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राजनीति का दौर, मोदी की ओर

The era of politics, towards Modi

राजस्थान की राजनीति में वसुंधरा राजे और अशोक गहलोत अब भी महत्वपूर्ण रूप से हस्तक्षेप रखते हैं। इन दोनों नेताओं की राजनीतिक पूर्ववृत्ति, व्यक्तिगत चरित्र, और कार्यक्षेत्र में किए गए प्रमुख कार्यक्रम का विवरण विस्तार से है इसी के संदर्भ में चर्चा करने के लिए, हम इस विषय पर विस्तार से विचार करेंगे।

वसुंधरा राजे, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की नेतृत्व करने वाली एक प्रमुख राजनेता हैं, जिन्होंने राजस्थान को अपने कुशल नेतृत्व के माध्यम से परिवर्तन और विकास की दिशा में अग्रणी बनाया है। उनका पूर्व मुख्यमंत्री पद में कार्यक्षेत्र, जनप्रियता, और राजनीतिक योगदान राजस्थान की जनता में एक महत्वपूर्ण स्थान पर  हैं। पिछले चुनाव में राजस्थान में "मोदी से बैर नहीं, वसुंधरा तेरी खैर नहीं" कहकर उनको सत्ता से वंचित रहना पड़ा था क्यूंिक उनका राजशाही रवैया और अपनी मनमानी जानता को या यूं कहें की खुद के खेमे को रास नहीं आई, बीते पाँच सालों में उनको इतना तो महसूस हो ही गया की उनके हारने और सत्ता से वंचित रहने के पीछे उनकी अपनी मनमानी और उनका व्यक्तिगत गुट ही था, इसलिए इस बार पार्टी वो गलती दोहराना नहीं चाहती। हालांकि चुनाव परिणाम अपने अंतिम चरम पर ही है और यादी भाजपा इस बार प्रदेश में सरकार बनाने मे सफल होती है तो यह अटकलें लगाई जा रही है कि मुख्यमंत्री की कुर्सी पर वही बैठेगा जिसका संघ से और खासकर दिल्ली दरबार से अच्छे सम्बंध हों और ताल-मेल भी बैठ सके।

वहाँ उनके प्रशासनिक और राजनीतिक नेतृत्व का सामर्थ्य है, जिससे उन्होंने राजस्थान को विकसित करने के लिए कई योजनाएं शुरू की हैं। उनका राजनीतिक दृष्टिकोण और विकास के प्रति समर्पण, उन्हें राजस्थान की राजनीति में एक विशेष स्थान पर बनाए रखने में मदद करते हैं।

अशोक गहलोत, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के एक प्रमुख नेता हैं और उन्होंने भी राजस्थान के मुख्यमंत्री के रूप में अपने करियर को सजीव किया है। उनका सरकारी क्षेत्रोें का अनुभव और व्यापक जनसमर्थन, उन्हें एक प्रमुख राजनीतिक उत्तरदाता बनाते हैं।

गहलोत का सियासी परिचय, उनकी राजनीतिक दक्षता, और उनकी जनप्रियता के कारण, वह राजस्थान की राजनीति में आज भी एक महत्वपूर्ण रूप से उपस्थित हैं। परन्तु उनके काल में राजस्थान में कई घटनाएं हुई है जिसका उनके या पार्टी के पास कोई उत्तर नहीं है फिर भी उनके नेतृत्व में कई विकासात्मक कदम और कार्यक्षेत्र में सुधार, उन्हें राजस्थान के लोगों के बीच लोकप्रिय बनाते हैं।

इन दोनों नेताओं के बीच राजनीतिक प्रतिष्ठा और उनके अनुयायियों के बीच विशेष रूप से यह बात सामने आती है कि राजस्थान में उनके प्रति जनमत अब उतनी स्थिर नहीं है। इसके पीछे कई कारण हैं, जो हम नीचे विचार करेंगे।


 

राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे

कुशल प्रशासनिक नेतृत्व: वसुंधरा राजे ने राजस्थान में मुख्यमंत्री के रूप में कई वर्षों तक सेवा की हैं और उनका प्रशासनिक क्षमता में विश्वास है। उन्होंने प्रशासनिक सुधारों के माध्यम से राजस्थान को एक विकसित राज्य बनाने के लिए कई कदम उठाए हैं।

विकास योजनाएं: उनकी मुख्यमंत्री पद काल में वसुंधरा राजे ने कई विकासात्मक योजनाएं शुरू की, जिनमें समृद्धि के क्षेत्रों में सुधार और लोगों के लिए सुविधाएं शामिल थीं। इसने बीजेपी की प्रतिष्ठा को बढ़ाने के लिए भी कई योजनाएं शुरू की हैं।

सामाजिक योजनाएं: उन्होंने गरीबी, बेरोजगारी, और सामाजिक असमानता के खिलाफ मुकाबले के लिए कई सामाजिक योजनाएं शुरू की हैं जो राजस्थान की जनता के बीच में उनकी लोकप्रियता में सुधार करने में मदद करती हैं।
 

राजस्थान के वर्तमान मुख्यमंत्री अशोक गहलोत:

अधिकारी नेतृत्व: अशोक गहलोत ने अपने प्रशासनिक कौशल और अधिकारी नेतृत्व के माध्यम से राजस्थान की सरकार चलाई जिस ढंग से चलानी चाहिए थी वैसे न चलाकर गैर संपत्ति अर्जन कर अपने बेटे को समृद्ध किया है।

किसानों के हित में कोई कदम नहीं: गहलोत ने किसानों के हित में नाममात्र के लिए कई योजनाएं शुरू की हैं, जो किसानों को आर्थिक सहायता प्रदान करने का उद्देश्य रखती थी। लेकिन धरातल पर ऐसा कुछ नज़र नहीं आया उनका किसानों के प्रति असमर्पण, उन्हें राजस्थान के गाँवों में पूरे क्षेत्र में निंदा का पात्र बना रही है।

शिक्षा में सुधार का कोई प्रकल्प नही: उनकी कार्यक्षेत्र में शिक्षा में सुधार की थोथी पहलों ने राजस्थान के युवा पीढ़ी के लिए शून्य का माहौल बनाया है।

राजस्थान में वसुंधरा राजे और अशोक गहलोत के बीच राजनीतिक प्रतिष्ठा और जनप्रियता का स्तर अभी भी उच्च है लेकिन पांच वर्ष के अशोक गहलोत और सचिन पायलट के कार्यकाल में लोकप्रियता निचले पायदान पर है। इन्होंने अपने क्षेत्र में विकास और परिवर्तन के लिए असमर्पित रूप से काम करने का ढोंग मात्र किया है, जिससे उनका स्थान राजस्थान की राजनीति में अभी कोई ख़ासा प्रभाव पड़ते हुए नहीं दिख रहा है।

भारतीय राजनीति में मोदी मेनिया एक महत्वपूर्ण और विवादास्पद विषय बन गया है। नरेंद्र मोदी, भारत के प्रधानमंत्री, ने कठिनाईयों के बावजूद बहुमत से चुनाव जीते हैं और उनकी नेतृत्व में भारतीय राजनीति में कई बदलाव हुए हैं।

मोदी मानिया की शुरुआत नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री चयन के समय से हुई थी। उनके आत्मनिर्भर भारत के उद्देश्य के साथ, वे एक सशक्त और विकसीत भारत की दिशा में कदम बढ़ा रहे थे। लोगों में उम्मीद और आकंधा का माहौल बनाए रखने के लिए उन्होंने कई कठिन निर्णय लिए और देश को सशक्त बनाने के लिए कई योजनाएं शुरू की।

एक पक्ष से देखें तो, मोदी मेनिया ने राष्ट्र को एक नए दिशा में बढ़ने का संकेत किया है। उनके उद्देश्यों में शामिल हैं स्वच्छ भारत अभियान, आत्मनिर्भर भारत, और जनधन योजना जैसी अनेक योजनाएं जिनका मुख्य उद्देश्य था देश की सामरिक और आर्थिक स्थिति में सुधार करना।

हालांकि, दूसरी ओर, मोदी मेनिया पर आरोप है कि उन्होंने देश को विभाजित करने की कोशिश की है और उनकी नीतियाँ किसानों और गरीब लोगों के खिलाफ हैं। चुनौती यह है कि कुछ लोग मानते हैं कि उनकी नीतियां विशेषत: आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को अनावश्यक तकलीफ पहुंचा रही हैं।

मोदी मेनिया के बीच, विभिन्न राज्यों में हो रहे विधानसभा चुनावों में भी यह देखा गया है कि मोदी का प्रभाव कितना है। विशेष रूप से, उत्तर प्रदेश, बिहार, वेस्ट बंगाल, तमिलनाडु, और केरल में हुए चुनावों में मोदी के प्रति जनसमर्थन का स्तर देखने को मिला।

उत्तर प्रदेश में मोदी मेनिया का सबसे स्पष्ट उदाहरण है, जहां भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने भारी बहुमत के साथ चुनाव जीता। यह दिखाता है कि जनता मोदी के नेतृत्व को अपनी प्राथमिकता मान रही है और उनकी राजनीतिक दिशा पर भरोसा कर रही है।

हालांकि, यह भी सत्य है कि विभिन्न राज्यों में चुनाव नतीजों में बदलाव हुआ है और मोदी के प्रति राजनीतिक दृष्टिकोण पर संकट हो सकता है। उत्तर प्रदेश में हुए चुनावों में सपा-बसपा का साथ देखकर यह स्पष्ट होता है कि कुछ राज्यों में विपक्ष मोदी के प्रति एकजुट हो रहा है और उनके प्रति आम जनमत का आकंधा बढ़ा है।

चुनावी प्रक्रिया में भ्रष्टाचार और दलाली के आरोपों के बावजूद, मोदी मेनिया का दौर भारतीय राजनीति को नए और  अनूठे मोड़ों पर ले जा रहा है। उनकी सशक्त नेतृत्व शैली ने देश को सामरिक, आर्थिक, और राजनीतिक दृष्टिकोण से बदल दिया है ।

वहीं इन पांच राज्यों की बात करें जिसमे मध्यप्रदेश, राजस्थान, और छत्तीसगढ़ महत्वपूर्ण और पूर्णतः हिंदी पट्टी राज्य हैँ, वहाँ मोदी मेनिया अपने चरम पर है

अधिकांश पाँच राज्यों में से तीन राज्यों पर जीत मोदी और उनकी पार्टी का लक्ष्य होगा ही होगा, दो राज्य ऐसे हैँ जहाँ क्षेत्रीय दल की पकड़ मजबूत बताई जा रही है जिसमे तेलंगाना और मिजोरम शामिल है, अटकलें तो ये भी है कि तेलंगाना और िमजोरम में नहीं भाजपा किसी न किसी रूप में किंग मेकर की भूमिका में रहें। आने वाले आम चुनाव की तैयारियां शुरु हो चुकी है और भाजपा अपनी पूरी तैयारी में है क्योंकि चाहे वो विधानसभा चुनाव हो भाजपा या आम चुनाव सभी चुनावों में मोदी का चेहरा ही है जो भाजपा की अधिकांश जीत को तय करता है।

कुछ चुनावों को छोड़ दिया जाए जहां मोदी का हस्तक्षेप भाजपा के कुछ विशेष गुट को रास नहीं आया तो वहाँ भाजपा को हर का सामना भी करना पड़ा है इसलिए एक बात तो तय है कि मोदी हर चुनाव में (एलेक्शन मास्टर) की भूमिका में रहते है, और पार्टी को इसकी ख़ासी आवश्यकता भी है।

एक विशेष बात यह भी है कि मोदी को ये आभास है कि पूर्व के चुनाव के हार के पीछे उनकी कुछ विशेष ग़लत नीतियाँ भी रही है, जिसको हर बार मोदी बड़ी ही चालाकी से धूमिल कर ध्रुवीकरण कर चुनाव रूपी बाढ़ में जीत रूपी नाव लेकर पार उतर जाया करते है परन्तु इस विषय पर उनको स्वचिंतन करने की आवश्यकता भी है ताकि उनकी जीत वाली नाव बीच में न फस पाये।

मोदी जी को चुनौती देना चुनाव में कठिन हो सकता है, लेकिन अजेन्डा और राजनीतिक परिस्थितियों पर निर्भर करता है। मोदी जी की चुनौती नहीं खत्म हो सकती, क्योंकि उनकी राजनीतिक चालबाजी, जनहित में कार्रवाई, और अच्छे नेतृत्व की वजह से वह चुनौती को परिभाषित करते हैं।

उनकी लोकप्रियता का एक कारण है कि वह आर्थिक विकास, स्वच्छता अभियान, और विभिन्न सामाजिक योजनाओं के माध्यम से जनता के बीच में एक सकारात्मक छवि बना रहे हैं। उनकी शक्ति भाषा, जिसमें वह देश की गरिमा और उन्नति के लिए प्रतिबद्ध हैं, उन्हें नेतृत्व में मजबूत बनाती है।

हालांकि, उनकी प्रशासनिक नीतियों और नागरिक स्वतंत्रता को लेकर आलोचना भी है। कई लोग उन्हें विचारशीलता की कमी, मीडिया कंट्रोल, और विरोधी दलों के प्रति कड़ी दृष्टिकोण के लिए आलोचित करते हैं।

चुनावों में उनकी जीत का कारण यह भी है कि उनका राजनीतिक दल, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा), उनके नेतृत्व में मजबूत है और वह विभिन्न राज्यों में एकजुटता बनाए रखने में सक्षम है।

यह सुनिश्चित करना मुश्किल है कि उन्हें हमेशा चुनौती मिलेगी, क्योंकि राजनीतिक परिस्थितियाँ बदलती रहती हैं, लेकिन उनकी जनप्रियता और कार्यक्षमता के कारण, मोदी जी चुनौती से सामना करने में सक्षम हैं।

इसलिए यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी की मोदी व्यक्तिगत रूप से राजनीति की दुनिया में  अमर राजनेता हैँ और अपने साथ अपनी टीम को जीत की सौगात देते रहते हैँ।

 

 

निशांत मिश्रा

(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)

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