नया वक्फ कानून लागू होने के बावजूद सियासी और सामाजिक तूफान थमा नहीं हैं। कुछ राजनीतिक दल, एनजीओ और मुस्लिम संगठन इसे असंवैधानिक बताते हुए सुप्रीम कोर्ट की चौखट तक जा पहुंचे हैं, जबकि कुछ इसकी तैयारी में अपने कानूनी हथियार की धार तेज कर रहे हैं। ऐसे में सवाल उठना संभव है कि आखिर इस कानून को लेकर इतनी सियासी हंगामा क्यों मचा है? क्या इसकी वजह सिर्फ मजहबी और सामाजिक ही है या फिर वक्फ की संपत्तियों से नियंत्रण हटने वाले कुछ लोगों की परेशानी झलक रही है? लेकिन एक वजह ऐसी है, जहां नजरें कम ही पहुंची हैं। दरअसल इस कानून ने मुस्लिम वोट बैंक की सरमायादारी करने वालों का रसूख कमजोर होता नजर आ रहा है। कुछ राजनीतिक दलों को भी लगता है कि अगर मुस्लिम समुदाय बंटा तो उसकी राजनीति पस्त पड़ सकती है।
संविधान सभा की मंजूरी वाले संविधान में भले ही देश को पंथ निरपेक्ष नहीं बताया गया, लेकिन आजादी के बाद से ही पंथ निरपेक्षता के नाम पर तुष्टिकरण की राजनीति जारी रही। उसके चलते मुस्लिम समुदाय को लेकर धारणा बनी कि वह अपने हितों का ध्यान रखते हुए थोक वोट बैंक की तरह काम करता है। पहले आम चुनाव में विभाजन का दर्द और स्वाधीनता संघर्ष का गर्वबोध ताजा-ताजा था, जिसकी प्रतिनिधि कांग्रेस थी, लिहाजा ज्यादातर मतदाताओं ने उसे पसंद किया। लेकिन बाद के दिनों में परिपक्व होता वोटर अपने लिहाज से राजनीतिक दलों को नापने-परखने लगा, तब कांग्रेस ने ब्राह्मण, दलित और मुस्लिम का सियासी रसायन तैयार किया और उसके सहारे सत्ता पर लंबे समय तक काबिज रही। इसी दौरान अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की राजनीति शुरू हुई, जो अब तक कुछ दलों का सियासी हथियार बनी हुई है। इसी की वजह से मुस्लिम वोट बैंक का विचार परवान चढ़ा। मुस्लिम समुदाय ने भी इसे गलत ठहराने का प्रयास नहीं किया। अल्पसंख्यकवाद के कवच और बहुसंख्यक के डर के चलते मुस्लिम वोट बैंक मजबूत होता चला गया।
वक्फ कानून के खिलाफ बेशक मुस्लिम समुदाय का एक हिस्सा नाराज दिख रहा है, लेकिन एक तबका ऐसा भी है, जो समर्थन में उठ खड़ा हुआ है। इसमें अजमेर दरगाह के चिश्ती सैयद नसरूद्दीन के साथ ही ऑल इंडिया सूफी सज्जादनशीं कौंसिल, मुस्लिम राष्ट्रीय मंच और भारत फर्स्ट जैसी संस्थाएं खुलकर बोल रही हैं। इस कानून के पास होने के बाद मचे सियासी हंगामे के बीच ऑल इंडिया इमाम ऑर्गनाइजेशन के प्रमुख उमर अहमद इलियासी भी इसके समर्थन में उठ खड़े हुए। समर्थकों की इस सूची में जमीयत हिमायत उल इस्लाम, पसमांदा मुस्लिम महाज और पसमांदा मुस्लिम समाज भी है।

समर्थकों में सबसे ज्यादा मुस्लिम पसमांदा समाज के लोग हैं। जिसे आज की राजनीतिक भाषा दलित, वंचित और शोषित कहा जाता है, पसमांदा समाज के लोग वही है। पसमांदा फारसी का शब्द है, जो पस और मांद से मिलकर बना है। पस का मतलब पीछे और मांद का अर्थ छूटना होता है यानी सामाजिक दौड़ में पीछे छूट गए लोग पसमांदा हैं। मुस्लिम समाज में इनकी हिस्सेदारी सत्तर से 85 फीसद तक मानी जाती है। 1931 की जनगणना में मुस्लिम समुदाय की तीन सौ से ज्यादा जातियों का जिक्र है। इसके पहले 1891 की जनगणना में बंगाल में सत्तर से ज्यादा मुस्लिम जातियों का रिकॉर्ड शामिल है।
आखिर क्या वजह है कि पसमांदा समाज को यह कानून पसंद आ रहा है। इसे समझने के लिए मुस्लिम बुद्धिजीवी जफर सरेशवाला के बयान को देखना होगा। उन्होंने कहा है कि वक्फ के पास इतनी संपत्ति है कि इसका इस्तेमाल सही से किया गया होता, तो सिर्फ मुसलमान ही नहीं, इस देश का हिंदू भी गरीब नहीं रहता। कुछ ऐसी ही राय बिहार के राज्यपाल और मुस्लिम समाज के जाने-माने चिंतक आरिफ मोहम्मद खान की भी है। उन्होंने पटना के महावीर मंदिर ट्रस्ट का हवाला देते हुए कहा है कि इसके अस्पताल और कई सेवा कार्य हैं, वक्फ बोर्ड के पास ऐसा काम कोई नहीं है। इस्लाम में जकात यानी दान का मतलब दीन की सेवा के लिए होता है। लेकिन वक्फ बोर्ड पर आरोप रहा है कि उसने अपने समुदाय के कमजोर तबके के कल्याण के लिए कभी कोई योजना नहीं चलाई। वक्फ विधेयक पर चर्चा के दौरान लोकसभा में गृहमंत्री अमित शाह ने भी वक्फ के उद्देश्य को लेकर जो कहा, उसमें भी इस तबके की चिंता झलक रही थी। उनका कहना था कि वक्फ का कानून दान के लिए किसी द्वारा दी गई संपत्ति, उसका प्रशासन अच्छे से चल रहा है या नहीं, कानून के हिसाब से चल रहा है या नहीं दान इस्लाम धर्म के लिए दिया गया है, गरीबों के उद्धार के लिए दिया गया है, लेकिन उस उद्देश्य के लिए उसका उपयोग हो रहा है या नहीं, इन सबके नियमन के लिए यह कानून आया है।
पसमांदा मुस्लिम समाज के राष्ट्रीय संयोजक फिरोज मंसूरी तो एक तरह से वक्फ बोर्ड को रसूखदार लोगों के हाथ की कठपुतली ही बता रहे हैं। उनका कहना है कि नौ लाख एकड़ से ज्यादा की जमीन पर सिर्फ दो सौ लोगों का कब्जा था, जो कट्टर धार्मिक हैं। मंसूरी के अनुसार, बदले कानून से पसमांदा मुस्लिम समुदाय के लिए योजनाएं बनेंगी, वक्फ की संपत्ति का इस्तेमाल गरीब और कमजोर वर्ग के हित के लिए होगा।
पसमांदा समुदाय की ऐसी प्रतिक्रियाओं से साफ है कि मुस्लिम वोट बैंक में दरार पड़नी तय है। क्योंकि इस कानून ने दलित, शोषित और वंचित मुस्लिम समाज को सत्ता की चाभी का पता बता दिया है। अब तक की मुस्लिम राजनीति को देखेंगे तो उसमें अशराफिया मुसलमानों का कब्जा रहा है। अरब, अफगानिस्तान और मध्य एशिया से आए मुसलमान भारतीय मूल के मुस्लिम लोगों से खुद को बेहतर मानते हैं। इन्हें अशराफिया कहा जाता है। इन्हीं लोगों के पास लंबे समय तक सत्ता रही, धार्मिक केंद्रों के भी यही प्रमुख रहे, इस वजह से अपने समुदाय पर इनका दबदबा रहा। आजादी के बाद भी मुसलमानों का नेतृत्व इसी वर्ग के हाथ रहा। इस कारण से पसमांदा मुस्लिम राजनीति में हाशिए पर हैं। हालांकि उन्हें एक करने के लिए पहली बार 1900 के दशक में ऑल इंडिया पचवारा मुस्लिम महाज का गठन हुआ। पिछली सदी के आखिरी दशक में बिहार के पत्रकार अली अनवर ने इस समुदाय की बात उठाई। पसमांदा समुदाय पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भी नजर है। पहली बार पांच जून 2022 को बीजेपी की हैदराबाद में हुई राष्ट्रीय कार्यसमिति की बैठक में इस समाज को साथ जोड़ने के लिए उनके बीच काम करने की बात उन्होंने कही। इसके बाद 27 जून 2023 को उन्होंने भोपाल में सार्वजनिक रूप से पहली बार पसमांदा समाज का जिक्र किया। लेकिन बीजेपी को विशेष सफलता नहीं मिली। मुस्लिम समुदाय थोक वोट बैंक के रूप में बना रहा।
वक्फ कानून के बाद यही थोक वोट बैंक राजनीतिक दलों को दरकता दिख रहा है। अगर यह दरकना बढ़ा, तो पसमांदा समाज मुस्लिम समाज के थोक वोट बैंक से छिटक सकता है। इस कारण इस समुदाय के वोटों की बुनियाद पर राजनीति करने वाले दलों का घबराना स्वाभाविक है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे का यह कहना कि वक्फ संशोधन कानून ने मुस्लिम समुदाय को बांट दिया है। कुछ ऐसे ही विचार मुस्लिम समीकरण की राजनीति करने वाली समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल समेत कई अन्य विपक्षी नेताओं के भी हैं। ये विचार इसी घबराहट के संकेत हैं।
सवाल यह है कि हिंदू समुदाय जातियों में बंट सकता है, उसे जातीय स्तर पर खंडित करके राजनीति अपनी राजनीतिक रोटी सेंक सकती है, सत्ता की दहलीज लांघ सकती है तो उसे मुस्लिम वोट बैंक में दरार से क्यों परेशानी होने लगी। परेशानी यह है कि अगर पिछड़ा, दलित और वंचित मुस्लिम समुदाय थोक वोट बैंक से अलग हुआ तो मुस्लिम आधार पर राजनीति करने वाले दलों की सियासी वजूद खतरे में पड़ जाएगा।

उमेश चतुर्वेदी
वरिष्ठ पत्रकार, राजनीतिक समीक्षक
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)
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