सारोजिनी नगर के श्री विनायक मंदिर में भगवान गणेश के सामने हाथ जोड़ते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीर अपने आप में एक राजनीतिक पड़ाव की तस्वीर है। 7 अक्टूबर 2001 को गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने वाले मोदी आज 25 साल से लगातार किसी न किसी सरकार के मुखिया हैं। भारतीय राजनीति में, जहाँ मतदाता अक्सर एक कार्यकाल के बाद सरकार को घर भेजने के लिए तैयार रहता है, वहाँ यह उपलब्धि निश्चित ही असाधारण है। लेकिन 25 साल की राजनीति को सिर्फ एक रिकॉर्ड मानकर छोड़ देना इस यात्रा को बहुत छोटा करके देखना होगा। असली सवाल यह है कि इन 25 वर्षों में मोदी ने भारत को कितना बदला और उनके जाने के बाद भी उनके विचारों और शासन की कौन-सी छाप बची रहेगी।
मोदी के शासन की सबसे बड़ी देन शायद यही है कि उन्होंने भारतीय राजनीति में ‘सरकार चलाने’ और ‘देश बदलने’ के बीच का फर्क मिटाने की कोशिश की। उनके आने से पहले सरकार का मतलब अक्सर योजनाओं की घोषणा, फाइलों की आवाजाही और वर्षों तक परियोजनाओं के अटकने से जोड़ा जाता था। मोदी ने इस कार्य-संस्कृति को चुनौती दी। सड़क, रेलवे, बिजली, शौचालय, घर, गैस, नल का पानी, बैंक खाता—इन सबको उन्होंने चुनावी भाषणों के बड़े नारों से निकालकर आम आदमी के रोजमर्रा के जीवन से जोड़ दिया। जनधन, आधार और मोबाइल के सहारे कल्याणकारी योजनाओं को सीधे लाभार्थी तक पहुँचाने का मॉडल इसी बदलाव का हिस्सा है।
लेकिन मोदी का परिवर्तन केवल सरकारी योजनाओं की सूची नहीं है। उन्होंने भारत के नागरिक और राज्य के रिश्ते को भी बदला। UPI इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। कभी डिजिटल भुगतान शहरों के पढ़े-लिखे तबके की चीज समझा जाता था; आज चाय की दुकान से लेकर बड़े कारोबार तक मोबाइल से भुगतान सामान्य बात है। स्वच्छता को लेकर अभियान हो या ‘वोकल फॉर लोकल’, मोदी ने सरकार को केवल नीति बनाने वाली संस्था नहीं रखा, बल्कि नागरिक को भी बदलाव का भागीदार बनाने की कोशिश की। यही कारण है कि उनके शासन की शैली को केवल ‘कल्याणकारी राज्य’ कहना अधूरा होगा; यह व्यवहार बदलने वाला शासन भी है।
आर्थिक मोर्चे पर GST, दिवालियापन कानून, बैंकिंग सुधार, बड़े पैमाने पर सार्वजनिक पूंजीगत खर्च, डिजिटल अर्थव्यवस्था और विनिर्माण पर जोर ने भारत की अर्थव्यवस्था की दिशा बदलने की कोशिश की। सार्वजनिक पूंजीगत व्यय में भारी वृद्धि और इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन का विस्तार इस बदलाव को दिखाता है। अब ‘मेक इन इंडिया’, सेमीकंडक्टर, रक्षा उत्पादन और आत्मनिर्भरता केवल सरकारी नारे नहीं, बल्कि रणनीतिक आर्थिक लक्ष्य बन चुके हैं।

मोदी ने भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा की राजनीतिक भाषा भी बदली। सर्जिकल स्ट्राइक, बालाकोट और ऑपरेशन सिंदूर जैसे फैसलों ने यह संदेश दिया कि सुरक्षा के सवाल पर भारत केवल प्रतिक्रिया देने वाला देश नहीं रहना चाहता। अनुच्छेद 370 हटाना भी इसी निर्णायक राजनीति का हिस्सा रहा। चाहे इन फैसलों पर राजनीतिक मतभेद हों, लेकिन इतना स्पष्ट है कि मोदी युग ने राष्ट्रीय सुरक्षा को चुनावी और राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में ला दिया है।
और शायद सबसे गहरा बदलाव भारत के आत्मविश्वास में आया है। राम मंदिर, काशी विश्वनाथ, योग, मिलेट्स, भारतीय भाषाओं और सभ्यतागत विरासत को लेकर मोदी की राजनीति ने विकास और सांस्कृतिक पहचान को एक-दूसरे का विरोधी मानने वाली पुरानी सोच को चुनौती दी है। उनके लिए आधुनिक भारत और अपनी जड़ों से जुड़ा भारत साथ-साथ चल सकता है।
इसलिए मोदी की 25 वर्ष की यात्रा का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं होगा कि उन्होंने कितनी सड़कें बनाईं, कितने खाते खोले या कितने चुनाव जीते। असली कसौटी यह होगी कि क्या उन्होंने भारत की सोचने की दिशा बदल दी है। ‘चलता है’ से ‘बदल सकता है’, सरकार से शासन, लाभार्थी से नागरिक, और परंपरा बनाम आधुनिकता से परंपरा के साथ आधुनिकता तक—अगर ये बदलाव स्थायी होते हैं, तो मोदी की सबसे बड़ी विरासत कोई एक योजना नहीं, बल्कि एक नया राजनीतिक दर्शन होगा। मंदिर में गणेश के सामने खड़े मोदी के 25 वर्ष इसलिए केवल सत्ता की कहानी नहीं हैं; यह उस भारत की कहानी है जो अब अपने भविष्य को लेकर पहले से कहीं अधिक महत्वाकांक्षी दिखाई देता है।
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