भारतीयता आखिर है क्या? भारतीयता की अवधारणा को भौगोलिक सीमाओं वाले भारत में रहने वाले लोग ही नहीं, बल्कि भारतीय उपमहाद्वीप का हर निवासी समझता है। बहुत कम लोग ऐसे हैं, जो अपने हृदय और मस्तिष्क में स्थित भारतीयता की अवधारणा को शाब्दिक रूप से सहजता से अभिव्यक्त कर सकें। लेकिन जब भी भारतीयता की चर्चा होती है, तब इसकी अवधारणा को भाषायी बंधन में भी अभिव्यक्त करने की कोशिश होती है। आखिर भारतीयता है क्या, इस प्रश्न के सहज जवाब में हिंदी के सुप्रसिद्ध कवि और लेखक सच्चिदानंद हीरालाल वात्स्यायन अज्ञेय का एक कथन याद आता है। अपने एक निबंध में वे कहते हैं, “भारत की आत्मा सनातन है, भारतीयता केवल एक भौगोलिक परिवृत्ति की छाप ही नहीं, एक विशिष्ट आध्यात्मिक गुण है, जो भारतीय को सारे संसार से पृथक करता है। भारतीयता मानवीयता का निचोड़ है, उस की हृदय मणि है, उस का शिर सावतंस है, उस के नाक का बेसर है ..”
आम तौर पर भारतीयता को आज के दौर में संकुचित किए गए हिंदुत्व की अवधारणा से जोड़ दिया जाता है। लेकिन भारतीयता प्रचलित वामपंथी सोच वाली हिंदुत्व की अवधारणा की सीमाओं में समाहित नहीं होती। बल्कि उससे आगे की सोच बनकर उभरती है। भारतीयता की इस प्रवृत्ति को स्वामी विवेकानंद और महर्षि अरविंद कहीं ज्यादा सहजता से पारिभाषित कर देते हैं। जब स्वामी विवेकानंद कहते हैं कि भारतीयता, आध्यात्मिक तरंगों से ओतप्रोत है, या फिर जब महर्षि अरविंद कहते हैं कि भारतीयता का प्राण, आस्था और भाव धर्म है तो वे एक तरह से भारतीयता को सहज रूप से शाब्दिक मूर्तन कर रहे होते हैं। मोटे तौर पर कह सकते हैं कि भारतीयता, उस भूमि की सहज धारणा है, जहां सिर्फ मनुष्य ही नहीं, प्रकृति के तमाम तत्वों, उसमें समाहित जीव- जंतु, पेड़-पौधे, नदी – समुद्र, पोखर-तालाब आदि आदि को लेकर आध्यात्मिक और विशिष्ट भाव रखता है। भारतीयता चराचर और भौतिक ही नहीं, आध्यात्मिक जगत तक को लेकर एक विशिष्ट भाव और सोच रखती है। आधुनिकता के साथ इसमें एक और भाव जुड़ गया है, राष्ट्र प्रथम। राष्ट्रीयता का यह भाव आज की भारतीयता का केंद्रीय तत्व है। अयं निज: परोवेति यानी यह मेरा और वह तुम्हारा है का भाव भारतीयता का केंद्रीय तत्व नहीं है। लेकिन राष्ट्र प्रथम की अवधारणा के साथ यह भाव भी किंचित रूप से भारतीयता में समाहित हो गया है। कह सकते हैं कि आधुनिक भारतीयता की अवधारणा की केंद्रीय धुरी राष्ट्र प्रथम की सोच है और भारतीयता के सारे पारंपरिक तत्व उसके ही इर्द-गिर्द घूमते हैं।
नरेंद्र मोदी के भारतीय राजनीति में उभार के पहले तक भारतीयता की अवधारणा की यह केंद्रीय सोच ही सिरे से नदारद थी। चूंकि स्वाधीन भारत की राजनीति की धुरी में जो शख्सियतें काबिज रहीं, उनकी सोच उस आधुनिकता से प्रभावित रहीं, जिनकी केंद्रीय धुरी पश्चिम की भौतिकवादी चिंतन धारा है। स्वाधीन भारत की राजनीति की केंद्रीय धुरी में कुछ एक अपवादों को छोड़ दें तो सिर्फ और सिर्फ पश्चिमोन्मुखी वैचारिकी का ही प्रभाव ज्यादा रहा। उनकी नजर में आधुनिकता मौजूदा दौर की जरूरत रही। आधुनिकता को मौजूदा दौर की जरूरत होने से शायद ही कोई इनकार करे। लेकिन उस आधुनिकता का स्वरूप और वैचारिक आधार क्या हो? इस पर विमर्श की गुंजाइश थी। लेकिन इस विमर्श को ही स्वाधीन भारत की राजनीति ने हर पायदान पर नकारा। उसकी नजर में आधुनिकता वही थी, जिसे पश्चिमी वैचारिक दर्शन आधुनिक मानता रहा। चूंकि पश्चिमी दर्शन में भारतीयता की पारंपरिक सोच की कोई गुंजाइश ही नहीं थी, इसलिए हमारी राजनीति ने आधुनिकता के नाम पर पारंपरिक भारतीय प्रतीकों तक को दकियानूसी मान लिया और उसे कुरीति मानते हुए नकार दिया।
इसी दौर में सेकुलर सोच को हवा मिली। सेकुलरवाद अपने आप में बेहतर दर्शन हो सकता है। राज्य के लिहाज से वह तार्किक हो भी सकता है। लेकिन भारत के संदर्भ में वह तार्किक से कहीं ज्यादा हिंदुत्व या सनातन विरोधी विचार के रूप में उभरा। कालातंर में सेकुलरवाद को लेकर सोच इस तरह हावी हुई कि अल्पसंख्यक समुदाय को संरक्षण देने के नाम पर मुस्लिम तुष्टिकरण की सोच सेकुलरवाद का पर्याय मान ली गई। हिंदुत्व चूंकि तुष्टिकरण के ठीक विपरीत छोर पर था, इसलिए सेकुलरवाद हिंदुत्व के विरोध का एक तरह से प्रतीक बन गया। सेकुलरवाद का यह रूप स्वीकार्य हो सकता था, बशर्तें वह बाकी धर्मों और धार्मिक विचारधाराओं के प्रति भी ठीक वैसा ही रूप रखता, जैसा हिंदुत्व विरोध के नाम पर रखता रहा। राजनीति भी अगर सेकुलरवाद के बहाने हर धर्म के प्रति एक जैसा विरोधी भाव भी रख रही होती तो वह भी स्वीकार्य हो सकता था। लेकिन राजनीति ने ऐसा नहीं किया। विशेषकर कांग्रेसी, समाजवादी और वामपंथी राजनीति ने सेकुलरवाद का नया रूप ही गढ़ दिया। जिसके दायरे में मुस्लिम तुष्टिकरण आता है, उनके धार्मिक प्रतीकों का सार्वजनिक प्रदर्शन भी आता है,और हिंदुत्व का खुला विरोध भी होता है।
सेकुलरवाद की यह सोच भारतीयता की उस अवधारणा के ठीक उलट रही, जिसे अपने-अपने ढंग से कभी विवेकानंद तो कभी गांधी तो कभी महर्षि अरविंद तो कभी अज्ञेय पारिभाषित करते हैं। भारतीयता की विशिष्टता का एक और महत्वपूर्ण अंग है, उसका प्रकृति का संस्कृति से मिलन। भारतीयता की अवधारणा में प्रकृति और संस्कृति एक-दूसरे के सहयोगी और संपूरक- दोनों हैं। लेकिन सेकुलरवाद की धारणा प्रकृति की भले ही आधुनिक अर्थों में जितनी भी पूजक हो, संस्कृति की भारतीय अवधारणा को खारिज करती है। बहुसंख्यक, जिन्हें आधुनिक संदर्भों में हिंदू के नाम से जाना जाता है, आखिर कब तक स्वयं को खारिज किया जाना बर्दाश्त करता। सेकुलरवाद ने हिंदुत्ववादी दर्शन और सोच को ही खारिज नहीं किया, उसकी वैचारिकी को भी दकियानूस और परिवर्तनरोधी तक घोषित कर दिया।
यहीं पर याद आती है भारतीय जनता पार्टी। अपने पूर्ववर्ती रूप भारतीय जनसंघ के जमाने से ही भाजपा ने कभी आधुनिकता को नहीं नकारा, लेकिन आधुनिकता के नाम पर हिंदुत्व और भारतीयता विरोधी सेकुलरवादी सोच को स्वीकार नहीं किया। इसकी वजह से वह अरसे तक भारतीय राजनीति में अछूत बनी रही। समाजवाद के प्रखर पैरोकार डॉक्टर राममनोहर लोहिया ने 1963 में गैर कांग्रेसवाद की सैद्धांतिकी गढ़ी। गैर कांग्रेसवाद की छतरी के नीचे जनसंघ भी आया। 1963 के संसदीय उपचुनावों से लेकर 1967 के चुनावों से होते हुए 1970-71 तक जनसंघ का साथ समाजवादी धारा की राजनीति ने लिया। इंदिरा गांधी द्वारा थोपे गए आपातकाल के बाद भी जनसंघ गैर कांग्रेसी राजनीतिक धारा के साथ आया। बाद में जनसंघ भाजपा के रूप में सामने आया और उसका साथ 1989 के चुनावों में भी गैर कांग्रेसी राजनीति ने लिया। लेकिन ये सारा साथ सिर्फ और सिर्फ राजनीतिक रहा। इसके जरिए राजनीतिक हित ही साधने की कोशिश हुई। भारतीयता के राजनीतिक चिंतन को नहीं स्वीकार किया गया। इसका असर यह हुआ कि 1998 और 1999 के आम चुनावों में भाजपा की अगुआई में सरकारें तो बनीं, लेकिन सेकुलरवादी राजनीति के दबाव में भारतीयता की राजनीति और सोच कहीं किनारे दबी रही।
लेकिन 2014 में भारत की केंद्रीय राजनीति में नरेंद्र मोदी का उभार हुआ तो जैसे भारतीयता को सही अर्थों में संजीवनी मिली। भारतीयता की सोच राजनीति और प्रशासन में हावी हुई। अतीत की राजनीति में भारतीयता का मूल तत्व धर्म अलग-थलग रहा। लेकिन नरेंद्र मोदी ने इसे राजनीति के केंद्र में स्थापित कर दिया। वाराणसी से पर्चा दाखिले के बाद अपने पहले भी भाषण में नरेंद्र मोदी ने जो कहा, वह एक तरह से उनकी भावी राजनीति का परिचय रहा। मोदी ने महामना मालवीय की मूर्ति पर फूल चढ़ाने के बाद कहा था, ‘मुझे गंगा मां ने बुलाया है।’ अतीत की राजनीति के प्रमुख तत्वों की निजी जिंदगी में गंगा भले ही मां रही हो, लेकिन सेकुलरवाद के दबाव के चलते उनकी सार्वजनिक अभिव्यक्ति में गंगा महज एक नदी रही, पानी की एक धारा। पानी भी जीवंत नहीं, सिर्फ एक तत्व। गंगा को सार्वजनिक रूप से मां के रूप में अभिव्यक्त करके मोदी ने भारतीयता की अवधारणा को ही स्थापित किया। मोदी के पहले तक संसद में राम का नाम भारतीयता के प्रतीक के रूप में नहीं लिया जाता था। बाबरी ध्वंस के बाद हुए संसद के अधिवेशन में राजनीति की हर धारा सिर्फ अफसोस ही जता रही थी। अफसोस की वजह सेकुलरवाद की वैचारिकी का दबाव रहा। लेकिन नरेंद्र मोदी संसद में खुलेआम राम का नाम लेते हैं। आजादी के बाद बेशक सरदार पटेल की पहल पर सोमनाथ मंदिर का उद्धार हुआ था। मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम में तत्कालीन राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद शामिल हुए थे। तब तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने इसका विरोध किया था। वह विरोध आधुनिक राष्ट्र-राज्य की अवधारणा के कथित मूल बिंदु सेकुलरवाद के दबाव के कारण था। राजेंद्र प्रसाद का कदम भारतीयता के सर्वथा अनुकूल था, लेकिन नेहरूवादी विरोध के चलते यह भारतीय राजनीति की प्रमुख धुरी नहीं बन पाया। नरेंद्र मोदी ने इस सोच को ही अब ध्वस्त कर दिया है। राम भारतीयता की सोच की धुरी हैं। उन्हीं राम का अयोध्या में मंदिर जब बनकर तैयार हो गया तो मोदी ने 22 जनवरी 2024 को उसके प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम में पूरी श्रद्धा से शामिल हुए। इसके पहले पांच अगस्त 2020 को राममंदिर के शिलान्यास में भी संकल्प करने से मोदी नहीं हिचके।
29 सितंबर 2016 को पाकिस्तान स्थित आतंकी कैंपों पर हुई भारतीय सेना की सर्जिकल स्ट्राइक किया था। उसके ठीक एक दिन पहले प्रयाग में संगम पर मोदी ने सार्वजनिक स्नान किया। ना सिर्फ स्नान किया, बल्कि धार्मिक रीति-रिवाज से सूर्य को अर्घ्य भी दिया। वाराणसी का काशीविश्वनाथ मंदिर हो या फिर नेपाल का पशुपति नाथ मंदिर, हर बार मोदी ने बाकायदा कैमरे के सामने पूजा की। मोदी ने अपने हर कदम से भारतीयता को प्रतिष्ठापित किया। धर्म भारतीयता की धुरी है, इसी धर्म का अनुपालन बतौर राजनेता करने में मोदी कभी नहीं हिचके।
प्रधानमंत्री बनते ही भारतीयता के एक और प्रतीक योग अगर वैश्विक स्तर पर प्रतिष्ठित हुआ तो इसकी बड़ी वजह मोदी ही रहे। 21 जून को पूरी दुनिया अंतरराष्ट्रीय स्तर पर योग दिवस मनाने लगी है। भारतीयता का एक और प्रतिष्ठित प्रतीक है आयुर्वेद। भारतीय आयुर्वेद की अब वैश्विक स्तर पर प्रतिष्ठा मोदी के कार्यकाल में ही बढ़ी। मोटे अनाज भारतीय जीवन शैली के अंग हैं। वैश्विक स्तर पर मोटे अनाजों का प्रयोग अगर बढ़ा है तो उसकी बड़ी वजह भी मोदी की ही सोच रही।
पूरी दुनिया हमारा परिवार है, यह भारतीयता की ही सोच है। भारत ने कोरोनारोधी वैक्सीन बनाने में कामयाबी हासिल की। अपनी जनसंख्या को यह वैक्सीन तो दी ही गई, दुनिया के विशेषकर कमजोर मुल्कों को भी मुफ्त में वैक्सीन भेजी गई। इसे दुनिया ने वैक्सीन कूटनीति का नाम दिया, लेकिन असलियत में यह भारतीयता की धारणा का ही विस्तार था, जिसमें पूरी दुनिया को अपना परिवार माना गया है। भारतीय खानपान, भारतीय वेशभूषा और भारतीय सोच अब दुनिया को भी भाने लगी है। यह संभव हुआ है मोदी की भारतीयता केंद्रित राजनीति अपनाने से। मोदी सरकार का दस साल के कार्यकाल के नाम तमाम उपलब्धियां हैं। लेकिन इनमें सबसे प्रमुख है भारतीयता की राजनीति की वापसी। कुछ वैसी ही राजनीति, जैसी चंद्रगुप्त मौर्य की थी, चाणक्य की थी, शिवाजी महाराज की थी।

उमेश चतुर्वेदी
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)
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