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जनहित के मुद्दे पीछे छोड़ती सितारों की चमक : क्या यही है नया बिहार?

The shine of stars leaving behind public interest issues: Is this the new Bihar?

जब राजनीति अभिनय बन जाए और अभिनेता राजनीति करने लगें, तो जनता केवल दर्शक रह जाती है।”

बिहार, जो कभी अपनी ज़मीन की सादगी, संघर्ष और शिक्षा के लिए जाना जाता था, आज कहीं न कहीं अपनी असली पहचान से भटकता नज़र आ रहा है। पहले यहाँ चर्चाओं में किसान, बेरोज़गारी, शिक्षा, और विकास जैसे मुद्दे होते थे — लेकिन अब सुर्ख़ियाँ फ़िल्मी सितारों, रैलियों की शोभा और सोशल मीडिया के तमाशों को ज़्यादा मिलती हैं। जनता के असली सवाल — नौकरी, सड़क, स्वास्थ्य, और सुरक्षा — अब मंचों की भीड़ और कैमरों की चमक में खोते जा रहे हैं। क्या यह बदलाव प्रगति की निशानी है या जनता की आवाज़ को पीछे छोड़ देने का संकेत? क्या लोकतंत्र की दिशा अब चमक-दमक की ओर मुड़ चुकी है, जहाँ मुद्दों से ज़्यादा मायने रखता है चेहरा? नया बिहार किस ओर जा रहा है — विकास की राह पर या दिखावे की दौड़ में? यही सवाल आज हर सोचने वाले नागरिक के मन में उठता है। कभी राजनीतिक चेतना की मिट्टी माने जाने वाले बिहार में आज एक नया दृश्य है। जहाँ कभी विचारों की मशाल जलती थी, वहाँ अब चेहरों की चमक है।जहाँ कभी नारे कभी राजनीतिक चेतना का केंद्र रहा बिहार, आज एक अजीब मोड़ पर खड़ा है। यह वही मिट्टी है जहाँ से जेपी आंदोलन उठा था, जहाँ लोहिया और कर्पूरी ठाकुर जैसे नेताओं ने विचार और संघर्ष की राजनीति को दिशा दी थी। लेकिन आज वही बिहार चुनावी मंच पर एक नए रंग में नजर आ रहा है — जहाँ मुद्दों की जगह चेहरों का बोलबाला है, घोषणाओं की जगह ग्लैमर है और जनता की जगह भीड़ खड़ी है। ऐसा लगता है जैसे लोकतंत्र अब एक फिल्म का सेट बन गया हो — कैमरे के सामने सब कुछ चमकदार, लेकिन पीछे वही पुरानी कहानी — बेरोज़गारी, पलायन, गरीबी और टूटी उम्मीदें। अब बिहार की राजनीति विचारों की नहीं, चेहरों की बन गई है। जहाँ कभी समाजवाद, शिक्षा, रोजगार और विकास की बातें होती थीं, वहाँ अब स्टारडम और फॉलोअर्स की गिनती होती है। भोजपुरी फिल्मों के सितारे, यूट्यूबर, क्रिकेटर, इंस्टाग्राम इन्फ्लुएंसर — सब राजनीति में उतर आए हैं। उनकी लोकप्रियता से भीड़ तो जुटती है, मगर सवाल यह है कि क्या भीड़ जुटाना ही नेतृत्व की पहचान है? क्या जो मंच पर ताली बजवा सकता है, वही जनता की तकलीफ़ समझ सकता है? राजनीति का यह ग्लैमर अब सवालों को ढंकने लगा है — जैसे असली मुद्दे कैमरे के फोकस से बाहर हो गए हों। बड़े राजनीतिक दल अब उम्मीदवारों का चयन योग्यता या सामाजिक सेवा से नहीं, बल्कि “पहुंच” और “फॉलोअर्स” के आधार पर करते हैं। जो जितना प्रसिद्ध है, उसे उतना बड़ा टिकट मिलता है। अब टिकट विचारधारा पर नहीं, ब्रांड वैल्यू पर मिलते हैं। एक भोजपुरी अभिनेता को सिर्फ इसलिए मौका मिलता है क्योंकि उसकी फिल्मों में भीड़ आती है, और एक यूट्यूबर को इसलिए टिकट दिया जाता है क्योंकि उसके वीडियो वायरल होते हैं। लेकिन जनता को वायरल वीडियो नहीं चाहिए — उसे स्थायी समाधान चाहिए, उसे रोज़गार चाहिए, उसे सम्मान चाहिए।

बिहार की असली समस्याएँ आज भी वहीं हैं — बिजली, पानी, सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, और बेरोज़गारी। लेकिन इन पर चर्चा गायब है। टीवी चैनलों पर अब नीतियों पर बहस नहीं होती, बल्कि इस बात पर चर्चा होती है कि किस स्टार की रैली में ज़्यादा भीड़ थी। जो आवाज़ें बेरोज़गारों और गरीबों के लिए उठनी चाहिए थीं, वे अब प्रचार गीतों और फोटोशूट में खो गई हैं। जनता के सवालों की जगह अब तालियों और नारों ने ले ली है। लोकतंत्र अब एक तमाशा बनता जा रहा है, जहाँ मंच पर अभिनय होता है और जनता को सिर्फ दर्शक की तरह बैठा दिया गया है। सोशल मीडिया ने इस बदलाव को और तेज़ कर दिया है। अब नेता गाँवों की गलियों में नहीं, मोबाइल की स्क्रीन पर दिखते हैं। फेसबुक पोस्ट, इंस्टाग्राम रील, और यूट्यूब वीडियो ही अब राजनीति के नए मंच हैं। जो सोशल मीडिया पर ट्रेंड करता है, वही चुनाव में चर्चा का केंद्र बन जाता है। लेकिन इस डिजिटल चमक के बीच जनता की आवाज़ खो जाती है। नीति नहीं बनती, बस पोस्ट बनते हैं। नेता संवाद नहीं करते, बस लाइक और शेयर गिनते हैं। पैसे और प्रचार का यह गठजोड़ अब राजनीति की नई परिभाषा बन चुका है। जहाँ पैसा और प्रचार मिल जाएँ, वहाँ विचार मर जाते हैं। चुनाव अब इतना महंगा हो गया है कि जमीनी कार्यकर्ता, जो सच में जनता के बीच रहते हैं, वो हाशिए पर चले गए हैं। अब वही नेता टिकट पाते हैं जिनके पास मीडिया को आकर्षित करने की क्षमता है। जो सादगी और सेवा की राजनीति करते थे, वे आज राजनीतिक पोस्टर पर जगह तक नहीं पा रहे। राजनीति अब ‘एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री’ बन चुकी है। मंच वही हैं, पर स्क्रिप्ट बदल गई है। रैलियाँ अब फिल्मों के ट्रेलर जैसी लगती हैं — मंचीय संवाद, बैकग्राउंड म्यूज़िक, नारे और लाइटें। नेता अब भाषण नहीं, अभिनय करते हैं। जनता अब सुनने नहीं, देखने आती है। और यही वह पल है जब लोकतंत्र अपनी आत्मा खो देता है।

कभी बिहार की धरती ने ऐसे नेताओं को जन्म दिया था जो विचारों से राजनीति करते थे। यह वही राज्य है जहाँ से लोकतंत्र की सबसे बड़ी लड़ाई लड़ी गई थी। आज वही बिहार अपने युवाओं को पलायन की ओर धकेल रहा है। हर साल लाखों छात्र रोजगार और अवसर की तलाश में दिल्ली, पुणे, बेंगलुरु और हैदराबाद का रुख करते हैं। बिहार की मिट्टी में आज भी प्रतिभा है, लेकिन अवसर नहीं। डिग्री हाथ में है, पर नौकरी दूर है। कॉलेजों में पढ़ाई है, पर भविष्य की कोई गारंटी नहीं। और फिर भी चुनावी मंच पर इन मुद्दों की जगह किसी फिल्म स्टार की एंट्री को बड़ी खबर बना दिया जाता है। स्वास्थ्य व्यवस्था का हाल भी कुछ अलग नहीं। कोविड के समय बिहार की चिकित्सा व्यवस्था ने जो असलियत दिखाई थी, उससे सब कुछ स्पष्ट हो गया था। लेकिन सुधार कहाँ हुआ? छोटे शहरों में अस्पतालों में डॉक्टर नहीं, दवा नहीं, और नेताओं के हेलीकॉप्टर आसमान में उड़ते हैं। यह विरोधाभास बिहार की राजनीति का सच्चा चेहरा है — जनता बीमार है, और राजनेता प्रचार में व्यस्त है।

जनता को अब खुद से सवाल पूछने की जरूरत है — क्या मेरा वोट किसी चेहरे के लिए है या किसी चरित्र के लिए? क्या मेरे बच्चों का भविष्य किसी सेलिब्रिटी की लोकप्रियता से ज़्यादा महत्वपूर्ण नहीं है? क्या मेरा वोट मनोरंजन का साधन है या लोकतंत्र की ज़िम्मेदारी? क्योंकि जब जनता सवाल पूछना शुरू कर देती है, तब कोई भी सेलिब्रिटी नेता नहीं टिक सकता। मीडिया भी इस खेल का हिस्सा बन चुका है। उसका काम सवाल पूछना था, लेकिन अब वह ताली बजाने लगा है। टीवी डिबेट स्क्रिप्टेड शो बन गए हैं। वहाँ असली मुद्दों की जगह नारे और भावनाएँ बिकती हैं। मीडिया अगर अपनी ज़िम्मेदारी निभाए, तो शायद राजनीति फिर से जनता के पास लौट सके। लोकतंत्र तभी ज़िंदा रहता है जब जनता जागी रहे। “ग्लैमर वोट नहीं दिलाता, भरोसा दिलाता है संघर्ष।” बिहार को सितारों की नहीं, सच्चे सेवकों की ज़रूरत है — क्योंकि चमक तो हर चुनाव में आती है, पर विकास सिर्फ एक पीढ़ी में आता है। नेताओं की चमक अस्थायी है, जनता की जागरूकता स्थायी — बस उसे जगाने की ज़रूरत है। और जब जनता जागती है, तो सत्ता झुकती है।

अब मैं कुछ पंक्तियों के माध्यम से अपने विचारों का निष्कर्ष प्रस्तुत करना चाहती हूं
ग्लैमर ताली तो दिला सकता है, पर भरोसा केवल संघर्ष ही दिलाता है।

लोकप्रियता क्षणिक होती है, पर जनसेवा की गूंज पीढ़ियों तक रहती है।

राजनीति तब खो जाती है, जब प्रचार नीति बन जाता है।

बिहार की आत्मा मुद्दों में है, प्रचार की रोशनी में नहीं।

 

 

डॉ. प्रियंका सिंह
(लेखिका सहायक प्रोफेसर केसीसी इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट एंड टेक्नोलॉजी, ग्रेटर नोएडा, हैं।)
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)

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