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गंगा के असली पहरेदार नदी की सेहत के जीवित संकेतक

The real guardians of the Ganga are living indicators of the river's health.

 


डॉ. दीपक कोहली 

गंगा केवल एक नदी नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता की जीवनरेखा है। हिमालय के गंगोत्री हिमनद से निकलकर उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल से होती हुई बंगाल की खाड़ी तक पहुंचने वाली यह नदी लगभग 2,500 किलोमीटर की यात्रा करती है। इसके विशाल बेसिन में भारत की लगभग 43 प्रतिशत आबादी निवास करती है। करोड़ों लोगों की पेयजल, सिंचाई, मत्स्य पालन, परिवहन और धार्मिक गतिविधियों की आवश्यकताएं प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से गंगा पर निर्भर हैं। हजारों वर्षों से यह नदी भारतीय संस्कृति, साहित्य, दर्शन और लोकजीवन का अभिन्न अंग रही है। किंतु इक्कीसवीं सदी में तीव्र औद्योगिकीकरण, शहरीकरण और बढ़ती जनसंख्या के दबाव ने गंगा की पारिस्थितिकी को अभूतपूर्व चुनौतियों के सामने ला खड़ा किया है।

आज गंगा में प्रतिदिन करोड़ों लीटर अनुपचारित सीवेज, औद्योगिक अपशिष्ट, कृषि रसायन और ठोस कचरा पहुंच रहा है। अनेक स्थानों पर नदी का प्राकृतिक प्रवाह भी बांधों, बैराजों और जल दोहन के कारण प्रभावित हुआ है। इन परिस्थितियों में यह जानना अत्यंत आवश्यक हो गया है कि गंगा वास्तव में कितनी स्वस्थ है। लंबे समय तक वैज्ञानिक नदी की सेहत का आकलन जल के रासायनिक परीक्षणों के आधार पर करते रहे। घुलित ऑक्सीजन, जैव-रासायनिक ऑक्सीजन मांग , रासायनिक ऑक्सीजन मांग ,  पीएच, नाइट्रेट, फास्फेट और भारी धातुओं जैसे मानकों का उपयोग किया जाता रहा है। ये परीक्षण महत्वपूर्ण हैं, किंतु वे केवल उस समय की स्थिति बताते हैं जब नमूना लिया गया हो। नदी का दीर्घकालिक स्वास्थ्य जानने के लिए केवल रसायन पर्याप्त नहीं होते। इसके लिए उन जीवों की ओर देखना पड़ता है जो नदी के भीतर रहते हैं और हर क्षण उसके बदलते पर्यावरण का अनुभव करते हैं।

यहीं से जैव संकेतकों या बायोइंडिकेटरों की अवधारणा सामने आती है। जैव संकेतक वे जीव होते हैं जिनकी उपस्थिति, अनुपस्थिति, संख्या, व्यवहार या शारीरिक स्थिति पर्यावरण की गुणवत्ता के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करती है। सरल शब्दों में कहा जाए तो ये जीव नदी की सेहत के जीवित थर्मामीटर होते हैं। यदि नदी स्वस्थ है तो कुछ विशेष प्रजातियां वहां फलती-फूलती हैं; यदि प्रदूषण बढ़ता है तो वही प्रजातियां कम होने लगती हैं या गायब हो जाती हैं। इसलिए वैज्ञानिक आज नदियों की निगरानी के लिए जैव संकेतकों को सबसे विश्वसनीय साधनों में से एक मानते हैं।

जैव संकेतकों की अवधारणा नई नहीं है। यूरोप और उत्तरी अमेरिका में बीसवीं शताब्दी के मध्य से ही वैज्ञानिक नदियों में रहने वाले कीटों, मछलियों और सूक्ष्म जीवों के आधार पर जल गुणवत्ता का मूल्यांकन कर रहे हैं। बाद में यह पाया गया कि कई बार रासायनिक परीक्षण सामान्य परिणाम दिखाते हैं, लेकिन जैव समुदाय गंभीर संकट की ओर संकेत कर रहा होता है। इसका कारण यह है कि जीव अपने शरीर में लंबे समय तक पर्यावरणीय प्रभावों को संचित रखते हैं। वे केवल वर्तमान नहीं, बल्कि अतीत के प्रदूषण का भी संकेत देते हैं। यही विशेषता उन्हें अत्यंत महत्वपूर्ण बनाती है।

गंगा की जैव विविधता विश्व की सबसे समृद्ध नदीय जैव विविधताओं में से एक है। इस नदी और इसकी सहायक नदियों में हजारों प्रकार के जीव निवास करते हैं। इनमें सूक्ष्म जीवाणुओं से लेकर विशाल जलीय स्तनधारी तक शामिल हैं। प्रत्येक जीव नदी के पारिस्थितिक तंत्र में एक विशिष्ट भूमिका निभाता है। कुछ जीव जैविक पदार्थों को विघटित करते हैं, कुछ पोषक तत्वों के चक्र को नियंत्रित करते हैं, कुछ खाद्य श्रृंखला का आधार बनते हैं और कुछ शीर्ष शिकारी के रूप में पूरे तंत्र के संतुलन को बनाए रखते हैं। यही कारण है कि किसी एक प्रजाति का संकट अक्सर पूरे पारिस्थितिक तंत्र के संकट का संकेत बन जाता है।

यदि गंगा के सबसे प्रसिद्ध जैव संकेतक की बात की जाए तो निस्संदेह गंगा डॉल्फिन का नाम सबसे पहले आता है। भारत का राष्ट्रीय जलीय जीव घोषित की जा चुकी यह डॉल्फिन केवल एक आकर्षक प्राणी नहीं, बल्कि नदी के स्वास्थ्य का जीवित प्रतीक है। वैज्ञानिक नाम प्लैटानिस्टा गैंगेटिका वाली यह डॉल्फिन गंगा, ब्रह्मपुत्र और उनकी कुछ सहायक नदियों में पाई जाती है। इसकी सबसे रोचक विशेषता यह है कि इसकी आंखें अत्यंत अविकसित होती हैं और यह लगभग अंधी मानी जाती है। फिर भी यह ध्वनि तरंगों के माध्यम से दिशा और भोजन का पता लगाने में सक्षम होती है। इस प्रक्रिया को इकोलोकेशन कहा जाता है।

गंगा डॉल्फिन के अस्तित्व के लिए कई पारिस्थितिक परिस्थितियों का एक साथ मौजूद होना आवश्यक है। उसे पर्याप्त गहराई वाला जल चाहिए, निरंतर प्रवाह चाहिए, भोजन के लिए पर्याप्त मछलियां चाहिए और अपेक्षाकृत स्वच्छ पर्यावरण चाहिए। यदि इनमें से कोई भी तत्व प्रभावित होता है तो डॉल्फिन की आबादी पर असर पड़ता है। इसलिए वैज्ञानिक इसे अम्ब्रेला स्पीशीज़ कहते हैं। इसका अर्थ है कि यदि डॉल्फिन सुरक्षित है तो उसके साथ पूरा नदी तंत्र भी अपेक्षाकृत सुरक्षित होगा।

एक समय गंगा में डॉल्फिन की संख्या हजारों में थी, लेकिन बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में प्रदूषण, अवैध शिकार और नदी के खंडित होते प्रवाह के कारण इनकी संख्या तेजी से घटी। कई क्षेत्रों से डॉल्फिन लगभग गायब हो गईं। हाल के वर्षों में संरक्षण प्रयासों के कारण कुछ क्षेत्रों में सुधार देखा गया है, किंतु यह प्रजाति अब भी संकटग्रस्त मानी जाती है। वैज्ञानिकों का मानना है कि डॉल्फिन की आबादी में होने वाला परिवर्तन गंगा की पारिस्थितिक स्थिति को समझने का सबसे प्रभावी तरीका है।

डॉल्फिन के बाद यदि कोई जीव गंगा की सेहत का महत्वपूर्ण दर्पण है तो वह है मछलियों का समुदाय। गंगा बेसिन में लगभग 150 से अधिक मछली प्रजातियां पाई जाती हैं। इनमें रोहू, कतला, मृगल, हिल्सा, महाशीर और अनेक स्थानीय प्रजातियां शामिल हैं। इन प्रजातियों का आर्थिक महत्व तो है ही, साथ ही वे नदी के पर्यावरणीय स्वास्थ्य का भी महत्वपूर्ण संकेत देती हैं।

मछलियों की विविधता और संख्या किसी नदी की पारिस्थितिक गुणवत्ता को दर्शाती है। स्वच्छ और ऑक्सीजन युक्त जल में अनेक संवेदनशील प्रजातियां पनपती हैं, जबकि प्रदूषित जल में केवल कुछ सहनशील प्रजातियां ही जीवित रह पाती हैं। जब किसी नदी में प्रदूषण बढ़ता है, तो सबसे पहले संवेदनशील प्रजातियों का प्रजनन प्रभावित होता है। उनके अंडों और बच्चों की मृत्यु दर बढ़ जाती है। धीरे-धीरे वे क्षेत्र से लुप्त होने लगती हैं। इसके विपरीत कुछ ऐसी प्रजातियां बढ़ने लगती हैं जो कम ऑक्सीजन और अधिक प्रदूषण वाली परिस्थितियों में भी जीवित रह सकती हैं। यह परिवर्तन वैज्ञानिकों को स्पष्ट संकेत देता है कि नदी का स्वास्थ्य बिगड़ रहा है।

मछलियां प्रदूषण के दीर्घकालिक प्रभावों को भी उजागर करती हैं। औद्योगिक अपशिष्टों से निकलने वाली भारी धातुएं जैसे पारा, सीसा, क्रोमियम और कैडमियम जल में प्रवेश कर मछलियों के शरीर में जमा हो जाती हैं। इस प्रक्रिया को जैव संचयन कहा जाता है। समय के साथ ये विषैले तत्व खाद्य श्रृंखला में ऊपर की ओर बढ़ते हैं और अंततः मनुष्य तक पहुंच सकते हैं। इसलिए मछलियों का अध्ययन केवल नदी की सेहत ही नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य की दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।

गंगा के स्वास्थ्य का आकलन करने में सूक्ष्म जीवों की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। नदी में अरबों की संख्या में सूक्ष्म जीवाणु, कवक और अन्य सूक्ष्मजीव मौजूद रहते हैं। ये जीव जैविक पदार्थों के अपघटन, पोषक तत्वों के पुनर्चक्रण और जल की स्वशोधन क्षमता को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यदि नदी में जैविक प्रदूषण बढ़ता है, तो सूक्ष्मजीव समुदाय की संरचना बदलने लगती है। कुछ विशेष प्रकार के जीवाणु तेजी से बढ़ते हैं जबकि अन्य कम हो जाते हैं। वैज्ञानिक इन परिवर्तनों का अध्ययन करके नदी की स्थिति का अनुमान लगा सकते हैं।

गंगा की एक अनोखी विशेषता उसकी स्वशोधन क्षमता मानी जाती रही है। लंबे समय तक यह माना जाता था कि गंगा का जल अन्य नदियों की तुलना में अधिक समय तक खराब नहीं होता। आधुनिक अनुसंधान बताते हैं कि इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं, जिनमें कुछ विशेष प्रकार के जीवाणुओं और बैक्टीरियोफेजों की भूमिका भी शामिल है। हालांकि वैज्ञानिक इस विषय पर अभी भी शोध कर रहे हैं, लेकिन इतना स्पष्ट है कि गंगा के सूक्ष्म जीव समुदाय का संबंध उसकी पारिस्थितिक सेहत से गहराई से जुड़ा हुआ है।

गंगा के सूक्ष्म संसार में प्लवकों का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। प्लवक वे सूक्ष्म जीव हैं जो जल में तैरते रहते हैं और अधिकांश जलीय खाद्य जाल की नींव बनाते हैं। इन्हें मुख्यतः दो वर्गों में बांटा जाता है—फाइटोप्लैंकटन और जूप्लैंकटन। फाइटोप्लैंकटन सूक्ष्म पौधों की तरह कार्य करते हैं और प्रकाश संश्लेषण द्वारा भोजन बनाते हैं। वहीं जूप्लैंकटन इन पर निर्भर रहते हैं और आगे चलकर मछलियों तथा अन्य जीवों के भोजन का आधार बनते हैं।

किसी नदी में प्लवकों की संरचना उस नदी के पोषक तत्वों की स्थिति को दर्शाती है। यदि जल में अत्यधिक नाइट्रोजन और फास्फोरस पहुंचता है, तो शैवालों की असामान्य वृद्धि होने लगती है। इसे यूट्रोफिकेशन कहा जाता है। प्रारंभ में यह वृद्धि सामान्य लग सकती है, लेकिन बाद में यही शैवाल बड़ी मात्रा में ऑक्सीजन की खपत करने लगते हैं। परिणामस्वरूप जल में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है और मछलियों सहित अनेक जलीय जीवों के लिए संकट उत्पन्न हो जाता है। इसलिए प्लवकों का अध्ययन नदी स्वास्थ्य मूल्यांकन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

गंगा में प्लवकों का वितरण भी क्षेत्रानुसार बदलता है। हिमालयी क्षेत्रों में जहां जल ठंडा और तेज प्रवाह वाला होता है, वहां प्लवक समुदाय भिन्न होता है। दूसरी ओर मैदानी क्षेत्रों में जहां पोषक तत्व अधिक होते हैं, वहां अलग प्रकार के प्लवक पाए जाते हैं। वैज्ञानिक इन परिवर्तनों का अध्ययन करके नदी के विभिन्न हिस्सों की पारिस्थितिक स्थिति का आकलन करते हैं।

गंगा की पारिस्थितिकी को समझने में जलीय कीटों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। सामान्यतः लोग नदी के स्वास्थ्य का संबंध बड़ी मछलियों, डॉल्फिन या कछुओं से जोड़ते हैं, लेकिन वैज्ञानिकों की दृष्टि में नदी के भीतर रहने वाले छोटे-छोटे कीट अनेक बार अधिक विश्वसनीय संकेतक सिद्ध होते हैं। इन कीटों के लार्वा अपने जीवन का अधिकांश भाग जल में बिताते हैं और जल की गुणवत्ता में होने वाले परिवर्तनों के प्रति अत्यंत संवेदनशील होते हैं। यही कारण है कि विश्वभर में नदियों की जैव निगरानी के लिए जलीय कीटों का व्यापक उपयोग किया जाता है।

मेफ्लाई , स्टोनफ्लाई  और कैडिसफ्लाई  जैसे कीट स्वच्छ, ठंडे और ऑक्सीजन-समृद्ध जल में ही जीवित रह सकते हैं। यदि किसी नदी में इनकी संख्या अच्छी है, तो यह संकेत माना जाता है कि वहां का जल अपेक्षाकृत स्वस्थ है। दूसरी ओर कुछ कीट, जैसे कुछ प्रकार के कृमि और मिज फ्लाई लार्वा, अत्यधिक प्रदूषित परिस्थितियों को भी सहन कर लेते हैं। इसलिए यदि किसी नदी में संवेदनशील प्रजातियां कम होने लगें और प्रदूषण-सहिष्णु जीवों की संख्या बढ़ने लगे, तो वैज्ञानिक तुरंत समझ जाते हैं कि नदी की गुणवत्ता में गिरावट आ रही है। गंगा और उसकी सहायक नदियों में किए गए अनेक अध्ययनों ने यह स्पष्ट किया है कि जलीय कीट समुदाय नदी के स्वास्थ्य का अत्यंत प्रभावी जैव संकेतक है।

गंगा के प्राकृतिक सफाईकर्मियों में कछुओं का स्थान भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। गंगा में कई प्रकार के नरम कवच वाले और कठोर कवच वाले कछुए पाए जाते हैं। ये केवल जैव विविधता के प्रतिनिधि जीव नहीं हैं, बल्कि नदी के स्वच्छता तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। कछुए मृत जीवों, जैविक अवशेषों और अन्य अपघटित पदार्थों को खाकर नदी में जैविक कचरे की मात्रा कम करते हैं। इस प्रकार वे जल को अपेक्षाकृत स्वच्छ बनाए रखने में सहायता करते हैं।

1980 और 1990 के दशक में गंगा के कुछ क्षेत्रों में कछुओं की संख्या में आई कमी ने वैज्ञानिकों को चिंतित किया था। इसके बाद संरक्षण कार्यक्रमों के अंतर्गत कई स्थानों पर कछुओं का पुनर्वास और संवर्धन किया गया। आज यह समझा जा चुका है कि यदि कछुए और अन्य अपमार्जक जीव स्वस्थ रहेंगे तो नदी की स्वशोधन क्षमता भी बेहतर बनी रहेगी। इस दृष्टि से कछुए गंगा के वास्तविक पर्यावरण प्रहरी हैं।

गंगा की तलहटी में रहने वाले जीवों का संसार भी कम रोचक नहीं है। नदी के तल में रहने वाले इन जीवों को सामूहिक रूप से बेंथिक जीव कहा जाता है। इनमें घोंघे, कीट लार्वा, कृमि, सूक्ष्म क्रस्टेशियन तथा अन्य छोटे जीव शामिल होते हैं। ये जीव सीधे नदी की तलछट के संपर्क में रहते हैं और इस कारण तलछट में मौजूद प्रदूषकों का प्रभाव सबसे पहले इन्हीं पर दिखाई देता है।

वैज्ञानिकों के लिए बेंथिक जीव इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वे नदी के छिपे हुए प्रदूषण को उजागर कर सकते हैं। कई बार जल की ऊपरी सतह अपेक्षाकृत स्वच्छ दिखाई देती है, लेकिन तलछट में भारी धातुएं और विषैले रसायन जमा हो चुके होते हैं। ऐसी स्थिति में बेंथिक जीवों की संरचना और संख्या बदलने लगती है। यदि संवेदनशील प्रजातियां गायब हो जाएं और केवल कुछ सहनशील जीव शेष रह जाएं, तो यह तलछट प्रदूषण का स्पष्ट संकेत होता है। इसलिए आधुनिक नदी विज्ञान में बेंथिक जीवों की निगरानी को अत्यधिक महत्व दिया जाता है।

गंगा के स्वास्थ्य की चर्चा करते समय सूक्ष्म जीव समुदाय का उल्लेख भी आवश्यक है। बैक्टीरिया, कवक, प्रोटोजोआ और अन्य सूक्ष्मजीव नदी के भीतर पोषक तत्वों के चक्र को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वे मृत जैविक पदार्थों को विघटित करते हैं, कार्बन और नाइट्रोजन चक्र को नियंत्रित करते हैं तथा नदी की स्वशोधन प्रक्रिया में भाग लेते हैं। यदि सूक्ष्म जीव समुदाय में असंतुलन उत्पन्न हो जाए, तो नदी की पारिस्थितिक स्थिरता प्रभावित हो सकती है।हाल के वर्षों में वैज्ञानिकों ने पाया है कि सूक्ष्मजीव समुदाय नदी के स्वास्थ्य का अत्यंत सूक्ष्म और प्रभावी संकेतक हो सकता है। कुछ विशेष प्रकार के जीवाणु प्रदूषित परिस्थितियों में तेजी से बढ़ते हैं, जबकि कुछ केवल स्वच्छ जल में ही पनपते हैं। इसलिए आधुनिक जैव निगरानी में माइक्रोबियल प्रोफाइलिंग का महत्व तेजी से बढ़ रहा है।

तकनीकी प्रगति ने जैव संकेतकों के अध्ययन को एक नई दिशा प्रदान की है। आज वैज्ञानिक केवल जीवों को देखकर ही नदी की स्थिति का आकलन नहीं करते, बल्कि उनके आनुवंशिक संकेतों का भी अध्ययन करते हैं। इस क्षेत्र की सबसे महत्वपूर्ण तकनीकों में से एक है पर्यावरणीय डीएनए । जब कोई जीव नदी में रहता है, तो वह अपने शरीर से त्वचा कोशिकाएं, श्लेष्मा, मल या अन्य जैविक पदार्थ छोड़ता रहता है। इन पदार्थों में उस जीव का डीएनए मौजूद होता है। वैज्ञानिक जल का नमूना लेकर उसमें उपस्थित डीएनए अंशों का विश्लेषण करते हैं और पता लगा लेते हैं कि उस क्षेत्र में कौन-कौन सी प्रजातियां मौजूद हैं। इस तकनीक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसके लिए जीवों को पकड़ने या देखने की आवश्यकता नहीं होती। गंगा डॉल्फिन जैसी दुर्लभ और कठिनाई से दिखाई देने वाली प्रजातियों की निगरानी में ई डीएनए तकनीक अत्यंत उपयोगी सिद्ध हो रही है। इसके माध्यम से वैज्ञानिक कम समय और कम लागत में बड़ी संख्या में प्रजातियों की उपस्थिति का पता लगा सकते हैं। भविष्य में यह तकनीक नदी संरक्षण कार्यक्रमों की आधारशिला बन सकती है।

गंगा के संरक्षण की दिशा में भारत सरकार द्वारा संचालित नमामि गंगे कार्यक्रम एक महत्वपूर्ण पहल है। इस कार्यक्रम का उद्देश्य केवल प्रदूषण नियंत्रण नहीं, बल्कि नदी के समग्र पारिस्थितिक पुनर्जीवन को सुनिश्चित करना है। इसके अंतर्गत सीवेज शोधन संयंत्रों की स्थापना, औद्योगिक अपशिष्ट नियंत्रण, नदी तटों का संरक्षण, जैव विविधता संवर्धन और जनभागीदारी को प्रोत्साहित करने जैसे अनेक कार्य किए जा रहे हैं।नमामि गंगे कार्यक्रम के अंतर्गत गंगा डॉल्फिन, कछुए, घड़ियाल और विभिन्न मछली प्रजातियों की निगरानी पर भी विशेष ध्यान दिया गया है। वैज्ञानिक सर्वेक्षणों के माध्यम से इन जीवों की आबादी का आकलन किया जा रहा है और उनके आवासों की सुरक्षा के लिए योजनाएं बनाई जा रही हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि आधुनिक नदी संरक्षण केवल प्रदूषण नियंत्रण तक सीमित नहीं है, बल्कि जैव संकेतकों की सुरक्षा को भी समान महत्व देता है।

हालांकि संरक्षण प्रयासों के बावजूद गंगा के सामने अनेक चुनौतियां अभी भी मौजूद हैं। इनमें सबसे बड़ी चुनौती जलवायु परिवर्तन है। हिमालयी हिमनद, जो गंगा की जलधारा के प्रमुख स्रोत हैं, तापमान वृद्धि के कारण प्रभावित हो रहे हैं। कई वैज्ञानिक अध्ययनों ने संकेत दिया है कि हिमालय क्षेत्र में ग्लेशियरों के पिघलने की दर बढ़ रही है। इसका दीर्घकालिक प्रभाव गंगा के प्रवाह पर पड़ सकता है।जलवायु परिवर्तन केवल जल की मात्रा को ही प्रभावित नहीं करता, बल्कि उसकी गुणवत्ता और तापमान को भी प्रभावित करता है। जल का तापमान बढ़ने पर उसमें घुलित ऑक्सीजन की मात्रा कम हो जाती है। इससे मछलियों, डॉल्फिन और अन्य जलीय जीवों के लिए प्रतिकूल परिस्थितियां उत्पन्न हो सकती हैं। इसी प्रकार अनियमित वर्षा, अचानक आने वाली बाढ़ और लंबे सूखे नदी की पारिस्थितिकी को अस्थिर बना सकते हैं।

जलवायु परिवर्तन का प्रभाव जैव संकेतकों पर प्रत्यक्ष रूप से दिखाई देता है। कुछ प्रजातियां अपने पारंपरिक आवास छोड़ने लगती हैं, कुछ का प्रजनन चक्र प्रभावित होता है और कुछ क्षेत्रों में जैव विविधता घटने लगती है। इसलिए भविष्य में गंगा संरक्षण की रणनीतियों में जलवायु अनुकूलन को विशेष महत्व देना होगा।यदि वैश्विक स्तर पर देखा जाए तो जैव संकेतकों का उपयोग केवल गंगा तक सीमित नहीं है। यूरोप की राइन नदी, ब्रिटेन की थेम्स नदी और अमेरिका की मिसिसिपी नदी में भी जैव संकेतकों के आधार पर नदी स्वास्थ्य का मूल्यांकन किया जाता है। थेम्स नदी इसका उत्कृष्ट उदाहरण है। बीसवीं शताब्दी के मध्य में इसे लगभग “मृत नदी” घोषित कर दिया गया था क्योंकि वहां जैव विविधता लगभग समाप्त हो चुकी थी। लेकिन दशकों तक चले संरक्षण प्रयासों के बाद जब मछलियों, पक्षियों और अन्य जलीय जीवों की वापसी हुई, तो इसे नदी पुनर्जीवन की वैश्विक सफलता के रूप में देखा गया। यह उदाहरण दर्शाता है कि यदि सही प्रयास किए जाएं तो गंगा जैसी विशाल नदी का पुनरुद्धार भी संभव है।

गंगा संरक्षण में स्थानीय समुदायों की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। नदी के किनारे रहने वाले मछुआरे, किसान, नाविक और स्थानीय निवासी प्रतिदिन नदी के संपर्क में रहते हैं। वे कई बार उन परिवर्तनों को सबसे पहले महसूस कर लेते हैं जिन्हें वैज्ञानिक बाद में दर्ज करते हैं। यदि किसी क्षेत्र में मछलियों की संख्या घट रही हो, डॉल्फिन दिखाई देना कम हो गई हों या जल की गुणवत्ता में बदलाव आया हो, तो स्थानीय समुदाय इसके बारे में महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान कर सकते हैं। वर्तमान समय में “सिटीजन साइंस” की अवधारणा तेजी से लोकप्रिय हो रही है। इसके अंतर्गत आम नागरिक भी वैज्ञानिक आंकड़े जुटाने में सहयोग करते हैं। गंगा के संदर्भ में यह मॉडल अत्यंत उपयोगी सिद्ध हो सकता है। यदि स्थानीय लोग जैव संकेतकों की निगरानी में भाग लें, तो संरक्षण प्रयास अधिक प्रभावी और व्यापक हो सकते हैं।

गंगा की सेहत का वास्तविक आकलन केवल प्रयोगशालाओं में बैठकर नहीं किया जा सकता। इसके लिए नदी के भीतर बसने वाले जीवों को समझना आवश्यक है। डॉल्फिन का व्यवहार, मछलियों की विविधता, जलीय कीटों की उपस्थिति, कछुओं की संख्या, प्लवकों का संतुलन और सूक्ष्मजीव समुदाय की संरचना—ये सभी मिलकर गंगा की वास्तविक कहानी कहते हैं। ये जीव हमें बताते हैं कि नदी स्वस्थ है या संकट में, संतुलित है या दबाव में।वास्तव में ये जीव केवल जैव विविधता के घटक नहीं हैं, बल्कि गंगा के जीवित स्वास्थ्य संकेतक हैं। वे हमें समय रहते चेतावनी देते हैं कि कहीं हम अपनी सबसे महत्वपूर्ण प्राकृतिक धरोहर को खोने की दिशा में तो नहीं बढ़ रहे। यदि इन संकेतकों की संख्या और विविधता बनी रहती है, तो यह आशा की बात है कि नदी अभी भी जीवनदायिनी बनी हुई है। लेकिन यदि ये प्रहरी कमजोर पड़ने लगें, तो यह पूरे पारिस्थितिक तंत्र के लिए गंभीर चेतावनी होगी।

अंततः कहा जा सकता है कि गंगा को बचाने का सबसे वैज्ञानिक और टिकाऊ मार्ग उसके जैव संकेतकों की रक्षा से होकर गुजरता है। डॉल्फिन, मछलियां, कछुए, जलीय कीट, प्लवक, बेंथिक जीव और सूक्ष्मजीव, ये सभी मिलकर गंगा की जीवनधारा को सुरक्षित रखते हैं। यही गंगा के वास्तविक पहरेदार हैं। इनकी सुरक्षा केवल जैव विविधता संरक्षण का प्रश्न नहीं, बल्कि भारत की पर्यावरणीय सुरक्षा, जल सुरक्षा और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण का प्रश्न भी है। जिस दिन हम इन मौन प्रहरियों के महत्व को पूरी तरह समझ लेंगे, उस दिन गंगा संरक्षण का हमारा प्रयास कहीं अधिक प्रभावी, वैज्ञानिक और सफल होगा।

(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)

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