हाल के दिनों में, भारत की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में लगातार गतिविधियां देखी जा रही हैं। लेकिन जहां कांग्रेस छोड़कर नेताओं और कार्यकर्ताओं का दूसरी पार्टियों में पलायन तेज हुआ है, वहीं दूसरी पार्टियों के नेताओं के कांग्रेस में आने की गति बेहद धीमी है। नेताओं द्वारा लगातार कांग्रेस छोड़ने से पार्टी की अपने सदस्यों को बनाए रखने की क्षमता पर सवाल खड़े हो गए हैं। हाल ही में संजय निरुपम, गौरव वल्लभ, मुक्केबाज विजेंदर सिंह और रोहन गुप्ता की विदाई कांग्रेस पार्टी के सदस्यों के बीच बढ़ती निराशा को दर्शाती है। नेतृत्व के फैसलों पर असंतोष से लेकर पार्टी की दिशा को लेकर चिंता जैसे मुद्दों ने इन नेताओं को कांग्रेस के बाहर विकल्प तलाशने के लिए प्रेरित किया है। भारत में कांग्रेस पार्टी के पतन के पीछे बहुत से आयाम मौजूद हैं। जो आंतरिक कमजोरियों और बाहरी दबावों के संयोजन में निहित है। जब तक पार्टी अपने नेतृत्व संकट को दूर नहीं कर पाती है, आंतरिक विभाजनों को पाट नहीं पाती, मतदाताओं के साथ फिर से जुड़ नहीं पाती और बदलते राजनीतिक परिदृश्य के अनुरूप खुद को नहीं ढाल लेती, तब तक इसका पतन निरंतर जारी रहने की आशंका है। इसकी वजह से भारतीय राजनीति की एक प्रमुख ताकत के रुप में इसकी भूमिका लगातार कम होती चली जाएगी। जैसे-जैसे भारत 21वीं सदी में आगे बढ़ रहा है, कांग्रेस का भाग्य अनिश्चित होता जा रहा है, जो दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के लिए चुनौतियों और अवसरों दोनों का प्रतीक है।
इस पृष्ठभूमि में यह बात गौर करने लायक है कि हालांकि शुरुआत में सोनिया गांधी और बाद में राहुल गांधी वामपंथी और जमीनी सोच के बीच संतुलन बनाने में कामयाब रहे, लेकिन अब राहुल आगे बढ़ गए और ऐसा लगता है कि वह अपने सलाहकारों की सलाह पर अधिक ध्यान देने लगे हैं। जब वह बीजेपी या प्रधानमंत्री मोदी पर हमला करते हैं तो अक्सर उनकी भाषा अनियमित हो जाती है और मूल मुद्दे कहीं खो जाते हैं। लेकिन डिजिटल युग में, जहां समाज की नब्ज सोशल मीडिया की लय में धड़कती है, राजनीतिक परिदृश्य भी इसके प्रभाव से अछूता नहीं रह पाता। इसलिए राहुल गांधी अक्सर इस बवंडर के केन्द्र में आ जाते हैं। एक तरफ तो उनकी भाषा और कार्यों को वामपंथी विचारक और चिंतक अक्सर आगे बढ़ाने में लगे रहते हैं। लेकिन इस आभासी शोर-शराबे के बीच, कांग्रेस की युवा ब्रिगेड के भीतर एक असंगति पैदा होने लगी है, जो ऑनलाइन प्रचारित बढ़ा-चढ़ाकर की गई बयानबाजी और कार्यों से खुद को असहमत पाते हैं। इसलिए इस बात से भी कोई इंकार नहीं कर सकता कि कांग्रेस का वर्तमान नेतृत्व सही समय पर सही कदमों का आकलन करने में विफल रहता है। यह प्रवृत्ति केवल वरिष्ठ लोगों तक ही सीमित नहीं है, यहां तक कि निचले स्तर के सदस्य भी पार्टी के पदानुक्रम में हाशिए पर महसूस करते हैं। सार्थक भागीदारी के सीमित अवसरों और निर्णय लेने की प्रक्रियाओं में पारदर्शिता की कथित कमी ने कई जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं को अलग-थलग कर दिया है। सीट आवंटन और बंटवारे की अपारदर्शी प्रक्रिया ने नाराजगी और आंतरिक कलह को और बढ़ावा दिया है। पक्षपात और पूर्वाग्रह के आरोप पार्टी के आंतरिक तंत्र में विश्वास को कम करते हैं, इसके समर्थन आधार को नष्ट करते हैं। सुधार के आह्वान के बावजूद, कांग्रेस परिवर्तन के प्रति प्रतिरोधी, पुरानी प्रथाओं और पदानुक्रमित संरचनाओं से चिपकी हुई दिखाई देती है। असहमति की आवाजों को दरकिनार करना, जैसा कि जी23 समूह के साथ व्यवहार में देखा जा चुका है, आंतरिक आलोचना के प्रति पार्टी की अनिच्छा को दर्शाता है। जैसे-जैसे 2024 का चुनाव नजदीक आ रहा है, कांग्रेस को प्रासंगिकता हासिल करने के लिए एक कठिन लड़ाई का सामना करना पड़ रहा है। लोकतंत्र और वैचारिक स्पष्टता की कमी सहित अपनी आंतरिक चुनौतियों का समाधान किए बिना, पार्टी पर और पतन का खतरा मंडरा रहा है। अब यह देखना होगा कि क्या केंद्रीय नेतृत्व सुधार के आह्वान पर ध्यान देगा और कांग्रेस के लिए कोई नया रास्ता तैयार करेगा, या वह बढ़ते असंतोष के सामने इसी तरह लड़खड़ाता रहेगा।

दीपक कुमार रथ
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