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नक्सली आतंक का समयबद्ध अंत

Timely end to Naxalite terror

नरेंद्र मोदी, अमित शाह के रूप में भारतीय शासन की चिर सनातन ध्वनि पुन: प्रकट हुई

2019 में एक भविष्यवाणी हुई थी कि स्वतंत्रता के बाद भारत को महानतम गृहमंत्री के रूप में लौहपुरुष सरदार मिले थे, किंतु अब जो राष्ट्रीय मंच पर उपस्थित हैं, श्री अमित शाह के रूप में देश को सबसे असरदार गृहमंत्री मिलने जा रहे हैं, तो मेरा यह कथन गलत नहीं था।

उस समय मैंने यह कहने का साहस गंभीर अध्ययन के बाद किया था।  स्वतंत्रता के बाद से सबसे जटिल समस्या कश्मीर का अधूरा एकीकरण और उसमें सबसे बड़ी संवैधानिक बाधा अनुच्छेद 370 को हटाना आसान कार्य तो नहीं था। 

अनुच्छेद 370 अब कभी समाप्त नहीं होगी, यह कथन तो मैंने पांचजन्य के संपादकीय विभाग में कार्य करते समय उस समय के बड़े संघ के विचारक श्री माधव गोविंद वैद्य के मुख से सुना था। 

उनका इस संदर्भ में आलेख एक पुस्तक के आमुख में तब प्रकाशित हुआ था, उसे उन्होंने पांचजन्य में प्रकाशन के लिए भेजा था। 

मैंने तत्कालीन संपादक श्री तरुण विजय को इसकी जानकारी दी कि यह तो संघ विचार परिवार के घोषित सिद्धांत के विपरीत पंक्ति है, उस पंक्ति पर तब विवाद उठ गया था। 

क्योंकि तब संघ ने अपने ही विचारक, तत्कालीन सहसरकार्यवाह श्री मनमोहन वैद्य के पिताजी, डॉ. हेडगेवार के समय के स्वयंसेवक श्री माधव गोविंद वैद्य जी के इस विचार से पल्ला झाड़ लिया था।

कहने का तात्पर्य यह है कि उस दौर में संघ के भीतर भी बुजुर्ग होते कुछ प्रचारकों का भरोसा हिल रहा था कि अब कभी 370 का 

खात्मा होगा। 

लेकिन जैसे ही बीजेपी में युवा रक्त का प्रवाह आगे बढ़ा, मानो भवानी भारती की चिर प्रतीक्षित आकांक्षा ही हिलोर मारने लगी। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में अमित शाह के गृहमंत्री बनते ही असंभव भारतीय शासन के शब्दकोश से हट गया और मानो अब सबकुछ संभव हो गया है। 

गृहमंत्री की शपथ लेते ही श्री अमित शाह ने संविधान से बाहर निकालकर कचरे के डिब्बे में जिस आसानी से चुपचाप फेंक दिया कि संसद में घोषणा के पहले किसी को कानों-कान खबर तक नहीं लगी, तो यह ऐतिहासिक घटना उस कथन का आधार थी कि अमित शाह देश के सबसे असरदार गृहमंत्री होने जा रहे हैं।

मैंने उसी कार्यक्रम में एक बात और कही थी। मेरी स्मृति में 5 अगस्त 2019 को संसद में अमित शाह के भाषण की कुछ पंक्तियां आ गईं थीं कि जान दे देंगे, क्या बात कर रहे हो, लेकिन कश्मीर नहीं देंगे। उन्हें दुहराते हुए मैं अचानक ही बोल पड़ा कि अमित शाह नहीं... बोलिए अमित शाह विक्रमादित्य। यही तो है भारतीय शासन की चिर-प्रतिक्षित ध्वनि जिसे सुनने के लिए पीढ़ियां प्रतीक्षा करती हैं।

और यह जो नक्सली आतंक के अंत की घोषणा संसद में हुई है, यह तो उससे भी बड़ी घोषणा है। जनतंत्र के महानतम संकल्प की पूर्ति है। एक बड़े भूभाग से लोकतंत्र विरोधी अंधेरे आतंक का खात्मा हुआ है। अरे सखी री मंगल गाओ री। अब नहीं तो कब उत्सव होता है! दंतेश्वरी भवानी के आशीर्वाद से प्रभु श्री राम की ननिहाल, हमारा कौशल प्रदेश, हमारा वैदिक दंडकारण्य, जय जोहार प्रदेश नक्सली राक्षसों से मुक्त हुआ है, खर-दूषण आदि खत्म हुए हैं। बाकी प्रदूषण भी शीघ्र समाप्त होंगे।

जैसे 370 के खात्मे के साथ पाकिस्तान प्रेरित इस्लामिक साम्राज्यवाद का एजेंडा ध्वस्त होना प्रारंभ हुआ है तो नक्सली आतंक के खात्मे से माओवादी बीजिंग केंद्रित पोलित ब्यूरो की घुसपैठ को लगाम लगी है।  इसे करने के लिए सरदार पटेल का ही जिगरा चाहिए था। इसलिए भवानी भारती ने अमित शाह को चुना।

मैं नियति को इसलिए भी बार-बार भवानी भारती के रूप में याद करता हूं कि वही तो सब कुछ कर और करवा रही है। काठमांडु में लेफ्ट के कारिंदे सलाखों के भीतर जा रहे हैं, वहां की राष्ट्रीय भावना फिर से नव स्वरूप में पूर्ण चैतन्य होकर आगे बढ़ रही है तो इसी समय में भारत के भीतर बीजिंग प्रेरित पशुपति से तिरूपति तक लॉल कॉरिडोर बनाने का सपना अंतिम सांस गिन रहा है। आगे क्या क्या होगा, और जो धुरंधर रूप में हो रहा है, देखते चलिए।

संसद में निश्चित रूप से अमित शाह का 30 मार्च का भाषण ऐतिहासिक था, अनूठा था, क्योंकि भाषण से ज्यादा उनके संकल्प की पूर्ति से उत्पन्न आत्माभिमान, स्वदेशाभिमान उनकी वाणी से निकलकर जन-जन को प्रभावित कर रहा था। 

विस्तार से उन्होंने नक्सली समस्या का गहराई से पोस्टमॉर्टम किया। भारतीय शासन के कुछ हिस्सों की शह पर जो समस्या पूर्व में पैदा की गई, उसके प्रचंड अंत की पूरी कहानी उन्होंने सुनाई। 

यह भाषण देश के राजनीतिक चिंतकों, प्रशासकों, पत्रकारों, लेखकों, युवा नेताओं और जिनमें देश के लिए कुछ कर गुजरने की इच्छा हिलोर ले रही है, उन सभी  को बार-बार सुनना चाहिए, और अमित शाह होने का मतलब गुनना चाहिए।

यह असाधारण है, अतुलनीय है। विश्व इतिहास में यह रिकॉर्ड पर है कि दिन-दिनांक घोषित कर कैंसर बन चुकी समस्या को भारतीय शासन की अप्रतिम इच्छाशक्ति से, सुरक्षा बलों और सभी एजेंसियों के समन्वित फौलादी रूप से गलाकर खत्म किया गया। 

प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में गृहमंत्री श्री अमित शाह की इस जोड़ी ने वह कर दिखाया, जिसके बारे में सत्ता के गलियारों में यही डर भरा शोर था कि नक्सली आतंक कभी खत्म नहीं होगा। बड़े-बड़े बौद्धिक लोग भी नक्सलियों के पक्ष में तर्क गढ़ते देखे-सुने जाते थे।

भारत के अब तक के संपूर्ण राजनीतिक इतिहास में इस उपलब्धि को भी सदा याद रखा जाएगा, इसकी सफलता केस स्टडी बनकर संसार के अकादमिक पाठ्यक्रमों में शोध का विषय होंगी। भारतीय शासन की यह महानतम उपलब्धि है। कई सदियों की तपस्या जुटती है तब जाकर ऐसी महानतम विजय किसी देश और उसकी मानवीय सभ्यता को प्राप्त होती है। 

नेतृत्व प्रबल होता है तभी तो दुर्दांत हथियारबंद आतंकी दस्ते या तो सिरेंडर करते हैं, या फिर सदा के लिए खामोश किए जाते हैं। कोई प्रचंड शक्ति बवंडर बनकर जब आती है तब देश विरोधी ऐसे सारे झाड़-झंखाड़-कंटक उड़कर दूर कहीं विलीन हो जाते हैं, जिन्हें हमारी विषैली राजनीति से ही संरक्षण मिलता रहा और पड़ोसी बीजिंग से जिन्हें ऊर्जा दी जाती रही। 

आज पशुपति से तिरूपति तक भवानी भारती का उद्घोष फिर से गूंज रहा है, फिर से वेदध्वनि भारतीय आकाश में गूंजने लगी है, भविष्य का आसमान फिर से हमें शांतिपूर्ण और सुरम्य दिखने लगा है, तो इस नक्सली आतंक को समाप्त करने के लिए श्री अमित शाह के फौलादी संकल्प की, और प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व की भूरि-भूरि प्रशंसा और सराहना खुलकर तो करनी ही पड़ेगी।

 


प्रो राकेश उपाध्याय 

(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)

 

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