं जताया।
भीड़ इकट्ठी करके दबाव बनाकर, बिना किसी प्रमाण के आरोप लगाकर ऐसी संस्थाओं पर कीचड़ उछाल कर मुख्य चुनाव आयुक्त का इस्तीफा मांगा जाना संवैधानिक तौर से गलत है। देश के सबसे बड़े विद्वान वकील हरीश साल्वे जी ने इसे सही नहीं मानते हुए तीखी प्रक्रिया प्रकट की है। उनकी बातों के मुख्य बिंदु उद्धृत कर रहा हूं।
साल्वे जी ने सुप्रीम कोर्ट, चुनाव आयोग, मुख्य चुनाव आयुक्त और फाॅर्म 6 से जुडे़े विवाद पर अपनी राय रखी है। इसमें उन्होनंे यह भी कहा कि अदालत में सुनवाई के दौरान की गई टिप्पणियों और लिखित न्यायिक आदेश या फैसले के बीच अंतर समझना चाहिये।
साल्वे जी की बातों का सरल हिन्दी में सार
13 करोड़ वोटर कटने का सच: यदि 13 करोड़ वोटर काटे जाने वाले लोग वोटर बनने के हकदार थे तो वो कहां है। उनमें से एक दो करोड,़ पच्चीस पचास लाख कुछ तो सामनें आते या विपक्ष के लोग उन्हें या उनके नाम से एफीडेविट देकर आते और बताते कि उन्हें वोटर नहीं बनाया गया है। सच तो यह है कि कोई भी व्यक्ति जो वोटर बनने का हकदार था वह वोटर बना है।

इनमें से दस बीस हजार वोटर भी सामनें नहीं आये हैं न ही विपक्ष इनको प्रस्तुत कर सका है।
इंडियन एक्सप्रेस: समाचार पत्र ने चुनाव आयोग के कार्यों को 22 सितंबर को एक आर्टिकल किसी पत्रकार द्वारा लिखा गया था। जिस पर भारतीय जनता पार्टी के नेताओ आदि ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की थी और चुनाव आयोग ने भी इसे सही नहीं माना था। बाद में 26 सितंबर को इंडियन एक्सप्रेस के ही पत्रकार दामिनी नाथ ने अपने लेख में लिखा कि पहले पत्रकार चुनाव आयोग की वीट नहीं देखते थे, इसलिए उसमें त्रुटियां हुई हैं। इस तरह इंडियन एक्सप्रेस अपनी बात पर बैकफुट पर आ गया है। एक खबर के हवाले से लिख रहा हूं कि प्रसिद्ध अधिवक्ता महेश जेठ मलानी ने इंडियन एक्सप्रेस द्वारा प्रकाशित लेख पर एक रसीद के हवाले से बताया कि कांग्रेस ने इक्यासी लाख पचास हजार रुपया इंडियन एक्सप्रेस को दिया है। मेरे विचार से ये रुपया क्यों दिया गया इसका स्पष्टीकरण कांग्रेस को देना चाहिए। या ऐ महज इत्तेफाक है कि कांग्रेस का इस तरह की त्रुटि पूर्ण खबर छपवाने में चुनाव आयोग को बदनाम करने में कोई हाथ है।
सुप्रीम कोर्ट के वर्तमान जस्टिस उज्जल भुइयां द्वारा एक समारोह में सार्वजनिक रूप से अपनी राय प्रकट करने पर बहुत से शिक्षाविदों और अधिवक्ताओं ने भोहै उठाई है। उनका कहना है कि कोर्ट के किसी वर्तमान जस्टिस को ऐसे किसी मामले में जो कि सुप्रीम कोर्ट में चल रहा हो, या चलने की संभावना हो, उस पर सार्वजनिक रूप से कोई टिप्पणी करना अनुचित है। यह भी कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट के एक बेंच ने 1991 में निर्णय दिया था और कहा था कि किसी भी मामले में जो कोर्ट में चल रहा हो, किसी जज को उस पर सार्वजनिक रूप से टिप्पणी नहीं करना चाहिए। इस तरह जस्टिस भुइयां ने चुनाव आयोग की कार्य प्रणाली पर उंगली उठाकर ऐसा लगता है कि कोड ऑफ कंडक्ट तोड़ा है। जस्टिस भुइया को इस पर स्पष्टीकरण देना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने तो अपनी दलील में कोर्ट में ये भी बोला कि यदि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा नहीं कराया गया तो देश में आगजनी फैल सकती है। हमारी राय में, कोर्ट को इस तरह से डराकर किसी निर्णय की अपेक्षा नहीं की जा सकती। विपक्ष या कुछ राजनीतिक पार्टियों को चुनाव आयोग द्वारा दिया गया निर्णय उनके हित में दिखाई नहीं दे रहा है, तो क्या वो संविधान को अपने हाथ में लेकर धरना प्रदर्शन से दबाव बनाकर डरावना माहौल बनाकर कानून व्यवस्था तोड़कर आगजनी फैला कर अपनी बात मनवाएंगे। यदि मुख्य चुनाव आयुक्त का इस्तीफा हुआ तो यही लोग कल जब हाई कोर्ट सुप्रीम कोर्ट द्वारा उनके पक्ष में निर्णय नहीं होगा तो सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों का इस्तीफा मांगेंगे और इसी तरह धरना प्रदर्शन करके दबाव बनाएंगे। इस तरह कानून व्यवस्था को भंग करने से देश में अस्थिरता फैल जाएगी। लगभग ऐसी ही बात साल्वे जी ने भी कही है।
यदि ऐसी अव्यवस्था फैली वैधानिक संस्थाओं में राजनीतिक दबाव और धरना प्रदर्शन से काम हुआ, कल यदि विपक्ष सत्ता में आता है तो उस टूटी फूटी व्यवस्था में कैसे सरकार चलाएगा, ये उसे सोचना चाहिए। हम सबने ये देखा है क्यों वहीं कुंठित लोग हर बार इस तरह के धरना प्रदर्शन में सरकार के खिलाफ खड़े हो जाते हैं, जो या तो चुनाव नहीं जीत सकें हैं या उन्हें कहीं पर सामाजिक स्पेस नहीं मिल पा रहा है। योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण इन सब ने आप पार्टी में सहयोग देकर काफी उम्मीदें लगाई थीं, लेकिन अरविंद केजरीवाल ने इन सबको ठिकाने लगा दिया। कुछ और अन्य लोग भी हैं जो इस तरह हर बार दिखाई देते हैं और सरकार के खिलाफ अपने फ्रस्ट्रेशन को बाहर निकालने की कोशिश करते हैं।
फाॅर्म 6 का सच तब कोर्ट के सामनें था उस पर कोई आपत्ति नहीं जतायी थी। आपकी इस बात पर आयोग आज भी कायम है और यही सच है। विपक्ष झूंठ बोल कर चिल्ला रहा है। कोई हजार बार झूंठ बोले तो झूंठ सच नहीं होगा। सच कभी पराजित हो ही नहीं सकता। वोट कटने और फाॅर्म 6 पर विपक्ष और राहुल गांधी द्वारा फैलाये गये झूंठ का षडयंत्र फेल हो गया।
कुल मिलाकर मामला सुप्रीम कोर्ट में है, जस्टिस भुइयां और पूर्व जस्टिस नारीमन ने जोे अपने विचार प्रकट किए हैं इसका प्रभाव सुप्रीम कोर्ट पर नहीं पड़ेगा। सुप्रीम कोर्ट का ये निर्णय आगे आने वाली संवैधानिक व्यवस्था के लिए मील का पत्थर साबित होने वाला होगा।
यदि चुनाव हारने वाली पार्टी प्रदर्शन धमकियों से अराजकता फैलाकर संवैधानिक संस्था पर बैठे हुए लोगों को वोट चोर कहकर उनके इस्तीफे लेने में सफल हो जाती है। फिर सुप्रीम कोर्ट में केस हारने वाली पार्टी जज को न्याय चोर कहकर न्यायाधीश का इस्तीफा भी मांग सकती है जो संविधान के लिए बेहद घातक होगा।
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)
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