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मीडिया का ‘सलेक्टिव मोड’ खतरनाक

The media’s ‘selective mode’ is dangerous.


प्रो. बलदेव भाई शर्मा


इन दिनों मीडिया का प्रभाव समाज जीवन में चारों ओर बहुत बढ़ गया है। अब इस बात से भी कुछ खास मतलब किसी को शायद नहीं रह गया है कि सही क्या है-गलत क्या है। विशेषकर उन लोगों को जो अपने राजनीतिक-सामाजिक फायदे के लिए मीडिया का इस्तेमाल करने का हर मौका लपकने को तैयार रहते हैं। दुर्भाग्य ये भी है कि एंड्रॉयड मोबाइल के तौर पर मीडिया को जेब में डाले घूम रहे कुछ लोगों के अलावा कुछ स्थापित लोग और मीडिया संस्थान भी इसका आर्थिक लाभ के लिए इस्तेमाल करने से नहीं चूकते। ‘कौआ कान ले गया’ का झूठ किसी ने फैला दिया, तो बिना यह सोचे कि इसमें सचाई कितनी है, न जाने कितने लोग इस फर्जी कौओं के पीछे भागने लगते हैं और चटखारे ले-लेकर इस झूठ को फैलाने लग जाते हैं। इन लोगों को न मीडिया की प्रतिष्ठा की चिंता है और न उसके प्रति लगातार घट रहे जनविश्वास की परवाह।

पिछले दिनों एक अंग्रेजी समाचार पत्र में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग की एसआईआर प्रक्रिया को लेकर सचाई का दावा करने वाली एक कथित खोजपूर्ण रिपोर्ट छपी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार की देश-देशांतर में निरंतर बढ़ रही लोकप्रियता और केंद्रीय सत्ता पर उनकी मजबूत पकड़ से बौखलाए और सत्ता के अंगूरों की तरफ ललचाई नजरों से ताकती लोगों को एक अवसर मिल गया। उसके बाद से विरोध के नाम पर जो बवाल और अराजकता राजनीति का हथियार बनाए जा रहे हैं, देश उससे शर्मसार है। राजनैतिक विरोध और धरना-प्रदर्शन एक लोकतांत्रिक अधिकार माने जाते हैं।

इसमें कोई शक-शुबह नहीं है। पर विरोध के नाम पर इतनी सत्ता की लालसा कि आप सत्ता की मर्यादाएं भूल जाएं और देश को अराजकता के गर्त में धकेलने पर आमादा हो जाएं। इसमें चिंताजनक ये है कि एक ऐसी मीडिया रिपोर्ट इसका आधार बन रही है जिस पर तथ्यात्मक रूप से सवाल उठ रहे हैं। जाने-अनजाने मीडिया इन लोगों का हथियार बन रहा है। देश की संवैधानिक संस्थाओं को अस्थिर करने की सीढ़ी यदि मीडिया बन जाएगा तो मीडिया धर्म कैसे बचेगा? मीडिया धर्म क्या यही है कि सत्तालोलुप नेताओं का मोहरा बनकर नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार को गालियां दो और जो लोग तथ्य और सत्य के आधार पर प्रधानमंत्री या सरकार की बात कहते हैं, उन्हें गोदी मीडिया कहकर लांछित करते हैं? ये कौन सी पत्रकारिता है कि तुम कहो तो सब सही-दूसरे कहें तो गलत? ये वैचारिक दुराग्रह तो शुरू से इस देश में कम्युनिस्टों और उनको पालने-पोसने वाली कांग्रेस का चरित्र रहा है। उन्हीं की भाषा बोलना-लिखना मीडिया के लिए कैसे राष्ट्रीय हित या संविधान-लोकतंत्र का संरक्षण हो गया? भारतीयता की बात करना, जब हिंदुत्व की बात करना इनको बिन गोदी मीडिया क्यों है? एक नेता अंदर खाली पन्ने और ऊपर संविधान कवर चढ़ाए लाल किताब लेकर देश भर को बहकाता फिरते, तब न आपकी कलम चलती है, न आवाज निकलती है। और जब देश में पहली बार सरकारी खजाने की लूट बन गई, इफ्तार पार्टियां बंद हो गईं, जम्मू-कश्मीर में दूसरा पाकिस्तान बनाने की साजिश में सहायक बन गई धारा 370 एक झटके में हटा दी गई, मुस्लिम महिलाओं का उत्पीड़न करने वाले तीन तलाक के खिलाफ कानून बन गया, भारत के राष्ट्रीय स्वाभिमान की ध्वजा फहराने वाला राम मंदिर तनकर खड़ा हो गया पूरी भव्यता के साथ, देश को इस बारे में बताना गोदी मीडिया हो गया है? सबसे ताजा उदाहरण देखें तो एक आतंकवादी ने हिंदूकुश एयरलाइंस का हवाई जहाज हाईजैक करके हजारों भवनों को 9/11 की तरह ध्वस्त करने की साजिश रची और एक भारतीय मूल के यात्री-पायलट ने जांबाजी दिखाकर षड्यंत्र विफल कर दिया और आतंकवादी को काबू कर जहाज को सही सलामत यात्रियों सहित सुरक्षित उतार दिया। गंभीर रूप से घायल उस बहादुर पायलट के लिए राहुल गांधी की संवेदना सोई रही, जबकि वह न जाने किस-किस के लिए तुरंत टिप्पणी करते हैं, “चिंता मत करो, मैं आ रहा हूँ, हम तुम्हारे साथ हैं।” क्योंकि सत्ता की तरफदारी करने से मुस्लिम वोट बैंक नाराज न हो जाए, इसलिए राहुल गांधी चुपचाप साथ गए। इस सलेक्टिव राजनीति के लिए किस-किसने राहुल गांधी पर उंगली उठाई, जरा गिरेबां में झांकें। ये सलेक्टिव मीडिया किस तरह देश, संविधान और लोकतंत्र का हितैषी है?

हिंदी पत्रकारिता की दो सौ साल पहले  शुरुआत करने वाले जुगल किशोर शुक्ल ने ‘उदंत मार्तण्ड’ में लिखा था, ‘यह उदंत मार्तण्ड हिंदुस्तानियों के हित हेतु’। आज मीडिया इस प्रस्थान बिंदु की कितनी परवाह कर रहा है? निहित राजनीतिक स्वार्थों के लिए छात्र हितों की आड़ लेकर कॉकरोचों के जंतर-मंतर प्रदर्शन में पृष्ठभूमि से पोषण कर रही आम आदमी पार्टी और कांग्रेस की साझी कहानी का खुलासा हो चुका है। वहाँ ‘नाम रहेगा अल्लाह का’ से लेकर ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे इंशा अल्ला इंशा अल्ला’ की सोच वाले राजीव इमाम और उमर खालिद की जय-जयकार हो रही थी, लाखों रुपये रोज का खाना और बिरयानी बह रही थी, तब गोदी मीडिया कहकर पत्रकारिता को अपवित्र मानने वाले तथाकथित ईमानदार मीडिया कर्मियों के लिए दीपिका, रांका एंड कंपनी नायक कैसे बन गए? जहां प्रधानमंत्री की माँ को गालियां दी गई तो कितने ही धुरंधर ‘महान पत्रकार’ भारत में गालियों की लोक परंपराओं का बखान करने लगे, पर इस अराजकता के लिए निंदा का एक शब्द भी उन्होंने न बोला, न लिखा। लड़के-लड़कियों के गले में स्वतंत्र पत्रकार के नकली टैग लटकाकर फर्जी पत्रकार बनाकर पुलिस अधिकारियों पर झूठे आरोप मढ़े, डीप फेक से फर्जी वीडियो बनाए, इससे असली पत्रकार और पुलिस को बदनाम किया। राहुल गांधी और इंडी गठबंधन के नेता प्रधानमंत्री निवास पर विरोध के नाम पर लोकतंत्र बचाओ की हुंकार लगाते रहे, पर यह अंधभक्त मीडिया मंडली सरकार के अत्याचार का ही अलाप लगाती रही। यह कैसा ‘हिंदुस्तानियों का हित’ है जो अराजकता को शह दे रहा है? पुलिस ने करीब पौने तीन हजार लोग अपराधी और असामाजिक तत्व चिह्नित किए जंतर-मंतर प्रदर्शन में, यह कैसा छात्र आंदोलन है? क्या अंधभक्त मीडिया ने ये सवाल उठाए?

अंग्रेजी अखबार की जिस रिपोर्ट को लेकर ‘ज्ञानेश कुमार इस्तीफा दो, ज्ञानेश कुमार को गिरफ्तार करो’ के नारे लगाए जा रहे हैं और सत्ता प्रतिष्ठान को अस्थिर करने का प्रयास किया जा रहा है, प्रसिद्ध अधिवक्ता महेश जेठमलानी द्वारा इसके लिए लाखों के लेन-देन और सांठगांठ की बातें सामने आ रही हैं, उससे अंधभक्त मीडिया पर सवाल उठने लाजिमी है। गोदी मीडिया का विमर्श खड़ा करके इन अपवित्र हरकतों से बचा नहीं जा सकता। ये अखबार तो मनमोहन सरकार के समय अपनी ‘खोजी’ रिपोर्टों से सत्ता पलट के लिए आगरा से सेना की दो टुकड़ियों के दिल्ली कूच की कहानी भी गढ़ चुका है जो पूरी तरह बेबुनियाद थी। यह विडंबना ही कही जाएगी कि जो अखबार देश पर एक कांग्रेसी प्रधानमंत्री द्वारा थोपी गई इमरजेंसी और लोकतंत्र की हत्या के खिलाफ अपने संचालक की हिम्मत और निडरता से पत्रकारिता की ईमानदार आवाज बन गया था, अब उसी पर कांग्रेस से सांठगांठ की बात कही जा रही है।

पहले तो अखबार ही पत्रकारिता कहे जाते थे, अब इलेक्ट्रानिक मीडिया, मल्टीमीडिया और सोशल मीडिया के चकाचौंध में अखबार ही आम आदमी के भरोसे को बचाकर रख सकते हैं, लेकिन जब अखबार ही अपनी नैतिकता खो दे और उन पर भी खोजी रिपोर्टों के नाम पर सत्तालोलुप दलों से लेन-देन के छींटे उछलें तो इस सलेक्टिव मोड से पत्रकारिता को राष्ट्रीय हितों की निष्पक्ष पैरोकार बनाकर खड़ा करना जरूरी है। जॉर्ज सोरोस जैसे धनाढ्य भारतविरोधी जब भारत के राजनैतिक दलों, नेताओं और मीडिया को अपनी उंगलियों पर नचाने को आमादा हों, तब मीडिया को इस अग्निपथ पर बहुत संभलकर चलना होगा। भारत सरकार के राष्ट्रीय और सामाजिक हितों के कामों की चर्चा भी यदि गोदी मीडिया कहकर नकारी जाएगी तो ‘डिवलपमेंट जर्नलिज्म’ कब कहाँ कही जाएगी? नरेंद्र मोदी से चिढ़ हो सकती है क्योंकि उनकी प्रधानमंत्री बनने की लोकप्रियता राहुल गांधी के दिवास्वप्न में बाधा है, लेकिन मोहन भागवत बोट चोरी के लिए जिम्मेदार कैसे हो गए? राहुल गांधी उन्हें भी जेल भेजने की बात कह रहे हैं? इस बेतुकी भाषा और अनर्गल राजनैतिक प्रलाप के खिलाफ कौन मीडिया आवाज उठा रहा है? ये तो राहुल गांधी के हाथों में खेलना हुआ। ऐसे कैसे मीडिया की साख बचेगी? अपने दिल पर हाथ रखकर अंधभक्त मीडिया को जरूर खुद से सवाल पूछना चाहिए। केवल दूसरों से सवाल पूछना ही पत्रकारिता नहीं है।


(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)

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