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असली चिंता तो बिहार में हार की है...

The real worry is about the defeat in Bihar...

जिस जन विश्वास पर मोदी सरकार सत्ता में है वह विपक्ष को इतना डरा रहा है कि 2029 में भी उसे नहीं लग रहा कि वह देश के जनमानस को अपने पक्ष में कर पाएगा। यही कारण है कि कांग्रेस सहित इंडिया ब्लॉक की सभी पार्टियां सड़कों पर उतरने को मजबूर हुई हैं। 11 अगस्त को देश के विपक्ष ने राहुल के नेतृत्व में चुनाव आयोग के विरुद्ध संसद से आयोग तक पैदल मार्च कर जहां एक ओर विपक्षी एकता का प्रदर्शन किया तो वहीं दूसरी ओर बिहार में जारी मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर)  की प्रक्रिया का विरोध किया। विपक्ष इस प्रदर्शन से इतना उत्साहित दिखा कि जैसे चुनाव आयोग ने खुद उसे आंदोलन का अच्छा खासा मौका दे दिया है। इस उत्साह में कुछ नेता जिनमें अखिलेश यादव  अव्वल हैं तो इतने बौरा गए कि वे बैरिकेड फांद कर दूसरी तरफ प्रदर्शन करने बैठ गए। समझ नहीं आता यह संविधान बचाने के लिए प्रदर्शन था या संवैधानिक व्यवस्थाओं को तोड़ने का प्रदर्शन था। इस सब में महत्वपूर्ण यह है कि राहुल गांधी के कथित एटमबम फोड़ू पावर प्वाइंट प्रेजेंटेशन से चुनाव आयोग ना तो विचलित है और ना ही घबराया हुआ है यही कारण है कि उसने प्रेस वार्ता कर राजनीतिक दलों को अपनी कार्य प्रणाली, दमदार तरीके से समझा दी है क्योंकि वह जानता है कि उसकी पारदर्शिता कहीं भी संदिग्ध नहीं है।

एक घंटे से अधिक के पावर प्वाइंट प्रेजेंटेशन में राहुल गांधी यह स्थापित करने का प्रयत्न करते रहे थे कि अब तक जितने चुनाव बीजेपी जीतती रही है वह सब  चोरी के वोटों के कारण जीती जिसमें चुनाव आयोग भाजपा को मदद करता रहा है। निश्चित ही यह एक बड़ा आरोप है जिसके लिए आयोग ने राहुल से हलफनामा पर हस्ताक्षर करने को कहा लेकिन राहुल का मानना है कि बिना हलफनामे के आयोग जांच करे क्योंकि उन्होंने तो संसद में शपथ ले ही रखी है। लेकिन सवाल इस बात का है कि आरोपों को प्रमाणित करने की जिम्मेदारी भी आरोप लगाने वालों की होती है। वैसे इन आरोपों में इसलिए दम दिखाई नहीं देता क्योंकि यदि वोटों की चोरी हुई होती तो भाजपा 2019 में मिली 302 सीटों से 2024 में 240 सीटों पर नहीं लुढ़कती या कांग्रेस अपनी 52 सीटों से 99 पर नहीं पहुंचती।

   राहुल गांधी ने 7 अगस्त को जो दस्तावेजों के पहाड़ जैसा पुलिंदा सार्वजनिक किया यदि वे ही आरोप हैं तो ये तो वे पहले भी लगा चुके हैं। महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में उन्होंने भाजपा पर वोटों की धांधली का आरोप लगाया था। करीब 2 महीने पहले 12 जून को चुनाव आयोग ने राहुल गांधी को ईमेल और पत्र लिखकर उनके द्वारा लगाए गए आरोपों पर चर्चा के लिए बुलाया था लेकिन राहुल ने आयोग में जाना मुनासिब नहीं समझा। यही नहीं महाराष्ट्र चुनाव में धांधली के आरोपों को पहले हाई कोर्ट ने फिर सुप्रीम कोर्ट ने भी खारिज कर दिया। राहुल के आरोप हैं कि महाराष्ट्र चुनाव में मैच फिक्सिंग की गई थी। इसी तरह की फिक्सिंग अब बिहार में होगी, फिर वहां होगी, जहां भाजपा हारती दिख रही होगी। इस बयान से यह पूरी तरह स्पष्ट हो रहा है कि राहुल गांधी की असली चिंता महाराष्ट्र की हार के बाद अब बिहार चुनाव में हारने की है। विपक्ष की यह चिंता तब और बढ़ गई जब ऑपरेशन सिंदूर के बाद पूरा देश मोदी के नेतृत्व को एक सशक्त और निडर सरकार के रूप में देखने लगा है। निःसंदेह यह स्थिति तब उत्पन्न हुई जब सरकार की दृढ़ इच्छा शक्ति ने 22 अप्रैल के पहलगाम आतंकी हमले का 6 से 10 मई के बीच पाकिस्तान से बदला लेकर उसे घुटनों पर ला दिया। इस कार्रवाई ने भारत की जनता में मोदी के प्रति असीम विश्वास का संचार किया है। वहीं दूसरी ओर चुनाव आयोग ने बिहार में मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण कर फर्जी वोटरों, मृत वोटरों, विस्थापित या स्थाई रूप से स्थानांतरित हो गए वोटरों को सूची से बाहर करने का काम किया जिसमें लगभग 65 लाख वोटरों के नाम काटे गए, जो गलत दर्ज थे। निश्चित ही यह फर्जी, मृत, विस्थापित और स्थाई रूप से स्थानांतरित वोटरों की बहुत बड़ी संख्या है। ऐसा क्यों न माना जाए कि इस पुनरीक्षण का विरोध विपक्ष इसलिए कर रहा लगता है कि विलोपित किए गए इन वोटरों में अधिकतर वे फर्जी मतदाता थे, जिनके नाम पर वोट डलवाए जाते थे और वे विपक्ष के खाते में जाते होंगे। हालांकि प्रक्रिया रोकने के लिए विपक्ष ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा भी खटखटाया था लेकिन उसने प्रक्रिया रोकने का आदेश देने से मना कर दिया। यही नहीं आयोग ने पुनरीक्षित मतदाता सूची का ड्राफ्ट रोल जारी कर आपत्तियों के लिए पर्याप्त समय दिया है किंतु न तो किसी व्यक्ति ने और न किसी राजनीतिक दल ने कोई आपत्ति दर्ज कराई जो इस बात का सूचक है कि पुनरीक्षण से वास्तविक मतदाताओं की नई सूची तैयार हो जाएगी जो विपक्ष की मांग के अनुसार साफ सुथरी होगी। लेकिन विपक्ष इस बात को लेकर बहुत परेशान लगता है कि अभी बिहार में चुनाव होने हैं  इसके बाद अगले साल में तमिलनाडु,असम, केरल, पुदुचेरी और पश्चिम बंगाल में चुनाव होना है। यहां भी बिहार जैसा मतदाता सूची का पुनरीक्षण होता है तो बहुत बड़ी संख्या में गलत वोटों की छंटनी हो जाएगी जो विपक्ष को नुकसानदेह साबित होगी। पश्चिम बंगाल में तो रोहिंग्या और बांग्लादेशी घुसपैठी मतदाताओं की बहुत बड़ी संख्या का अनुमान है यदि ये पुनरीक्षण में निकाल दिए गए तो तृणमूल के जीतने की संभावनाएं बहुत कम हो जाएंगी।

विपक्ष के धरना प्रदर्शन से एक बात स्पष्ट हो रही है कि उसने मोदी विरोध के लिए कमर कस ली है जिसका एकमात्र उद्देश्य मोदी को सत्ता से हटाना प्रतीत होता है। इसमें विपक्ष कितना सफल होता है यह तो वक्त बताएगा लेकिन एसआईआर के अलावा विपक्ष जिन मुद्दों को लेकर आगे बढ़ रहा है उनमें ऑपरेशन सिंदूर के कथित सीज फायर पर राष्ट्रपति ट्रंप का दावा तथा भारत को ऑपरेशन सिंदूर में हुई नुकसानी और पहलगाम हमले के आतंकियों के मारे जाने की टाइमिंग तथा ट्रंप द्वारा लगाए गए टैरिफ आदि प्रमुख हैं। निश्चित ही विपक्ष आर-पार के मूड में दिखाई दे रहा है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में विपक्ष का यह कदम असंवैधानिक तो नहीं है लेकिन आशंका यह है कि कहीं यह प्रदर्शन बांग्लादेश और श्रीलंका जैसी अराजक स्थिति पैदा करने का आधार तो नहीं बनाया जा रहा क्योंकि आज से 1 साल पहले इसी अगस्त के महीने में कांग्रेसी नेताओं के ऐसे बयान आए थे जो देश में अराजकता की स्थिति पैदा करने को जनता को उकसाते नजर आ रहे थे। मध्य प्रदेश में कांग्रेस नेता और पूर्व मंत्री सज्जन सिंह वर्मा ने धमकी भरे अंदाज में कहा था कि एक दिन भारत के प्रधानमंत्री आवास पर भी लोग धावा बोल देंगे ठीक वैसे ही जैसे बांग्लादेश में हुआ। उन्होंने कहा था पहले श्रीलंका में हुआ फिर बांग्लादेश में हुआ अब भारत में भी ऐसा हो सकता है। केवल सज्जन सिंह वर्मा ही नहीं बल्कि कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री सलमान खुर्शीद ने भी कुछ ऐसा ही बयान दिया था कि भारत में भले ही ऊपर ऊपर सब कुछ सामान्य दिख रहा है लेकिन अंदर बहुत कुछ चल रहा है। जैसा बांग्लादेश में हुआ वैसा ही भारत में हो सकता है। बयान भले ही एक साल पहले के हों लेकिन जिस तरह मतदाता सूची पुनरीक्षण के विरोध में विपक्षी गठबंधन आंदोलन कर रहा है वह लोगों को उकसाने वाली कार्रवाई प्रतीत हो रही है। लगता है इन्हीं बयानों को लेकर प्रधानमंत्री ने आशंका जताते हुए कहा था कि हो सकता है मुझे व्यक्तिगत हानि उठाना पड़े। अभी पिछले सप्ताह भी आरजेडी सांसद मनोज झा ने भी भारत में बांग्लादेश जैसी स्थितियों के होने की धमकी देकर विपक्ष की मंशा उजागर कर दी। लेकिन भारत की जनता बहुत समझदार है वह तेल और तेल की धार देख रही है।





डॉ. हरिकृष्ण बड़ोदिया
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)

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