logo

ये जीत है बड़े काम की...

 This is a victory for a great cause

तीन राज्यों में भारतीय जनता पार्टी की भारी जीत को लेकर तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं आ रही हैं। सबके अपने-अपने तर्क हैं। किसी के हिसाब से यह जीत नरेंद्र मोदी की गारंटी की जीत है तो किसी का तर्क है कि स्थानीय समीकरणों ने भी इस जीत को सफल बनाया। इससे इनकार नहीं कि संसदीय लोकतंत्र की चुनावी प्रक्रिया में चाहे जीत हो या हार, सैद्धांतिक रूप से भले ही व्यक्ति केंद्रित नहीं हो, लेकिन व्यवहारिक रूप से वह कहीं न कहीं व्यक्ति केंद्रित होती ही है। भारतीय जनता पार्टी की तीन राज्यों में जीत को भी इसी तरह देखा और परखा जाना कोई अनूठी बात नहीं है।

जो भारतीय जनता पार्टी को जानते हैं, उन्हें उसकी कार्यशैली पता है। चाहे जीत हो या हार, सबकी होती है। यहां सामूहिकता पर जोर रहता है। इसकी वजह यह है कि भारतीय जनता पार्टी कैडर आधारित पार्टी है। बेशक जो अगुआई कर रहा होता है, श्रेय उसे ही मिलता है। लेकिन जीत के पीछे समूचे संगठन की ताकत लगती है, उसका चिंतन लगता है। कई लोग सामने होते हैं तो कई पर्दे के पीछे। हां, यह सही है कि अगुआ अगर दमदार हो तो उसके पीछे चलने वाले कार्यकर्ताओं का उत्साह दोगुना-चौगुना होता है। नरेंद्र मोदी ऐसे ही अगुआ हैं। उनके पीछे चलने वाले कार्यकर्ताओं की का समूह उनकी वजह से चौगुने उत्साह से अपनी-अपनी भूमिकाओं में जुटा रहता है। तीन राज्यों की जीत के पीछे इसी सोच को ही देखा जाना चाहिए।

चाहे राजस्थान की जीत हो या छत्तीसगढ़ की या फिर मध्य प्रदेश की, सबके पीछे भाजपा की सामूहिक ताकत रही, नरेंद्र मोदी का चेहरा रहा और इसके साथ ही संगठन की अहर्निश सक्रिय मशीनरी भी रही। मध्य प्रदेश की जीत को लेकर भले ही राज्य के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और राज्य के भाजपा के चुनाव प्रभारी अश्विनी वैष्णव प्रधानमंत्री मोदी की जीत बता रहे हों। लेकिन इस जीत के सेहरे के हकदार एक हद तक शिवराज भी हैं। रही बात छत्तीसगढ़ की जीत की, तो निश्चित तौर पर इसके लिए पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व कहीं ज्यादा जिम्मेदार है। राजस्थान की राजनीति की चूंकि तीस सालों से रवायत है कि एक बार कांग्रेस तो अगली बार भाजपा, इसलिए वहां की जीत को इस चश्मे से भी देखा जाएगा। लेकिन मध्य प्रदेश की जीत को कुछ अलग तरह से भी देखना होगा। 

बीते दस जून को मध्य प्रदेश की संस्कारधानी जबलपुर में जब शिवराज सिंह चौहान ने 23 साल से ज्यादा उम्र वाली महिलाओं की मदद के लिए लाडली बहना योजना शुरू की। उसके ठीक अगले ही दिन कांग्रेस की महासचिव प्रियंका गांधी की उसी जबलपुर में रैली थी। तब प्रियंका की रैली को लेकर जो उत्साह नजर आ रहा था, वैसा उत्साह लाड़ली बहना योजना को लेकर नहीं नजर आया। तब लाड़ली बहना योजना के लांचिंग के मौके पर हुई रैली में आई महिलाओं में भी दिल से शिवराज सरकार को लेकर उत्साह नजर नहीं आ रहा था। यहां तक कि वहां उपस्थित पत्रकार भी कुछ उदासीन नजर आ रहे थे। लेकिन जैसे ही यह योजना लागू हुई, महिलाओं के खाते में प्रति माह एक हजार रूपए का ट्रांजेक्शन होने लगा, शिवराज और भाजपा को लेकर स्थितियां बदलनी शुरू हुईं। मुफ्तिया रेवड़ी के साइड इफेक्ट को समझते हुए भी शिवराज ने इस योजना पर शिद्दत से काम जारी रखा। सितंबर महीने से इस योजना के तहत मिलने वाली रकम को हजार रूपए प्रति महीने से बढ़ाकर 1250 रूपए प्रति महीने कर दिया। इसका असर चुनाव नतीजों पर दिख रहा है। भारतीय जनता पार्टी पिछली बार के 109 सीटों से कहीं ज्यादा आंकड़ा पार करके मध्य प्रदेश की राजनीति में नया इतिहास रच चुकी है। इस नए इतिहास के रचयिता के रूप में कहीं न कहीं शिवराज की लाड़ली बहना योजना को देखना ही पड़ेगा।

यह पहला मौका नहीं है, जब शिवराज ने ऐसी कोई योजना चलाई। साल 2008 के आम चुनावों के ठीक पहले उन्होंने लाड़ली लक्ष्मी योजना शुरू की। जिसके तहत पैदा होने वाली लड़कियों के पैदा होने से लेकर उनकी पढ़ाई-लिखाई, साइकिल और शादी के खर्च तो सरकार ने उठाए ही, दहेज में 51 हजार रूपए दिए गए। इसका असर उस चुनाव में बीजेपी को जीत के रूप में दिखा। साल 2013 के विधानसभा चुनावों के पहले शिवराज ने तीर्थ दर्शन योजना चलाई। इसके तहत राज्य के बुजुर्गों को रेल गाड़ियों के जरिए तीर्थयात्रा कराई गई। इसका असर 2013 के विधानसभा चुनावों में दिखा। यहां याद कर लेना चाहिए कि ये योजनाएं उनके विश्वस्त और लेखक के रूप में विख्यात प्रशासनिक अधिकारी मनोज श्रीवास्तव के दिमाग की उपज थी। इन योजनाओं को बाद में तमाम राज्य सरकारों ने अपनाया। दिल्ली की शीला दीक्षित सरकार ने जहां लाड़ली लक्ष्मी योजना को अपनाया तो दिल्ली की ही केजरीवाल सरकार हर साल बुजुर्गों को तीर्थयात्रा करा रही। लाड़ली लक्ष्मी योजना के बारे में शिवराज कह चुके हैं कि उन्हें इसका सपना आया और इसे वे लागू कर रहे हैं।

वैसे 2018 के विधानसभा चुनावों में भाजपा को कांग्रेस से 48 हजार 27 वोट ज्यादा मिले थे, लेकिन उसकी सीटें कांग्रेस से पांच कम रह गई थीं। इन संदर्भों में देखें तो तब की हार भी व्यवहारिक रूप से हार भले ही हो, सैद्धांतिक रूप से हार नहीं थी। इस लिहाज से देखें तो शिवराज भारतीय राजनीति के बड़े चेहरे के रूप में उभरते हैं। शिवराज के बारे में यह बात फैलाई गई थी कि उनका चेहरा देखकर मध्य प्रदेश के लोग उब गए हैं। लेकिन नतीजे कुछ और ही बता रहे हैं। राज्य में महिला मतदाताओं की संख्या पुरूषों के मुकाबले ज्यादा है। करीब 52 फीसद वोटर महिलाएं हैं। इसी तरह राज्य में प्रति सीट करीब पौने दस हजार नए वोटर बने हैं। कह सकते हैं कि कांग्रेस की गारंटियां इन वोटरों को आकर्षित नहीं कर पाईं और शिवराज कहीं ज्यादा आगे रहे। कांग्रेस कुछ ज्यादा उत्साह में रही और अति उत्साह उसे ले डूबा।

मध्य प्रदेश की ही कोख से निकले राज्य छत्तीसगढ़ के बारे में किसी भी एक्जिट पोल ने यह उम्मीद नहीं जताई थी कि वहां कांग्रेस की जीत होगी। लेकिन वहां भी भारतीय जनता पार्टी ने नया इतिहास रच दिया। और तो और, छत्तीसगढ़ कांग्रेस के नेता भी मध्य प्रदेश की तरह ज्यादा उत्साह में थे। जबकि भाजपा में तो उत्साह दिख भी नहीं रहा था। चार साल तक तो यहां का स्थानीय भाजपा नेतृत्व लगातार हताश और निरूत्साहित नजर आया। मोदी-शाह की जोड़ी और संघ विचार परिवार के संगठनों ने मिलकर बाजी पलट अमित शाह ने छत्तीसगढ़ में लगातार दौरे किए। ओम माथुर ने हर सीट पर काम किया और नतीजा सामने है। छत्तीसगढ़ को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस का एटीएम कहा था। अब कांग्रेस का यह एटीएम उससे छिन चुका है। इसमें किंचित योगदान अमित जोगी की अगुआई वाली छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस का भी है, जिसने कांग्रेस के किले में बीजेपी को सेंध लगाने में मदद दी। छत्तीसगढ़ की जीत निश्चित तौर पर भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व, उसकी रणनीति और संगठन की है। वैसे छत्तीसगढ़ की हार के पीछे मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के इर्द-गिर्द इकट्ठे हुए लोगों का अहंकार भी बड़ा कारण रहा। बघेल उन पर भरोसा करते रहे और उन्होंने बघेल तक सही सूचनाएं नहीं पहुंचाई। इसके लिए बघेल को भी जिम्मेदार माना जा सकता है। वैसे सत्ता जब आती है तो अहंकार साथ आता है। ऐसा आरोप अशोक गहलोत पर उनके ही विशेष कार्यअधिकारी रहे लोकेश शर्मा लगा चुके हैं। उनका कहना है कि गहलोत के इर्दे-गिर्द जुटे लोग अहंकारी और चाटुकार थे और वे गहलोत तक सही जानकारी नहीं पहुंचाते रहे। इन अर्थों में भाजपा की प्रशंसा ही करनी पड़ेगी कि उसने सही और सटीक सूचनाओं पर भरोसा किया और तीनों ही राज्यों में नया इतिहास रच दिया।

राजस्थान में भाजपा रवायत के मुताबिक सत्ता छीनने में कामयाब भले ही हुई हो, लेकिन यह भी सच है कि भाजपा की आपसी खींचतान की वजह से यह जीत आसान नहीं दिख रही थी। हाल के दिनों में जिस तरह मीडिया के एक वर्ग ने अशोक गहलोत के बारे में हवा फैलाने में मदद दी थी, उससे राष्ट्रीय स्तर पर यह संदेश गया कि गहलोत अजेय हैं। हालांकि गहलोत इतने मजबूत हो चुके थे कि वे अपने आलाकमान को ठेंगे पर रखने लगे थे। उन्होंने कांग्रेस आलाकमान की मर्जी के विपरीत जाकर ना तो मुख्यमंत्री पद छोड़ा, ना ही कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए चुनाव लड़ा। इतना ही नहीं, आलाकमान की आंख की किरकिरी बने शांति धारीवाल को जबरदस्ती टिकट दिलाया। इससे राहुल गांधी नाराज भी रहे। पचपन दिनों के चुनाव अभियान के बाद वे राज्य में महज चार घंटे के लिए चुनाव प्रचार करने पहुंचे और तीन ही रैलियां कीं। भाजपा ने इस बीच अपनी रूठी पड़ी महारानी वसुंधरा को आगे किया,सामूहिक भाव के साथ चुनाव मैदान में उतरी और इतिहास बदलकर रख दिया।

विंध्य पर्वत के उत्तर में स्थित हिंदीभाषी तीन राज्यों में भाजपा की जीत से भाजपा का उत्साह बढ़ेगा। उसका मनोबल भी बढ़ेगा, जिसके जरिए वह लोकसभा चुनावों में आगे आने के लिए पुरजोर ताकत झोंकेगी। कांग्रेस भले ही तेलंगाना जीत रही हो,लेकिन विपक्षी गठबंधन में उसकी स्वीकार्यता में दरार बढ़ेगी। कुछ जानकारों का कहना है कि उदयनिधि स्टालिन ने बीते सितंबर में सनातन धर्म के खिलाफ जो कुछ भी बोला, उसका इंडिया गठबंधन के नेताओं ने तीखा विरोध नहीं किया, इसकी वजह से भी उत्तर भारत में सनातनधर्म समर्थक कांग्रेस के खिलाफ गोलबंद हुए। यह सच है कि राजस्थान में बीजेपी की ओर से कन्हैया लाल की नृशंस हत्या का मामला उछाला गया, लेकिन यह भी सच है कि राजस्थान के लोग भी कानून व्यवस्था की हालत से उब गये थे और अशोक गहलोत को उन्होंने सबक सिखाने की ठानी। लोकसभा चुनावों के पहले होने वाले हर चुनाव को मीडिया का एक हिस्सा सेमीफाइनल बताते नहीं थकता। लेकिन यह सोच सही नहीं है। राजनीतिक दलों के लिए हर चुनाव उस संदर्भ विशेष में फाइनल ही होता है। जुझारू राजनीतिक दल हर चुनाव को युद्ध की तरह लेते हैं और खुद को जनता की अदालत में साबित करने की कोशिश करते हैं। फिलहाल बीजेपी इस मामले में आगे है। इसलिए उसकी प्रशंसा तो करनी ही पड़ेगी। प्रशंसा की पात्र जनता भी है, जिसने अपने विवेक के हिसाब से समर्थन दिया है। और उस जनता को सलाम किया जाना चाहिए, जिसने अपने तरीके से लोकतंत्र पर भरोसा जताया है।



उमेश चतुर्वेदी
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)

Leave Your Comment

 

 

Top