मानव सभ्यता का तकनीकी उत्कर्ष लंबे समय तक प्रकृति पर विजय की अवधारणा से प्रेरित रहा है। औद्योगिक क्रांति के पश्चात विज्ञान और अभियांत्रिकी का प्रमुख लक्ष्य उत्पादन की तीव्रता, संरचनाओं की विशालता और उपभोग की अधिकतमता रहा। किंतु 20वीं और 21वीं शताब्दी के संक्रमणकाल में स्पष्ट होने लगा कि संसाधन-सघन और ऊर्जा-प्रधान विकास मॉडल पारिस्थितिक संतुलन के लिए दीर्घकालिक रूप से घातक सिद्ध हो सकते हैं। जलवायु परिवर्तन, समुद्री अम्लीकरण, जैव-विविधता में तीव्र ह्रास, भूमि-अवनयन और सूक्ष्मप्लास्टिक प्रदूषण जैसे संकट यह संकेत देते हैं कि तकनीकी प्रगति का पुनर्मूल्यांकन आवश्यक है। इसी बौद्धिक और वैज्ञानिक पृष्ठभूमि में बायोमिमिक्री की अवधारणा एक वैकल्पिक, संतुलित और भविष्य-उन्मुख प्रतिमान के रूप में उभरती है।
बायोमिमिक्री की विचारधारा को वैश्विक स्तर पर वैचारिक और वैज्ञानिक आधार प्रदान करने का श्रेय अमेरिकी जीवविज्ञानी “जेनीन बेनियस” को जाता है, जिन्होंने अपनी चर्चित कृति “बायोमिमिक्री इनोवेशन इंस्पायर्ड बाई नेचर” में यह प्रतिपादित किया कि प्रकृति 3.8 अरब वर्षों से निरंतर प्रयोग और चयन की प्रक्रिया से गुजरी एक परिपक्व अनुसंधान प्रणाली है। प्राकृतिक चयन के द्वारा परिष्कृत डिज़ाइन ऊर्जा-दक्ष, पदार्थ-कुशल, लचीले और आत्म-समायोजी होते हैं। इस प्रकार बायोमिमिक्री मात्र अनुकरण नहीं, बल्कि विकासवाद द्वारा सत्यापित संरचनाओं और प्रक्रियाओं का वैज्ञानिक अनुवाद है।
विकासवाद का वैज्ञानिक सिद्धांत, जिसे 19वीं शताब्दी में चार्ल्स डार्विन ने प्रतिपादित किया, यह स्थापित करता है कि वे संरचनाएँ और व्यवहार, जो पर्यावरण के अनुरूप हैं, दीर्घकाल तक टिके रहते हैं। अतः यदि किसी जीव में विशिष्ट आकृति, पदार्थ-संरचना अथवा ऊर्जा-रूपांतरण तंत्र विकसित हुआ है, तो वह दीर्घकालीन दक्षता का परिणाम है। बायोमिमिक्री इसी विकासवादी बुद्धिमत्ता को अभियांत्रिकी में रूपांतरित करती है। यहाँ प्रकृति को शिक्षक , मॉडल और मानक के रूप में देखा जाता है। यह त्रिस्तरीय दृष्टिकोण वैज्ञानिकों को यह प्रेरणा देता है कि वे प्रकृति की कार्य-पद्धति को समझें, उसके अनुरूप डिजाइन करें और उसके मानकों से अपनी तकनीक का मूल्यांकन करें।
रूपात्मक स्तर पर बायोमिमिक्री सूक्ष्म और स्थूल संरचनाओं के विश्लेषण से आरंभ होती है। कमल ( वैज्ञानिक नाम- नीलंबो न्यूसीफेरा ) की पत्तियों पर सूक्ष्म-विस्तारक उभारों की -बूंदों के संपर्क कोण को बढ़ाती है और स्व-स्वच्छता का गुण प्रदान करती है। “लोटस प्रभाव” के इस सिद्धांत ने नैनो-सतह प्रौद्योगिकी को नई दिशा दी। इसी प्रकार जेक्को के पैरों की सूक्ष्म रोएँदार संरचना वैन-डेर-वाल्स बलों पर आधारित आसंजन का उत्कृष्ट उदाहरण है, जिसके आधार पर पुनःउपयोगी चिपकने वाली सतहें विकसित की जा रही हैं। यह शोध केवल जैव-अनुकरण का व्यावहारिक पक्ष नहीं दर्शाता, बल्कि यह भी बताता है कि प्रकृति रासायनिक हस्तक्षेप के बिना भौतिक संरचना से कार्य-संपादन कर सकती है।
संरचनात्मक दृढ़ता के क्षेत्र में मकड़ी के रेशम की आणविक संरचना ने सामग्री विज्ञान को अत्यधिक प्रेरित किया है। इसका तन्य बल इस्पात से अधिक तथा घनत्व अत्यल्प होता है। बायो-पॉलिमर अभिकल्पना में यह समझ विकसित हो रही है कि दोहरावदार प्रोटीन अनुक्रम किस प्रकार सूक्ष्म क्रिस्टलीय और अमोर्फस क्षेत्रों का संयोजन निर्मित करते हैं, जिससे लचीलापन और दृढ़ता का संतुलन उत्पन्न होता है। इसी प्रकार शंखों की नैकर संरचना “ईंट-और-गारा” मॉडल का उदाहरण प्रस्तुत करती है, जहाँ अकार्बनिक प्लेटलेट और कार्बनिक बंधन परत-दर-परत संयोजित होते हैं। इस जैव-समग्र की संरचना ने उच्च-प्रत्यास्थ और आघात-प्रतिरोधी सामग्री के विकास का मार्ग प्रशस्त किया।
वास्तुकला और शहरी नियोजन में बायोमिमिक्री के सिद्धांतों का अनुप्रयोग ऊर्जा संकट के समाधान की दिशा में महत्वपूर्ण है। जिम्बाब्वे के हरारे स्थित ईस्टगेट सेंटर की संरचना दीमक-टीले की वायुसंचार प्रणाली से प्रेरित है। दीमक अपने आवास में तापमान को नियंत्रित रखने के लिए जटिल वेंटिलेशन मार्ग बनाती हैं। भवन डिजाइनरों ने इस सिद्धांत को अपनाकर प्राकृतिक वायु संचरण और ताप संतुलन की व्यवस्था की, जिससे कृत्रिम वातानुकूलन की आवश्यकता अत्यंत कम हो गई। इसी प्रकार समुद्री स्पंज की जालिका-संरचना से प्रेरित उच्च-प्रत्यास्थ भवन ढाँचे विकसित करने के प्रयास जारी हैं।
वायुगतिकी में पक्षियों और जलीय जीवों की गति का अध्ययन उच्चगति परिवहन प्रणालियों के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध हुआ है। जापान की रेल प्रणाली संचालित करने वाली संस्था जे आर ईस्ट ने किंगफिशर पक्षी की चोंच का सूक्ष्म विश्लेषण कर ट्रेन के अग्रभाग का पुनःडिज़ाइन किया। इस संरचनात्मक अनुकूलन से वायु प्रतिरोध और ध्वनि-दाब तरंगों में कमी आई। इसी प्रकार हंपबैक व्हेल के पंखों पर स्थित कटीली संरचनाओं से प्रेरित पवन टरबाइन ब्लेड निम्न वायु-गति में भी अधिक घूर्णन प्रदान करते हैं। इस प्रकार जैव-आकृति विज्ञान और द्रव-गतिकी का समन्वय ऊर्जा क्षेत्र में दक्षता बढ़ा सकता है।
ऊर्जा विज्ञान में प्रकाश-संश्लेषण की क्वांटम दक्षता का विश्लेषण कृत्रिम प्रकाश-संश्लेषण के विकास हेतु महत्त्वपूर्ण है। क्लोरोफिल अणुओं में ऊर्जा-स्थानांतरण की फेम्टोसेकंड समय-मान वाली प्रक्रियाएँ यह दर्शाती हैं कि जैविक तंत्र न्यून ऊर्जा क्षति के साथ फोटॉन ऊर्जा को रासायनिक बंध ऊर्जा में परिवर्तित करते हैं। यदि इस तंत्र की नकल कर सौर ऊर्जा से हाइड्रोजन अथवा अन्य ईंधनों का उत्पादन संभव हो, तो कार्बन-न्यून ऊर्जा व्यवस्था की दिशा में क्रांतिकारी परिवर्तन संभव होगा।
बीटल की पंख-सतह पर जल-आकर्षी और जल-अपसारी सूक्ष्म क्षेत्रों का संयोजन संघनन की दक्ष प्रणाली का उदाहरण है। कोहरे की सूक्ष्म बूंदें इन क्षेत्रों पर संघटित होकर जल-धार में परिवर्तित हो जाती हैं। इसी सिद्धांत पर आधारित जल-संग्रह उपकरण शुष्क क्षेत्रों में पेयजल आपूर्ति के लिए संभावित समाधान प्रस्तुत करते हैं। यह जैव-प्रेरणा जलवायु-अनुकूल तकनीक के विकास की दिशा में उल्लेखनीय है।
प्रणालीगत स्तर पर बायोमिमिक्री का महत्व और भी गहरा है। प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्रों में पदार्थ-चक्र पूर्ण होते हैं; अपशिष्ट किसी अन्य जीव या प्रक्रिया का संसाधन बन जाता है। आधुनिक औद्योगिक पारिस्थितिकी इसी सिद्धांत को अपनाते हुए परिपत्र अर्थव्यवस्था की संकल्पना विकसित कर रही है। यदि उत्पादन-प्रणाली को बंद-पाश प्रणाली के रूप में पुनर्गठित किया जाए, तो संसाधन-उपभोग और प्रदूषण दोनों में कमी लाई जा सकती है। प्रकृति में ऊर्जा मुख्यतः सौर स्रोत से आती है और स्थानीय स्तर पर उपयोग होती है; इसी मॉडल को विकेंद्रीकृत नवीकरणीय ऊर्जा प्रणालियों में लागू किया जा सकता है।
भारत जैसे जैव-विविधता संपन्न राष्ट्र के संदर्भ में बायोमिमिक्री विशेष संभावनाएँ रखती है। हिमालयी पारिस्थितिक तंत्र में पाई जाने वाली शीत-सहिष्णु वनस्पतियाँ, मरुस्थलीय कंटीली झाड़ियाँ, पश्चिमी घाटों की आर्द्र-वन संरचना और सुंदरबन का लवण-सहिष्णु मैंग्रोव तंत्र, ये सभी भविष्य की जलवायु-अनुकूल कृषि और अवसंरचना के लिए मॉडल प्रदान कर सकते हैं। यदि जैव-विज्ञान, पदार्थ-विज्ञान, संगणकीय मॉडलिंग और अभियांत्रिकी का अंतःविषयी समन्वय स्थापित हो, तो जैव-प्रेरित नवाचार में भारत वैश्विक नेतृत्व कर सकता है।
बायोमिमिक्री के वैज्ञानिक विकास में उच्च-रिज़ॉल्यूशन सूक्ष्मदर्शी, नैनो-संरचनात्मक विश्लेषण, संगणकीय द्रव-गतिकी, आणविक गतिकी सिमुलेशन तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित पैटर्न-पहचान तकनीकें अत्यंत सहायक सिद्ध हो रही हैं। जैव-संरचनाओं की जटिलता को प्रतिरूपित करने में बहु-पैमाने मॉडलिंग की आवश्यकता होती है। उदाहरणार्थ, मकड़ी रेशम की यांत्रिक विशेषताओं को समझने हेतु आणविक से मैक्रो-स्तर तक विश्लेषण आवश्यक है। यह अंतःविषयी शोध बायोमिमिक्री को केवल प्रेरणात्मक विचार से आगे बढ़ाकर कठोर वैज्ञानिक अनुशासन का रूप देता है।
यद्यपि बायोमिमिक्री में अपार संभावनाएँ हैं, परंतु इसकी सीमाएँ और नैतिक आयाम भी हैं। जैव-संसाधनों का अतिदोहन संरक्षण के सिद्धांतों के विरुद्ध हो सकता है। किसी जैविक संरचना की जटिलता को आंशिक रूप से समझकर उसका अनुकरण करने में त्रुटियाँ हो सकती हैं। अतः जैव-अनुकरण में जैव-विज्ञान की गहन समझ और पारिस्थितिक संवेदनशीलता अनिवार्य है। इसके अतिरिक्त, तकनीकी उत्पादन-प्रणाली को जैव-प्रेरित सिद्धांतों के अनुरूप रूपांतरित करने हेतु नीतिगत और औद्योगिक संरचनात्मक परिवर्तन भी आवश्यक होंगे।
भारत वैश्विक जैव-विविधता का एक महत्वपूर्ण ध्रुव है और यह विविधता केवल पारिस्थितिक समृद्धि का प्रतीक नहीं, बल्कि नवाचार की अप्रयुक्त प्रयोगशाला भी है। भारतके 10 प्रमुख जैव-भौगोलिक क्षेत्रों; हिमालय, ट्रांस-हिमालय, गंगा के मैदानी क्षेत्र, थार मरुस्थल, पश्चिमी तटीय पट्टी, दक्कन का पठार, पूर्वोत्तर की पर्वतीय श्रेणियाँ, प्रत्येक में विशिष्ट अनुकूलन-आधारित जैविक संरचनाएँ मिलती हैं। उदाहरणार्थ, पश्चिमी घाट की सदाबहार वनस्पतियों में पाए जाने वाले जल-नियमन तंत्र उच्च आर्द्रता और अनियमित वर्षा के बीच संतुलन स्थापित करते हैं; वहीं थार राजस्थान की वनस्पतियाँ सूक्ष्म पत्ती-संरचना और रंध्र-नियंत्रण द्वारा अत्यल्प जल-हानि सुनिश्चित करती हैं। इन अनुकूलनों का विश्लेषण शुष्क-क्षेत्र कृषि अभियांत्रिकी और जल-संरक्षण तकनीकों के लिए प्रतिरूप प्रदान कर सकता है।
तटीय भारत में स्थित सुंदरबन की मैंग्रोव प्रणाली लवण-सहिष्णुता, न्यूमेटोफोर और ज्वारीय लचक का असाधारण उदाहरण प्रस्तुत करती है। समुद्री-स्तर वृद्धि और चक्रवातों की तीव्रता के युग में यह तंत्र तटीय अवसंरचना डिजाइन के लिए जैव-प्रेरित मॉडल बन सकता है—विशेषतः लचीली, बहु-स्तरीय और ऊर्जा-अवशोषी संरचनाओं के विकास में। इसी प्रकार, हिमालयी पारिस्थितिकी में पाई जाने वाली बौनी और शीत-सहिष्णु वनस्पतियाँ निम्न-ताप सहनशील जैव-पॉलिमर तथा ताप-नियंत्रित निर्माण सामग्री के विकास हेतु संकेत देती हैं।
संस्थागत स्तर पर भारत में जैव-प्रेरित सामग्री और संरचनात्मक विज्ञान पर उन्नत शोध चल रहा है। वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद की विभिन्न प्रयोगशालाओं में जैव-समग्र और हरित-रसायन आधारित पदार्थ-विकास पर कार्य हो रहा है। भारतीय विज्ञान संस्थान , बेंगलुरु तथा प्रमुख भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान परिसरों में नैनो-संरचनात्मक विश्लेषण, जैव-पॉलिमर अभिकल्पना और संगणकीय जैव-यांत्रिकी पर शोध बायोमिमिक्री को व्यावहारिक दिशा दे रहा है। यदि इन प्रयासों को राष्ट्रीय नवाचार मिशनों और स्टार्टअप पारिस्थितिकी से जोड़ा जाए, तो भारत जैव-प्रेरित हरित-प्रौद्योगिकी में वैश्विक नेतृत्व स्थापित कर सकता है।
निष्कर्षत: बायोमिमिक्री मानव प्रौद्योगिकी को पुनर्परिभाषित करने का आह्वान है। यह दृष्टिकोण बताता है कि सतत विकास का मार्ग प्रकृति के विरोध में नहीं, बल्कि उसके साथ संवाद में निहित है। विज्ञान प्रगति के परिप्रेक्ष्य में यह क्षेत्र एक ऐसे अंतःविषयी सेतु का निर्माण करता है, जहाँ जीवविज्ञान, भौतिकी, रसायन, अभियांत्रिकी और पर्यावरण विज्ञान एकीकृत होकर नई वैज्ञानिक संवेदना उत्पन्न करते हैं। 21वीं सदी की वैज्ञानिक सभ्यता यदि ऊर्जा-दक्ष, कार्बन-न्यून, संसाधन-संतुलित और पारिस्थितिक रूप से प्रत्यास्थ बनना चाहती है, तो उसे जैव-विकास की उस दीर्घकालिक प्रयोगशाला से सीखना होगा, जिसने पृथ्वी पर जीवन को अब तक बनाए रखा है। बायोमिमिक्री उसी शाश्वत ज्ञान को आधुनिक प्रयोगशाला की भाषा में अनूदित करने का सशक्त प्रयास है और संभवतः सतत भविष्य की वैज्ञानिक आधार-शिला भी।

डॉ दीपक कोहली
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)
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