सयाली पराते
गिद्ध हमारे पारिस्थितिकी तंत्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। प्रकृति में इनकी भूमिका केवल एक पक्षी के रूप में नहीं, बल्कि प्राकृतिक सफाईकर्मी के रूप में भी है। कई धर्मों और संस्कृतियों में गिद्धों को विशेष महत्व दिया गया है।
मृत पशुओं के शवों को खाकर वे पर्यावरण को स्वच्छ रखने और कई तरह की बीमारियों को रोकने में महत्वपूर्ण योगदान देते है। दुनिया में गिद्धों की लगभग 22 प्रजातियां पाई जाती हैं, जिनमें से 9 प्रजातियां भारत में प्रमुख रूप से मिलती है।
गिद्ध क्या होते हैं?
गिद्ध बड़े आकार के मांसाहारी पक्षी हैं जो मुख्य रूप से मृत जानवरों के शवों पर निर्भर रहते है। इन्हें scavenger अर्थात मृतजीवी पक्षी कहा जाता है। इनके बड़े पंख उन्हें लंबे समय तक आकाश में उड़ने में सहायता करते है। गर्म हवा की धाराओं का उपयोग करके वे बहुत कम ऊर्जा खर्च करते हुए काफी देर तक उड़ सकते है।
गिद्धों की दृष्टि बहुत तेज होती है। वे दूर से जमीन पर पड़े शवों को पहचान सकते है। कुछ परिस्थितियों में वे अन्य गिद्धों या दूसरे scavengers की गतिविधियों को देखकर भी भोजन के स्थान का पता लगा सकते है।
गिद्धों के सिर और गर्दन पर अपेक्षाकृत कम पंख होते है। यह विशेषता शव खाने की उनकी जीवनशैली के अनुकूल मानी जाती है।

भारत में पाए जाने वाले गिद्ध
भारत गिद्धों की विविधता के लिए महत्वपूर्ण देश है। यहां गिद्धों की कई प्रजातियां पाई जाती हैं। इनमें प्रमुख रूप से भारत में पाई जाने वाली गिद्धों की प्रमुख प्रजातियों में
WII की एक रिपोर्ट के अनुसार
गिद्ध की विशेषताएं
पारिस्थितिकी तंत्र में प्रत्येक जीव की अपनी भूमिका होती है। गिद्ध खाद्य जाल में scavenger के रूप में महत्वपूर्ण स्थान रखते है। मृत जानवरों को जल्दी हटाने से वे पर्यावरण में शवों के लंबे समय तक पड़े रहने को कम करते है। इससे प्राकृतिक अपघटन की प्रक्रिया में सहायता मिलती है।
गिद्धों की कमी का प्रभाव केवल उनकी अपनी प्रजातियों तक सीमित नहीं रहता। किसी पारिस्थितिकी तंत्र में एक महत्वपूर्ण scavenger की संख्या कम होने पर शवों पर निर्भर दूसरे जीवों की गतिविधियों और संख्या में भी बदलाव हो सकता है। इसलिए गिद्धों का संरक्षण पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण का भी हिस्सा है।

क्या गिद्ध जलस्रोतों को प्रदूषण से बचाने में मदद करते है ?
नदी, तालाब या किसी गांव के आसपास पड़ा कोई मृत जानवर सड़ने-गलने के दौरान रोगजनक सूक्ष्मजीव और कार्बनिक पदार्थ आसपास के पर्यावरण में छोड़ सकता है। गिद्ध इन मृत जानवरों के शवों को बहुत तेजी से खा सकते है।
एक रिसर्च पेपर के अनुसार जिन क्षेत्रों में गिद्धों का पतन अधिक था, वहां पानी की गुणवत्ता खराब हो गई। शोधकर्ताओं ने fecal coliform में वृद्धि और dissolved oxygen में कमी देखी। इसका संभावित mechanism यह बताया गया है कि गिद्धों के कम होने पर पशुओं के शव अधिक समय तक पड़े रहते हैं और उनसे जुड़ा organic material runoff के माध्यम से पानी में पहुंच सकता है
गिद्धों के पेट में मौजूद अत्यधिक अम्लीय पाचक रस और उनकी विशेष पाचन प्रणाली उन्हें मृत जानवरों के शवों में मौजूद कई रोगजनक सूक्ष्मजीवों को नष्ट करने में सक्षम बनाती है। मृत जानवरों के शवों को तेजी से हटाकर गिद्ध अन्य मांसाहारी जीवों, दूसरे जानवरों और आसपास के पर्यावरण के संपर्क में आने वाली संक्रमणकारी सामग्री की मात्रा को कम कर सकते है।
गिद्धों के लिए क्यों जरूरी हैं जलस्रोत?
गिद्धों के लिए जलस्रोत केवल पानी पीने की जगह नहीं है। बुंदेलखंड में किए गए एक अध्ययन में गिद्धों के Nesting sites और जलस्रोतों के बीच मजबूत संबंध पाया गया। अध्ययन में दर्ज सभी nesting sites किसी नदी, बांध या नहर जैसे जलस्रोत के करीब थीं।
गिद्ध नदियों और तालाबों से पानी पीते हैं और भोजन के बाद स्नान भी करते है। अध्ययन में यह भी पाया गया कि पर्याप्त जल उपलब्धता वाले कुछ जिलों में गिद्धों की आबादी बेहतर थी, जबकि पानी की कमी वाले क्षेत्रों में, पशुधन उपलब्ध होने के बावजूद, गिद्धों की संख्या कम थी।
भूजल में गिद्ध का महत्त्व
जब कोई पशु मर जाता है और उसका शव खुले में पड़ा रहता है, तो गिद्ध उसे तेजी से खाकर समाप्त कर सकते हैं। यदि गिद्धों की संख्या कम हो जाए तो शव लंबे समय तक पड़े रह सकते है। बारिश के दौरान इन शवों से निकलने वाला जैविक पदार्थ और रोगजनक आसपास के तालाब, नाले, नदियों और भूजल तक पहुंच सकते है।
एक अध्ययन में गिद्धों के घटने और जल गुणवत्ता के बीच संबंध का उल्लेख किया गया है। भारत में गिद्धों की आबादी में भारी गिरावट के बाद कुछ क्षेत्रों में घुलित ऑक्सीजन में 12% तक कमी और फीकल कोलीफॉर्म में लगभग दोगुनी वृद्धि देखी गई।
गिद्धों की संख्या में गिरावट
भारत में गिद्धों की संख्या में भारी गिरावट देखि गयी है। BNHS के अनुसार 1980 के आसपास भारत में white-rumped vultures और लंबी चोंच वाले गिद्धों की संख्या लगभग 4 करोड़ आंकी गई थी। लेकिन अगले दो दशकों में इनकी आबादी में तेजी से गिरावट आई।
वर्ष 2000 में अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) ने चेतावनी दी कि “भारतीय गिद्ध पूर्ण विलुप्ति से केवल एक कदम दूर है।” स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 2007 तक भारत में गिद्धों की कुल संख्या में लगभग 99 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई, जबकि white-rumped vultures की आबादी में यह गिरावट 99.9 प्रतिशत तक पहुंच गई थी।
गिद्धों के बिना भारत: एक स्वास्थ्य संकट
BNHS के अनुसार भारत और नेपाल में हिंदुओं के लिए गायों का धार्मिक महत्व है और सामान्यतः उनका मांस नहीं खाया जाता। ऐसे में मृत पशुओं के शवों को अक्सर बड़े नगरपालिका कचरा स्थलों या गांवों के बाहरी इलाकों में छोड़ दिया जाता है।
लंबे समय से ये स्थान गिद्धों के भोजन का प्रमुख स्रोत रहे है। गिद्धों द्वारा शवों को तेजी से खा जाना भारतीय उपमहाद्वीप में मृत पशुओं के निस्तारण की एक पारंपरिक और प्राकृतिक व्यवस्था रही है। अनुमान है कि गिद्ध हर वर्ष लगभग 1.2 करोड़ टन (12 मिलियन टन) मृत जैविक पदार्थ का उपभोग करते थे।
लेकिन गिद्धों की संख्या में भारी गिरावट के बाद ये शव खुले में सड़ने लगे हैं, जिससे पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य के लिए खतरा बढ़ गया है। सड़ते हुए शवों से बीमारियों के फैलने की आशंका बढ़ती है और इनके कारण आवारा तथा रेबीज से संक्रमित कुत्तों की संख्या में भी वृद्धि हो सकती है।
अंतर्राष्ट्रीय गिद्ध जागरूकता दिवस
गिद्धों के महत्व और उनके संरक्षण की आवश्यकता के बारे में दुनिया भर में जागरूकता फैलाने के लिए International Vulture Awareness Day (IVAD) मनाया जाता है। यह दिवस हर वर्ष सितंबर के पहले शनिवार को मनाया जाता है। वर्ष 2026 में International Vulture Awareness Day 5 सितंबर को मनाया जाएगा।
इस दिवस का उद्देश्य केवल गिद्धों के बारे में जानकारी देना नहीं है, बल्कि लोगों की उनके प्रति बनी नकारात्मक धारणाओं को बदलना भी है। गिद्धों को अक्सर केवल मृत जानवर खाने वाले पक्षी के रूप में देखा जाता है, जबकि वे स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र के लिए आवश्यक प्राकृतिक सफाईकर्मियों में शामिल है।
भारत में गिद्ध संरक्षण: क्या कहता है सरकारी एक्शन प्लान?
भारत सरकार के इस एक्शन प्लान के अनुसार, देश में गिद्धों की नौ प्रजातियां जंगली अवस्था में पाई जाती थीं। इनमें सफेद-पृष्ठीय गिद्ध, पतली चोंच वाला गिद्ध और लंबी चोंच वाला गिद्ध सबसे गंभीर संकट का सामना कर रहे थे।
दस्तावेज के अनुसार वर्ष 2005 तक भारत में Gyps वंश के गिद्धों की आबादी में लगभग 97 प्रतिशत की गिरावट आ चुकी थी। इसी तेजी से हो रही कमी के कारण इन तीन प्रजातियों को वर्ष 2000 में IUCN द्वारा ‘Critically Endangered’ (अति संकटग्रस्त) श्रेणी में रखा गया था। सरकार ने यह भी माना कि यदि तत्काल संरक्षण उपाय नहीं किए गए तो इनके पूरी तरह विलुप्त होने का खतरा था।
रिपोर्ट में गिद्धों को भारत के प्रमुख प्राकृतिक अपमार्जकों में बताया गया है। गिद्धों की संख्या कम होने पर खुले में पड़े शवों की संख्या बढ़ सकती है और इससे दूसरे अपमार्जक जीवों, विशेषकर आवारा कुत्तों की संख्या बढ़ने की आशंका रहती है।
रिपोर्ट के अनुसार इससे रेबीज और एंथ्रेक्स जैसी बीमारियों के प्रसार का खतरा बढ़ सकता है। गिद्धों का महत्व पारिस्थितिकी के साथ-साथ सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी बताया गया है, क्योंकि पारसी समुदाय की पारंपरिक अंतिम संस्कार व्यवस्था में भी गिद्धों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
(https://hindi.indiawaterportal.org/environment/international-vulture-awareness-day)
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)
Leave Your Comment