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सोशल मीडिया का दौर और मीडिया की स्वाधीनता

The Era of Social Media and Media Independence


उमेश चतुर्वेदी


सोशल मीडिया के विराट विस्तार के बाद मीडिया का स्वरूप ही नहीं, विचार और सोच भी बदल चुका है। मुख्यधारा की मीडिया स्वयं को सोशल मीडिया के चाल, चरित्र, चिंतन और वैचारिकी के साथ ही रूपगत विभेद दिखाने की कोशिश जरूर करता है, लेकिन वास्तविक धरातल पर ऐसा नहीं कर पाता है। आज सोशल मीडिया की पहुंच हमारे दैनंदिन जीवन के हर क्षेत्र में लगातार बढ़ी है, सोते-जागते, खाते-पीते, उठते-बैठते, यात्रा करते और विश्राम करते वक्त सोशल मीडिया कभी चाहे तो कभी अनचाहे रूप से हमारी जिंदगी में दखल देता रहता है, इसलिए सावधानी और विवेक पूर्वक व्यवहार के बावजूद अवचेतन में सोशल मीडिया से प्रक्षेपित ज्ञान, सूचनाएं और कई बार विकृतियां भी घर बनाती जाती है। ऐसे अवचेतन के साथ मुख्यधारा का मीडियाकर्मी भी काम करेगा तो चाहे और कई बार अनचाहे ही सोशल मीडिया से हासिल प्रसंस्कृत, सुसंस्कृत और कुसंस्कृत ज्ञान एवं सूचना के साथ कचरा और भाषा का प्रक्षेपण मुख्यधारा में भी परिलक्षित होना स्वाभाविक है। फिर भी कहा जा सकता है कि एक महीन विभाजक रेखा मुख्यधारा की मीडिया और सोशल मीडिया के बीच स्थित जरूर है।

आज मुख्यधारा का मीडिया भी सोशल मीडिया का मोहताज हो गया है। अपनी कहानियों, अपनी सूचनाओं, अपने विश्लेषणों और अपनी चिंताओं आदि के प्रसार के लिए पारंपरिक प्रसार यानी ब्राडकास्टिंग, टेलीकास्टिंग या प्रतियों के विस्तार पर निर्भर रहते हुए भी सोशल मीडिया का सहारा ले रहा है। इस नाते मुख्यधारा की मीडिया की निर्भरता सोशल मीडिया पर कहीं ज्यादा बढ़ी है। चूंकि सोशल मीडिया का अपना चरित्र है, अपना अलगोरिदम है, जो सिर्फ नकारात्मकता को ही बढ़ावा देता है। इसकी वजह से जब मुख्यधारा का मीडिया सोशल मीडिया का सहारा लेता है तो वह भी नकारात्मकता को ही अपना यूएसपी यानी यूनिक सेलिंग प्वाइंट बनाता है। टाइम्स ऑफ इंडिया समूह का सांध्यकालीन हिंदी टेबलायड अखबार सांध्य टाइम्स कभी अच्छी खबरों को भी बेचने के लिए नकारात्मकता को ही सुर्खी बनाता था। हाल ही में यह अखबार बंद हो गया। क्योंकि सोशल मीडिया ने उसकी उपयोगिता और उसकी जगह, दोनों को ही निगल लिया। अपने उरूज के दिनों सांध्य टाइम्स किस तरह की सुर्खियां बनाता था, इस उदाहरण से समझा जा सकता है। सब जानते हैं कि भारतीय सिनेमा के सर्वकालिक तौर लीजेंड अमिताभ बच्चन हैं। तो एक बार कोई जेबकतरा पकड़ा गया। उसका नाम अमिताभ था। जेबकतरे की गिरफ्तारी कोई बड़ी घटना तो है नहीं। लेकिन सांध्य टाइम्स ने उसे सुर्खी बना दिया, अमिताभ गिरफ्तार। 72 प्वाइंट की मोटी सुर्खी और हॉकर के गले से निकलती तेज आवाज मिलकर अमिताभ की गिरफ्तारी तब पाठक के मन में उत्कंठा भर देती थी कि आखिर अमिताभ बच्चन क्यों गिरफ्तार कर लिए गए। वह उत्सुकता से रूपया-अठन्नी में आने वाले अखबार की प्रति झट हाकर से खरीद लेता था। लेकिन अखबार के उस समाचार के पढ़ने के साथ ही उसकी सारी उत्कंठा काफूर हो जाती थी, क्योंकि खबर तो जेबकतरे अमिताभ के बारे में थी। बहरहाल इस पूरी प्रक्रिया में अखबार की प्रति बिक चुकी होती थी, हाकर का काम हो चुका होता था। सोशल मीडिया ने उसी सुर्खी की जगह को आत्मसात कर लिया है। इसलिए आज मुख्यधारा का मीडिया भी अपने समाचारों को बेचने या दूसरे शब्दों में कहें तो पाठकों-दर्शकों या श्रोताओं तक पहुंचाने के लिए ऐसे ही चमत्कारिक, धोखेबाज, सनसनीखेज सुर्खियों का सहारा लेने में ही भलाई समझता है। यह बात और है कि सूचनाओं के लगातार जारी प्रसार के दौर में आज का पाठक, दर्शक और श्रोता इस तिकड़म को पहले के पाठकों, दर्शकों और श्रोताओं की तुलना में कहीं ज्यादा गहराई से समझ चुका है। इसलिए कई बार वह इस भ्रम और भुलावे में नहीं आता तो कई बार आ भी जाता है।

भारत लाख दावा कर ले कि उसकी शिक्षा व्यवस्था बेहतर हुई है, उसने साक्षरता बढ़ा दी है, लेकिन यह भी सच है कि देश में ज्ञानवान, विवेकी और समझदार लोगों का एक बड़ा वर्ग अब भी है। लेकिन एक खतरा यह है कि आज का मोबाइल फोन और उसके जरिए सोशल और इंटरनेट मीडिया की पहुंच उस तक भी है। सूचनाओं के छद्म और पक्षपाती रूप से यह वर्ग जल्दी प्रभावित होता है। भारतीय लोकतंत्र के लिए आज यही सबसे बड़ा खतरा है। मौजूदा राजनीति इस तथ्य को बखूबी समझती है। इसलिए वह अक्सर ऐसा नैरेटिव गढ़ती है और उसके जरिए ही उस वर्ग को प्रभावित करने की कोशिश करती है, जो अब भी कम पढ़ा-लिखा है, जिसकी राजनीतिक सूचनाओं को लेकर समझ गहरी नहीं है। उदाहरण के लिए वोट चोरी का जो विपक्षी नैरेटिव है, वह इसी प्रक्रिया का परिणाम है। तेरह करोड़ वोट काटे जाने की धारणा भी ऐसा है। मौजूदा विपक्ष सोशल मीडिया के जरिए नैरेटिव गढ़ने में सफल हुआ है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान यानी एसआईआर के जरिए तेरह करोड़ वोटरों का नाम काट दिया है। जबकि हकीकत यह है कि इन तेरह करोड़ में 2.80 करोड़ नाम ऐसे शामिल थे, जिनकी मृत्यु हो चुकी है। इसी तरह डुप्लीकेट वोटरों की संख्या एक करोड़ थी। डुप्लिकेट मतलब एक ही वोटर के दो या दो से ज्यादा जगह नाम थे। इसी तरह वोटर लिस्ट वाली जगह छोड़ चुके मतदाताओं की संख्या 6 करोड़ 30 लाख रही। जबकि वोटर लिस्ट वाली जगह गैरहाजिर या स्थायी रूप से अनुपस्थित वोटरों की संख्या तीन करोड़ रही। चूंकि पारंपरिक मीडिया विशेषकर प्रिंट माध्यम की एक विशेषता है कि वह संदर्भ के साथ बात करता है और तथ्य रखता है। वहां यह सामान्य कार्य प्रक्रिया है। जबकि सोशल मीडिया में संदर्भ की गुंजाइश कम है। वह छापामार शैली में छोटी और संदर्भहीन जानकारियां प्रस्तुत करता है। कम पढ़ा-लिखा व्यक्ति या सामान्य समझ वाला व्यक्ति इसे पूरी खबर मान लेता है। इस तरह संदर्भहीन और हकीकत से दूर नैरेटिव स्थापित हो जाता है।

गांधी के जमाने में कायदे से टेलीविजन भी नहीं था, रेडियो भी आज की तरह नहीं था। सिर्फ प्रिंट माध्यम था। इसके बावजूद वे लोकतंत्र के लिए सही शिक्षा को कितना जरूरी मानते थे। उन्होंने एक जगह लिखा है, “लोकतंत्र को सुचारू रूप से चलाने के लिए वास्तव में तथ्यों का ज्ञान नहीं, बल्कि सही शिक्षा आवश्यक है। पत्रकारिता का वास्तविक उद्देश्य जनता के मन को शिक्षित करना है, न कि उसमें वांछित और अवांछित धारणाओं का भंडार भरना। इसलिए, एक पत्रकार को यह तय करने में अपने विवेक का प्रयोग करना चाहिए कि क्या रिपोर्ट करना है और कब। वैसे भी, पत्रकार केवल तथ्यों तक ही सीमित नहीं रहते। पत्रकारिता 'घटनाओं का बुद्धिमत्तापूर्ण पूर्वानुमान' लगाने की कला बन गई है।“

सवाल यह है कि क्या आज के दौर में ऐसा संभव है। स्वाधीनता के 80 साल के कालखंड बीतने के बावजूद अब तक भारत का ज्यादातर नागरिक ऐसी स्थिति में नहीं पहुंच पाया है, जिसे लोकतंत्र के लायक बुनियादी समझ हो। ऐसे में सवाल यह उठता है कि मौजूदा हालात में क्या किया जाना चाहिए। यह सवाल भी बड़ा है और उसका जवाब ढूंढ़ना भी चुनौतीपूर्ण है।

गांधी की ही चर्चा चली है तो उनके एक और कथन की भी यहां याद आना स्वाभाविक है। उन्होंने इंडियन ओपीनियन निकालते वक्त कहा था कि पत्रकार का विशिष्ट कार्य देश के मन को पढ़ना और उस मन को निश्चित और निर्भीक अभिव्यक्ति देना है। सवाल यह है कि क्या दैत्याकार रूप में जीवन के हर मोड़ पर उपस्थित सोशल मीडिया के कथित पत्रकार देश के मन को सचमुच पढ़ना जानता है, या फिर उस मन की निश्चित और निर्भीक अभिव्यक्ति देता है। इस सवाल का जवाब अंशत: सही हो सकता है। लेकिन मोटे तौर पर इस प्रश्न का उत्तर नकारात्मक ही है। सोशल मीडिया के दौर में भाषा का क्षरण और उसकी मर्यादा का तार-तार होना आम बात हो गई है। सोशल मीडिया के जरिए हो रही पत्रकारिता ने आंखों का शर्म और लिहाज खत्म कर दिया है। दिलचस्प यह है कि ऐसी भाषा राजनीति के शिखर वाले जिम्मेदार और जवाबदेह लोग भी कर रहे हैं। भाषा छिछले स्तर पर उतर गई है। ऐसी भाषा के जरिए क्या प्रभावी बात कही जा सकती है। यहां पर याद आता है, एकात्म मानव धर्म के प्रणेता दीनदयाल उपाध्याय जी से जुड़ा एक प्रसंग। पिछली सदी के छठवें दशक में पाञ्चजन्य के तत्कालीन संपादक यादवराव देशमुख ने तिब्बत और चीन के संबंध में तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू की नीतियों की कड़ी आलोचना की थी। उन्होंने पांचजन्य में पहला संपादकीय लिखा था, जिसका शीर्षक था, ‘गजस्तत्र न हन्यते’। यह एक नीति श्लोक का अंश है। पूरा श्लोक है,

शूरश्च कृतविद्यश्च दर्शनीयोऽसि पुत्रक।

यस्मिन् कुले त्वमुत्पन्नो गजस्तत्र न हन्यते॥

जिसका भावार्थ है कि हे पुत्र! तुम शूरवीर हो, शिक्षित हो और रूपवान भी हो, लेकिन जिस कुल में तुम्हारा जन्म हुआ है, वहाँ हाथी जैसे महाशत्रु से युद्ध करना कुल-धर्म नहीं है।

इस शीर्षक का इस्तेमाल यादवराव देशमुख ने एक तरह से नेहरू पर तंज कसने के लिए किया था। इस संपादकीय को पढ़ने के बाद दीनदयाल उपाध्याय ने यादवराव देशमुख से कहा था, “भाई आपका अग्रलेख बहुत अच्छा रहा, लेकिन उसका शीर्षक आपने शायद बहुत सोचकर नहीं लिखा है। पंडित नेहरू से हमारा वैचारिक मतभेद होना स्वाभाविक है, लेकिन यह भी याद रखना चाहिए कि वे हमारे देश के प्रधानमंत्री हैं। उनकी आलोचना करते समय हल्के शब्दों का प्रयोग करना तो उचित नहीं होगा।“

मुख्यधारा की मीडिया के वर्चस्व के दौर में दीनदयाल भी होते थे और यादवराव देशमुख भी। वे मर्यादा का भी ध्यान रखते थे और नीतियों के विरोध का माद्दा भी रखते थे। लेकिन आज सिर्फ विरोध के लिए विरोध हो रहा है। भाषा तार-तार हो रही है, तथ्यों से खिलवाड़ हो रहा है और फर्जी तरीके सै नैरेटिव गढ़े जा रहे हैं।

क्या ऐसे माहौल वाले मीडिया को हम स्वाधीन, स्वायत्त या स्वतंत्र चेत्ता कह सकते हैं। निश्चित तौर पर इसका जवाब ना में होगा। जीवन मूल्यों का क्षरण और मानवीय गरिमा का त्याग करने वाला मीडिया स्वायत्त और स्वतंत्रचेत्ता कैसे कहा जा सकता है? इन प्रश्नों से गंभीरता से मनन नहीं हुआ, इन गड़बड़ियों को दूर करने की कोशिश नहीं हुई तो तय है कि लोकतंत्र पटरी से उतरेगा। निश्चित तौर पर यह स्वस्थ समाज के हित में नहीं होगा। इसलिए सोशल मीडिया के दौर में मीडिया को अपनी स्वाधीनता की रक्षा के लिए जरूरी और एहतियाती कदमों को उठाना ही होगा।


(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)

 

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