देश के कई हिस्सों में बाघों और हाथियों का मानव बस्तियों के पास आना अब अपवाद नहीं रहा। उत्तराखंड के तराई क्षेत्र, उत्तर प्रदेश के पीलीभीत–दुधवा अंचल, मध्य प्रदेश के उमरिया और मंडला, झारखंड, ओडिशा और असम से लगातार ऐसी खबरें सामने आ रही हैं, जहां बाघ गांवों की सीमा तक पहुंच गए और हाथियों के झुंड खेतों व बस्तियों से होकर गुजरते दिखे। कहीं फसलें रौंदी गईं, कहीं मवेशी मारे गए और कहीं लोगों को रातें जागकर गुजारनी पड़ीं। इन घटनाओं ने ग्रामीण समाज में भय पैदा किया है और वन्यजीव संरक्षण की मौजूदा रणनीतियों पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
यह स्थिति न तो केवल जंगली जानवरों की समस्या है और न ही इसे सिर्फ मानव की लापरवाही कहकर टाला जा सकता है। वास्तव में यह उस गहरे पर्यावरणीय असंतुलन का परिणाम है, जिसे हमने वर्षों तक अनदेखा किया। जंगलों का लगातार सिमटना, खनन, सड़क और रेल परियोजनाओं का विस्तार, बड़े जलाशयों का निर्माण और बेतरतीब शहरीकरण, इन सबने वन्यजीवों के पारंपरिक आवागमन मार्गों, यानी कॉरिडोरों, को बाधित किया है। हाथी जैसे स्मृतिशील जीव जब अपने पीढ़ियों पुराने रास्ते नहीं पाते, तो वे मजबूरन गांवों और खेतों से होकर गुजरते हैं। वहीं संरक्षण प्रयासों से बाघों की बढ़ती संख्या तब संघर्ष में बदल जाती है, जब उनके लिए सुरक्षित और पर्याप्त वन क्षेत्र और शिकार आधार उपलब्ध नहीं होता।

इस संघर्ष की सबसे बड़ी कीमत जंगलों के किनारे रहने वाले ग्रामीण समुदाय चुका रहे हैं। जान-माल का नुकसान, फसलों और पशुधन की क्षति, आजीविका पर असर और लगातार बना रहने वाला मानसिक भय उनके जीवन का हिस्सा बन चुका है। मुआवजा प्रक्रियाओं में देरी और अपर्याप्त राहत से लोगों में असंतोष बढ़ना स्वाभाविक है। यदि संरक्षण की नीति केवल आंकड़ों और उपलब्धियों तक सीमित रहे और पीड़ित लोगों की पीड़ा को नजरअंदाज करे, तो वह न तो मानवीय होगी और न ही टिकाऊ। वहीं बदले की भावना में वन्यजीवों को दोषी ठहराना भी किसी समाधान की ओर नहीं ले जाता।
अब स्पष्ट है कि मानव–वन्यजीव संघर्ष को तात्कालिक समस्या नहीं, बल्कि एक स्थायी नीतिगत चुनौती मानकर समाधान खोजना होगा। सबसे पहले वन्यजीव कॉरिडोरों की वैज्ञानिक पहचान, उन्हें कानूनी सुरक्षा और जहां आवश्यक हो वहां पुनर्स्थापन अनिवार्य किया जाना चाहिए। विकास परियोजनाओं की मंजूरी केवल औपचारिक पर्यावरणीय स्वीकृति तक सीमित न रहे, बल्कि अंडरपास, ओवरब्रिज और सुरक्षित मार्ग जैसे शमन उपायों का प्रभावी और अनिवार्य क्रियान्वयन सुनिश्चित हो। हाल की घटनाएं साफ बताती हैं कि जहां इन उपायों की अनदेखी हुई है, वहीं टकराव की घटनाएं अधिक सामने आई हैं।
इसके साथ ही पूर्व चेतावनी प्रणालियों को मजबूत करना समय की सबसे बड़ी मांग है। कैमरा ट्रैप, ड्रोन निगरानी और रियल-टाइम अलर्ट जैसी तकनीकों को वन विभाग, स्थानीय प्रशासन और ग्रामीण समुदाय से जोड़ा जाना चाहिए, ताकि खतरे की सूचना समय रहते मिल सके। प्रशिक्षित त्वरित प्रतिक्रिया दलों की सक्रिय और संवेदनशील भूमिका से जान-माल के नुकसान को काफी हद तक रोका जा सकता है।
स्थानीय समुदायों की भागीदारी इस पूरी प्रक्रिया की आधारशिला है। मुआवजा त्वरित, पारदर्शी और वास्तविक नुकसान के अनुरूप हो, तभी लोगों का भरोसा कायम रह पाएगा। फसल सुरक्षा के लिए सौर बाड़, हाथियों के लिए मधुमक्खी-बाड़ और सामुदायिक निगरानी जैसे उपाय कई इलाकों में प्रभावी सिद्ध हुए हैं। साथ ही भूमि-उपयोग योजना में वन सीमावर्ती क्षेत्रों के लिए स्पष्ट और सख्त दिशानिर्देश तय किए जाने चाहिए, ताकि जोखिम वाले इलाकों में अविवेकपूर्ण और असंतुलित विकास पर रोक लगे।
बाघ और हाथी का आबादी की ओर आना केवल संकट नहीं, बल्कि चेतावनी और अवसर दोनों है। चेतावनी इस बात की कि विकास और संरक्षण के बीच संतुलन गहराई से बिगड़ चुका है और अवसर इस बात का कि हम अपनी विकास नीतियों पर पुनर्विचार करें। संरक्षण और विकास को आमने-सामने खड़ा करने के बजाय, दोनों के बीच संतुलन साधना ही भविष्य का रास्ता है। तभी मनुष्य सुरक्षित रह सकेगा और जंगलों के वास्तविक स्वामी भी अपने घरों में सुरक्षित जीवन जी सकेंगे।

डॉ दीपक कोहली
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)
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