छत्तीसगढ़ में नक्सलियों की कमर टूट गई है। प्रतिबंधित सीपीआई (माओवादी) में नंबर-2 की हैसियत रखने वाले पोलित ब्यूरो सदस्य मल्लोजुला वेणुगोपाल राव उर्फ भूपति और हमले की रणनीति बनाने वाले माओवादी कमांडर 'अशन्ना' के आत्मसमर्पण से नक्सली आंदोलन को भारी नुकसान हुआ है। दोनों नक्सली कमांडरों ने लगभग 208 कार्यकर्ताओं के साथ हथियार डाला है। जिसके बाद दंडकारण्य के कई इलाके नक्सलियों से खाली हो गए हैं।
गृहमंत्री शाह की रणनीति से नक्सली हुए पस्त
सुरक्षा बलों के लगातार अभियान से माओवाद और नक्सलवाद की जड़ें कट चुकी हैं। इससे माओवादी गतिविधियां दिन-ब-दिन सीमित होती जा रही हैं। छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले के कर्रेगुट्टा पहाड़ी क्षेत्र में चलाए गए संयुक्त अभियान में सुरक्षा बलों ने महज 21 दिनों में 31 कुख्यात नक्सलियों को मार गिराया है। यह ऑपरेशन छत्तीसगढ़-तेलंगाना सीमा पर स्थित कुर्रगुट्टालू पहाड़ पर अंजाम दिया गया। इस कार्रवाई में भारी मात्रा में हथियार और गोला-बारूद भी बरामद हुए हैं। इस ऐतिहासिक ऑपरेशन पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने सुरक्षा बलों को बधाई दी। उन्होंने कहा कि यह नक्सलवाद के खिलाफ अब तक का सबसे बड़ा अभियान है, जिसमें 31 नक्सलियों को मार गिराया गया। शाह ने बताया कि जिस कुर्रगुट्टालू पहाड़ पर पहले नक्सलियों का आतंक था, वहां अब गर्व से तिरंगा लहरा रहा है। यह पहाड़ PLGA बटालियन-1, DKSZC, TSC और CRC जैसे बड़े नक्सली गिरोहों का मुख्यालय था, जहां नक्सलियों को ट्रेनिंग दी जाती थी और हथियार बनाए जाते थे।
गृह मंत्री शाह ने यह भी बताया कि इस ऑपरेशन को सफलतापूर्वक केवल 21 दिनों में पूरा किया गया। खराब मौसम और दुर्गम पहाड़ी रास्तों के बावजूद CRPF, STF और DRG के जवानों ने बहादुरी से नक्सलियों का सामना किया। उन्होंने कहा कि "छत्तीसगढ़ में कभी माओवादियों के गढ़ रहे अबूझमाड़ और उत्तर बस्तर अब नक्सलियों से मुक्त हो चुके हैं। उनकी थोड़ी बहुत मौजूदगी सिर्फ दक्षिण बस्तर में है। हम जल्द ही वहां से भी उनका सफाया कर देंगे।"
छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद का आगाज
छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद 1960 के दशक के अंत में शुरू हुआ। यह भोपालपटनम के रास्ते राज्य के दक्षिणी भाग में स्थित बस्तर की शांत घाटी में फैलता चला गया। घने जंगलों, खतरनाक पहाड़ी जमीन और बस्तर के कई जिलों तक पुलिस-प्रशासन की पहुंच ना हो पाने के कारण छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद ने अपनी जड़ें जमा लीं। 25 मई, 1967 को पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी से नक्सलवाद की आधिकारिक शुरुआत हुई। जिसके बाद यह झारखंड, ओडिशा, आंध्र प्रदेश सहित 12 राज्यों के 220 जिलों में फैलता चला गया। छत्तीसगढ़ भौगोलिक रूप से इन सभी राज्यों से घिरा हुआ है। इसलिए यहां नक्सलवाद ने अपनी जमीन मजबूत कर ली। लेकिन छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद को खाद-पानी मिलने के पीछे एक तात्कालिक घटना भी थी। जिसने इस जंगली भूमि में नक्सलवाद की खतरनाक विचारधारा को भरपूर खाद-पानी प्रदान किया। वह थी लोकप्रिय राजा प्रवीरचंद्र भंजदेव की हत्या।

क्यों हुई थी राजा की हत्या
जब से बस्तर भारत संघ का हिस्सा बना, खासतौर से 1960 के बाद यहां पर बड़े पैमाने पर गैर-आदिवासियों का प्रवेश होने लगा। इसके अलावा बांग्लादेश से आए शरणार्थियों को भी बड़ी संख्या में जंगल के अंदर बसाया गया। दूसरी तरफ 1966 में जापान के साथ बैलाडिला लौह खदान खोलने का समझौता हुआ जिसके बाद यहां गैर आदिवासियों की संख्या बढ़ने लगी और आदिवासी अल्पसंख्यक होते चले गए। बैलाडिला से कोत्तावाल्सा (आंध्रप्रदेश) तक रेल लाइन बिछाई गई। इससे दर्जनों गांव उजड़ गए और हजारों आदिवासी लोग विस्थापन का शिकार हुए। रेल लाइन काम के लिए मजदूरों को आंध्र और ओडिशा से लाया गया। बस्तरिया आदिवासी को मजदूर काम भी नहीं दिया गया। राजा प्रवीर इस भेदभाव से बेहद दुखी थे। उन्होंने रेल लाईन को उखाड़ फेकने व जल-जंगल जमीन की रक्षा – के लिए आम जनता को संगठित करना शुरू किया।
आजादी के बाद भी आदिवासियों की मुख्य समस्या जंगल व जमीन ही बनी हुई थी। जंगल पर उनको कोई अधिकार नहीं रह गया था। पूंजीपतियों के फायदे के लिए वनों का दोहन किया जा रहा था। जनजाति सुरक्षा कानून 1956 जैसे कानूनों से आम आदिवासी को कोई फायदा नही मिल रहा था। राजा प्रवीर ने सरकार की आदिवासी विरोधी नीतियों का कड़ा विरोध किया। बस्तर की जनता खेती व वनोपज पर जीवनयापन करती है लेकिन सरकार उनके लिए सिंचाई आदि की कोई व्यवस्था नहीं करती थी। पूरे बस्तर में मात्र 27.5 प्रतिशत भूमि पर खेती होती थी, लेकिन उसके लिए भी सिंचाई मात्र 2.9 प्रतिशत ही थी। बस्तर के आदिवासी किसान इतने दरिद्र थे कि 2610 लकड़ी के हलों पर मात्र एक हल लोहे का होता था। गैर आदिवासियों के बढ़ते जाने से जंगल बर्बाद हो रहा था। इसका विरोध करते हुए अपनी जनता को गोलबंद करने के लिए 1955 में राजा ने आदिवासी किसान मजदूर संगठन (AKMS) बनाया। उन्होंने संगठन के सदस्यों के लिए नियम बनाया कि कोई जंगल की जमीन को नहीं छोड़ेगा, राजा की सम्पति राजा को देने के लिए लड़ेगा आदि आदि। गांव-गांव में किसान मजदूर संगठन की इकाईयां गठित की गई, सदस्यता रसीद के साथ-साथ, महिला-पुरुष सदस्यों को संगठन की वर्दी भी बांटी गई। आदिवासी जनता अपने राजा को दिल से प्यार व विश्वास करती थी, राजा भी उनका भरपूर ध्यान रखते थे।
जनता के अंदर राजा की लोकप्रियता को देखते हुए कांग्रेस सरकार ने राजा प्रवीर चंद्र को अपनी तरफ खींचने के लिए बहुत कोशिश की। 1957 में उन्हें विधानसभा चुनाव लड़ने का लालच देकर जिला कांग्रेस पार्टी अध्यक्ष का पद दिया गया। चुनाव जीतकर राजा विधानसभा सदस्य भी बन गए। लेकिन इसके बाद भी आदिवासी जनता से भेदभाव थमा नहीं। राजा इससे नाराज होकर विधान सभा सदस्यता से इस्तीफा देकर बाहर आ गए। जिसके बाद सरकार और राजा के बीच सीधा संघर्ष शुरु हो गया।
उसी समय बस्तर में CPI ने भी अपने संगठन का निर्माण किया था। उन्होंने भी जमीन जप्ती संघर्ष का समर्थन करते हुए दारू न पीने का प्रचार किया। सेवा दल के जंगल काट कर जमीन बांटने की कार्रवाई को रोकने के लिए सरकार ने 22000 एकड़ जमीन को आदिवासियों को देने का निर्णय लिया। सेवा दल ने गांव-गांव जाकर जगदलपुर में कांग्रेस के खिलाफ बड़े पैमाने पर सभाओं का आयोजन किया। हजारों संख्या में आदिवासी रैलियों में आते थे। इसका फायदा उठाने के लिए कांग्रेस विरोधी प्रजा सोशलिस्ट व रामराज्य दल जैसी पार्टियां भी राजा के पक्ष में खड़ी हो गई थी। सेवा दल और राजा के आंदोलन से सरकार में हड़कंप मच गया। सरकार को इस बात का डर सताने लगा कि यह आंदोलन अब अलग बस्तर राज्य की मांग करने लगेगा और हिंसक रूप धारण करेगा। सरकार ने बस्तर के कई हिस्सों व जगदलपुर में विशेष सशस्त्र बल को तैनात कर दिया।

सरकार ने राजा प्रवीर चन्द्र का दो लाख का भत्ता रद्द कर दिया और राजा की उपाधि भी छीन ली। जनता में इसके खिलाफ आक्रोश फैलने लगा। सेवा दल को दबाने के लिए राजा प्रवीर चन्द्र को फरवरी 1961 को गिरफ्तार कर लिया गया। उसे गिरफ्तार कर नरसिंह गढ़ जेल में बंद कर दिया गया। राजपरिवार में फूट डालने के लिए प्रवीर के भाई विजय चन्द्र को सरकार ने राजा घोषित कर उसे दो लाख भत्ता देना शुरू कर दिया। सरकार ने प्रचार किया कि प्रवीरचंद्र विद्रोह की तैयारी कर रहे थे। इसलिए उन्हें पकड़ कर जेल में रखा गया। लेकिन इससे संघर्ष थमा नहीं और आखिरकार जेल से बाहर आने के बाद सरकार ने राजा की हत्या करवा दी।
राजा की हत्या से छत्तीसगढ़ में जम गए नक्सलियों के पांव
साल 1966 में राजा प्रवीर चंद्र भंज देव की यह हत्या बस्तर के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुई, जिससे इस क्षेत्र में नक्सली आंदोलन उभरने लगा। क्योंकि बस्तर की आदिवासी जनता के बीच राजा प्रवीर चंद्र भंजदेव इतने लोकप्रिय थे कि भोले-भाले आदिवासी उन्हें देवता की तरह पूजते थे। राजा भी अपनी जनता को संतान की तरह मानते थे। लेकिन यह बात ना तो अंग्रेजी शासन को अच्छी लगती थी और ना ही आजादी मिलने के बाद अंग्रेजी शासन की तर्ज पर काम करने वाली कांग्रेस सरकार को पसंद आई।
दरअसल 1921 में राजा रुद्र प्रताप देव की मृत्यु के बाद, उनकी पुत्री प्रफुल्ल कुमारी को रानी बनाया गया। लेकिन वह अंग्रेजी शासन का जमाना था। अंग्रेज़ बस्तर की खनिज से समृद्ध भूमि पर नियंत्रण करना चाहते थे, जिसके कारण राजनीतिक चालबाजियों का दौर चला। आखिरकार प्रफुल्ल कुमारी की संदिग्ध परिस्थितियों में विदेश में मृत्यु हो गई। अंग्रेजों ने बस्तर पर नियंत्रण रखने के लिए इंग्लैण्ड में पले-बढ़े युवा प्रवीर चंद्र भंजदेव को राजा बनाया। ताकि वे अपने हितों के लिए उनका इस्तेमाल कर सकें। लेकिन राजा प्रवीर चंद्र का दिल अपनी आदिवासी जनता के लिए पीड़ित रहता था। वह अंग्रेजों द्वारा अपनी जनता पर हो रहे अत्याचार को सहन नहीं कर पाते थे। इस बीच 1947 में अंग्रेजी शासन खत्म हो गया। लेकिन मध्य प्रदेश में शासनारुढ़ हुई तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने भी अंग्रेजों की शोषण व्यवस्था को जारी रखा। जिसके विरोध में राजा प्रवीर चंद्र भंज देव ने सरकार और खनन कंपनियों के अतिक्रमणकारी हितों से अपने लोगों के अधिकारों की रक्षा करने की कोशिश की। बस्तर के संसाधनों के दोहन के उनके विरोध के कारण राज्य में सत्तासीन कांग्रेस सरकार के साथ तनाव पैदा हो गया। राजा प्रवीर चंद्र ने जल, जंगल और जमीन की लड़ाई को लेकर कांग्रेस सरकार से सीधी टक्कर लेनी शुरू कर दी। उस समय मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री द्विगुणा राव मण्डलोई थे। जिनके आदेश पर 25 मार्च 1966 को राज्य पुलिस ने बस्तर के शाही महल पर हमला कर दिया। 25 मार्च 1966 को राजमहल के सामने भारी संख्या में पुलिस बल कि तैनाती की गई। राजमहल के सामने हजारों लोग जमा थे, उनके हाथ में भी तीर धनुष थे। उस दिन पुलिस व जनता के बीच भीषण मुठभेड़ हुई। कई पुलिस वाले घायल हुए, कुछ मारे गए। यह देखने और इस सब को रोकने के लिए राजा प्रवीरचंद्र महल से बाहर निकले। तभी पुलिस ने राजा को गोलियों से भून डाला। सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक इस हत्याकांड में राजा सहित 11 आदिवासी लोग शहीद हुए। राजा की हत्या से उनकी आदिवासी प्रजा को काफी दुख पहुंचा। यहां तक की मृत्यु के बाद भी बस्तर के आदिवासियों को अपने राजा की पार्थिव देह के दर्शन करने नहीं दिया गया। जिसकी वजह से सभी को बड़ा आघात लगा। आम जनता ने राज्य पुलिस को भी अंग्रेजों की तरह नए उत्पीड़क के रूप में देखा। सत्ता प्रतिष्ठान से बस्तर की आदिवासी जनता का विश्वास उठ गया और इस स्थिति का फायदा नक्सलियों ने उठाया। राजा की मृत्यु से जनजातीय आबादी में व्याप्त असंतोष ने नक्सलवादी विचारधारा के प्रति उनका झुकाव बढ़ा दिया।
राजा की हत्या के बाद नक्सलियों ने ऐसे किया खुद का मजबूत
राजा प्रवीर चंद्र भंजदेव की हत्या के बाद आदिवासी जनता की बेचैनी का फायदा नक्सलियों ने जमकर उठाया। बस्तर का एक बड़ा भूभाग अब भी देश दुनिया की मुख्यधारा से कटा हुआ है। वहां बुनियादी सुविधाएं वर्तमान काल तक पूरी तरह नहीं पहुंच पाई है। मुख्यधारा में नहीं होने के कारण माओवादियों ने आदिवासियों का जमकर इस्तेमाल किया। जिसके कारण बस्तर में माओवादियों की जड़ें और मजबूत होती गई। बस्तर का जंगल नक्सलवाद के लिए सुरक्षित अभ्यारण्य बन गया। 1 नवंबर 2000 तक छत्तीसगढ़ मध्य प्रदेश राज्य का हिस्सा था। छत्तीसगढ़ का यह घने जंगलों से घिरा क्षेत्र आदिवासी समूहों की आबादी का क्षेत्र है। आदिवासी समुदाय छत्तीसगढ़ की कुल आबादी का लगभग 32 प्रतिशत और दक्षिणी छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा और बीजापुर जिलों की आबादी का लगभग 79 प्रतिशत हिस्सा बनाते हैं। मारिया गोंड और दोरला जनजातियां इस क्षेत्र के दो प्रमुख आदिवासी समुदाय हैं।
1966 में राजा की हत्या के बाद नक्सलियों ने आहिस्ता आहिस्ता पैर जमाते हुए 1980 के दशक में मध्य प्रदेश के बस्तर क्षेत्र में अपनी गतिविधियां तेज कर दीं। इस क्षेत्र में आदिवासी समुदायों के आर्थिक शोषण और पुलिस के साथ खराब संबंधों का नक्सलियों ने फायदा उठाया। उसके बाद सरकारी सुविधाओं और संस्थानों के अभाव ने इसे और मजबूती दी। जिससे नक्सलवाद को समर्थन और बढ़ावा मिला।
छत्तीसगढ़ साल 1 नवंबर 2000 में मध्य प्रदेश से अलग हुआ। नए राज्य को नक्सली गतिविधियों से जूझना पड़ा। पहले मुख्यमंत्री अजीत जोगी की सरकार की अस्थिरता से यह संघर्ष और भी जटिल हो गया। साल 2004 में पीडब्ल्यूजी(Peoples War Group) और एमसीसी (Maoist Communist Centre) के विलय के बाद छत्तीसगढ़ में नक्सली गतिविधियां बढ़ गई। विशेष रूप से, दंडकारण्य क्षेत्र जिसे बस्तर का इलाका कहा जाता है, यह नक्सलियों का एक महत्वपूर्ण कमान केंद्र बन गया।
मुश्किल से हुआ नक्सलियों का खात्मा
सुरक्षाबलों के लंबे और बेहद कठिन ऑपरेशन के बाद छत्तीसगढ़ में नक्सलियों की कमर टूट गई है। बड़ी संख्या में नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया है। इस बार के आत्मसमर्पण में सबसे बड़ी बात यह रही कि नक्सलियों के कई बड़े नेताओं ने भी हथियार छोड़े हैं। जो बचे हैं, वे अलग-थलग पड़ रहे हैं और उग्रवाद खात्मे के कगार पर पहुंच गया है। यह सरकार और सुरक्षा बलों दोनों के लिए बड़ी उपलब्धि है। दरअसल नक्सली हिंसा के जरिए सत्ता पर कब्जा करने का सपना देख रहे थे। उनका नारा ही है, 'सत्ता वोट से नहीं, बंदूक की नली से निकलती है'। पहले की सरकारों की अनदेखी से पैदा हुए आदिवासियों के शोषण ने छत्तीसगढ़ में नक्सलियों को उर्वर जमीन मुहैया कराई। आदिवासियों की सबसे प्रमुख वनोपज- तेंदूपत्ता के माध्यम से आदिवासियों का शोषण आम बात थी। गैर-आदिवासी इलाकों के ठेकेदार आज से 15-20 साल पहले आदिवासियों से पांच रुपये में एक हजार तेंदूपत्ता लेते थे, जिन्हें वे बीड़ी की फैक्टरियों में पांच सौ रुपये में बेचते थे। नक्सलियों ने आदिवासियों के इसी शोषण को हथियार बनाकर अपनी गहरी पैठ बनाई। नक्सलियों के निशाने पर पुलिस जमींदार, जेल, थाने के हथियार होते थे। उनका नारा था, 'पुलिस का हथियार, हमारा हथियार'। इसलिए जब भी वे पुलिस बल या जेलों पर हमला करते, तो वहां हथियार वे सबसे पहले लूट ले जाते थे। इसी तरह आदिवासी इलाकों की खदानों के ठेकेदारों को धमकाकर वे वहां उपयोग होने वाली विस्फोटक सामग्री ले लेते थे। इसी बीच छत्तीसगढ़ में एक और घटना हो गई, जिसमें दंतेवाड़ा में नक्सली हमले में CRPF के 76 जवान शहीद हो गए थे। जिसके बाद 2010 में केन्द्र सरकार ने नक्सलियों की समस्या को गंभीरता से लेना शुरु किया। राज्य पुलिस बल को प्रशिक्षण और हथियार आदि के लिए पर्याप्त राशि दी जाने लगी। सामाजिक स्तर पर भी काम शुरू हुए। आदिवासियों से संपर्क का कोई साधन नहीं था। वे बाहर निकलते नहीं थे। इन मुद्दों पर ध्यान दिया गया। थानों की किलेबंदी की गई, रणनीति अपनाकर आदिवासियों से संपर्क स्थापित किया गया। स्थानीय लोगों को भरोसे में लेकर उनकी बोली समझी जाने लगी। इस दौरान नक्सलियों के खिलाफ भी स्थानीय स्तर पर माहौल बनने लगा, क्योंकि नक्सली नेताओं ने आदिवासी महिलाओं का शोषण शुरू कर दिया। इससे वहां के लोग नाराज हुए और नक्सल गतिविधियों की जानकारी पुलिस तक पहुंचाने लगे। यह सब एक दिन में नहीं हुआ बल्कि इस काम में कई दशक लगे। दशकों के गंभीर प्रयास और आदिवासी जनता के सहयोग से जो अभियान शुरू हुआ, उसका परिणाम अब दिख रहा है। उम्मीद की जानी चाहिए कि सिर्फ छत्तीसगढ़ ही नहीं बल्कि पूरे देश से नक्सलियों की हिंसक विचारधारा समाप्त हो जाएगी।

अंशुमान आनंद
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