कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जो किसी उपमा, किसी बहुमान, भारत रत्न या कोई भी अवॉर्ड के मोहताज नहीं होते फिर भी उनका तेज उनका प्रभाव और व्यवहार सारे विश्व को सुखी और शांतिमय बनाने की शक्ति रखता है। एक ऐसे ही थे महापुरुष श्री रतन टाटा जी। जिनका निधन 86 वर्ष की उम्र में 09 अक्टूबर, 2024 की देर रात हुआ। रतन टाटा देश के उन नामों में गिने जाते थे, जिनकी तुलना किसी से करना असंभव था। वे बड़े ही संवेदनशील औऱ सज्जन व्यक्ति थे। रतन टाटा भारतीय उद्योगपति और टाटा संस के पूर्व अध्यक्ष थे। 1991 से 2012 तक वे टाटा समूह के अध्यक्ष रहे और अक्तूबर 2016 से फरवरी 2017 तक अंतरिम अध्यक्ष बने। वे एक समर्पित परोपकारी व्यक्ति थे। बचपन से ही रतन टाटा ने अपने परिवार से व्यावसायिक मूल्य और नैतिकता का पाठ सीखा।
बचपन और प्रारंभिक जीवन
रतन टाटा का जन्म 28 दिसंबर 1937 को नवल टाटा और सोनू टाटा के घर हुआ था। उनके एक भाई जिमी और एक सौतेले भाई नोएल टाटा हैं। जब रतन टाटा 10 साल के थे, तब उनके माता- पिता अलग हो गए। दोनों भाइयों का पालन-पोषण उनकी दादी नवाजबाई टाटा ने किया। उनकी शुरुआती स्कूली शिक्षा मुंबई के कैंपियन स्कूल और जॉन कॉनन स्कूल में हुई। इसके बाद रतन टाटा ने कॉर्नेल यूनिवर्सिटी, यूएसए से स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग के साथ आर्किटेक्चर में डिग्री प्राप्त की। 1975 में उन्होंने हार्वर्ड बिजनेस स्कूल में एक उन्नत प्रबंधन कार्यक्रम पूरा किया।
रतन टाटा का काम को लेकर संघर्ष
रतन टाटा 1962 में टाटा संस में शामिल हो गए। जहां उन्होंने कर्मियों संग फ्लोर पर काम किया। यह एक कठिन और मुश्किल काम था, लेकिन उन्होंने पारिवारिक व्यवसाय के बारे में अनुभव और समझ हासिल की। इसके बाद रतन टाटा को 1971 में नेलको (नेशनल रेडियो एंड इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनी लिमिटेड) का प्रभारी निदेशक बनाया गया। कंपनी वित्तीय संकट से गुजर रही थी। उस वक्त रतन टाटा ने बेहतर उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स डिवीजन बनाने के लिए कड़ी मेहनत की, लेकिन आर्थिक मंदी और यूनियन के मुद्दों के कारण वे सफल नहीं हो पाए। एम्प्रेस मिल्स में स्थानांतरण 1977 में रतन टाटा को एम्प्रेस मिल्स में स्थानांतरित कर दिया गया, जो टाटा समूह की एक और संघर्षरत इकाई थी। उन्होंने मिल के पुनरुद्धार के लिए एक योजना बनाई, लेकिन कंपनी के अन्य अधिकारियों ने इसे अस्वीकार कर दिया और मिल बंद कर दी गई। रतन टाटा को फिर से टाटा इंडस्ट्रीज में स्थानांतरित कर दिया गया।

टाटा समूह के अध्यक्ष के रुप में कार्यभार
समय था 1991 का जब जेआरडी टाटा ने रतन टाटा को टाटा समूह का अध्यक्ष नियुक्त किया। जिसके बाद रतन टाटा बिना पीछे देखे संगठन की समग्र स्थिति में सफलतापूर्वक सुधार किया। संगठन को सफल बनाने के लिए दृढ़ संक्ल्पित होकर लक्ष्य केंद्रित कर लिया। इसके बाद दिसंबर 2012 में अपने 75वें जन्मदिन पर रतन टाटा ने टाटा समूह के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया। उनके 21 वर्षों के दौरान, टाटा ग्रुप का मुनाफा 50 गुना बढ़ गया। इसमें अधिकांश रेवेन्यू जगुआर-लैंडरोवर व्हीकल्स और टेटली जैसे पॉपुलर टाटा उत्पादों की विदेशों में बिक्री से आया। रतन टाटा जी के इस्तीफे के बाद टाटा समूह के नए अध्यक्ष शापूरजी पल्लोनजी समूह के प्रबंध निदेशक साइरस मिस्री टाटा बने।
रतन टाटा की प्रमुख सफलताएं
टाटा समूह न्यूयॉर्क स्टॉक एक्सचेंज तक पहुंचा। उनके नेतृत्व में, टाटा समूह कोरस , जगुआर, लैंड रोवर औऱ टेटली जैसी कंपनियों के अधिग्रहण से वैश्विक ब्रांड बन गया। टाटा नैनो और टाटा इंडिका ऑटोमोबाइल की कल्पना और निर्माण उनके नेतृत्व में किया गया था।
कम बात करते थे, बुक लवर और कारों के शौकीन
टाटा को बचपन से ही कम बातचीत पसंद थी। वे केवल औपचारिक और जरूरी बात ही करते थे। वे बुक लवर थे और उन्हें सक्सेस स्टोरीज पढ़ना बहुत पसंद था। एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि रिटायरमेंट के बाद वे अपने इस शौक को समय दे रहे हैं। वे 60-70 के दशक के गाने सुनना पसंद करते थे। वे कहते थे, 'मुझे बड़ी संतुष्टि होगी अगर मैं शास्त्रीय संगीत बजा पाऊं। मुझे शॉपिंग पसंद है। सिम्फनी भी अच्छी लगती है। बिथोवन, चेकोस्की पसंद हैं, पर मुझे लगता है कि काश मैं खुद इन्हें पियानो पर बजा सकता।' कारों के बारे में पूछने पर टाटा ने बताया था कि मुझे कारों से बहुत लगाव है। उन्होंने कहा था 'मुझे पुरानी और नई दोनों तरह की कारों का शौक है। खासतौर पर उनकी स्टाइलिंग और उनके मैकेनिज्म के प्रति गहरा रुझान है। इसलिए मैं उन्हें खरीदता हूं, ताकि उन्हें पढ़ सकूं।’ खास बात तो यह थी कि रतन टाटा F-16 पर उड़ान भरने वाले पहले भारतीय नागरिक थे। वे लगभग 40 मिनट तक अमेरिकी वायु सेना के ब्लॉक 50 से संबंधित लड़ाकू विमान के को-पायलट रहे थे।
नैनो कार का विचार

एक किस्सा कार के निर्माण से जुड़ा है। उन्होंने नैनो कार का विचार तब उठाया जब उन्होंने मुंबई की सड़कों पर एक परिवार को स्कूटर पर यात्रा करते देखा। उन्होंने उस समय सोचा कि भारत में ऐसा वाहन होना चाहिए जो हर आम आदमी की पहुंच में हो, और इस तरह 1 लाख की नैनो कार का सपना साकार हुआ।
रतन टाटा की उपलब्धियां और पुरस्कार
कुछ बातें टाटा कंपनी की
156 साल पहले टाटा ग्रुप की स्थापना हुई थी। तबसे लेकर आज तक इसके प्रोडक्ट्स सुबह से शाम तक हमारी जिंदगी का हिस्सा बने हुए हैं। टाटा नाम के साथ-साथ आम भारतीय के दिनचर्या का एक हिस्सा रहा है। टाटा ग्रुप की स्थापना जमशेदजी टाटा ने 1868 में की थी। यह भारत की सबसे बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी है, इसकी 30 कंपनियां दुनिया के 100 से ज्यादा देशों में 10 अलग-अलग बिजनेस में कारोबार करती हैं। अभी एन चंद्रशेखरन इसके चेयरमैन हैं।

टाटा संस टाटा कंपनियों की प्रिंसिपल इन्वेस्टमेंट होल्डिंग और प्रमोटर है। टाटा संस की 66 प्रतिशत इक्विटी शेयर कैपिटल उसके चैरिटेबल ट्रस्ट के पास हैं, जो एजुकेशन, हेल्थ, आर्ट एंड कल्चर और लाइवलीहुड जनरेशन के लिए काम करता है।
2023-24 में टाटा ग्रुप की सभी कंपनियों का टोटल रेवेन्यू 13.86 लाख करोड़ रुपए था। यह 10 लाख से ज्यादा लोगों को रोजगार देती है। इसके प्रोडक्ट्स सुबह से शाम तक हमारी जिंदगी में शामिल हैं। सुबह उठकर टाटा चाय पीने से लेकर टेलीविजन पर टाटा बिंज सर्विस का इस्तेमाल, और टाटा स्टील से बने अनगिनत उत्पादों का इस्तेमाल करते हैं।
रतन टाटा कहते थे...
'सबसे बड़ा जोखिम, जोखिम नहीं उठाना है'
'अगर आप तेज चलना चाहते हैं, तो अकेले चलें। लेकिन अगर आप लंबी दूरी जाना चाहते हैं, तो साथ-साथ चलें।'
'लोग आप पर जो पत्थर फेंकते हैं, उन्हें लीजिए और उनका उपयोग मॉन्यूमेंट बनाने के लिए कीजिए।'
'मैं सही निर्णय लेने में विश्वास नहीं रखता। मैं निर्णय लेता हूं और फिर उन्हें सही साबित करता हूं।'
धैर्य और दृढ़ता से चुनौतियों का सामना करें क्योंकि वे सफलता की आधारशिला हैं।'
'सबसे बड़ा जोखिम,जोखिम नहीं उठाना है। तेजी से बदलती दुनिया में एक ही स्ट्रैटेजी है जो नाकाम बना सकती है, वह है जोखिम न उठाना
उदय इंडिया ब्यूरो
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