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वक्फ को लेकर विवाद की जड़ में ‘एटीएम’ व ‘डीएम’ का पुराना संघर्ष

The old conflict between 'ATM' and 'DM' is at the root of the dispute over Waqf

भारत के मुसलमानों में दो वर्ग हैं , पहला वर्ग उन मुसलमानों का है जिनके वंशज इस मुल्क में हमलावर के रूप में आए थे। यह वर्ग एटीएम (अरब+तुर्क+मुगल) कहलाता है। दूसरा वर्ग उन मुसलमानों का है जो यहीं के लोग हैं लेकिन किन्हीं कारणों से हमलावरों के मजहब में शामिल हो गए थे। उन्हें देसी मुसलमान या डीएम कहा जाता है। इसके बाद ही वक्फ बोर्ड पर हो रहे विवाद को सही सन्दर्भ में समझा जा सकता है। वक्फ अरबी भाषा का शब्द है। इसका अर्थ कोई भी चल या अचल सम्पत्ति अल्लाह को समर्पित कर देना। जाहिर है जब सम्पत्ति अल्लाह को समर्पित कर दी गई है तो उसकी सार संभाल तो इसी संसार के कुछ लोग अल्लाह की तरफ से करेंगे। अल्लाह की तरफ से सार संभाल करने का अधिकार इन ‘कुछ’ लोगों को कौन देता है , यह प्रश्न सदा विवाद का विषय बना रहेगा। अल्लाह को दान की गई इन सम्पत्तियों से जो आमदनी होती है उसका कुछ हिस्सा , इन सम्पत्तियों की सार संभाल करने वाला व्यक्ति अपने मेहनताने के एवज़ में अपने पास भी भी रख सकता है। इसलिए विवाद बढ़ता रहता है। जिसके नियंत्रण में अल्लाह को दी गई यह सम्पत्ति आ जाती है , वह इसे छोड़ना नहीं चाहता। 1947 में अंग्रेज़ों के चले जाने के उपरान्त कांग्रेस ने सरकार बनाई तो उसने 1954 में वक्फ बोर्ड अधिनियम बनाया। सरकार को पता चला की इस देश की जमीन का बड़ा हिस्सा वक्फ में अल्लाह को दिया जा चुका है। कहा जाता है कि रेलवे और रक्षा मंत्रालय के बाद देश की  सबसे ज्यादा जमीन वक्फ के नाम पर अल्लाह को दी जा चुकी है। वक्फ के पास इस समय देश की आठ लाख एकड़ से अधिक जमीन है। बोर्ड की अनुमानित संपत्ति 1.2 लाख करोड़ रुपये है। 2009 में वक्फ बोर्ड के पास कुल 4 लाख एकड़ जमीन थी। इस मसले की जड़ तक जाना जरुरी है कि सम्पत्तियों का लाभ मोटे तौर पर एटीएम उठा रहा है , डीएम को हाशिए पर रखा हुआ है । भारत सरकार ने  इस अन्याय को दूर करने के लिए वक्फ बोर्ड में परिवर्तन किए । इन संशोधनों को भारतीय संसद ने पारित कर दिया । दो अप्रैल 2025 की रात्रि को लोक सभा में बिल के पक्ष में 288 वोट पड़े और उसके विरोध में 232 वोट पड़े । तीन अप्रेल की रात्रि को राज्य सभा में भी यह बिल पारित हो गया । इसके पक्ष हमें 128 और विपक्ष में 95 वोट पड़े । वैसे वक्फ बोर्ड संशोधन अधिनियम बिल को लेकर विपक्षी गठबन्धन भी अंत समय तक एक नहीं रह सका । बीजू जनता दल और जगन मोहन रेड्डी की युवजन श्रमिक रायत कांग्रेस पार्टी  ने अपने सांसदों को बिल का समर्थन करने के लिए व्हिप जारी करने से इन्कार कर दिया और उन्हें अपनी अन्तरात्मा के अनुसार वोट देने की स्वतंत्रता दे दी। जिन विपक्षी दलों ने बिल का विरोध किया उनके भीतर भी असंतोष के स्वर सुने जा सकते थे । वक्फ बोर्ड में हुए संशोधनों को लेकर जो विवाद हो रहा है उसके लिए भारत के इतिहास में थोड़ा पीछे जाना होगा ।

दरअसल इस देश में अरबों , तुर्कों व मुगलों के हमले 712 ई. में शुरू हो गए थे । 1200 ई. तक आते आते उन्होंने देश के एक बडे हिस्से पर कब्जा कर लिया और उसमें से कुछ हिस्सा अलग अलग समय में अल्लाह को भी दे दिया । व्यवहारिक रूप से अल्लाह को देने का मतलब मुल्ला मौलवियों को देना ही था । ये मुल्ला मौलवी इस देश के रहने वाले तो थे नहीं बल्कि ये भी इन्हीं हमलावरों के साथ मध्य एशिया से आए थे । मुगलों ने इनके खाने पीने पीने की व्यवस्था के लिए इन्हें जागीरें देना शुरू कर दिया और उसे मज़हबी रंग देने के लिए वक्फ कहना शुरू कर दिया । दरअसल भारत में वक्फ का उदय संस्था के रूप में उदय 1185 में मुगल शासन के दौरान हुआ था । मोहम्मद गौरी ने पहले भारत के कुछ हिस्से पर कब्जा किया । तब मुसलमानों को पूजा के लिए मस्जिद की भी जरुरत महसूस हुई । यह घटना मुलतान की है । पहले मस्जिद बनाई गई । लेकिन उसको चलाने के लिए पैसे की जरुरत थी । उसके लिए गौरी ने दो गाँव किसी शेखुल्ल इस्लाम को वक्फ में दे दिए । प्रश्न यह है कि जिस जमीन पर ज़बरदस्ती कब्जा किया गया हो तो क्या उसको वक्फ में दिया जा सकता है । इस्लाम मजहब इसकी अनुमति नहीं देता । लेकिन राजा को कौन बताए कि यह मजहब के अनुसार है या नहीं । इस घटना से अन्दाज़ा लगाया जा सकता है कि जैसे जैसे हिन्दुस्तान में मुगल शासन फैलता गया वैसे वैसे वक्फ भी फैलता गया । इस मुल्क में यदि कोई सम्पत्ति अल्लाह के नाम पर दान भी की जाती है तो वह यक़ीनन देसी मुसलमानों की ही हो सकती है । हमलावर अरब , तुर्क या मुगल अपने देशों की जमीन या सम्पत्ति तो उठाकर लाए नहीं थे जिसे उन्होंने हिन्दुस्तान में आकर वक्फ के नाम कर दिया । वक्फ का असूल है कि जो सम्पत्ति वक्फ की जाती है वह उसकी अपनी सम्पत्ति होनी चाहिए । दूसरे की क़ब्ज़ाई गई सम्पत्ति को वक्फ के नाम नहीं किया जा सकता । अब केवल उदाहरण के लिए यदि अपने समय में औरंगजेब ने कोई जमीन वक्फ की हो तो उसको वक्फ माना ही नहीं जा सकता क्योंकि वह उसके पूर्वजों द्वारा बलपूर्वक क़ब्ज़ाई सम्पत्ति है । औरंगजेब के जमाने में तो आज का वक्फ बोर्ड तो नहीं था लेकिन मुसलमान राजाओं को इस देश की सम्पत्ति वक्फ में देने की आदत बहुत थी क्योंकि इससे शायद उनके लिए जन्नत का रास्ता खुलता था । यह जमीन उनके अपने देश की तो नहीं थी , यह उस देश की थी जिस पर मुगलों ने कब्जा कर रखा था । लेकिन तब तक वक्फ में दी गई ज़मीनें और सम्पत्तियों की देखभाल के लिए कोई केन्द्रीय संस्था नहीं बनी थी ।

एटीएम का तर्क है कि वक्फ की जमीन अल्लाह को दी गई है । लेकिन क्या देसी मुसलमान अल्लाह के प्रतिनिधि नहीं हो सकते ? क्या अल्लाह के प्रतिनिधि विदेशी मूल के मुल्ला मौलवी ही हैं ? लडाई का असली मुद्दा यही है । इसके लिए एक उदाहरण काफी है । श्रीनगर में एक मस्जिद है जो जामिया के नाम से प्रसिद्ध है । इस मस्जिद का वायज , जो मीर वायज के नाम से जाना जाता है , सैयद ही हो सकता है वह भी ख़ानदानी आधार पर । ये सैयद तैमूरलंग के समय ईरान से भागकर श्रीनगर में आ गए थे । इन्होंने यह मस्जिद बनाई थी । उस समय कश्मीर के लोग अभी इस्लाम मजहब या शिया मजहब में दीक्षित नहीं हुए थे । जाहिर है उस समय इस मस्जिद का मीरवायज इन्हीं सैयदों में से कोई बनता । लेकिन अब तो कश्मीरियों को भी इस्लाम मजहब को अपनाए हुए छह सात सदियों से भी ज्यादा ही हो गए हैं । कश्मीर को बैसे भी ज्ञान का प्रदेश माना जाता है । कम से कम अरबों से तो ज्ञान के मामले में कहीं आगे हैं । इन छह सात सौ साल में वे इस्लाम के दर्शन व उसके सामाजिक आधार को अच्छी तरह समझ ही गए होंगे । क़ुरान शरीफ़ की व्याख्या वे अरबों, तुर्कों और मुगलों से तो कहीं बेहतर कर सकते हैं । लेकिन अभी भी वही सैयद श्रीनगर की जामिया मस्जिद के मीरवायज के पद पर पैतृक पद्धति से कब्जा जमा कर बैठे हैं । वे उसे अब कश्मीर के देसी मुसलमानों के हवाले क्यों नहीं करते।  सम्पत्ति पर कब्जा जमाए रखने की एटीएम की यही प्रवृत्ति वक्फ बोर्ड में संशोधनों का विरोध कर रही है ।

अपने जमाने में अंग्रेज़ सरकार भी एटीएम के इस कष्ट को समझ गई थी। अंग्रेज़ समझ गए थे कि मुगल राज ख़त्म हो जाने के कारण एटीएम मूल के मुसलमानों का आभिजात्य वर्ग बहुत संकट में पड गया था । यह ऐसा वर्ग था जो दरबारों में रहने के कारण अकर्मण्य हो चुका था । वह न तो परिश्रम कर सकता था और न ही भारत के देसी मुसलमानों की तरह साधारण ज़िन्दगी व्यतीत कर सकता था । यह वर्ग भीतर से खोखला हो चुका खा लेकिन बाहर की शानो शौक़त और अकड़ छोड़ने को तैयार नहीं था । यह भी दिखाई दे ही रहा था कि एटीएम मूल के इस वर्ग का भारत के देसी मुसलमानों पर रुआब अब भी वरकरार था । यदि एटीएम को कुछ साधन मुहैया करवा दिए जाएँ तो यह वर्ग हिन्दुस्तान में अंग्रेज़ी शासन का सबसे बड़ा समर्थक बन सकता था । अंग्रेज़ी सरकार अपनी सम्पत्ति में से तो इन का अभाव क्यों दूर करती , उसने इसके लिए नया रास्ता खोज लिया । वक्फ की जो सम्पत्तियाँ जगह जगह बिखरी हुई थीं , उनको एक केन्द्रीय संस्था के अधीन कर दिया जाए और इस केन्द्रीय संस्था को ही एटीएम के हवाले कर दिया जाए । इसके लिए The Bengal Code Regulation XIX of 1810 and the Madras Code Regulation VII of 1817 का गठन किया गया । ये रागुलेशन वक्फ बोर्ड के पूर्व रूप हैं । इससे एटीएम में नई जान आई ।

वक्फ बोर्ड के इस गठन का अंग्रेज़ सरकार को सचमुच लाभ भी हुआ।  जब 1857 में भारतीयों ने अंग्रेज़ों के खिलाफ आजादी की पहली लडाई छेड़ दी तो देसी मुसलमानों ने तो इस लडाई में अंग्रेज़ों के खिलाफ लडाई लड़ी लेकिन एटीएम के लोग अंग्रेज़ सरकार के साथ खड़े थे । इस लडाई के तुरन्त एटीएम के बडे नेता सर सैयद अहमद खान ने एक किताब लिखी। जिसमें देसी मुसलमानों को जम कर गालियाँ निकालीं क्योंकि उन्होंने अंग्रेज़ों के खिलाफ लडाई लड़ी थी । सर सैयद दो हिक़ारत से देसी मुसलमानों को जुलाहा कहते हुए उनकी मुजम्मत करते हैं । सैयद का कहना है कि मुगल सत्ता के समाप्त हो जाने के बाद यदि हमें कुछ मिल सकता है तो वह गोरे अंग्रेज़ों से ही मिल सकता है । अपने आप को उर्दू साहित्य का सबसे बड़ा पैरोकार बताने वाले मिर्ज़ा ग़ालिब ने तो समस्त भारतीयों को नमकहराम तक कहा जिन्होंने इन नए मालिकों के खिलाफ जंग छेड़ दिया था । हिन्दुस्तानियों को इस सिलसिले में गालियाँ निकालने के लिए उस शायर ने दस्तंबू नाम से किताब लिखी जिसे स्वयं को गोरों का नमक हलाल सिद्ध करने के लिए किताब महारानी विक्टोरिया को भेजा । देसी मुसलमान एटीएम के इस साहिब के यह करतूत भारत के देसी मुसलमान पढ न सकें, इसलिए यह किताब उर्दू में न लिख कर फारसी भाषा में लिखी । अंग्रेज़ों का तीर ठिकाने पर लगा था , इसलिए बाद के वर्षों में उन्होंने वक्फ की सम्पत्तियाँ पूरे तौर पर एटीएम के इसी प्रकार के चन्द लोगों के हाथ में दे दीं। एटीएम के मुँह वक्फ का ख़ून लग गया था। सम्पत्ति भारत की लेकिन वक्फ एटीएम का।

अंग्रेज़ों के चले जाने के बाद कांग्रेस को भी लगा कि मुसलमानों के एक मुश्त वोट मिल सकते हैं । कांग्रेस यह भी समझ गई थी कि देसी मुसलमानों का नेतृत्व एटीएम मूल के मुसलमानों के ही हाथ में है । इसलिए उसने पहले से भी ज्यादा केन्द्रीकृत रूप में वक्फ बोर्ड अधिनियम 1954 का गठन करके भारत की अरबों की जायदाद एटीएम के हाथों में दे दी । 1954 में वक्फ बोर्ड बन जाने से सारे अधिकार क़ानूनी रूप से इसी वर्ग विशेष के हाथों में दे दिए गए । दुर्भाग्य से जिस वर्ग के हाथों में इन सम्पत्तियों का नियंत्रण आया वह मोटे तौर पर एटीएम मूल के मुसलमानों का ही था। यह मुसलमानों का आभिजात्य वर्ग है । एटीएम (अरब+तुर्क+मुगल) के राज में देसी मुसलमानों (डीएम) को लगता था कि शायद मुल्ला मौलवी वक्फ की इस सम्पत्ति से , उनकी हालत सुधारने के लिए भी ध्यान देंगे लेकिन न तो ऐसा हुआ और न ही आगे होने की सम्भावना थी। देसी मुसलमान , जिन्हें एटीएम मूल का मुसलमान पसमांदा , अरजाल , अलजाफ , न जाने और कितने निंदनीय शब्दों से सम्बोधित करता है, अपने ही देश में अपनी ही सम्पत्ति अशराफों के हाथों लुटती देखता रहा । समय समय पर इस वक्फ़ अधिनियम में संशोधन होते रहे और एटीएम का शिकंजा और कसता गया । नए नए प्रावधान जोड़े गए । सबसे ज्यादा दुख की बात तो यह है कि वक्फ़ की इन सम्पत्तियों से अर्जित आय का लाभ देसी मुसलमानों को मिलना चाहिए था , उनको अपने रोज़गार चलाने में मदद की जानी चाहिए थी , उनके लिए अच्छे आधुनिक स्कूल खोले जाने चाहिए थे । लेकिन उनके विकास के नाम पर उनके लिए मध्यकालीन मदरसे खोल दिए गए और बाक़ी आमदनी एटीएम ने अपने लिए रख ली । मुगलों का राज ख़त्म हो जाने के बाद भी बहुत ही शातिराना तरीक़े से उनके वंशजों ने इस मुल्क की बहुत बडी सम्पत्ति पर कब्जा जमा रखा है । उस कब्जे को छुड़ा कर , यदि उसे मुसलमानों को ही देना है , तो उसे देश के देसी मुसलमानों के हवाले किए जाने की सख्त जरुरत है ।

एक उदाहरण लिया जा सकता है । दो फरीकों में किसी सम्पत्ति को लेकर झगड़ा कचहरी में चल रहा है । पहले फरीक के कब्जे में वह सम्पत्ति है लेकिन उस को लग रहा है कि वह केस हार जाएगा । इसलिए वह केस का फैसला आने से पहले ही वह सम्पत्ति मौलवी से मिल कर वक्फ के नाम कर देता है । लिखा पढ़ी करने की भी जरुरत नहीं है । वक्फ बोर्ड की दलदल में फँस गई यह सम्पत्ति अब वापिस असली मालिक को नहीं मिल सकती । यह नियम बना रखा है कि एक बार वक्फ़ के नाम हो चुकी सम्पत्ति वापिस नहीं हो सकती । असली मालिक वक्फ़ बोर्ड के इस तानाशाही रवैए के खिलाफ फ़रियाद भी उसी वक्फ़ बोर्ड के पास कर सकता है । हाई कोर्ट में अपील तक नहीं की जा सकती । अभी वक्फ बोर्ड  अधिनियम में एक असमानी धारा भी है जिसे अधिनियम में धारा 40 कहा जाता है । इसके अनुसार यदि वक्फ बोर्ड के पास यह विश्वास करने के कारण हैं कि कोई जायदाद वक्फ की है तो वह उसे वक्फ़ सम्पत्ति घोषित कर सकता है । कोई सम्पत्ति किसकी है इसके लिए प्रमाण की जरुरत होती है न कि विश्वास की । लेकिन वक्फ़ बोर्ड सम्पत्ति के मामले में प्रमाण की बजाए विश्वास को ही तरजीह देता है । यानि वक्फ़ स्वयं भी बहुत सी सम्पत्ति को , स्वयं ही विशवास करके , वक्फ़ की सम्पत्ति घोषित कर देता है । इस प्रकार भारत की बहुत सी सम्पत्ति को उसने खुद ही वक्फ़ सम्पत्ति घोषित कर रखा है । भारत सरकार के पुरातत्व विभाग की तो अनेक सम्पत्तियों को वक्फ अपना मानता ही है और सरकार ने भी अभी तक इस मामले में मौन स्वीकृति दे रखी थी।

 कुछ लोग कह रहे हैं कि इस बिल से अन्य समुदायों के लोगों पर भी असर पड़ेगा। दरअसल इसका अन्य किसी समुदाय से कोई लेना देना नहीं है। अन्य किसी समुदाय का कोई व्यक्ति यदि अपनी सम्पत्ति का जनहित में trust बनाना चाहता है तो वह Indian trust act के तहत बनता है । इसके लिए ट्रस्टियों  का चयन वह स्वयं करता है और नियम क़ायदे भी खुद बनाता है। ट्रस्ट के उद्देश्य भी स्पष्ट करता है । इस प्रकार के ट्रस्ट पूरे देश में लाखों की संख्या में बने हुए हैं । ऐसे कई ट्रस्ट मंदिर भी चलाते हैं और गुरुद्वारे भी । अख़बार भी चलाते हैं और वृद्ध आश्रम भी । भंडारे भी चलाते हैं और स्कूल भी । पंजाब में दयाल सिंह मजीठिया ने ट्रस्ट बनाया था जो आजकल ट्रिब्यून अख़बार चलाता है , एक स्कूल भी चलाता है । कई मुसलमानों ने भी, चाहे वे देसी मुसलमान हों या एटीएम मूल के मुसलमान हों , ऐसे ट्रस्ट बना रखे हैं । लेकिन 1954 में भारत सरकार ने वक्फ़ बोर्ड बना कर मुसलमानों द्वारा वक्फ़ में दी गई सम्पत्तियों को लेकर सारे देश के लिए वक्फ बोर्ड के नाम से एक नया केन्द्रीय संस्थान बना दिया जिसके पास मुसलमानों द्वार ट्रस्ट को दी गई ज़मीनों को उसके प्रबन्ध में दे दिया । यह मुसलमानों के अधिकारों को कम करने की साज़िश तो थी ही, उसके साथ ही भारत के देसी मुसलमानों को एटीएम मूल के मुसलमानों के बन्धक बनाने की बडी साज़िश भी थी । क्योंकि इतना तो स्पष्ट था कि वक्फ़ बोर्ड पर कब्जा तो एटीएम का ही रहने वाला था ।                                                  

एटीएम के लोग कह रहे हैं कि वक्फ बोर्ड में किए जा रहे संशोधन इस्लाम मजहब में दख़लन्दाज़ी है । मामला शुद्ध रूप से सम्पत्ति की मैनेजमेंट का है। वक्फ की सम्पत्ति की देखभाल इस प्रकार की जाए ताकि सम्पत्ति वक्फ में देने वाले दानदाता का मन प्रसन्न रहे । उसे दिखाई दे कि जिस उद्देश्य के लिए सम्पत्ति दी थी , वह उसी उद्देश्य के लिए प्रयोग की जा रही है । इसमें मजहब की बात कहाँ आती है। मैनेजमेंट का मजहब से क्या  लेना देना है ? लेकिन एटीएम को किसी भी तरह से मुगल शासन की विरासत को बचाना है । अब मुगल शासन वापिस तो आ नहीं सकता । अरबों का शासन भी नहीं आ सकता क्योंकि हिन्दुस्तान में सैयदों व शेखों की संख्या ऊँगलियों पर गिनी जा सकती है । अब एटीएम की मंशा है कि किसी न किसी तरह वक्फ़ को ही बचा लिया जाए । वे भारत के देसी मुसलमानों को आज 2025 में भी अपने गुलाम समझ रहे हैं । एटीएम को यह समझ नहीं आ रहा कि भारत का देसी मुसलमान (DM) वक्फ़ बिल के मामले में अपने हितों की रक्षा के लिए लड़ेंगे न कि एटीएम (ATM) के हितों के लिए । इसलिए एटीएम इस पूरे मामले में मजहब को घसीटने की कोशिश कर रहा है ताकि देसी मुसलमान मजहब के जाल में ही फँस कर एटीएम के लिए लडाई लडने के लिए तैयार हो जाएँ । लेकिन इस बार देसी मुसलमान ने एटीएम के जाल में फँसने से इन्कार कर दिया है । इसके उल्ट वह तो वक्फ़ बिल के समर्थन में बढ रहा है क्योंकि नए अधिनियम में एटीएम द्वारा डीएम के शोषण को रोकने का प्रयास किया गया है ।

अब इक्कीसवीं सदी में भारत सरकार इस सम्पत्ति को एटीएम से मुक्त करवा कर डीएम के कल्याण के लिए प्रयोग करने के लिए इस अधिनियम में आवश्यक संशोधन कर रही है । इसी जरुरत को पूरा करने के लिए वक़्फ़ बोर्ड अधिनियम में परिवर्तनों का प्रस्ताव आया । नए अधिनियम में वक्फ़ की आमदनी के लाभ का कुछ हिस्सा तो देसी मुसलमानों तक पहुँचाने का प्रावधान किया जा रहा है , तो एटीएम आसमान सिर पर उठा रहा है । भारत का देसी मुसलमान तो वक्फ बोर्ड अधिनियम में किए जा रहे परिवर्तनों से प्रसन्न है लेकिन एटीएम भयंकर विरोध कर रहा है । कुछ दिन पहले ही वह औरंगजेब की कब्र बचाने की लडाई लड रहा था लेकिन अब तो मुगल साम्राज्य समाप्त होने से पहले भारत में जो जायदाद वक्फ़ के बहाने उनको उनके भरण पोषण के लिए दे गया था , वह भी उनके हाथों से छिनती नज़र आ रही थी । यह सम्पत्ति अब देसी मुसलमानों के हित के लिए प्रयोग होने वाली है । लेकिन पूछा जा सकता है कि फिर वक्फ़ बोर्ड अधिनियम में किए जा रहे इन स्वदेशी परिवर्तनों का विरोध आख़िर भारत के ही कुछ राजनैतिक दल क्यों कर रहे हैं ? इसका उत्तर जानने के लिए इसी से मिलते जुलते एक दूसरे प्रश्न का उत्तर तलाशना होगा । मुगलों और अंग्रेज़ों के राजकाल में भारत के ही कुछ लोग मुगलों व अंग्रेज़ों का साथ क्यों दे रहे थे ? 





कुलदीप चन्द अग्निहोत्री
(लेखक हिमाचल प्रदेश केन्द्रीय विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति हैं)
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)      

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