लेखक- सुबोध चंद्र
नई दिल्ली: भारत की पावन भूमि ने समय-समय पर ऐसे अनेक महापुरुषों और प्रतिभाओं को जन्म दिया है जिन्होंने अपने परिश्रम, समर्पण और राष्ट्रभक्ति से विश्व मंच पर भारत का गौरव बढ़ाया है। देवभूमि उत्तराखंड के ऐसे ही एक गौरवशाली सपूत थे जसपाल राणा। उनका नाम भारतीय निशानेबाजी के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित है। वे केवल एक महान खिलाड़ी नहीं थे, बल्कि करोड़ों भारतीयों, विशेषकर उत्तराखंड के युवाओं के लिए प्रेरणा, आत्मविश्वास और राष्ट्रगौरव के प्रतीक थे।

उत्तराखंड की वीरभूमि में जन्मे जसपाल राणा ने बचपन से ही असाधारण प्रतिभा का परिचय देना प्रारंभकर दिया था। उनके जीवन में अनुशासन, साधना और लक्ष्य के प्रति समर्पण प्रारंभ से ही दिखाई देता था। सीमित संसाधनों और चुनौतियों के बीच उन्होंने जो उपलब्धियाँ प्राप्त कीं, वे किसी भी युवा के लिए प्रेरणादायी हैं। उन्होंने यह सिद्ध किया कि यदि मन में संकल्प हो और परिश्रम निरंतर हो, तो पर्वत जैसी बाधाएँ भी मार्ग नहीं रोक सकतीं। भारतीय खेल जगत में एक समय ऐसा था जब निशानेबाजी को बहुत अधिक लोकप्रियता प्राप्त नहीं थी। किंतु जसपाल राणा ने अपने अद्वितीय प्रदर्शन से इस खेल को नई पहचान दिलाई। एशियाई खेलों, राष्ट्रमंडल खेलों और अनेक अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में उन्होंने भारत के लिए स्वर्ण, रजत और कांस्य पदकों की झड़ी लगा दी। जब भी वे निशाना साधते थे, करोड़ों भारतीयों की उम्मीदें उनके साथ होती थीं और जब लक्ष्य भेदते थे तो तिरंगा गर्व से लहराता था।
उनकी सफलता का रहस्य केवल उनकी तकनीकी दक्षता नहीं था, बल्कि उनका मानसिक संतुलन, आत्मविश्वास और राष्ट्र के के प्रति समर्पण था। निशानेबाजी ऐसा खेल है जिसमें शरीर से अधिक मन की स्थिरता की आवश्यकता होती है। जसपाल राणा ने इस क्षेत्र में जो ऊँचाइयाँ प्राप्त कीं, वे उनकी साधना और तपस्या का परिणाम थीं।
उत्तराखंड की जनता ने जसपाल राणा को केवल एक खिलाड़ी के रूप में नहीं देखा, बल्कि अपने घर-परिवार के सदस्य की तरह अपनाया। उनकी उपलब्धियों में पूरे प्रदेश ने अपना गौरव देखा। जब वे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत का नाम रोशन कर रहे थे, तब उत्तराखंड के गाँव-गाँव में उनके चर्चे होते थे। विद्यालयों, युवाओं और खेल प्रेमियों के बीच उनका नाम प्रेरणा का पर्याय बन चुका था।
उनकी लोकप्रियता का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि उत्तराखंड के लोकजीवन और लोकसंगीत में भी उनका नाम सम्मानपूर्वक गूंजने लगा। प्रसिद्ध लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी ने उनकी अद्भुत निशानेबाजी और उपलब्धियों को अपने लोकस्वर में अभिव्यक्ति देते हुए गाया-
"बंदूक्या जसपाल राणा सिस्त शादी दे, निशाणु शादी दे।
उत्तराखंड म बाघ लग्यो, बाघ मारी दे।"
यह पंक्तियां उसे समय की है जब उत्तराखंड के गांव-गांव में बाग का बहुत डर था।
इन पंक्तियों में केवल एक खिलाड़ी की प्रशंसा नहीं, बल्कि पूरे उत्तराखंड के हृदय की भावना अभिव्यक्त होती है। यह उस गर्व, आत्मविश्वास और विश्वास का प्रतीक है जो प्रदेशवासियों को अपने इस वीर पुत्र पर था। किसी खिलाड़ी के लिए इससे बड़ा सम्मान क्या हो सकता है कि उसकी उपलब्धियाँ लोकगीतों में स्थान प्राप्त कर लें और जन-जन के कंठ में गूंजने लगें।
जसपाल राणा का जीवन केवल पदकों तक सीमित नहीं था। खेल जीवन के पश्चात उन्होंने प्रशिक्षक और मार्गदर्शक की भूमिका में भी भारतीय निशानेबाजी को नई दिशा प्रदान की। उन्होंने अनेक युवा खिलाड़ियों को तैयार किया, उनमें आत्मविश्वास जगाया और उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके मार्गदर्शन में तैयार हुई नई पीढ़ी भारतीय खेल जगत में आज भी उनकी विरासत को आगे बढ़ा रही है।
उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता उनकी विनम्रता थी। अपार सफलता प्राप्त करने के बाद भी वे सदैव सरल, सहज और अपनी मिट्टी से जुड़े रहे। उत्तराखंड की संस्कृति, सादगी और संघर्षशीलता उनके व्यक्तित्व में स्पष्ट झलकती थी। यही कारण है कि वे केवल खेल प्रेमियों के ही नहीं, बल्कि समाज के हर वर्ग के प्रिय बने रहे। उत्तराखंड के अनेक युवाओं के लिए जसपाल राणा वह नाम थे जिन्होंने यह विश्वास जगाया कि पहाड़ों की धरती से निकलकर भी विश्व मंच पर विजय प्राप्त की जा सकती है। उन्होंने युवाओं को यह सिखाया कि सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं होता; उसके लिए तप, त्याग, अनुशासन और निरंतर अभ्यास आवश्यक है।
आज जब हम उनके जीवन को स्मरण करते हैं, तो केवल एक महान निशानेबाज की उपलब्धियाँ ही नहीं, बल्कि एक ऐसे राष्ट्रभक्त व्यक्तित्व का दर्शन करते हैं जिसने अपने जीवन को भारत माता की सेवा के लिए समर्पित कर दिया। उनकी प्रत्येक उपलब्धि भारत के सम्मान की उपलब्धि थी। उनकी प्रत्येक सफलता करोड़ों भारतीयों के चेहरे पर मुस्कान और गर्व लेकर आती थी।
जसपाल राणा उत्तराखंड की उस महान परंपरा के प्रतिनिधि थे जिसने देश को सैनिक, संत, समाजसेवी, साहित्यकार और खिलाड़ी दिए हैं। उन्होंने सिद्ध किया कि देवभूमि केवल आध्यात्मिक चेतना की भूमि ही नहीं, बल्कि प्रतिभा, परिश्रम और राष्ट्रसेवा की भी भूमि है।
आज भी जब भारतीय खेलों की गौरवगाथा लिखी जाएगी, तब जसपाल राणा का नाम सम्मानपूर्वक लिया जाएगा। उनके पदक, उनके रिकॉर्ड, उनके द्वारा तैयार किए गए खिलाड़ी और उनके प्रति समाज का प्रेम-ये सभी उनकी अमर विरासत के रूप में सदैव जीवित रहेंगे।
देवभूमि उत्तराखंड का यह अमर लाल, भारतीय खेल जगत का यह उज्ज्वल नक्षत्र और राष्ट्रगौरव का यह प्रतीक आने वाली पीढ़ियों को सदैव प्रेरणा देता रहेगा।
जसपाल राणा केवल एक खिलाड़ी नहीं थे; वे एक भावना थे, एक प्रेरणा थे, एक विश्वास थे और भारत के गौरवशाली भविष्य का जीवंत प्रतीक थे।
भारत माता के इस महान सपूत को शत-शत नमन।

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