logo

AIIMS का अघोषित इतिहास

The undisclosed history of AIIMS

इतिहास हमेशा झूठ नहीं बोलता, कई बार वह सुविधाजनक चुप्पी ओढ़ लेता है। उसी चुप्पी में सत्ता अपने नायक गढ़ती है और वास्तविक योगदानकर्ताओं को हाशिये पर धकेल देती है। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान—AIIMS—की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। आजकल एक "दादी की नाक वाली" दीदी एक बात बार बार दोहरा रही हैं।  मैंने सोचा की आज कुछ बातें आपलोगों के सामने साफ़ कर दूँ। 
मित्रों, आजादी से लेकर आजतक आपको, हम सबको यह घुट्टी पीला दी गयी है  कि “नेहरू ने AIIMS बनाया।” जबकि यह सच्चाई नहीं है।  यह वाक्य fact नहीं, बल्कि political propaganda है। सच्चाई यह है कि AIIMS का निर्माण जवाहरलाल नेहरू ने नहीं, बल्कि राजकुमारी अमृत कौर ने किया था।
AIIMS इसलिए अस्तित्व में आया क्योंकि एक महिला ने अपने व्यक्तिगत संसाधन, प्रभाव और संकल्प को public health के लिए समर्पित कर दिया। दिल्ली के अंसारी नगर में स्थित AIIMS लगभग 190 एकड़ की जिस बेशकीमती ज़मीन पर खड़ा है, वह न तो सरकार द्वारा अधिग्रहित की गई थी और न ही खरीदी गई थी। यह ज़मीन राजकुमारी अमृत कौर की निजी पारिवारिक संपत्ति थी, जिसे उन्होंने बिना किसी प्रतिफल के दान कर दिया। आज के बाज़ार मूल्य में इस ज़मीन की कीमत हज़ारों, बल्कि दसियों हज़ार करोड़ रुपये आंकी जा सकती है। इसके बावजूद कांग्रेस सरकार ने इसके लिए न तो एक रुपया भी खर्च किया, बल्कि इस तथ्य का उल्लेख इतिहास में भी लगभग गायब है।
आजादी के तुरंत बाद भारत आर्थिक रूप से बेहद कमज़ोर स्थिति में था। सरकार के पास बड़े-बड़े नारे थे, लेकिन संसाधनों की भारी कमी थी। ऐसे में AIIMS जैसे विश्वस्तरीय चिकित्सा संस्थान का सपना सरकारी तिजोरी के भरोसे पूरा होना संभव नहीं था। यह राजकुमारी अमृत कौर ही थीं जिन्होंने न्यूज़ीलैंड सहित विदेशी देशों से सहायता सुनिश्चित की, अंतरराष्ट्रीय चिकित्सा सहयोग स्थापित किया और उपकरणों, प्रशिक्षण तथा विशेषज्ञता की व्यवस्था कराई। यदि कांग्रेस सरकार के पास स्वयं यह क्षमता होती, तो विदेशी सहयोग की आवश्यकता ही क्यों पड़ती—यह सवाल अपने आप में बहुत कुछ कह देता है।
AIIMS अधिनियम, 1956 भी किसी अचानक जागी सरकारी इच्छाशक्ति का परिणाम नहीं था। यह कानून राजकुमारी अमृत कौर के निरंतर दबाव के कारण अस्तित्व में आया। उन्हें नौकरशाही की जड़ता, मंत्रिमंडल की उदासीनता और कांग्रेस की राजनीतिक सुस्ती से लगातार लड़ना पड़ा। फाइलें अपने आप नहीं चलीं; उन्हें चलाया गया। वह process, जिसे आज Institutional building के रूप में पेश किया जाता है, दरअसल एक महिला की जिद और प्रतिबद्धता का नतीजा थी।
इसके विपरीत, जवाहरलाल नेहरू की भूमिका मुख्यतः औपचारिक रही। उन्होंने उस ढांचे को मंज़ूरी दी जो पहले ही आकार ले चुका था, भाषण दिए और उद्घाटन किया। यह भूमिका administrative process  का हिस्सा हो सकती है, लेकिन इसे Institution building कहना सच्चाई के साथ अन्याय होगा। यह contribution  से अधिक political posturing थी— जिसमे credit कैमरों और इतिहास की किताबों में दर्ज हो गया।
यही कारण है कि कांग्रेस ने राजकुमारी अमृत कौर को इतिहास के हाशिये पर धकेल दिया। उनकी कहानी उस मिथक को तोड़ती है कि कांग्रेस ने अकेले भारत का निर्माण किया, कि नेहरू ने सभी महान संस्थान खड़े किए, और कि सत्ता अपने आप में योगदान का प्रमाण होती है। AIIMS इस धारणा को उलट देता है। यहाँ एक शाही पृष्ठभूमि से आई महिला ने अपनी विरासत सार्वजनिक भलाई के लिए त्याग दी, जबकि सत्ता में बैठे लोगों ने बाद में उसका श्रेय अपने नाम कर लिया।
आज न तो कोई दरबारी इतिहासकार राजकुमारी अमृत कौर को केंद्र में रखता है और न ही पाठ्यपुस्तकों में उन्हें वह स्थान मिलता है जिसकी वे हक़दार थीं। कारण स्पष्ट है—कांग्रेस का इतिहास गाँधी title  से आगे देखना ही नहीं चाहता। सच्चाई यह है कि AIIMS राजकुमारी अमृत कौर की विरासत है। कांग्रेस ने सिर्फ उस पर अपना नाम लिख दिया। त्याग किसी और का था, और प्रचार किसी और का। जय हिन्द जय भारत। 

Leave Your Comment

 

 

Top