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दबाव की राजनीति और संस्थाओं की अग्निपरीक्षा

The Politics of Pressure and the Trial by Fire for Institutions


नीलाभ कृष्ण


दिल्ली की सड़कों पर ‘वोट चोरी’ के नारे लगाना, चुनाव आयोग को कठघरे में खड़ा करना, मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग करना और फिर सुप्रीम कोर्ट की ओर मार्च निकालना—राहुल गांधी और विपक्ष की राजनीति अब एक ऐसे मोड़ पर दिखाई देती है, जहां सवाल सिर्फ चुनावी आरोपों का नहीं, बल्कि संवैधानिक संस्थाओं के प्रति राजनीतिक रवैये का भी है। जब चुनाव आयोग से मनमाफिक जवाब नहीं मिलता, तो लड़ाई अदालत के दरवाजे तक पहुंच जाती है। जब अदालत तय प्रक्रिया से चलने की बात करती है, तो उसके फैसले और उसके कामकाज को भी राजनीतिक टकराव के दायरे में खींचने की कोशिश होती है। आखिर यह कैसी राजनीति है, जिसमें हर संस्था तभी तक निष्पक्ष मानी जाती है, जब तक वह विपक्ष की मांग के मुताबिक काम करे?

लोकतंत्र में सरकार से सवाल पूछना जरूरी है, चुनाव आयोग की जवाबदेही मांगना जरूरी है और न्यायपालिका के सामने अपनी शिकायत रखना भी जरूरी है। लेकिन इन अधिकारों का मतलब यह नहीं कि किसी संस्था पर आरोप लगाकर उसे राजनीतिक कटघरे में खड़ा कर दिया जाए और फिर सड़क पर ताकत दिखाकर उससे मनचाहा फैसला लेने की अपेक्षा की जाए। लोकतंत्र संविधान से चलता है, किसी नेता की जिद से नहीं। यहां आरोपों की आवाज कितनी ऊंची है, इससे ज्यादा जरूरी यह है कि उनके पीछे सबूत कितने मजबूत हैं। यही कसौटी राहुल गांधी पर भी लागू होती है और उन तमाम विपक्षी नेताओं पर भी, जो ‘वोट चोरी’ के नाम पर राजनीतिक अभियान चला रहे हैं।

‘वोट चोरी’ का शोर और सबूतों का सवाल

राहुल गांधी और विपक्षी दलों ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR पर सवाल उठाए हैं। उनका दावा है कि चुनावी प्रक्रिया में गड़बड़ियां हुई हैं और मतदाता सूची में बदलाव से लोगों के मतदान के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। अगर किसी पात्र मतदाता का नाम गलत तरीके से हटाया गया है, तो यह गंभीर मामला है। अगर चुनाव आयोग के किसी अधिकारी ने नियमों का उल्लंघन किया है, तो उसकी जांच होनी चाहिए। लेकिन सवाल यह है कि क्या इन आरोपों को प्रमाणित करने के लिए उतनी ही गंभीरता दिखाई जा रही है, जितनी गंभीरता से इन्हें राजनीतिक मंचों पर उछाला जा रहा है?

‘वोट चोरी’ जैसे आरोप कोई मामूली राजनीतिक जुमला नहीं हैं। इनका सीधा संबंध चुनाव की विश्वसनीयता और करोड़ों मतदाताओं के विश्वास से है। ऐसे आरोप लगाने वाले नेताओं की जिम्मेदारी है कि वे स्पष्ट करें कि कथित गड़बड़ी कहां हुई, किस नियम का उल्लंघन हुआ, कौन-से मतदाता प्रभावित हुए और उनके दावों की पुष्टि करने वाले दस्तावेज कहां हैं। केवल भाषणों, सोशल मीडिया पोस्ट और बार-बार दोहराए गए आरोपों के आधार पर किसी संवैधानिक संस्था को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

मतदाता सूची का पुनरीक्षण अपने आप में कोई अपराध नहीं है। मृत मतदाताओं के नाम हटाना, दोहरी प्रविष्टियों की पहचान करना और स्थायी रूप से स्थान बदल चुके मतदाताओं के रिकॉर्ड को दुरुस्त करना चुनावी व्यवस्था की जरूरत है। लेकिन इस प्रक्रिया में किसी पात्र मतदाता का नाम गलत तरीके से हटना भी स्वीकार नहीं किया जा सकता। इसलिए चुनाव आयोग को पारदर्शिता बरतनी चाहिए और विपक्ष को वास्तविक अनियमितताओं के प्रमाण सामने रखने चाहिए। यही लोकतांत्रिक जवाबदेही है।

लेकिन यदि हर प्रशासनिक प्रक्रिया को पहले से ही साजिश मान लिया जाए, हर स्पष्टीकरण को खारिज कर दिया जाए और हर असहमति को चुनावी बेईमानी का प्रमाण बताया जाए, तो फिर जांच का रास्ता बचेगा ही कहां? क्या विपक्ष का काम सिर्फ आरोप लगाना है, या आरोपों को साबित करना भी उसकी जिम्मेदारी है? लोकतंत्र में किसी दावे की सच्चाई उसके प्रचार से तय नहीं होती। उसके लिए प्रमाण चाहिए, जांच चाहिए और निष्पक्ष निष्कर्ष चाहिए।

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग भी इसी संदर्भ में देखी जानी चाहिए। किसी अधिकारी से जवाब मांगना एक बात है, लेकिन आरोपों का न्यायिक परीक्षण पूरा होने से पहले ही उसे दोषी मानकर पद छोड़ने की मांग करना दूसरी बात। यदि विपक्ष के पास ठोस सबूत हैं, तो उन्हें संबंधित कानूनी प्रक्रिया के तहत सामने रखना चाहिए। संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों की जवाबदेही जरूरी है, लेकिन उन्हें राजनीतिक दबाव के आगे झुकाना जवाबदेही नहीं कहलाता।

जब सुप्रीम कोर्ट भी राजनीतिक प्रदर्शन का मंच बनने लगे

12 अक्टूबर 2026 को राहुल गांधी और विपक्षी नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट की ओर मार्च किया। इससे पहले राहुल गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत से मुलाकात का समय मांगा था। उनकी मांग स्वीकार नहीं की गई। मुख्य न्यायाधीश की ओर से यह बात सामने आई कि संबंधित मुद्दे अदालत के समक्ष विचाराधीन हैं और उन्हें निर्धारित न्यायिक प्रक्रिया के जरिए उठाया जाना चाहिए।

यहां एक सीधा सवाल है: जब अदालत ने कानूनी प्रक्रिया अपनाने का रास्ता बताया, तो फिर राजनीतिक मार्च की जरूरत क्यों पड़ी? क्या याचिका दाखिल करके, दस्तावेज प्रस्तुत करके और कानूनी दलीलें रखकर न्याय नहीं मांगा जा सकता था? क्या न्याय पाने के लिए अदालत के बाहर राजनीतिक शक्ति का प्रदर्शन जरूरी है? और यदि किसी आम नागरिक को यही सुविधा नहीं मिलती, तो क्या किसी बड़े राजनीतिक नेता को अपनी हैसियत के कारण अलग रास्ता मिलना चाहिए?

मुख्य न्यायाधीश का किसी राजनीतिक नेता से प्रशासनिक मुलाकात न करना न्याय से इनकार नहीं है। अदालत का काम किसी नेता की मांग पर तत्काल राजनीतिक प्रतिक्रिया देना नहीं, बल्कि कानून के अनुसार मामलों का निपटारा करना है। यदि कोई मामला विचाराधीन है, तो उसे उचित प्रक्रिया के तहत उठाना ही न्यायिक मर्यादा है। अदालत में किसे, कब और किस तरीके से सुना जाए, इसका निर्धारण कानून और न्यायिक प्रक्रिया से होना चाहिए, न कि किसी नेता की राजनीतिक सुविधा से।

यहीं से असली चिंता शुरू होती है। चुनाव आयोग के खिलाफ राजनीतिक अभियान चलाना विपक्ष का अधिकार है। लेकिन जब मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचता है, तो वहां भी क्या वही राजनीतिक शैली अपनाई जाएगी? क्या न्यायपालिका से भी तत्काल वही प्रतिक्रिया मांगी जाएगी, जो विपक्ष अपने राजनीतिक मंचों पर चाहता है? यदि अदालत निर्धारित प्रक्रिया पर जोर दे, तो क्या उसे भी राजनीतिक असहमति का निशाना बनाया जाएगा?

शांतिपूर्ण प्रदर्शन अपने आप में गलत नहीं है। किसी मार्च में शामिल होने भर से किसी नेता को अराजक या दोषी करार नहीं दिया जा सकता। लेकिन विचाराधीन मामलों के बीच न्यायिक संस्थान के आसपास दबाव बनाने की कोशिश गंभीर सवाल जरूर खड़े करती है। अदालत कोई राजनीतिक मुख्यालय नहीं है, जहां समर्थकों की भीड़ और नारों की गूंज के आधार पर फैसले लिए जाएं। न्यायपालिका की ताकत उसकी स्वतंत्रता है, न कि किसी राजनीतिक दल की स्वीकृति।

15 अक्टूबर को इस मामले में नया मोड़ आया, जब मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने मार्च से जुड़े मामले में राहुल गांधी, अखिलेश यादव और अन्य विपक्षी नेताओं को नोटिस जारी किए। अदालत ने न्यायपालिका पर दबाव डालने या उसे डराने की कोशिशों को लेकर भी सख्त रुख जताया। दूसरी ओर, SIR से संबंधित अलग याचिका पर चुनाव आयोग और उसके अधिकारियों से जवाब मांगा गया। दोनों घटनाएं एक महत्वपूर्ण बात स्पष्ट करती हैं: अदालत चुनावी आरोपों की जांच भी कर सकती है और न्यायिक प्रक्रिया से जुड़े आचरण पर सवाल भी उठा सकती है।

नोटिस जारी होना दोष सिद्ध होना नहीं है। इसी तरह, चुनाव आयोग से जवाब मांगना विपक्ष के आरोपों को सही ठहरा देना भी नहीं है। अंतिम निष्कर्ष तथ्यों, दस्तावेजों और कानून के आधार पर ही निकलेगा। यही वह बुनियादी सिद्धांत है, जिसे राजनीतिक शोर के बीच भूलना नहीं चाहिए।

हर संस्था को अविश्वास के कटघरे में खड़ा करने का खेल

राहुल गांधी की राजनीति पर सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या संस्थाओं से असहमति जताने और उनकी विश्वसनीयता को लगातार संदेह के घेरे में रखने के बीच कोई सीमा बची है? यदि चुनाव आयोग पर आरोप लगते हैं, तो उसे जवाब देना चाहिए। यदि अदालत में मामला जाता है, तो अदालत को उसकी सुनवाई करनी चाहिए। लेकिन क्या हर प्रक्रिया का निष्कर्ष पहले से तय करके चलना उचित है? क्या विपक्ष केवल उसी नतीजे को स्वीकार करेगा, जो उसकी राजनीतिक मांगों के अनुरूप हो?

संस्थाओं की आलोचना लोकतंत्र को मजबूत कर सकती है, बशर्ते वह तथ्यों पर आधारित हो। लेकिन यदि किसी संस्था को बिना पर्याप्त प्रमाण के लगातार पक्षपाती बताकर जनता का भरोसा कमजोर किया जाए, तो नुकसान केवल उस संस्था का नहीं होता। इससे पूरी संवैधानिक व्यवस्था की विश्वसनीयता प्रभावित होती है। चुनाव आयोग पर जनता का भरोसा कमजोर होगा, तो चुनावी नतीजों पर संदेह बढ़ेगा। न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर अनावश्यक राजनीतिक दबाव पड़ेगा, तो न्यायिक प्रक्रिया को लेकर भी भ्रम पैदा होगा।

इसका अर्थ यह नहीं कि संस्थाओं को आलोचना से छूट मिलनी चाहिए। उलटे, चुनाव आयोग और न्यायपालिका सहित हर संवैधानिक संस्था को अपने अधिकारों का इस्तेमाल कानून के अनुसार करना चाहिए। लेकिन आलोचना और संस्थागत अविश्वास फैलाने के बीच फर्क बनाए रखना जरूरी है। किसी फैसले में खामी बताना और पूरी संस्था को ही अवैध ठहराना एक बात नहीं है।

सोशल मीडिया के दौर में किसी आरोप को वायरल करना बेहद आसान है। लेकिन वायरल संदेश प्रमाण नहीं होता। राजनीतिक भाषण न्यायिक साक्ष्य नहीं होता। किसी दावे को हजार बार दोहराने से वह सच नहीं बन जाता। यदि ‘वोट चोरी’ हुई है, तो उसका प्रमाण सामने आना चाहिए। यदि नहीं हुई, तो केवल राजनीतिक शोर से चुनावी प्रक्रिया को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। देश को नारों से ज्यादा तथ्यों की जरूरत है।

विरोध का अधिकार, संविधान से ऊपर होने का दावा नहीं

भारत का लोकतांत्रिक इतिहास आंदोलनों और विरोध प्रदर्शनों से भरा है। कई बार जनता के आंदोलनों ने अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई और व्यवस्था में सुधार का रास्ता खोला। इसलिए हर प्रदर्शन को अराजकता कहना गलत होगा। शांतिपूर्ण विरोध नागरिकों का अधिकार है और विपक्ष को सरकार तथा संवैधानिक संस्थाओं से सवाल पूछने की पूरी स्वतंत्रता है।

लेकिन अधिकारों के साथ जिम्मेदारियां भी आती हैं। विरोध का अधिकार कानून से ऊपर होने का लाइसेंस नहीं है। किसी अदालत के बाहर भीड़ जुटाकर न्यायिक प्रक्रिया को अपनी मांग के अनुरूप मोड़ने का अधिकार किसी राजनीतिक दल को नहीं मिल जाता। न्यायालयों को स्वतंत्र वातावरण में काम करने देना जरूरी है। यदि हर दल यह मानने लगे कि सड़क पर ताकत दिखाकर अदालत से मनचाहा व्यवहार कराया जा सकता है, तो कल कोई भी राजनीतिक संगठन यही रास्ता अपना सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने मार्च से संबंधित मामले में CCTV फुटेज और डिजिटल साक्ष्य सुरक्षित रखने के निर्देश भी दिए। अब इस घटनाक्रम से जुड़े सवालों का उत्तर जांच और कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से ही सामने आना चाहिए। किसी को समय से पहले दोषी ठहराना गलत होगा, लेकिन न्यायिक संस्थाओं की गरिमा और स्वतंत्रता से जुड़े सवालों को केवल राजनीतिक विरोध बताकर टालना भी उचित नहीं है।

राहुल गांधी और विपक्ष को यह समझना होगा कि लोकतंत्र में अधिकारों का इस्तेमाल संवैधानिक मर्यादाओं के भीतर ही सार्थक है। चुनाव आयोग से सवाल पूछिए, अदालत में जाइए, दस्तावेज रखिए और न्याय मांगिए। लेकिन संस्थाओं को अपनी राजनीतिक लड़ाई का अखाड़ा बनाने से बचिए। यही जिम्मेदार विपक्ष की पहचान होनी चाहिए।

लोकतंत्र की कसौटी: सबूत या सिर्फ शोर?

इस पूरे विवाद में फैसला किसी राजनीतिक दल की इच्छा से नहीं होना चाहिए। यदि SIR के दौरान पात्र मतदाताओं के नाम गलत तरीके से हटाए गए हैं, तो उन्हें न्याय मिलना चाहिए। यदि चुनाव आयोग ने नियमों का उल्लंघन किया है, तो उसकी जवाबदेही तय होनी चाहिए। लेकिन यदि आरोप प्रमाणित नहीं होते, तो उन्हें बार-बार दोहराकर सच नहीं बनाया जा सकता। यही कसौटी मार्च से जुड़े मामले पर भी लागू होनी चाहिए।

भारत का संविधान न सरकार को मनमानी की छूट देता है, न विपक्ष को संस्थाओं पर दबाव बनाने का विशेषाधिकार। चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट किसी राजनीतिक दल की संपत्ति नहीं हैं। वे देश की संवैधानिक व्यवस्था के अंग हैं और उनकी स्वतंत्रता का सम्मान हर दल की जिम्मेदारी है।

आज जरूरत इस बात की है कि राजनीतिक बहस को नारों से निकालकर प्रमाणों के धरातल पर लाया जाए। आरोप लगाइए, लेकिन उन्हें साबित भी कीजिए। संस्थाओं से सवाल पूछिए, लेकिन उनकी प्रक्रिया का सम्मान भी कीजिए। न्याय मांगिए, लेकिन न्यायपालिका को राजनीतिक दबाव के आगे झुकाने की कोशिश मत कीजिए।

क्योंकि लोकतंत्र में सबसे खतरनाक स्थिति वह नहीं, जब संस्थाओं से सवाल पूछे जाते हैं; बल्कि वह है, जब किसी संस्था को तभी सही माना जाए, जब उसका फैसला राजनीतिक अपेक्षाओं के मुताबिक हो। भारत का लोकतंत्र किसी नेता के दावों, किसी पार्टी के नारों या सड़क पर जुटी भीड़ से नहीं चलेगा। वह संविधान, कानून, प्रमाण और निष्पक्ष न्याय से चलेगा। और यही संदेश हर राजनीतिक दल को समझना होगा: संवैधानिक संस्थाएं सवालों से ऊपर नहीं हैं, लेकिन कोई राजनीतिक नेता भी संविधान से ऊपर नहीं है।


(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)

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