2025 में भारत का विश्व की तीसरी सबसे बड़ी सैन्य शक्ति के रूप में उभरना केवल एक आँकड़ा नहीं, बल्कि एक दीर्घकालिक राष्ट्रीय दृष्टि की परिणति है। यह उपलब्धि उस रणनीतिक सोच, संस्थागत सुधारों और राजनीतिक इच्छाशक्ति का परिणाम है, जिसने रक्षा क्षेत्र को आयात-निर्भरता से निकालकर आत्मनिर्भरता और नवाचार के पथ पर अग्रसर किया। रिकॉर्ड ₹1.54 लाख करोड़ का रक्षा उत्पादन, ₹24,000 करोड़ का निर्यात और 100 से अधिक देशों तक भारतीय रक्षा उत्पादों की पहुँच—ये सभी संकेत हैं कि भारत अब केवल उपभोक्ता नहीं, बल्कि वैश्विक रक्षा आपूर्ति शृंखला का विश्वसनीय भागीदार बन चुका है।
इस परिवर्तन के केंद्र में ‘आत्मनिर्भर भारत’ की वह भावना है, जिसने स्वदेशीकरण को नारे से आगे बढ़ाकर नीति और क्रियान्वयन का विषय बनाया। आज भारतीय सशस्त्र बलों के पास 65 प्रतिशत तक स्वदेशी उपकरण हैं—यह तथ्य दशकों पुरानी निर्भरता की जंजीरों के टूटने का प्रमाण है। रक्षा सार्वजनिक उपक्रमों के साथ-साथ निजी क्षेत्र और स्टार्टअप्स की भागीदारी ने इस क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा, गुणवत्ता और गति को नई ऊँचाइयाँ दी हैं। मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भरता की नीतियों ने न केवल तकनीकी क्षमता बढ़ाई, बल्कि रोजगार और कौशल विकास को भी बल दिया।

ऑपरेशन सिंदूर ने आधुनिक युद्ध की भारतीय समझ को स्पष्ट रूप से दुनिया के सामने रखा। ड्रोन, काउंटर-ड्रोन सिस्टम और नेटवर्क-केंद्रित युद्ध क्षमताओं का प्रभावी उपयोग यह दर्शाता है कि भारत भविष्य के युद्धों के लिए केवल तैयारी ही नहीं कर रहा, बल्कि नेतृत्व भी कर रहा है। यह संदेश महत्वपूर्ण है कि भारतीय सैन्य सोच अब पारंपरिक हथियार प्रणालियों तक सीमित नहीं, बल्कि उभरती तकनीकों—एआई, साइबर, अंतरिक्ष और स्वायत्त प्रणालियों—को रणनीतिक रूप से अपनाने की दिशा में बढ़ चुकी है।
आने वाले समय में 20–25 प्रतिशत तक रक्षा बजट में संभावित वृद्धि इस दिशा को और सुदृढ़ करेगी। एआई आधारित प्रणालियाँ, आधुनिक लड़ाकू विमान, और नौसेना का विस्तार—ये तीनों स्तंभ भारत की समग्र सैन्य शक्ति को संतुलित और प्रभावी बनाएँगे। हिंद महासागर क्षेत्र में बढ़ती भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के बीच एक मजबूत नौसेना भारत के समुद्री हितों की रक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए अनिवार्य है। वहीं, आधुनिक वायु शक्ति और उन्नत जमीनी क्षमतियाँ किसी भी पारंपरिक या हाइब्रिड चुनौती का सटीक उत्तर देने में सक्षम होंगी।
इस पूरे परिवर्तनकाल में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का नेतृत्व निर्णायक रहा है। उनकी प्रशासनिक स्पष्टता, संस्थागत विश्वास और सैन्य आधुनिकीकरण के प्रति प्रतिबद्धता ने नीतियों को जमीन पर उतारने में अहम भूमिका निभाई। खरीद प्रक्रियाओं में पारदर्शिता, स्वदेशी प्राथमिकता और निर्यात को बढ़ावा—इन सभी कदमों ने रक्षा पारिस्थितिकी तंत्र को स्थिरता और दिशा दी है। उनका जोर केवल हथियारों की संख्या बढ़ाने पर नहीं, बल्कि क्षमता, आत्मनिर्भरता और दीर्घकालिक सुरक्षा पर रहा है।
भारत की यह सैन्य प्रगति शक्ति प्रदर्शन भर नहीं, बल्कि जिम्मेदार शक्ति बनने की यात्रा है। वैश्विक मंच पर भारत अब सुरक्षा प्रदाता के रूप में देखा जा रहा है—चाहे वह मानवीय सहायता हो, समुद्री सुरक्षा हो या रणनीतिक साझेदारियों का विस्तार। 2025 की यह उपलब्धि हमें यह विश्वास देती है कि भारत आने वाले दशक में न केवल अपनी सीमाओं की रक्षा करेगा, बल्कि वैश्विक शांति और स्थिरता में भी निर्णायक भूमिका निभाएगा। यह पुनर्जागरण आत्मविश्वास का है—एक ऐसे भारत का, जो मजबूत भी है और जिम्मेदार भी।
उदय इंडिया ब्यूरो
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