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जंग का आगाज

The beginning of war

भारत की गिनती दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के रुप में होती है। जहां पर कहीं ना कहीं और किसी ना किसी स्तर पर चुनाव चलते ही रहते हैं। इसमें विधानसभा चुनाव की भूमिका बड़ी अहम होती है, जिसमें नागरिक राज्य स्तर पर अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करते हैं। देश के पांच राज्यों--मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और मिजोरम--में चुनाव होने वाले हैं। इन सभी राज्यों के चुनाव अपने-अपने क्षेत्र के राजनीतिक परिदृश्य को आकार देने और देश की राजनीति को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। इसमें से सांस्कृतिक रूप से समृद्ध और राजनीतिक रूप से जीवंत राज्य राजस्थान में, अशोक गहलोत सरकार को न केवल मजबूत सत्ता विरोधी भावना का सामना करना पड़ रहा है, बल्कि कांग्रेस पार्टी को आंतरिक संघर्ष से भी जूझना पड़ रहा है। इस राज्य में केन्द्र सरकार की विकास योजनाओं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करिश्माई नेतृत्व के कारण भाजपा को बढ़त दिखाई दे रही है। उधर नक्सली हिंसा से प्रभावित राज्य छत्तीसगढ़ भी भारतीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यहां भूपेश बघेल सरकार ने किसानों और आदिवासी समुदायों के उत्थान के लिए कई कदम उठाए हैं। राज्य सरकार वर्तमान में 2800 रुपये प्रति क्विंटल की दर से चावल खरीदती हैं। कांग्रेस का आश्वासन है कि अगर वह दोबारा चुनाव जीतती है तो इसे बढ़ाकर 3600 रुपये किया जाएगा। इसके अलावा, उन्होंने चावल की खरीद मात्रा 15 क्विंटल प्रति एकड़ से बढ़ाकर 20 क्विंटल प्रति एकड़ करने का भी वादा किया है। आदिवासी वोट बैंक को साधने के लिए कांग्रेस सरकार बेहतर दरों पर तेंदू पत्ते और इमली की खरीद भी कर रही है।  जिसे आगे और बढ़ाने का आश्वासन दिया गया है। आम नागरिकों के लिए सरकार 100 यूनिट तक की खपत पर बिजली पर 50 फीसदी सब्सिडी देती है। अपने इन क्रियाकलापों की वजह से मुख्यमंत्री भूपेश बघेल बेहद लोकप्रिय भी हैं और भाजपा के पास इसका कोई तोड़ नहीं है। उधर भारत का दिल कहे जाने वाले मध्य प्रदेश में कांटे की जंग दिखाई दे रही है। वर्तमान मुख्यमंत्री शिवराज सिंह सरकार के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर प्रबल है। वहीं पार्टी के भीतर का आंतरिक विवाद घुन की तरह खोखला कर रहा है।   जैसे-जैसे आगामी चुनाव नजदीक आ रहे हैं, दोनों प्रमुख दल यानी कांग्रेस और भाजपा, इस महत्वपूर्ण राज्य में बढ़त हासिल करने के लिए जोरदार प्रचार में जुट गए हैं।  तेलंगाना में आगामी चुनावों में विपक्ष की ओर से नई चुनौती पेश की जा रही है।  भाजपा और कांग्रेस राज्य में पांव जमाने की होड़ में हैं। मिजोरम की राजनीति में अक्सर  सत्ता का परिवर्तन शांतिपूर्ण तरीके से होता है, जो कि इसे दूसरे राज्यों से अलग बनाता है।

इन पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव कई मुद्दों के इर्द-गिर्द घूमते  दिखाई दे रहे हैं, जिसमें से आर्थिक विकास, रोजगार सृजन और गरीबी उन्मूलन जैसे मुद्दे  हैं। प्रत्येक राज्य के मतदाता अपनी सरकार का चुनाव इन क्षेत्रों में उसके प्रदर्शन के आधार पर करेंगे। इन राज्यों की सांस्कृतिक और क्षेत्रीय विविधता भी चुनावी नतीजों पर असर डालेगी।  क्षेत्रीय पहचान और प्रत्येक राज्य के विशिष्ट मुद्दे चुनावी परिणाम पर हावी हो सकते हैं। छत्तीसगढ़ में नक्सली हिंसा और संघर्ष एक गंभीर मुद्दा बना हुआ है, जिसका निदान तलाश करने में कांग्रेस सरकार की क्षमता चुनाव में एक महत्वपूर्ण कारक साबित होगी। भूमि अधिकार और आदिवासी कल्याण से संबंधित मुद्दे अक्सर इन राज्यों की राजनीति में केंद्रीय भूमिका निभाते हैं, खासकर छत्तीसगढ़ और मिजोरम में। इसके अलावा प्रचार रणनीति, गठबंधन और उम्मीदवारों का चयन जैसे कई और कारक भी चुनाव परिणामों पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालेंगे। एक नजरिए से देखा जाए तो मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और मिजोरम में विधानसभा चुनाव भारत के विविध राजनीतिक परिदृश्य का प्रतिबिंब हैं। ये चुनाव न केवल इन राज्यों के लिए सरकार का चुनाव करेंगे, बल्कि 2024 के लोकसभा चुनावों पर भी प्रभाव डाल सकते हैं। क्योंकि इन चुनावों के ठीक बाद लोकसभा चुनाव होने वाले हैं। इसीलिए इन पांच राज्यों के नतीजे संभावित राजनीतिक गठबंधनों और रणनीतियों की दिशा तय करेंगे। इन राज्य चुनावों के नतीजे मतदाताओं की भावना, पार्टी की ताकत और संभावित गठबंधनों के संकेत के रूप में काम करेंगे, जो कि भारत के गतिशील लोकतंत्र का एक अनिवार्य पहलू है। ये चुनाव भारतीय लोकतंत्र की जीवंतता और इसे संचालित करने वाली विविध क्षेत्रीय भावनाओं के अस्तित्व का प्रबल प्रमाण हैं।

 

 


दीपक कुमार रथ

 

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