
दीपक कुमार रथ
भारत की शिक्षा व्यवस्था लंबे समय से उन चुनौतियों से जूझती रही है जिनमें Transparency of the evaluation process, security of answer scripts, errors in the calculation of marks और परिणामों की विश्वसनीयता प्रमुख रही हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 और डिजिटल इंडिया अभियान के तहत केंद्र सरकार ने इन समस्याओं का स्थायी समाधान खोजने का प्रयास करते हुए एक महत्वाकांक्षी निर्णय लिया—कक्षा 12 की लगभग 98 लाख उत्तरपुस्तिकाओं के मूल्यांकन को पूरी तरह डिजिटल बनाना। यह केवल एक प्रशासनिक बदलाव नहीं था, बल्कि भारतीय शिक्षा प्रणाली को तकनीक-संचालित और अधिक पारदर्शी बनाने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम था। हालांकि, इस परियोजना के क्रियान्वयन के साथ ही जिस प्रकार इसे कथित “ओएसएम घोटाले” के रूप में प्रस्तुत किया गया, उसने एक महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा कर दिया है: क्या यह वास्तव में भ्रष्टाचार का मामला है, या फिर एक बड़े सुधार को राजनीतिक विवाद में बदलने का प्रयास?
विवाद की शुरुआत उस समय हुई जब राहुल गाँधी और केजरीवाल जैसे विपक्षी नेताओं ने सीबीएसई द्वारा जारी निविदा (टेंडर) में किए गए कुछ संशोधनों को एक विशेष कंपनी को लाभ पहुंचाने की कोशिश बताया। लेकिन यदि निविदा प्रक्रिया के दस्तावेजों, तकनीकी मूल्यांकन रिपोर्टों और Pre-bid Meetings के रिकॉर्ड का अध्ययन किया जाए, तो तस्वीर कहीं अधिक जटिल और तथ्यपरक दिखाई देती है। प्रारंभिक निविदा की शर्तें इतनी कठोर थीं कि देश की अग्रणी आईटी कंपनियों में से एक टीसीएस सहित सभी चार बोलीदाता तकनीकी मूल्यांकन में असफल हो गए। ऐसी स्थिति में सीबीएसई के सामने दो विकल्प थे—या तो परियोजना को अनिश्चितकाल के लिए टाल दिया जाए, अथवा व्यावहारिक आवश्यकताओं के अनुरूप निविदा शर्तों में संशोधन किया जाए। बोर्ड ने दूसरा रास्ता चुना।
सबसे अधिक आलोचना उस निर्णय की हुई जिसमें स्कैनिंग गुणवत्ता के लिए निर्धारित 300 डीपीआई मानक को घटाकर 200 डीपीआई किया गया। इसे विपक्ष ने कथित रूप से एक विशेष कंपनी (CoEmpt) के हित में किया गया बदलाव बताया। लेकिन उपलब्ध रिकॉर्ड यह संकेत देते हैं कि इस संशोधन का सुझाव स्वयं टीसीएस ने Pre-bid Discussion के दौरान दिया था। यदि ऐसा है, तो यह तर्क कमजोर पड़ जाता है कि बदलाव किसी एक कंपनी को लाभ पहुंचाने के लिए किया गया था। इसी प्रकार सीएमएमआई स्तर-5 की अनिवार्यता को स्तर-3 करना तथा ‘कूलिंग ऑफ’ अवधि को दो वर्ष से घटाकर एक वर्ष करना भी सरकारी खरीद प्रक्रियाओं में प्रचलित मानकों के अनुरूप ही है।
इस पूरे विवाद का एक और महत्वपूर्ण पहलू लागत से जुड़ा है। यदि किसी निविदा को वास्तव में किसी विशेष कंपनी के पक्ष में तैयार किया गया होता, तो सामान्यतः परियोजना की लागत बढ़ने की आशंका रहती। लेकिन उपलब्ध आंकड़े इसके विपरीत तस्वीर प्रस्तुत करते हैं। जहां एक बोलीदाता यानी टीसीएस ने प्रति उत्तरपुस्तिका लगभग 65 रुपये का प्रस्ताव दिया था, वहीं चयनित कंपनी यानी CoEmpt की बोली 24.75 रुपये प्रति उत्तरपुस्तिका थी। अर्थात लागत में लगभग 62 प्रतिशत की कमी आई। यह तथ्य कम-से-कम उस धारणा को चुनौती देता है कि पूरी प्रक्रिया का उद्देश्य वित्तीय लाभ पहुंचाना था।
डिजिटल मूल्यांकन प्रणाली की आलोचना करने वाले यह भी भूल जाते हैं कि पारंपरिक कागजी व्यवस्था स्वयं कई समस्याओं से घिरी हुई थी। उत्तरपुस्तिकाओं के खो जाने, अंक जोड़ने में त्रुटियों, पुनर्मूल्यांकन में देरी और सीमित जवाबदेही जैसी शिकायतें वर्षों से सामने आती रही हैं। डिजिटल प्रणाली ने पहली बार मूल्यांकन प्रक्रिया को रिकॉर्ड-आधारित और ट्रैक करने योग्य बनाया। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार लगभग 98 लाख उत्तरपुस्तिकाओं के मूल्यांकन में त्रुटि दर 0.07 प्रतिशत के आसपास रही। हजारों उत्तरपुस्तिकाओं का पुनः स्कैन किया गया, समस्याओं को दर्ज किया गया और उनका समाधान भी किया गया। किसी भी बड़े तकनीकी परिवर्तन के दौरान चुनौतियां आना स्वाभाविक है, लेकिन महत्वपूर्ण यह है कि उन चुनौतियों की पहचान और समाधान किस प्रकार किया जाता है।
जनवरी 2026 के ‘ड्राई रन’ को भी विपक्ष ने विफलता के प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किया। जबकि किसी भी तकनीकी परियोजना में ड्राई रन का उद्देश्य ही संभावित समस्याओं को वास्तविक संचालन से पहले पहचानना होता है। यदि परीक्षण के दौरान समस्याएं सामने आईं और बाद में उन्हें ठीक कर दिया गया, तो इसे विफलता नहीं बल्कि जिम्मेदार कार्यान्वयन कहा जाना चाहिए।
लोकतंत्र में सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित करना विपक्ष का दायित्व है और किसी भी सार्वजनिक परियोजना की जांच-परख होना आवश्यक है। लेकिन उतना ही आवश्यक यह भी है कि आलोचना तथ्यों और दस्तावेजों पर आधारित हो। शिक्षा जैसी संवेदनशील व्यवस्था में सुधारों को राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के चश्मे से देखने के बजाय उनके वास्तविक प्रभावों का मूल्यांकन किया जाना चाहिए। यदि कहीं अनियमितता है तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए, लेकिन यदि एक व्यापक डिजिटल परिवर्तन पारदर्शिता और दक्षता की दिशा में आगे बढ़ रहा है, तो उसे केवल राजनीतिक नैरेटिव का शिकार नहीं बनने देना चाहिए। भारत की शिक्षा व्यवस्था को सुधारों की आवश्यकता है, और उन सुधारों का आकलन भावनाओं से नहीं, बल्कि तथ्यों और परिणामों के आधार पर होना चाहिए।
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