
प्रो. रमाशंकर दूबे
भारत की सबसे बड़ी पहचान उसकी विविधता है। यह विविधता केवल संस्कृति, परंपरा और जीवनशैली तक सीमित नहीं है, बल्कि भाषाओं में भी दिखाई देती है। संविधान की आठवीं अनुसूची में 22 भाषाओं को मान्यता प्राप्त है, जबकि देशभर में सैकड़ों भाषाएं और बोलियां जीवंत रूप से बोली जाती हैं। ऐसे राष्ट्र में शिक्षा व्यवस्था का स्वरूप भी ऐसा होना चाहिए जो विद्यार्थियों को अपनी भाषाई जड़ों से जोड़ते हुए उन्हें राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर सक्षम बनाए। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अंतर्गत प्रस्तावित त्रिभाषा सूत्र इसी व्यापक दृष्टिकोण का परिणाम है।
आज जब दुनिया ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रही है, तब भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं रह गई है। भाषा ज्ञान प्राप्ति, नवाचार, अनुसंधान, रोजगार और सामाजिक सहभागिता का भी महत्वपूर्ण आधार बन चुकी है। इस संदर्भ में त्रिभाषा सूत्र को केवल एक शैक्षिक व्यवस्था के रूप में नहीं, बल्कि भारत की भविष्य की आवश्यकता के रूप में देखा जाना चाहिए।
त्रिभाषा सूत्र का सबसे बड़ा उद्देश्य विद्यार्थियों को बहुभाषी बनाना है। बहुभाषिकता किसी व्यक्ति की बौद्धिक क्षमता को समृद्ध करती है। विभिन्न भाषाओं का ज्ञान व्यक्ति को अलग-अलग संस्कृतियों, विचारधाराओं और ज्ञान परंपराओं से जोड़ता है। एक विद्यार्थी जब अपनी मातृभाषा के साथ अन्य भारतीय भाषाओं और व्यापक उपयोग वाली भाषाओं का अध्ययन करता है, तो उसका दृष्टिकोण अधिक व्यापक बनता है। वह केवल एक क्षेत्र या भाषा तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे राष्ट्र और विश्व को समझने की क्षमता विकसित करता है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का एक महत्वपूर्ण लक्ष्य भारतीय भाषाओं को शिक्षा के केंद्र में स्थापित करना है। लंबे समय तक यह धारणा बनी रही कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा केवल अंग्रेज़ी माध्यम से ही संभव है। इसके परिणामस्वरूप अनेक विद्यार्थी भाषा संबंधी बाधाओं के कारण अपनी वास्तविक क्षमता का प्रदर्शन नहीं कर पाए। नई शिक्षा नीति इस सोच को बदलने का प्रयास करती है। नीति यह स्वीकार करती है कि विद्यार्थी अपनी मातृभाषा या परिचित भाषा में विषयों को अधिक गहराई और सहजता से समझ सकता है। यही कारण है कि प्रारंभिक शिक्षा में मातृभाषा को महत्व देने के साथ-साथ आगे की शिक्षा में भी भारतीय भाषाओं को प्रोत्साहित करने की दिशा में कार्य किया जा रहा है।
उच्च शिक्षा के क्षेत्र में त्रिभाषा सूत्र का महत्व और अधिक बढ़ जाता है। आज भारत विश्व की तीसरी सबसे बड़ी उच्च शिक्षा प्रणाली का देश है। लाखों विद्यार्थी हर वर्ष विश्वविद्यालयों और तकनीकी संस्थानों में प्रवेश लेते हैं। इनमें से बड़ी संख्या ऐसे विद्यार्थियों की होती है जो ग्रामीण या अर्ध-शहरी पृष्ठभूमि से आते हैं। यदि उच्च शिक्षा केवल सीमित भाषाई दायरे में उपलब्ध होगी, तो प्रतिभा का एक बड़ा वर्ग पीछे छूट सकता है। भारतीय भाषाओं में अध्ययन सामग्री, शोध संसाधन और तकनीकी शिक्षा उपलब्ध कराकर इस अंतर को कम किया जा सकता है। त्रिभाषा सूत्र इसी दिशा में एक मजबूत आधार तैयार करता है।
इसके अतिरिक्त, भारत आज वैश्विक मंच पर एक उभरती हुई शक्ति के रूप में स्थापित हो रहा है। व्यापार, प्रौद्योगिकी, कूटनीति, पर्यटन और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के क्षेत्र में भारत की भूमिका लगातार बढ़ रही है। ऐसे समय में बहुभाषी नागरिक देश की महत्वपूर्ण आवश्यकता हैं। जो विद्यार्थी अनेक भाषाओं का ज्ञान रखते हैं, वे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय दोनों स्तरों पर अधिक प्रभावी भूमिका निभा सकते हैं। इसलिए त्रिभाषा सूत्र केवल सांस्कृतिक या शैक्षिक पहल नहीं, बल्कि मानव संसाधन विकास की दृष्टि से भी एक दूरदर्शी कदम है।

भारतीय भाषाओं के संरक्षण और संवर्धन की दृष्टि से भी यह नीति अत्यंत महत्वपूर्ण है। भाषा केवल शब्दों का समूह नहीं होती, बल्कि वह इतिहास, साहित्य, लोकज्ञान, परंपरा और सामूहिक स्मृति की वाहक होती है। यदि कोई भाषा कमजोर होती है, तो उसके साथ उससे जुड़ी सांस्कृतिक विरासत भी प्रभावित होती है। त्रिभाषा सूत्र विद्यार्थियों को अपनी भाषा और अन्य भारतीय भाषाओं से परिचित कराकर इस विरासत के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
कुछ लोगों द्वारा यह आशंका व्यक्त की जाती है कि बहुभाषिक शिक्षा विद्यार्थियों पर अतिरिक्त बोझ डाल सकती है। किंतु वास्तविकता यह है कि भारत के अधिकांश बच्चे स्वाभाविक रूप से बहुभाषी वातावरण में बड़े होते हैं। घर में एक भाषा, सामाजिक जीवन में दूसरी और शिक्षा या कार्यस्थल पर तीसरी भाषा का प्रयोग भारतीय समाज की सामान्य विशेषता है। ऐसे में सुव्यवस्थित और संतुलित ढंग से भाषाओं का अध्ययन विद्यार्थियों के लिए अवसरों का विस्तार करता है, न कि बोझ बढ़ाता है।
त्रिभाषा सूत्र की सबसे बड़ी विशेषता इसकी समावेशी प्रकृति है। इसका उद्देश्य किसी भाषा को बढ़ावा देकर दूसरी भाषा को कमतर करना नहीं है। इसके विपरीत, यह भारत की भाषाई विविधता को सम्मान देते हुए विभिन्न भाषाओं के बीच संवाद और सहयोग को बढ़ावा देता है। यही दृष्टिकोण भारत की लोकतांत्रिक और सांस्कृतिक परंपरा के अनुरूप भी है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 और शिक्षा मंत्रालय के प्रयासों ने भारतीय भाषाओं को नई ऊर्जा प्रदान की है। विभिन्न भारतीय भाषाओं में तकनीकी, वैज्ञानिक और व्यावसायिक विषयों की सामग्री तैयार की जा रही है। डिजिटल प्लेटफॉर्मों के माध्यम से भाषाई संसाधनों को व्यापक बनाया जा रहा है। अनुवाद और ज्ञान-साझाकरण की नई व्यवस्थाएं विकसित की जा रही हैं। इन पहलों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि भाषा किसी विद्यार्थी की प्रगति में बाधा न बने, बल्कि उसकी सफलता का माध्यम बने।
विकसित भारत 2047 के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए ऐसे नागरिकों की आवश्यकता होगी जो अपनी संस्कृति और भाषा से जुड़े हों, साथ ही वैश्विक स्तर पर संवाद करने की क्षमता भी रखते हों। त्रिभाषा सूत्र इस दिशा में एक महत्वपूर्ण साधन है। यह विद्यार्थियों को स्थानीय से राष्ट्रीय और राष्ट्रीय से वैश्विक स्तर तक जोड़ने का कार्य करता है। यही इसकी वास्तविक शक्ति है।
अतः त्रिभाषा सूत्र को केवल भाषा नीति के रूप में नहीं, बल्कि भारत के ज्ञान, संस्कृति, शिक्षा और राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करने वाली एक दूरदर्शी पहल के रूप में देखा जाना चाहिए। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के माध्यम से भारत सरकार और शिक्षा मंत्रालय ने बहुभाषी, आत्मविश्वासी और ज्ञान-समृद्ध भारत के निर्माण की जो दिशा निर्धारित की है, वह आने वाले वर्षों में देश की शैक्षिक और बौद्धिक प्रगति का मजबूत आधार सिद्ध हो सकती है।
(लेखक कुलाधिपति, राष्ट्रीय शैक्षिक योजना एवं प्रशासन संस्थान (NIEPA), नई दिल्ली, हैं)
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)
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