
राकेश उपाध्याय
क्यारिजीम चेंज एक सरल, साधारण और लोकतांत्रिक शब्द है? तो इस शब्द का विवादित इतिहास और अतीत इसे सवालों के घेरे में खड़ा कर देता है। विश्व के राजनीतिक इतिहास में यह शब्द ट्रांसफर ऑफ द पॉवर, इलेक्टोरल प्रोसेस, डेमोक्रेटिक चेंज, टॉपलिंग द गर्वनमेंट या हिंदी के सत्ता परिवर्तन, बदलाव, चुनावी जय-पराजय से अधिक तख्ता पलट या मिलिट्री कू आदि से जुड़ता दिखाई देता है।
प्रेस क्लब में प्रेस कॉन्फ्रेंस में प्रशांत भूषण ने ‘रिजीम चेंज’ पर और नेहा बोरा ने बंगलादेशी तख्तापलट को धन्यवाद देकर अपने भीतर की मोदी विरोधी नफरती-नीयत जाहिर की तो सियासत में उबाल आना ही था।
बीजेपी ने देश में मुख्य चुनाव आयुक्त और मतदाता गहन पुनरीक्षण के बहाने चल रहे प्रदर्शनों की षड्यंत्री नीयत बताकर इसे देश विरोधी, तख्तापलट का खुला ऐलान कहा तो विपक्षी दलों के प्रवक्ता चैनलों पर यह कहकर बयान का बचाव करने लगे कि डेमोक्रेसी में रिजीम चेंज तो डेमोक्रेटिक तरीके से ही किया जाता है।
राजनीतिक विज्ञान की शब्दावली में रिजीम चेंज शब्द अमेरिकी विदेश नीति में अपने देश की विरोधी सरकारों को उलट देने का सबसे प्रमुख संवादी शब्द है। 1925 में इस शब्द का प्रयोग प्रथम विश्वयुद्ध के बाद प्रचलित हुआ बताया जाता है जबकि अमेरिका के नेतृत्व में मित्र देश बगैर किसी युद्ध के अपने विरोधी शासकों को निपटाने की रणनीति पर खामोशी से काम करने में जुट गए थे। अंग्रेजी शब्दकोश में तभी से यह शब्द शामिल हुआ देखा जाता है।
अब रिजीम चेंज के तरीके क्या हैं तो इसे भी स्पष्ट रूप से इस शब्द से जुड़े इतिहास आख्यानों में माना और स्वीकार किया गया है कि विरोधी सरकारों को आंतरिक उपद्रव, क्रांति, भीड़तंत्र का सहारा लेकर, गृहयुद्ध भड़काकर, सैनिक विद्रोह पैदा कर, अथवा उस देश के पड़ोसी देशों से आतंकवाद का कवच लेकर यदि उलट दिया जाए तो इसे ही रिजीम चेंज का सर्वाधिक प्रभावी तरीका माना गया है।
इसके अंतर्गत किसी देश के शासन के विरोधी दलों को आर्थिक और जरूरी सहायता मुहैया कराना, उस देश के लोकतंत्र विरोधी समूहों को खास तौर पर प्रशिक्षित करना, उस देश की मीडिया को पूरी सहायता देकर मनोनुकूल नैरेटिव बनाना, देश के भीतर हर संवेदनशील मुद्दे में विस्फोटक परिस्थित का आंकलन कर उससे जुड़े स्टेकहोल्डर को तत्काल सड़क पर उतरकर सरकारी संस्थाओं को घेर लेना, और अंत में सरकार की बलपूर्वक कार्रवाई की प्रतिक्रिया में देश भर में दंगे, आगजनी, नेताओं-अफसरों की हत्या आदि को प्रेरित करना शामिल है।
हमारे शोध में उपर्युक्त लिखित विवरण को अनेक अकादमिक शोध पोर्टल और आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस ने भी सही माना है।
* Earliest Documentation: The exact phrase dates back at least to 1925 in English-language records.
* Conceptual Roots: The underlying idea of replacing a government or political system—whether through internal revolutions, civil wars, and coups d'état, or external invasions—traces back to ancient political philosophy (such as Thucydides)

अब बात क्नाट प्लेस पर तिरंगा फहराने के सीजेपी के अभियान की कर लेते हैं। इस बारे में अनेक पत्रकार अनेक तरह की बातें कर रहे हैं कि तिरंगा फहराने की अनुमति दी जानी चाहिए थी।
इस संदर्भ में मैं वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव को उद्धृत करना चाहूंगा। उन्हें शायद ही कोई प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के समर्थक वर्ग में शामिल करे। उन्होंने फेसबुक पर बड़ी तार्किक बात लिखी है।
उन्होंने लिखा है कि भारत जैसे लोकतांत्रिक देश के संदर्भ में 'रिजीम चेंज' (तख्तापलट जैसी भाषा) की बात करना पूरी तरह गलत और अनुचित है। राहुल देव के अनुसार, अंग्रेजी राजनीतिक विमर्श में 'रिजीम चेंज' का रूढ़ और प्रचलित अर्थ अलोकतांत्रिक, हिंसक तरीकों या सैन्य माध्यमों से 'तख्तापलट' या पूरी व्यवस्था का परिवर्तन करना होता है। यह सामान्य 'सरकार-परिवर्तन' (Change of Government) से बिल्कुल अलग है
अब एक मित्र पत्रकार लिखते हैं कि मोदीजी ने खुद हर घर तिरंगा अभियान चलवाया। खुद बीजेपी अध्यक्ष डॉ. मुरली मनोहर जोशी के नेतृत्व में कश्मीर के लाल चौक पर तिरंगा फहराया था। तो अब कोई समूह यदि उसी अभियान को लेकर चल रहा है तो क्या दिक्कत है।
इस संदर्भ में यह उल्लेखनीय है कि 26 जनवरी 1992 को बीजेपी अध्यक्ष डॉ. मुरली मनोहर जोशी, वर्तमान पीएम श्री नरेंद्र मोदी, वरिष्ठ बीजेपी नेता श्री मदन लाल खुराना, कृष्णलाल आदि अनेक लोगों ने नरसिम्हाराव सरकार से अनुमति के बाद सैनिक सुरक्षा में तब तिरंगा फहराया था जबकि घाटी में आईएसआई प्रेरित इस्लामिक आतंकवाद चरम पर था।
तब आतंकी समूह घाटी में खुलेआम तिरंगा जला रहे थे, देश की संप्रभुता को खुली चुनौती दी गई थी। आर्मी के अफसर सहित भारत की तत्कालीन रिजीम का समर्थन करने वाला हर समूह आतंकवादियों और छुपे हुए गद्दारों के निशाने पर था। इस बारे में कश्मीर फाइल्स फिल्म में सबकुछ प्रमाण सहित प्रदर्शित है।
कश्मीरी हिंदुओं को कितनी बड़ी कीमत तब चुकानी पड़ी थी, इसे शोधपूर्वक आज भी पढ़ा और जाना जा सकता है। इसलिए आज के तिरंगा अभियान से उस समय की तस्वीर की कोई तुलना करना अज्ञानता के सिवाय कुछ नहीं है।
दूसरी ओर प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के हर घर तिरंगा अभियान में आम नागरिकों की स्वैच्छिक सहभागिता को प्रेरित किया जाता है। मान लीजिए कि हर घर तिरंगा अभियान चल रहा है तो कोई समूह आम लोगों को तिरंगा उपलब्ध करवा सकता है, सम्मान पूर्वक लोग उसे अपने घरों, छतों पर लगाते ही है।
हम अपने स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस पर गांव-गांव, नगर-नगर, विद्यालय-विद्यालय प्रभात फेरी शांतिपूर्ण निकालते ही हैं। यह तो हमारी खुशी का उत्सव है। हमारी स्वतंत्रता, संवैधानिक जीवन के प्रारंभ के दिनों की याद हम ताजा करते हैं, मिठाई, भोज आदि भी खाते हैं।
लेकिन यहां तिरंगा लहराने के क्रॉकरोच अभियान में क्या हो रहा है? ज्यादातर कॉक्रोच और लेफ्ट संगठन अपने गांव-घर में कभी तिरंगा फहराते नहीं देखे जाते।
जब ये विदेश रहते हैं तो यदि पंद्रह अगस्त, छब्बीस जनवरी पड़े तो शायद ही इनके सोशल मीडिया पर कोई तस्वीर ये तिरंगे के साथ भी प्रदर्शित करते हैं, यानी खुद अपने प्लेटफॉर्म पर कभी तिरंगा नहीं रखते लेकिन अचानक रिजीम-चेंज का सपना इन्हें साकार करना है तो ये तिरंगा लेकर आगे बढ़ने को अपना जन्मसिद्ध अधिकार बताने लगते हैं।
सवाल है कि किसकी छत पर तिरंगा लहराना है। जिस भी छत पर लहराना है वहां तो पहले से ही फहर रहा है। मान लिया कि क्नॉट प्लेस की हर छत पर फहराना है तो वहां किसी की दुकान है, मकान, निजी स्वामित्व है। वहां फहराने के लिए उस प्रतिष्ठान के स्वामी से अनुरोध करिए, वह तो खुशी खुशी फहराने आगे आएंगे।
लेकिन क्या कोई अनुरोध है? क्या उन्हें इसके लिए पूछा गया है कि हम आपके घर की छत पर चढ़कर झंडा फहराएंगे? क्योंकि जिस पॉर्क में फहराना है तो वहां तो सदा ही 100 फुट ऊंचा तिरंगा फहर ही रहा है। धन्यवाद दीजिए श्री नवीन जिंदल को जिन्होंने सुप्रीम कोर्ट तक लड़ाई लड़ी और हर घर तिरंगा के सपने को साकार किया।
लेकिन यहां मामला ही उलट है। यहां तो ऐसा है कि आपने CP के दुकानदारों, घर के मालिकों, उनके एसोसिएशन से कोई अनुमति नहीं ली कि हम आपके यहां फहराने आ रहे हैं।
ये व्यापारी लोग जबकि आपका पूर्व रूप देख चुके हैं। ये देख चुके हैं कि आप कैसे पुलिस से भी हिंसक बर्ताव कर रहे हैं। तो मामला ऐसा हो जाता है कि मानो जबरन एक झुंड डकैती डालने, लूटपाट के लिए हाथ में तिरंगा लेकर किसी बाजार में घुस जाए और कहे कि आपके दुकान, मकान की छत पर हम तिरंगा फहराएंगे तो लोगों की क्या प्रतिक्रिया होगी, जबकि ये जानते हैं कि ये तो छंटे हुए बदमाश हैं, गुंडे हैं, टुकड़े-टुकड़े गैंग के समर्थक हैं, दंगाई उमर खालिद के यार हैं, दिल्ली दंगों के समय हर दंगाई के पीछे ये वकील बनकर खड़े हैं तो ऐसा सोचकर लोग क्या करेंगे?

सारा देश कुछ दिनों पहले के प्रदर्शन में ही इनका हिंसक, पिण्डारी और हमलावर चरित्र देख चुका है, और ये फिर तिरंगा हाथ में लेकर आगे आ गए हैं तो लोगों की जो प्रतिक्रिया मिल रही है, वह सामने ही है।
सीपी में ही लोग विरोध पर उतर आए। हवाई जहाज में लोगों ने इनके नेताओं पर शर्म-शर्म के नारे उछाले। इसीलिए इस लहरा दो तिरंगा के वामपंथी हिंसक चरित्र का कोई असर जनता पर नहीं है।
रिजीम चेंज की बात लाकर, बंगलादेश के मुस्लिम हत्यारों, हिंसकों, प्रधानमंत्री की जान के दुश्मन बनी भीड़ को धन्यवाद देकर नेहा बोरा और प्रशांत भूषण ने इस आंदोलन की मिट्टी वैसे ही कूट दी है। नीयत में खोट, षड्यंत्र का पर्दाफाश हो चुका है, इसलिए लोगों में, युवाओँ में हर जबान यही चर्चा है कि जॉर्ज सोरोस और एलन मस्क का, मिडिल ईस्ट के भारत विरोधी अब्राहमवाद से मिल रहे मुफ्त-माले-गनीमत फंड का सब असर है। जबतक मिल रहा है, आंदोलन चल रहा है।
एक बात और मुझे पत्रकार साथी बता रहे हैं कि यूथ कॉग्रेस के युवा नेताओँ में बेचैनी है। NSUI और यूथ कॉंग्रेस के नेताओं में रिवर्स गीयर लग गया कि श्री राहुल जी ने, प्रियंका जी ने लेफ्ट की नेहा बोरा को इतनी अहमियत क्यों दी? उन्हें अपने से आगे रखने के लिए अपने यूथ संगठन से कोई चमकता चेहरा क्यों नहीं मिला?
तो अपने घर के युवा युवा नहीं लगते क्या कांग्रेस को? भारी नुकसान में गई कॉंग्रेस। ऐसा जो कोई भी संगठन करेगा, जो अपने कॉडर की उपेक्षाकर उधारी पर भरोसा करेगा, वह नुकसान में ही जाएगा। कांग्रेस, लेफ्ट, बीजेपी सहित आम आदमी पार्टी सभी को इससे सबक लेने की जरूरत है कि अपने युवा नेताओं पर भरोसा करना ज्यादा जरूरी है।
अंतिम बात- यह है कि रिजीम चेंज की विदेशी कोशिश से सभी को दूरी बनानी चाहिए। गंभीर बुनियादी मुद्दों पर काम करना चाहिए। मतदाता गहन पुनरीक्षण में जो खामियां हैं, उसके परिमार्जन के लिए रचनात्मक सहयोग करना चाहिए। जिनके नाम छूट गए हैं, उन्हें पुनः सूची में लाने के लिए घर-घर राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं को जाकर पुनः फॉर्म भरने और नाम जुड़वाने के अभियान को सफल करना चाहिए।
लोकतंत्र में राजनीतिक कार्यकर्ता का यही काम है, न कि जहरीले भाषण देकर लोकतांत्रिक ढंग से चुनी गई सरकार को गिराने की अवैध कोशिशों को समर्थन देने से कोई लोकतंत्र मजबूत होने जा रहा है।
कोशिश हो कि ग्राम स्वराज पर कार्य हो। संसद-विधानसभा पर शक्तियों के बोझ को कम करने की आवश्यकता है, ग्राम केंद्रित न्याय पालिका, नीति नियोजन, रोजगार, उद्यम को बढ़ाने की आवश्यकता है।
इस दिशा में नीति नियोजन पर, ज्ञाति-नीति पर राजनीतिक दलों को कार्य करना चाहिए। तभी और तभी वास्तविक रूप से भारत की सेवा हो सकेगी।
कृपया भारत को यूरोप की नकल बनाने की प्रवृत्ति से सभी बचें। हिंद स्वराज में तो गांधी ने यही सपना देखा था और सावधान किया था कि यदि यूरोप के कथित विकासवाद, अब्राहम-वाद से या अब्राहमिक-वाद से हमने समय रहते मुक्ति नहीं ली तो ''मुझे यह बताते हुए आंख में आंसू आते हैं, मेरा गला भर्रा जाता है कि इस वेस्टमिंस्टर मॉडल पर आधारित संसदीय लोकतंत्र के कारण हम बरबाद हो जाएंगे, इसकी लगाई आग में हम सभी जलकर मरेंगे।''
यही गांधी की चेतावनी सदैव मेरी आंखों में नाचती है, इसलिए ग्राम और ज्ञाति ही भारत की मुक्ति का विकेंद्रित भारतीय मार्ग ही असल रक्षा कवच दिखाई देता है। भारत उसी स्व और स्वराज की खोज की ओर बढ़ रहा है, वह उसे पाकर ही रहेगा, यही उसकी नियति है। कोई और मार्ग नहीं।
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)
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