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पंजाब में 'नशा विरोधी यात्रा' भाजपा को 2 सीट से सत्ता तक पहुंचा सकती है 

The 'anti-drug yatra' in Punjab could propel the BJP from two seats to power.

बंगाल फॉर्मूले पर पंजाब में खिलेगा 'कमल'सुनील पाण्डेय

अगले साल होने जा रहे पंजाब विधानसभा के आम चुनावों को लेकर राजनीतिक दलों ने तैयारियां तेज कर दी हैं। सत्ताधारी दल आम आदमी पार्टी अपने लोकलुभावन फ्री बिजली, महिलाओं को डेढ़ हजार रुपये आदि वादों के प्लेटफार्म पर चलकर दोबारा सत्ता में आना चाहती है। इसके अलावा पार्टी अंदर खाते हिंदू वोट बैंक को भी आकर्षित करने के लिए कुछ नए प्रयोग कर रही है। आप को पटकनी देने के लिए प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस कोशिश तो कर रही है लेकिन पार्टी में आपसी खींचतान के चलते स्थिति दिन—ब—दिन कमजोर होती जा रही है। कभी पंजाब की अपनी पार्टी कही जाने वाली शिरोमणि अकाली दल प्रकाश सिंह बादल के जाने के बाद वजूद बचाने के लिए संघर्ष कर रही है। उनके बेटे सुखबीर सिंह बादल अब जमीन बचाने के लिए दिन—रात एक किए हुए है। पार्टी की वर्तमान में पंजाब में मात्र 1 सीट है। वहीं दुनिया की सबसे बडी पार्टी भारतीय जनता पार्टी इस बार पंजाब में कमल खिलाने के लिए बेताब है। भाजपा पंजाब में बंगाल फॉर्मूले पर चलकर बडा खेला करने की तैयारी कर रही है।  बीजेपी ने पश्चिम बंगाल चुनावों से पहले 'परिवर्तन यात्रा' के जरिए जमीनी स्तर तक पकड़ बनाई थी, उसी राजनीतिक मॉडल को अब पंजाब के गांवों और कस्बों में आजमाया जा रहा है। यहां 'परिवर्तन यात्रा की जगह 'नशा विरोधी यात्रा' निकाली जाएगी। समूचा पंजाब नशे से ग्रस्त है। पंजाब का यूथ नशे की चपेट में आ चुका है। उसे बचाने के लिए भाजपा ने बडे स्तर पर योजना बनाई है। 2027 के पंजाब विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए बीजेपी ने नशे को एक केंद्रीय चुनावी मुद्दा बनाया है और इसके खिलाफ राज्यव्यापी आंदोलन की तैयारी की है।  'नशा विरोधी यात्रा' अगले सप्ताह के बीच पठानकोट से शुरू होने की संभावना है।  इस यात्रा में दर्जनभर से अधिक केंद्रीय मंत्री और राष्ट्रीय स्तर के नेता शामिल होंगे। वहीं जालंधर में होने वाली एक बड़ी समापन रैली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के शामिल होने की उम्मीद है। इसकी कमान खुद गृहमंत्री अमित शाह ने संभाली है। शाह ने नशे के खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर अभियान चलाया है। पंजाब में यही 'नशा विरोधी यात्रा' भाजपा को 2 सीट से सत्ता तक पहुंचा सकती है। बीजेपी इसको लेकर पूरी तक से आक्रामक हो गई है। इस यात्रा से पंजाब में भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व की सक्रियता बढ़ गई है। 

  बता दें कि पंजाब विधानसभा की कुल 117 सीटें हैं। इसमें सत्ताधारी आम आदमी पार्टी के पास 95, कांग्रेस पार्टी के 16, भारतीय जनता पार्टी की 2, शिरोमणि अकाली दल, बीएसपी, आईएनडी की 1—1 सीटें हैं। 

भाजपा की चुनावी गतिविधियां तेज

बता दें कि पंजाब विधानसभा चुनाव में अब करीब छह महीने का समय शेष है। भाजपा ने प्रदेश में अपनी चुनावी गतिविधियां तेज कर दी हैं। पार्टी ने सितंबर और अक्टूबर में अपने शीर्ष नेतृत्व के कार्यक्रमों की रूपरेखा तैयार करनी शुरू कर दी है। राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के संभावित कार्यक्रमों को लेकर पार्टी स्तर पर तैयारियां चल रही हैं। सूत्रों के अनुसार, प्रधानमंत्री मोदी अक्टूबर में तीन दिन पंजाब में रह सकते हैं। हालांकि, अभी दौरे की तारीख तय नहीं हुई है। पार्टी का प्रयास है कि उनके कार्यक्रम को अमृतसर, जालंधर, लुधियाना और पटियाला के आसपास केंद्रित किया जाए। प्रस्तावित कार्यक्रम के अनुसार प्रधानमंत्री पहले दिन माझा क्षेत्र के कई विधानसभा क्षेत्रों से रोड शो के माध्यम से गुजर सकते हैं। उनके रात्रि विश्राम के लिए राधा स्वामी सत्संग ब्यास के मुख्यालय पर विचार किया जा रहा है। प्रधानमंत्री की जनसभा को लेकर भी पार्टी में मंथन चल रहा है। भाजपा के कुछ नेता बठिंडा अथवा पटियाला में जनसभा कराने के लिए राष्ट्रीय नेतृत्व से संपर्क में हैं। बठिंडा से पटियाला तक रोड शो की संभावना पर भी विचार किया जा रहा है।

अकाली—भाजपा गठबंधन हुआ तो मिल सकता है फायदा, संशय

 पंजाब में अकाली—भाजपा के बीच गठबंधन केा लेकर अभी तक स्थिति स्पष्ट नहीं है। पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सुखबीर सिंह बादल की मुलाकात से संभावना प्रबल होती दिख रही है, लेकिन बीच में भाजपा के दिग्गत नेताओं के बयान आने के बाद ऐसा लगने लगा कि दोनों की राहें अलग हो जाएंगी। हालांकि अंदर खाते बात अभी भी चल रही है। राजनीतिक विशेषज्ञ डॉक्टर परमिंदर पाल सिंह कहते हैं कि अगर अकाली—भाजपा मिलकर चुनाव लड़ते हैं तो दोनों को फायदा होगा। अलग—अलग मैदान में उतरने से तीसरा दल बाजी मार जाएगा, जैसे पहले हुआ था। चूंकि वर्तमान में कांग्रेस में आपसी गुटबाजी हावी है इसलिए इसका फायदा गठबंधन को पूरा मिल सकता है। प्रधानमंत्री मोदी के साथ सुखबीर बादल की इस मुलाकात की पटकथा लिखने में पड़ोसी राज्य हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने एक महत्वपूर्ण मध्यस्थ की भूमिका निभाई है।  प्रधानमंत्री कार्यालय  से सुखबीर बादल को फोन जाना और अगले ही दिन दिल्ली में यह बैठक होना साफ संकेत देता है कि पर्दे के पीछे की बातचीत काफी आगे बढ़ चुकी है। हालांकि, दोनों ही दलों के शीर्ष नेतृत्व ने इस बैठक को एक अनौपचारिक और पंजाब के ज्वलंत मुद्दों पर आधारित शिष्टाचार भेंट बताया है, लेकिन राजनीति में कोई भी मुलाकात बिना किसी ठोस निहितार्थ के नहीं होती। सुखबीर बादल ने प्रधानमंत्री के सामने भगवंत मान सरकार की कथित प्रशासनिक विफलता, राज्य में चरमराई कानून-व्यवस्था, नशीली दवाओं की बढ़ती समस्या, भर्ती परीक्षाओं में हो रहे पेपर लीक और शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के कामकाज में सरकारी हस्तक्षेप जैसे गंभीर मुद्दों को रखा। लेकिन इस रणनीतिक संवाद का असली मकसद पंजाब के शहरी हिंदू मतदाताओं (जो भाजपा की ताकत हैं) और ग्रामीण सिख मतदाताओं ( जो अकाली दल का आधार रहे हैं) के पुराने सामाजिक-राजनीतिक गठजोड़ को पुनर्जीवित करना है, जिसने दशकों तक पंजाब को एक स्थिर शासन दिया था।

कृषि कानून को लेकर टूट गया था रिश्ता

सितंबर 2020 में जब केंद्र सरकार द्वारा तीन कृषि कानून लाए गए थे, तब देशव्यापी किसान आंदोलन के भारी दबाव के चलते अकाली दल को राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन  से अपना ढाई दशक पुराना नाता तोड़ना पड़ा था। वह अलगाव केवल राजनीतिक नहीं था, बल्कि उसने पंजाब के ग्रामीण और सिख मतदाताओं के बीच अकाली दल की साख को भारी नुकसान पहुंचाया था। 2022 के विधानसभा चुनावों में दोनों दलों ने अलग-अलग चुनाव लड़ा और परिणाम यह हुआ कि दोनों पार्टियां हाशिए पर चली गईं। अकाली दल मात्र तीन सीटों पर सिमट गया और भाजपा को सिर्फ दो सीटों से संतोष करना पड़ा। हालिया आंतरिक सर्वेक्षणों और जमीन से आ रही रिपोर्टों ने सुखबीर बादल को यह अहसास करा दिया है कि ग्रामीण पंजाब में कट्टरपंथी और पंथक ताकतों का ग्राफ तेजी से बढ़ रहा है, जिससे अकाली दल का पारंपरिक वोट बैंक खिसक रहा है। ऐसी स्थिति में, अकेले चुनाव लड़कर सत्ता में वापसी करना अकाली दल के लिए एक असंभव चुनौती बन चुका था।

राहुल गांधी का कैप्टन के प्रति उमड़ा यह प्रेम

देखा जाए तो मोदी-बादल मुलाकात और राहुल गांधी का कैप्टन अमरिंदर सिंह के प्रति उमड़ा यह प्रेम इस बात का स्पष्ट संकेत है कि भारतीय राजनीति अब पूरी तरह से व्यावहारिक और परिणाम-केंद्रित हो चुकी है, जहां पुरानी कड़वाहटों और वैचारिक मतभेदों की म्याद बहुत छोटी होती है। पंजाब की जनता इस समय आर्थिक मंदी, कृषि संकट, रोजगार के अभाव और युवाओं के बड़े पैमाने पर हो रहे पलायन  जैसे बुनियादी संकटों से जूझ रही है। राजनीतिक दलों के ये शीर्ष स्तर के पैंतरे और बयानबाजी तब तक जमीन पर रंग नहीं लाएगी जब तक कि वे पंजाब के इन बुनियादी मुद्दों का कोई ठोस रोडमैप लेकर जनता के बीच नहीं जाएंगे। दिल्ली में होने वाली इन मुलाकातों और सोशल मीडिया पर चलने वाले इन बयानों ने पंजाब की सियासी बिसात पर मोहरे तो सजा दिए हैं और राजनीतिक हलचल को भी चरम पर पहुंचा दिया है, लेकिन इस बिसात का असली सुल्तान कौन बनेगा, इसका फैसला अंततः पंजाब के खेतों, गांवों और शहरों की वो आम जनता ही करेगी जो फिलहाल शांति से इस पूरे सियासी ड्रामे को देख रही है। राहुल गांधी का यह 'कैप्टन मोह' ऐसे समय में सामने आया है जब पंजाब कांग्रेस के भीतर अंदरूनी गुटबाजी और कलह एक बार फिर चरम पर है। प्रदेश अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग और अन्य गुटों के बीच नेतृत्व को लेकर खींचतान जारी है। राहुल गांधी के इस बयान ने राज्य के कांग्रेसी कार्यकर्ताओं और वर्तमान प्रांतीय नेताओं के बीच एक अजीब सी असहजता और दुविधा पैदा कर दी है। कैप्टन अमरिंदर सिंह ने भी इस पर त्वरित प्रतिक्रिया देते हुए राहुल गांधी की बड़प्पन की तारीफ की और याद दिलाया कि गांधी परिवार और पटियाला राजघराने के बीच के संबंध राजनीतिक उतार-चढ़ाव से परे हैं। कैप्टन और पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी दून स्कूल में सहपाठी और गहरे दोस्त थे, और यह पारिवारिक वफादारी आज भी बची हुई है। हालांकि, कैप्टन ने तुरंत यह स्पष्ट कर दिया कि वे वैचारिक और राजनीतिक रूप से पूरी तरह से भारतीय जनता पार्टी के प्रति समर्पित हैं, लेकिन इस बयान ने यह साबित कर दिया है कि पंजाब की राजनीति में व्यक्तिगत संबंध आज भी राजनीतिक सीमाओं को लांघने की ताकत रखते हैं।

त्रिकोणीय या चतुष्कोणीय मुकाबले की नई तस्वीर

 पंजाब की राजनीति में एक त्रिकोणीय या चतुष्कोणीय मुकाबले की नई तस्वीर उभर रही है। वर्तमान में सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी  केंद्र सरकार पर पंजाब के फंड रोकने और ग्रामीण विकास कोष  को फ्रीज करने का आरोप लगाकर लगातार क्षेत्रीय अस्मिता का कार्ड खेल रही है। मुख्यमंत्री भगवंत मान की सरकार अपनी मुफ्त बिजली और अन्य कल्याणकारी योजनाओं के दम पर जमीन मजबूत बनाए रखने का दावा कर रही है, लेकिन कानून-व्यवस्था और वित्तीय कुप्रबंधन के मोर्चे पर वह लगातार विपक्ष के निशाने पर है। यदि भाजपा और अकाली दल का गठबंधन दोबारा जमीन पर उतरता है, तो यह सीधे तौर पर आम आदमी पार्टी के उस वोट बैंक में सेंध लगाएगा जो अकाली दल के बिखरने के बाद उनकी तरफ शिफ्ट हुआ था। भाजपा के पास पंजाब में एक कद्दावर सिख चेहरे की कमी हमेशा से खलती रही है, और राहुल गांधी द्वारा कैप्टन अमरिंदर सिंह को दी गई यह 'सर्टिफिकेट' भाजपा के लिए पंजाब के सिख और राष्ट्रवादी मतदाताओं के बीच कैप्टन की स्वीकार्यता को और मजबूत करने का हथियार बन सकती है।


सुनील पाण्डेय
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)

 

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