
डॉ. दीपक कोहली
प्रतिवर्ष 14 सितंबर का अवसर केवल एक औपचारिक भाषाई पर्व या प्रशासनिक तिथियों को दोहराने का दिन नहीं है। यह भारत की भाषाई अस्मिता, उसकी प्राचीन ज्ञान परंपरा और सांस्कृतिक स्वतंत्रता को नए सिरे से रेखांकित करने का एक ऐतिहासिक संकल्प दिवस है। वर्ष 1949 में इसी दिन संविधान सभा ने हिंदी को संघ की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया था। वह निर्णय केवल एक प्रशासनिक व्यवस्था का अंग नहीं था, बल्कि औपनिवेशिक मानसिकता की जंजीरों को तोड़कर अपनी सांस्कृतिक जड़ों की ओर लौटने का एक राष्ट्रीय प्रतिज्ञा-पत्र था। भारतेंदु हरिश्चंद्र ने बहुत पहले इस शाश्वत सत्य को पहचानते हुए रेखांकित किया था कि अपनी भाषा की उन्नति ही सभी प्रकार की प्रगतियों का मूल आधार है। बिना अपनी भाषा के सहज ज्ञान के, समाज के हृदय में बैठी हीनभावना कभी समाप्त नहीं हो सकती। हिंदी दिवस हमें इसी यथार्थ का स्मरण कराता है कि स्वभाषा के सम्मान के बिना कोई भी राष्ट्र अपने मौलिक चिंतन और ज्ञान-विज्ञान के बल पर विश्व पटल पर अग्रणी भूमिका नहीं निभा सकता।
ज्ञान केवल आंकड़ों या अमूर्त विचारों का संकलन मात्र नहीं होता। यह किसी भी सभ्यता की सामूहिक चेतना, उसकी ऐतिहासिक यात्रा, दार्शनिक दृष्टि और व्यावहारिक समझ का सजीव दस्तावेज़ होता है। भारत की ज्ञान परंपरा विश्व की प्राचीनतम और सतत प्रवाहमान धाराओं में से एक है। इस महान ज्ञान वटवृक्ष की जड़ें भारत की विविधतापूर्ण और वैज्ञानिक भाषाओं की भूमि में गहराई तक समाई हुई हैं। भाषा केवल विचारों के आदान-प्रदान का साधारण माध्यम नहीं, बल्कि संस्कृति की संवाहक और चिंतन की आधारशिला होती है। जब हम यह कहते हैं कि भारतीय ज्ञान परंपरा का मूल आधार भारतीय भाषाएं हैं, तो इसका सीधा अर्थ यही है कि भारत का संपूर्ण ज्ञान—अध्यात्म, दर्शन, गणित, खगोल विज्ञान, आयुर्वेद, स्थापत्य और लोक-कलाएं—इन भाषाओं की ध्वनियों, व्याकरण, शब्द-संरचना और संवेदनाओं के साथ अटूट रूप से बंधा हुआ है।
भारतीय ज्ञान परंपरा की व्यापकता को किसी संकीर्ण दायरे में नहीं बांधा जा सकता। हमारी चिंतन धारा में ज्ञान को 'परा' और 'अपरा' विद्या के रूप में देखा गया, जहाँ एक ओर आत्म-साक्षात्कार और दार्शनिक सत्य की खोज है, वहीं दूसरी ओर भौतिक जगत के विज्ञान, गणित, आयुर्वेद और समाजशास्त्र का गहन विवेचन। इन दोनों ही धाराओं का पोषण भारतीय भाषाओं के माध्यम से ही संभव हुआ। भाषाशास्त्र का यह सिद्धान्त जगज़ाहिर है कि मनुष्य जिस भाषा में चिंतन करता है, विश्व को देखने का उसका दृष्टिकोण भी वैसा ही निर्मित होता है। हमारी भाषाएं एक ऐसी एकीकृत दृष्टि प्रदान करती हैं, जहाँ प्रकृति, मनुष्य और संपूर्ण ब्रह्मांड को अलग-अलग खंडों के बजाय एक अखंड इकाई के रूप में देखा जाता है।
संस्कृत, जिसे हमारी अनेक भाषाओं की जननी और शास्त्रीय ज्ञान की वाहक माना जाता है, उसकी रचना अपने आप में एक अद्भुत वैज्ञानिक उपलब्धि है। पाणिनि का 'अष्टाध्यायी' व्याकरण विश्व इतिहास का पहला ऐसा नियम-आधारित ढांचा है, जिसे आज आधुनिक कंप्यूटर विज्ञान और भाषा विज्ञान में 'एल्गोरिदम' के प्राचीनतम रूप में स्वीकार किया जाता है। इसी प्रकार, दक्षिण भारत की शास्त्रीय तमिल भाषा का संगम साहित्य हो, थिरुवल्लुवर का 'तिरुक्कुरल' हो या कन्नड़ का 'वचन साहित्य'—इन सभी ने प्रकृति, समाज और मानव मूल्यों के सह-संबंधों की जो गहरी समझ दी, वह आज भी प्रासंगिक है। प्राकृत और पाली में रचे गए बौद्ध तथा जैन साहित्य ने ज्ञान को अभिजात वर्ग के नियंत्रण से निकालकर जन-सामान्य तक पहुँचाने का क्रांतिकारी कार्य किया।
मध्यकाल में जब शास्त्रीय ज्ञान एक सीमित दायरे में सिमटने लगा था, तब भक्ति आंदोलन ने एक विशाल सांस्कृतिक और भाषाई नवजागरण का सूत्रपात किया। कबीर, तुलसीदास, सूरदास, मीराबाई, गुरु नानक, ज्ञानेश्वर, तुकाराम, बसवेश्वर, शंकरदेव और चैतन्य महाप्रभु जैसे संतों ने अवधी, ब्रज, मराठी, कन्नड़, असमिया और बांग्ला जैसी जन-भाषाओं को चेतना का माध्यम बनाया। ज्ञान मठों और राजदरबारों से निकलकर खेतों, खलिहानों और जन-मन तक पहुँचा। इन संतों ने केवल आध्यात्मिक संदेश नहीं दिया, बल्कि अपनी लोक-भाषाओं के माध्यम से श्रम, सामाजिक समरसता और नीतिगत आचरण का व्यावहारिक ज्ञान समाज में रोपा।
यह एक दुखद औपनिवेशिक भ्रम रहा है कि भारतीय भाषाएं केवल साहित्य और अध्यात्म तक सीमित थीं। वास्तव में, भारत का पूरा वैज्ञानिक इतिहास इन्हीं भाषाओं की नींव पर टिका हुआ है। आर्यभट्ट, ब्रह्मगुप्त और भास्कराचार्य जैसे गणितज्ञों ने अपने जटिल खगोलीय और गणितीय शोध संस्कृत के श्लोकों में पिरोए। शून्य और दशमलव प्रणाली की खोज ने विश्व गणित की दिशा बदल दी, जो भारतीय भाषाओं की अंक-शब्दावली के बिना संभव नहीं थी। इसी तरह चरक और सुश्रुत संहिताओं में वर्णित शल्य चिकित्सा और औषधीय पौधों का ज्ञान पूरी तरह स्थानीय और भाषाई शब्दावली पर आधारित है। वात, पित्त और कफ जैसी अवधारणाओं का विदेशी भाषाओं में सीधा अनुवाद उनके मूल दार्शनिक और चिकित्सीय अर्थ को ही समाप्त कर देता है।
1835 की मैकाले की शिक्षा नीति ने भारतीय ज्ञान परंपरा और हमारी भाषाओं के इस स्वाभाविक संबंध को खंडित करने का कुत्सित प्रयास किया। अंग्रेजी को शिक्षा और प्रशासन का माध्यम बनाकर भारतीय भाषाओं को उपेक्षित और अविकसित घोषित करने का षड्यंत्र रचा गया। इसके परिणामस्वरूप, देश का एक बड़ा वर्ग अपनी ही समृद्ध पांडुलिपियों और परंपराओं से कट गया। एक ऐसी हीनग्रंथि ने जन्म लिया, जिससे यह माना जाने लगा कि आधुनिकता और वैज्ञानिक प्रगति केवल पश्चिमी भाषाओं के माध्यम से ही अर्जित की जा सकती है।
आज जब हम 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाते हैं, तो यह अवसर हमें उसी औपनिवेशिक हीनग्रंथि से पूरी तरह मुक्त होने की चुनौती देता है। 'राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020' ने इस दिशा में एक दूरगामी पहल की है। मातृभाषा में प्राथमिक शिक्षा और आगे चलकर चिकित्सा, इंजीनियरिंग तथा विधि जैसे विषयों की पढ़ाई भारतीय भाषाओं में उपलब्ध कराने का संकल्प इसी दिशा में बढ़ाया गया कदम है। यह सर्वमान्य सत्य है कि कोई भी व्यक्ति अपनी मातृभाषा में अवधारणाओं को जितनी गहराई और मौलिकता से समझ सकता है, किसी पराई भाषा में वह केवल उसका रटंत अभ्यास कर सकता है।
डिजिटल और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के आधुनिक दौर में हमारी भाषाओं के सामने नई चुनौतियां और असीम संभावनाएं दोनों उपस्थित हैं। यदि हमें अपनी भाषाओं को आधुनिक ज्ञान का सशक्त माध्यम बनाना है, तो हमें केवल अतीत के गौरवगान तक सीमित रहने के बजाय भविष्योन्मुखी होना पड़ेगा। विज्ञान, तकनीक, साइबर सुरक्षा और अर्थशास्त्र जैसे आधुनिक विषयों की गुणवत्तापूर्ण पठन सामग्री हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में बड़े पैमाने पर तैयार करनी होगी। इसके साथ ही, अत्याधुनिक तकनीक का सहारा लेकर भारत की विभिन्न भाषाओं के बीच सहज अनुवाद की व्यवस्था विकसित करनी होगी, ताकि ज्ञान का आदान-प्रदान निर्बाध रूप से हो सके।
हिंदी दिवस का वास्तविक संदेश केवल एक भाषा विशेष का प्रचार-प्रसार नहीं, बल्कि भारत की संपूर्ण भाषाई विरासत का संरक्षण और संवर्धन है। जब देश का युवा अपनी भाषाओं में सोचेगा, अपनी भाषा में शोध और नवोन्मेष करेगा, तभी भारत वास्तविक अर्थों में एक 'आत्मनिर्भर ज्ञान महाशक्ति' के रूप में उभर सकेगा। हमारी भाषाएं हमारी सांस्कृतिक रीढ़ हैं, और उनमें निहित ज्ञान का पुनरुद्धार ही एक सशक्त, समर्थ और स्वाभिमानी भारत के निर्माण का सबसे ठोस मार्ग है।
भारतीय ज्ञान परंपरा की मौलिकता इस बात में निहित है कि यह सत्य को किसी एक ही चौखट में बांधकर नहीं देखती। 'एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति' (सत्य एक है, विद्वान उसे विभिन्न तरीकों से कहते हैं) का सिद्धांत ही भारत की भाषाई और वैचारिक विविधता का मूल उत्स है। यहाँ भाषा केवल अभिव्यक्ति का साधन नहीं, बल्कि ब्रह्म की प्राप्ति का माध्यम मानी गई है। व्याकरण दर्शन में 'शब्द-ब्रह्म' की अवधारणा इसी सत्य को रेखांकित करती है कि ध्वनियों और शब्दों के सही प्रयोग से मनुष्य अंतस की चेतना को जाग्रत कर सकता है।
यही कारण है कि भारत में भाषाई विविधता को कभी बाधा नहीं माना गया, बल्कि इसे ज्ञान की समृद्धि के रूप में देखा गया। उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक फैली भारत की विभिन्न भाषा-परिवारों—जैसे इंडो-आर्यन, द्रविड़, आस्ट्रो-एशियाटिक और तिब्बती-बर्मी—ने आपस में संवाद और आदान-प्रदान करके एक ऐसे साझी संस्कृति का निर्माण किया, जिसमें विविधता के भीतर एक सुदृढ़ आंतरिक एकता हमेशा बनी रही। इस समन्वित दृष्टि को जीवित रखने में लोक-साहित्य, लोक-कथाओं और मौखिक परंपराओं का योगदान सर्वोपरि रहा है, जिसने पांडुलिपियों के अभाव में भी ज्ञान को पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित रखा।
मैकालेवादी शिक्षा तंत्र का सबसे बड़ा दुष्परिणाम यह हुआ कि उसने शिक्षा को केवल रोजगार पाने का साधन बना दिया और उसे ज्ञान की मौलिक खोज से अलग कर दिया। जब विद्यार्थी अपनी मातृभाषा के बजाय किसी विदेशी भाषा में जटिल अवधारणाओं को सीखने के लिए बाध्य होता है, तो उसकी ऊर्जा का अधिकांश हिस्सा भाषा की बाधा से जूझने में ही खर्च हो जाता है। इससे उसकी रचनात्मकता, स्वतंत्र चिंतन और नवाचार करने की क्षमता कुंठित हो जाती है।
यदि हम विज्ञान, विधि, चिकित्सा, और प्रौद्योगिकी की तकनीकी शब्दावली को अपनी भाषाओं में सहज और सुलभ बना सकें, तो डिजिटल माध्यमों के ज़रिए दूर-दराज़ के गाँवों में बैठा युवा भी दुनिया भर के ज्ञान तक अपनी मातृभाषा में पहुँच बना सकता है। इसके लिए सरकार, शिक्षाविदों, भाषाविदों और टेक-कंपनियों को एक साथ मिलकर काम करना होगा ताकि भारतीय भाषाओं के समृद्ध डेटाबेस, डिजिटल कोश और अनुवाद मॉडल तैयार किए जा सकें।
14 सितंबर केवल एक उत्सव मनाने या भाषण देने की रस्म अदायगी का दिन नहीं है, बल्कि यह आत्म-विश्लेषण का अवसर है। अपनी भाषा को सम्मान देना किसी अन्य भाषा के प्रति विद्वेष रखना नहीं है, बल्कि अपनी जड़ों के प्रति निष्ठा और स्वाभिमान का परिचय देना है। जब तक भारत का बौद्धिक वर्ग अपनी मातृभाषा में मौलिक चिंतन, शोध और ज्ञान का सृजन नहीं करेगा, तब तक वैश्विक ज्ञान-व्यवस्था में भारत का योगदान अधूरा रहेगा। भारतीय भाषाओं का पुनरुद्धार ही भारत को वैश्विक स्तर पर एक स्वाभिमानी, समर्थ और ज्ञान- समृद्ध राष्ट्र के रूप में पुनर्स्थापित करने का सबसे सशक्त माध्यम है।
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)
Leave Your Comment