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भगवान जगन्नाथ की विश्व प्रसिद्ध रथयात्रा : एक परिप्रेक्ष्य

The world famous Rath Yatra of Lord Jagannath: A perspective

विश्व का एकमात्र संस्कृति संपन्न देश भारत  है जहां के आध्यात्मिक प्रदेश ओडिशा के श्रीजगन्नाथ धाम पुरी में अनादिकाल से अपने रत्न सिंहासन पर विराजमान हैं जगत के नाथ भगवान जगन्नाथ। वे  कलियुग के एकमात्र पूर्ण दारुब्रह्म हैं जो अपने दर्शन मात्र से भक्तों को विश्व शांति,एकता,सद्भाव,भाईचारा और मैत्री का पावन संदेश देते हैं।

प्रतिवर्ष आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को भगवान जगन्नाथ की विश्वप्रसिद्ध रथयात्रा अनुष्ठित होती है जो अपने आपमें एक सांस्कृतिक महोत्सव होता है। 2025 की रथयात्रा आगामी 27 जून को है। उस विश्व प्रसिद्ध रथयात्रा को दशावतार यात्रा, गुण्डीचा यात्रा, जनकपुरी यात्रा, नव दिवसीय यात्रा ,घोष यात्रा और पतितपावनी यात्रा भी कहते हैं।

भगवान जगन्नाथजी की विश्व प्रसिद्ध रथयात्रा के लिए प्रतिवर्ष तीन नये रथों का निर्माण होता है। श्रीमंदिर के समस्त रीति-नीति के तहत वैशाख मास की अक्षय तृतीया से रथनिर्माण का कार्य आरंभ होता है। रथ-निर्माण में कुल लगभग 45 दिन लगते हैं। काष्ठ संग्रह का कार्य बसंतपंचमी से आरंभ होता है।(इस वर्ष वसंत पंचमी 02 फरवरी,रविवार को थी।) रथ-निर्माण की अत्यंत गौरवशाली और सुदीर्घ परम्परा रही है। इस कार्य को वंशानुगत क्रम से सुनिश्चित सेवायत बढईगण ही करते हैं। यह कार्य पूर्णतः शास्त्रसम्मत विधि से संपन्न होता है। तीनों रथ- बलभद्रजी का रथ तालध्वज रथ, सुभद्राजी का देवदलन रथ तथा भगवान जगन्नाथ के रथ नंदिघोष रथ का निर्माण पूरी तरह से वैज्ञानिक तरीके से होता है। रथ-निर्माण में कुल लगभग 205 प्रकार के अलग-अलग सेवायतगण सहयोग करते हैं। रथ निर्माण के क्रम में ऐसी मान्यता है कि जिस प्रकार पंचतत्वों से मानव-शरीर का निर्माण हुआ है, ठीक उसी प्रकार काष्ठ, धातु, रंग, परिधान तथा सजावटी वस्तु, पंच  सामग्रियों से रथों का पूर्णरुपेण निर्माण होता है। पौराणिक मान्यता के आधार पर रथ ही मानव-शरीर होता है, रथी मानव-आत्मा, सारथि-मानव-बुद्धि, लगाम मानव-मन तथा रथ के घोड़े मानव-इिन्द्रयगण के प्रतीक हैं। जगन्नाथ जी की विश्वप्रसिद्ध रथयात्रा के दिन तीनों ही रथ चलते-फिरते मंदिर होते हैं।

रथों का विवरण- 

तालध्वज रथः भगवान जगन्नाथ जी के बड़े भाई बलभद्रजी के रथ का नाम तालध्वज है। इसे बहलध्वज भी कहते हैं। इसे ताल जंगव के देवताओं ने बलभद्रजी को भेंट किया था। यह 44फीट ऊंचा होता है जिसमें 14चक्के लगे होते हैं। इसके निर्माण में कुल 763 काष्ठ खण्डों का प्रयोग होता है। इस रथ पर लगे पताके का नाम उन्नानी है। इस रथ पर लगे नये परिधान के रंग लाल-हरा होता है। इसके घोडों़ का नाम- तीव्र, घोर, दीर्घाश्रम और स्वर्णनाभ हैं। घोडों का रंग काला होता है। रथ के रस्से का नाम वासुकि होता है। रथ के पार्श्व देव-देवतागण के रुप में गणेश, कार्तिकेय, सर्वमंगला, प्रलंबरी, हलयुध, मृत्युंजय, नतंभरा, मुक्तेश्वर तथा शेषदेव हैं। रथ के सारथि का नाम मातलि है तथा रथ के रक्षक हैं-वासुदेव।

देवदलन रथ: यह रथ भगवान जगन्नाथ की लाड़ली बहन सुभद्राजी का है जिसे देवदलन तथा दर्पदलन भी कहा जाता है। यह 43फीट ऊंचा होता है। इसमें कुल 593 काष्ठ खण्डों का प्रयोग होता है। इस पर लगे नये परिधान का रंग लाल-काला होता है। इसमें 12 चक्के लगे होते हैं। रथ के सारथि का नाम अर्जुन है। रक्षक जयदुर्गा हैं। रथ पर लगे पताके का नाम नदंबिका है। रथ के चार घोडे हैं –रुचिका,मोचिका,जीत तथा अपराजिता। घोड़ों का रंग भूरा है। रथ में उपयोग में आनेवाले रस्से का नाम स्वर्णचूड़ है। रथ के पार्श्व देव-देवियां है-चण्डी, चामुण्डी, उग्रतारा, शूलीदुर्गा, वराही, श्यामकाली, मंगला और विमला हैं।

नन्दिघोष रथ: भगवान जगन्नाथजी के रथ का नाम नंदिघोष रथ है। इसे गरुड़ध्वज तथा कपिध्वज भी कहते हैं। इसे स्वयं देवराज इन्द्र ने भगवान जगन्नाथ को प्रदान किया था। रथ की ऊंचाई 45फीट होता है। इसमें 16चक्के होते हैं। इसके निर्माण में कुल 832 काष्ठ खण्डों का प्रयोग होता है। रथ पर लगे नये परिधानों का रंग लाल-पीला होता है। इसपर लगे पताके का नाम त्रैलोक्यमोहिनी है। इसके सारथि दारुक तथा रक्षक हैं –गरुण। इसके चार घोडे हैः शंख,बलाहक,सुश्वेत तथा हरिदाश्व। इस रथ में लगे रस्से का नाम शंखचूड है। रथ के पार्श्व देव-देवियां है- वराह, गोवर्धन, कृष्ण, गोपीकृष्ण, नरसिंह, राम, नारायण, त्रिविक्रम, हनुमान तथा रुद्र हैं। 2025 की रथयात्रा 27 जून को है इसीलिए 19जून, आषाढ़ शुक्ल प्रतिपदा के दिन तीनों ही रथों को पूर्णरुपेण निर्मितकर रथखला से लाकर उसे पूरी तरह से सुसज्जित करके श्रीमंदिर के सिंहद्वार के सामने खडा कर दिया जाएगा जिसमें 27 जून को अर्थात् आषाढ शुक्ल द्वितीया के दिन चतुर्धा देवविग्रहों को पहण्डी विजयकर रथारुढ किया जाएगा। पुरी गोवर्द्धन मठ के 145वें पीठाधीश्वर,पुरी के जगतगुरु शंकराचार्य परमपाद स्वामी निश्चलानन्द सरस्वती महाभाग रथयात्रा के दिन अपने परिकरों के साथ आकर रथों का अवलोकन करते हैं तथा अपना आत्मनिवेदन प्रस्तुत करते हैं। पुरी के गजपति महाराजा जो जगन्नाथ जी के प्रथम सेवक होते हैं श्री श्री दिव्यसिंहदेवजी महाराजा अपने राजमहल श्रीनाहर से सफेद राजसी वस्त्र में पालकी में सवार होकर आते हैं और तीनों ही रथों पर छेरापंहरा करते हैं अर्थात् रथों पर चंदनमिश्रित पवित्र जल छिड़कर रथों को शुद्धता प्रदान करते हैं। उसके उपरांत आरंभ होगी भगवान जगन्नाथ जी की विश्व प्रसिद्ध रथयात्रा।2025 वर्ष की रथयात्रा 27 जून को है। ऐसी मान्यता है कि भगवान जगन्नाथ की विश्व प्रसिद्ध रथयात्रा जगन्नाथ-भक्ति,दर्शन और ज्ञान की त्रिवेणी होती है जिसमें जो भक्त उनके रथारुढ़ स्वरुप के दर्शन कर लेता है उसे पुनः मोक्ष की कामना नहीं होती है।





अशोक पाण्डेय
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)

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