महाराष्ट्र के हिंगोली में गुरुवार यानी 21 मार्च को को एक के बाद एक लगातार दो भूकंप के झटके महसूस किए गए। ये झटके लगभग 10 मिनट के अंतराल पर दर्ज किए गए। भूकंप का पहला झटका सुबह 6 बजकर 8 मिनट पर महसूस किया गया। रिक्टर पैमाने पर इसकी तीव्रता 4.5 रही। वहीं, भूकंप का दूसरा झटका सुबह 6 बजकर 19 मिनट पर दर्ज किया गया।
रिक्टर पैमाने पर इसकी तीव्रता 3.6 दर्ज की गई। इससे पहले मेघालय के नोंगपोह में भी सोमवार यानी 18 मार्च की शाम को 3.0 तीव्रता का मध्यम भूकंप आया था। इसके अलावा गुरुवार को ही जापान के भी पूर्वी प्रांत इबाराकी में 5.3 तीव्रता का भूकंप आया है। जिसके झटके जापान की राजधानी टोक्यो तक महसूस किया गया है। इस साल की शुरुआत के दिन यानी पहली जनवरी को जापान में सात घंटे में भूकंप के 60 झटके महसूस किए गए थे। जिससे भारी नुकसान हुआ था। क्योंकि इन झटकों की तीव्रता 7.6 थी। इसके अलावा तुर्की,चीन, नेपाल, सीरिया, मोरक्को जैसे कई देशों में भूकंप आ चुके हैं। भारत के तो 29 शहरों पर भूकंप का खतरा मंडरा रहा है। जिसमें 9 राज्यों की राजधानियां शामिल हैं। जिनमें घनी आबादी बसती है। ऐसे में भूकंप कभी भी बड़े नुकसान का कारण बन सकता है। जिसकी आशंका पिछले कुछ दिनों में बहुत ज्यादा बढ़ गई है।
क्योंकि विशेषज्ञों का मानना है कि धरती के नीचे मौजूद टेक्टोनिक प्लेट्स इन दिनों एक्टिव हो गई हैं। दरअसल धरती के गर्भ में गर्म लावा भरा हुआ है जिस पर टेक्टोनिक प्लेट्स तैरती हैं और जब यह प्लेटें आपस में टकराती हैं और उन पर दबाव पड़ता है और उस टकराव से पैदा हुई ऊर्जा बाहर निकलने का रास्ता तलाश करती है, जिसकी वजह से भूकंप आ जाता है। सबसे ज्यादा बदलाव दक्षिणी गोलार्द्ध की टैक्टोनिक प्लेट्स पर हो रहा है। जिसके दायरे में हमारे देश भारत के साथ-साथ चीन, पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान, म्यांमार, ऑस्ट्रेलिया जैसे देश आते हैं। जो कि घनी बसावट वाले इलाके हैं। जहां पर भूकंप का आना बहुत घातक सिद्ध हो सकता है।
साल 2018 में भूकंप विज्ञानी सीपी राजेंद्रन ने एक स्टडी की थी, जिसमें उन्होंने बताया था कि साल 1315 और 1440 के बीच भारत के भाटपुर से लेकर नेपाल के मोहाना खोला तक 600 किलोमीटर लंबा सिस्मिक गैप बन गया था। जो कि पिछले 700 सालों से ये गैप शांत है लेकिन अब इसपर भूकंपीय दबाव बढ़ गया है। जो कभी भी बड़े भूकंप का कारण बन सकता है और यह तीव्रता 8.5 तक हो सकती है। जो कि भारी तबाही का कारण बन सकती है। खास तौर पर Delhi-NCR के नीचे 100 से ज्यादा लंबी और गहरी फॉल्ट्स हैं। इसके अलावा ऐसी भी आशंका है कि भारत के हिमालयन रेंज में भूकंप का खतरा ज्यादा गंभीर है, क्योंकि भारतीय प्लेट लगातार यूरेशियन प्लेट पर दबाव डाल रही है। इस रेंज में जम्मू कश्मीर, लद्दाख, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में आते हैं। यह क्षेत्र भूकंपीय रूप से बहुत सक्रिय है।

लिहाजा, यहां भूकंप से बड़ा नुकसान हो सकता है। ऐसे में भूकंप को लेकर सावधानी बरतने की सख्त जरुरत महसूस की जा रही है। भूकंप को रोका जाना संभव नहीं है। लेकिन इससे होने वाले जानमाल के नुकसान को कम किया जा सकता है। लेकिन इसके लिए दीर्घकालिक योजनाओं की जरूरत है। भारत समेत दुनिया भर के महानगरों में आबादी का घनत्व बढ़ता जा रहा है और हाईराइज बिल्डिंग तैयार हो रही हैं, जो कि भूकंप की दृष्टि से बेहद खतरनाक हैं। क्योंकि किसी भी बड़े भूकंप की स्थिति में ऐसी बिल्डिंगें ताश के पत्तों की तरह ढह सकती हैं। खास तौर पर हिमालय से नजदीकी के कारण दिल्ली एनसीआर का इलाका भूकंपीय रूप से दूसरा सबसे खतरनाक इलाका माना जाता है। इसे सिस्मिक जोन 4 में रखा गया है। ऐसे हालातों में सावधानी और जानकारी ही बचाव का इकलौता रास्ता है। लेकिन विकास की होड़ में मनुष्य शायद प्रकृति के इस भयावह स्वरूप से आंख मूंदे बैठा है। ये लापरवाही कभी भी घातक रूप ले सकती है।
उदय इंडिया ब्यूरो
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