
नीलाभ कृष्ण
एक समय था जब सोशल मीडिया को मानव सभ्यता की सबसे बड़ी तकनीकी उपलब्धियों में से एक माना जाता था। कहा गया कि यह दुनिया को एक सूत्र में बांध देगा। दूरियां मिट जाएंगी, विचारों का आदान-प्रदान आसान होगा, लोकतंत्र और मजबूत होगा और हर व्यक्ति को अपनी बात रखने का समान अवसर मिलेगा। फेसबुक, ट्विटर (अब एक्स), इंस्टाग्राम, यूट्यूब और बाद में अनेक अन्य सोशल मीडिया मंचों ने वास्तव में सूचना के प्रवाह को अभूतपूर्व गति दी। व्यवसाय बढ़े, सामाजिक आंदोलनों को नई ऊर्जा मिली और दुनिया पहले से कहीं अधिक जुड़ी हुई दिखाई देने लगी।
लेकिन महज दो दशकों के भीतर तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। जिस तकनीक को लोगों को जोड़ने का माध्यम माना गया था, वही आज उन्हें भीतर से तोड़ रही है। जिस मंच से ज्ञान का प्रसार होना था, वहां भ्रम, अफवाह और घृणा का बाजार अधिक तेजी से फल-फूल रहा है। जो माध्यम लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए बना था, वही समाज को वैचारिक खांचों में बांटने का औजार बनता जा रहा है। सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि सोशल मीडिया का अत्यधिक उपयोग अब केवल व्यक्तिगत आदत नहीं रह गया है, बल्कि यह मानसिक स्वास्थ्य, पारिवारिक जीवन, सामाजिक ताने-बाने, आर्थिक उत्पादकता और यहां तक कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी गंभीर चुनौती बन चुका है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि सोशल मीडिया का अतिरेक अब एक "हाई-रिस्क ज़ोन" में प्रवेश कर चुका है।
समस्या सोशल मीडिया के अस्तित्व में नहीं है। तकनीक स्वयं न अच्छी होती है और न बुरी। उसका प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि उसका उपयोग कैसे किया जाता है। लेकिन वर्तमान डिजिटल व्यवस्था का पूरा आर्थिक मॉडल इस प्रकार विकसित हुआ है कि वह मनुष्य के समय, उसकी भावनाओं और उसके मनोविज्ञान को ही उत्पाद बनाकर बेचता है। जितना अधिक व्यक्ति स्क्रीन पर रहेगा, उतना अधिक लाभ डिजिटल कंपनियों को होगा। इसलिए एल्गोरिद्म का उद्देश्य व्यक्ति को सूचित करना नहीं, बल्कि उसे अधिक से अधिक समय तक स्क्रीन से चिपकाए रखना है। यही वह बिंदु है जहां से समस्या शुरू होती है।
इस अतिरेक का सबसे पहला और सबसे गहरा आघात मानवीय संबंधों पर पड़ा है। विडंबना देखिए कि आज एक व्यक्ति के सोशल मीडिया पर हजारों मित्र हो सकते हैं, लेकिन वास्तविक जीवन में वह पहले से कहीं अधिक अकेला है। परिवार एक ही छत के नीचे रहता है, लेकिन संवाद समाप्त हो रहा है। भोजन की मेज पर जहां कभी हंसी और बातचीत होती थी, वहां आज हर व्यक्ति अपने मोबाइल की स्क्रीन में खोया रहता है। बच्चे माता-पिता से कम और मोबाइल से अधिक बातें करते हैं। मित्र एक-दूसरे से मिलने के बजाय तस्वीरें खींचकर उन्हें सोशल मीडिया पर साझा करने में अधिक व्यस्त रहते हैं। रिश्तों का मूल्य अब भावनाओं से कम और ऑनलाइन प्रतिक्रियाओं से अधिक आंका जाने लगा है।
मानवीय संबंध समय, धैर्य, संवेदनशीलता और प्रत्यक्ष संवाद की मांग करते हैं। लेकिन सोशल मीडिया तात्कालिक प्रतिक्रिया, तुरंत संतुष्टि और निरंतर तुलना की संस्कृति को बढ़ावा देता है। परिणामस्वरूप लोगों की अपेक्षाएं बदल रही हैं। दंपति एक-दूसरे के साथ बिताए समय से अधिक इस बात पर ध्यान देने लगे हैं कि उनके पोस्ट पर कितने लाइक आए। जन्मदिन की शुभकामनाओं का महत्व व्यक्तिगत मुलाकात से अधिक सार्वजनिक पोस्ट में दिखाई देने लगा है। भावनाएं धीरे-धीरे प्रदर्शन में बदल रही हैं।
एक नई सामाजिक प्रवृत्ति सामने आई है जिसे अंग्रेजी में "फबिंग" कहा जाता है—अर्थात सामने बैठे व्यक्ति की उपेक्षा कर मोबाइल में व्यस्त रहना। यह व्यवहार अब इतना सामान्य हो गया है कि लोग इसे असामान्य मानना ही छोड़ चुके हैं। लेकिन मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि यही छोटी-छोटी आदतें धीरे-धीरे रिश्तों की आत्मीयता को समाप्त कर देती हैं। संवाद कम होता है, गलतफहमियां बढ़ती हैं और भावनात्मक दूरी गहराती जाती है।
सोशल मीडिया का सबसे गंभीर प्रभाव युवाओं और किशोरों पर दिखाई देता है। आज का युवा अपनी पहचान वास्तविक जीवन में कम और डिजिटल दुनिया में अधिक तलाश रहा है। उसकी सफलता का पैमाना उसके ज्ञान, व्यक्तित्व या चरित्र से अधिक उसके फॉलोअर्स, लाइक्स और वायरल होने की क्षमता बनती जा रही है। यह निरंतर दबाव उसे ऐसी कृत्रिम दुनिया में धकेल देता है, जहां हर व्यक्ति अपनी जिंदगी का सबसे सुंदर हिस्सा दिखाता है और बाकी सब कुछ छिपा देता है।
तुलना मानव स्वभाव का हिस्सा है, लेकिन सोशल मीडिया ने तुलना को चौबीसों घंटे चलने वाली प्रक्रिया बना दिया है। हर दिन व्यक्ति दूसरों की शानदार यात्राएं, महंगी गाड़ियां, आदर्श शरीर, सफल करियर और खुशहाल जीवन देखता है। वह यह भूल जाता है कि सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाला जीवन वास्तविकता का केवल संपादित संस्करण होता है। परिणामस्वरूप उसे अपना जीवन साधारण, अधूरा और असफल लगने लगता है। यही भावना धीरे-धीरे अवसाद, चिंता और आत्महीनता में बदल जाती है।
विश्वभर में हुए अनेक शोध बताते हैं कि सोशल मीडिया के अत्यधिक उपयोग का संबंध अवसाद, चिंता, अकेलेपन, आत्मसम्मान में कमी और आत्महत्या के बढ़ते जोखिम से जुड़ता जा रहा है। किशोरियों में शरीर को लेकर असंतोष और मानसिक तनाव की समस्या विशेष रूप से बढ़ी है। सुंदर दिखने की होड़, फिल्टर संस्कृति और कृत्रिम सौंदर्य के मानकों ने लाखों युवाओं के आत्मविश्वास को प्रभावित किया है।

सोशल मीडिया का एक और खतरनाक पक्ष इसकी नशे जैसी प्रकृति है। हर नोटिफिकेशन, हर लाइक और हर कमेंट मस्तिष्क में डोपामिन का हल्का स्राव करता है। यही प्रक्रिया व्यक्ति को बार-बार मोबाइल देखने के लिए प्रेरित करती है। धीरे-धीरे यह आदत मजबूरी बन जाती है। अनेक लोग कुछ मिनट भी मोबाइल से दूर नहीं रह पाते। सुबह उठते ही पहला काम मोबाइल देखना और रात को सोने से पहले आखिरी काम सोशल मीडिया स्क्रॉल करना एक सामान्य व्यवहार बन चुका है।
इसका सीधा प्रभाव नींद पर पड़ता है। देर रात तक स्क्रीन देखने से शरीर की जैविक घड़ी प्रभावित होती है। नींद पूरी नहीं होती, एकाग्रता कम होती है, चिड़चिड़ापन बढ़ता है और कार्यक्षमता घटती है। लंबे समय तक नींद की कमी हृदय रोग, मधुमेह, मोटापा और मानसिक विकारों का जोखिम भी बढ़ाती है।
शारीरिक स्वास्थ्य पर भी इसका प्रभाव कम गंभीर नहीं है। घंटों तक एक ही मुद्रा में बैठे रहने से मोटापा, कमर दर्द, गर्दन की समस्या, रीढ़ की विकृतियां, आंखों पर दबाव और मांसपेशियों की कमजोरी जैसी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। आज डॉक्टर "टेक्स्ट नेक" और "डिजिटल आई स्ट्रेन" जैसी नई चिकित्सकीय समस्याओं का उपचार कर रहे हैं, जिनका मुख्य कारण अत्यधिक स्क्रीन टाइम है।
सबसे अधिक चिंता बच्चों को लेकर है। उनका बचपन धीरे-धीरे स्क्रीन में कैद होता जा रहा है। खेल के मैदान खाली हो रहे हैं और मोबाइल गेम्स बच्चों के नए साथी बन गए हैं। कल्पनाशक्ति, पुस्तक पढ़ने की आदत और सामाजिक व्यवहार पर इसका नकारात्मक प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। शिक्षक बताते हैं कि विद्यार्थियों की एकाग्रता पहले की तुलना में काफी कम हो गई है। वे लंबे समय तक किसी विषय पर ध्यान केंद्रित नहीं कर पाते क्योंकि उनका मस्तिष्क लगातार छोटे-छोटे वीडियो और त्वरित मनोरंजन का आदी हो चुका है।
शिक्षा की गुणवत्ता पर भी इसका असर पड़ रहा है। जानकारी और ज्ञान के बीच का अंतर धीरे-धीरे मिटता जा रहा है। इंटरनेट पर उपलब्ध सूचनाओं को ही ज्ञान मान लिया जाता है, जबकि वास्तविक शिक्षा गहन अध्ययन, विश्लेषण और चिंतन की मांग करती है। सोशल मीडिया इस प्रक्रिया को बाधित करता है। परिणामस्वरूप सतही ज्ञान बढ़ता है लेकिन बौद्धिक गहराई घटती जाती है।

सोशल मीडिया ने साइबर बुलिंग की समस्या को भी भयावह बना दिया है। पहले किसी बच्चे का उत्पीड़न स्कूल तक सीमित रहता था, लेकिन अब ऑनलाइन अपमान चौबीसों घंटे उसका पीछा करता है। गाली-गलौज, फर्जी तस्वीरें, अपमानजनक टिप्पणियां और संगठित ट्रोलिंग मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव डालती हैं। अनेक देशों में किशोरों की आत्महत्या के मामलों में साइबर बुलिंग एक महत्वपूर्ण कारण के रूप में सामने आई है।
लेकिन सोशल मीडिया का सबसे चिंताजनक पक्ष केवल व्यक्तिगत या सामाजिक नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा से भी जुड़ा हुआ है। इक्कीसवीं सदी में युद्ध का स्वरूप बदल चुका है। अब केवल सीमाओं पर लड़ाइयां नहीं लड़ी जातीं, बल्कि समाज के भीतर भी सूचना और मनोविज्ञान के स्तर पर संघर्ष चलता है। सोशल मीडिया इस नए सूचना युद्ध का सबसे बड़ा हथियार बन चुका है।
आज शत्रु देश, आतंकी संगठन, साइबर अपराधी और विदेशी प्रभाव समूह सोशल मीडिया का उपयोग जनमत को प्रभावित करने, अफवाह फैलाने, सामाजिक तनाव पैदा करने और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर लोगों का विश्वास कमजोर करने के लिए कर रहे हैं। यह युद्ध बिना गोली चलाए लड़ा जाता है। इसका उद्देश्य लोगों के मन में संदेह, भय और विभाजन पैदा करना होता है।
भारत जैसे विविधताओं से भरे देश में यह खतरा और अधिक गंभीर हो जाता है। धर्म, जाति, भाषा और क्षेत्रीय पहचान जैसे संवेदनशील विषयों पर फर्जी वीडियो, पुरानी तस्वीरें और भ्रामक संदेश कुछ ही मिनटों में लाखों लोगों तक पहुंच जाते हैं। कई बार दूसरे देशों की घटनाओं को भारत की घटना बताकर साझा किया जाता है। संपादित वीडियो और कृत्रिम कथाएं सामाजिक तनाव को भड़काने का माध्यम बन जाती हैं। जब तक प्रशासन सत्य सामने लाता है, तब तक अफवाह अपना काम कर चुकी होती है।
भीड़ द्वारा हिंसा, सांप्रदायिक तनाव और कानून-व्यवस्था की अनेक घटनाओं में सोशल मीडिया आधारित अफवाहों की भूमिका सामने आ चुकी है। एक झूठा संदेश हजारों लोगों को सड़कों पर ला सकता है। डिजिटल दुनिया में सूचना की गति सत्यापन की गति से कहीं अधिक तेज हो चुकी है। यही स्थिति सबसे बड़ी चुनौती है।
आतंकवादी संगठन भी सोशल मीडिया का भरपूर उपयोग कर रहे हैं। वे युवाओं को कट्टरपंथ की ओर आकर्षित करने, प्रचार सामग्री फैलाने और भर्ती के लिए डिजिटल माध्यमों का इस्तेमाल करते हैं। पहले जहां कट्टरपंथी विचारधारा के प्रसार के लिए भौतिक नेटवर्क की आवश्यकता होती थी, वहीं अब यह प्रक्रिया पूरी तरह ऑनलाइन संचालित की जा सकती है। अकेलापन, असंतोष या पहचान के संकट से गुजर रहे युवा ऐसे नेटवर्क के आसान लक्ष्य बन जाते हैं।
साइबर अपराधों का विस्तार भी सोशल मीडिया के माध्यम से अभूतपूर्व गति से हुआ है। फर्जी निवेश योजनाएं, रोमांस स्कैम, फिशिंग, पहचान की चोरी, ऑनलाइन ब्लैकमेल और डिजिटल धोखाधड़ी के अधिकांश मामलों की शुरुआत सोशल मीडिया से ही होती है। लोग अनजान व्यक्तियों पर भरोसा कर अपनी निजी जानकारी साझा कर देते हैं, जिसका बाद में आर्थिक और मानसिक शोषण किया जाता है।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने इस चुनौती को और जटिल बना दिया है। अब डीपफेक तकनीक के माध्यम से किसी भी व्यक्ति की आवाज़ और चेहरा हूबहू तैयार किया जा सकता है। किसी राजनीतिक नेता, सैन्य अधिकारी या प्रसिद्ध व्यक्ति के नाम से झूठा वीडियो बनाकर कुछ ही घंटों में करोड़ों लोगों तक पहुंचाया जा सकता है। चुनाव, युद्ध या राष्ट्रीय संकट के समय ऐसी तकनीकें लोकतंत्र और राष्ट्रीय सुरक्षा दोनों के लिए गंभीर खतरा बन सकती हैं।
सोशल मीडिया का एक और दुष्प्रभाव यह है कि इसने समाज को वैचारिक द्वीपों में बांटना शुरू कर दिया है। एल्गोरिद्म वही सामग्री दिखाते हैं जो व्यक्ति पहले से पसंद करता है। परिणामस्वरूप उसे विपरीत विचार सुनने का अवसर ही नहीं मिलता। धीरे-धीरे समाज संवाद की जगह टकराव की ओर बढ़ने लगता है। असहमति को शत्रुता समझा जाने लगता है। लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति—विचारों का स्वस्थ आदान-प्रदान—कमजोर होने लगता है।
इस पूरी स्थिति के लिए केवल उपयोगकर्ता जिम्मेदार नहीं हैं। सोशल मीडिया कंपनियों की भी बड़ी जिम्मेदारी है। उनका पूरा व्यापार मॉडल लोगों का अधिक से अधिक समय स्क्रीन पर बनाए रखने पर आधारित है। इसलिए एल्गोरिद्म अक्सर वही सामग्री आगे बढ़ाते हैं जो सनसनीखेज, भावनात्मक या विवादास्पद हो। सत्य की तुलना में उत्तेजना अधिक तेजी से फैलती है क्योंकि वही अधिक क्लिक और विज्ञापन राजस्व उत्पन्न करती है। इसलिए तकनीकी कंपनियों को एल्गोरिद्म की पारदर्शिता, बच्चों की सुरक्षा, फर्जी खातों पर नियंत्रण और भ्रामक सामग्री के विरुद्ध अधिक उत्तरदायित्व निभाना होगा।

सरकारों के सामने भी चुनौती आसान नहीं है। एक ओर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करनी है, दूसरी ओर समाज को डिजिटल अराजकता से भी बचाना है। संतुलित और पारदर्शी नियमन ही इसका समाधान हो सकता है। केवल कानून पर्याप्त नहीं होंगे। डिजिटल साक्षरता को शिक्षा का अनिवार्य हिस्सा बनाना होगा ताकि नागरिक सत्य और असत्य में अंतर करना सीख सकें।
परिवारों की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। बच्चों को केवल मोबाइल छीनकर सुरक्षित नहीं बनाया जा सकता। उन्हें डिजिटल अनुशासन, वास्तविक संवाद और तकनीक के संतुलित उपयोग की शिक्षा देनी होगी। माता-पिता स्वयं यदि हर समय मोबाइल में व्यस्त रहेंगे तो बच्चे भी वही व्यवहार अपनाएंगे। इसलिए परिवर्तन की शुरुआत घर से ही होनी चाहिए।
समाधान सोशल मीडिया को त्यागने में नहीं, बल्कि उसके विवेकपूर्ण उपयोग में है। यह आज भी शिक्षा, व्यापार, आपदा प्रबंधन, नवाचार, शोध और वैश्विक संवाद का प्रभावी माध्यम है। समस्या उसका अस्तित्व नहीं, बल्कि उसका अतिरेक है। जब स्क्रीन वास्तविक जीवन का विकल्प बनने लगे, जब आभासी पहचान वास्तविक व्यक्तित्व पर हावी हो जाए और जब डिजिटल दुनिया मानवीय संवेदनाओं की जगह लेने लगे, तब समाज को रुककर आत्ममंथन करना ही होगा।
सभ्यताएं केवल तकनीकी प्रगति से महान नहीं बनतीं; वे इस बात से महान बनती हैं कि वे तकनीक को मानव हित में कितना नियंत्रित कर पाती हैं। यदि मनुष्य एल्गोरिद्म का स्वामी बनने के बजाय उसका दास बन गया, तो यह प्रगति नहीं, पराधीनता होगी। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम सोशल मीडिया को अपने जीवन का साधन बनाए रखें, उसे जीवन का स्वामी न बनने दें।
क्योंकि अंततः सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि हम सोशल मीडिया का कितना उपयोग करते हैं। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि कहीं सोशल मीडिया हमारा उपयोग तो नहीं कर रहा? यदि इस प्रश्न का उत्तर हमें बेचैन करता है, तो समझ लेना चाहिए कि खतरे की घंटी बज चुकी है। यह केवल व्यक्तिगत जीवन का संकट नहीं, बल्कि समाज, संस्कृति और राष्ट्र की सामूहिक चेतना का प्रश्न है। यदि समय रहते संतुलन स्थापित नहीं किया गया, तो यह डिजिटल अतिरेक आने वाली पीढ़ियों से केवल उनका समय ही नहीं, बल्कि उनका मानसिक स्वास्थ्य, उनके संबंध, उनका सामाजिक विश्वास और अंततः राष्ट्र की आंतरिक सुरक्षा तक छीन सकता है।
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)
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