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तकनीकी चूक या अदृश्य हस्तक्षेप?

Technical error or invisible intervention?

ISRO की लगातार विफलताओं पर उठते असहज सवाल

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के लिए वर्ष की शुरुआत निराशाजनक रही जब 12 जनवरी को PSLV-C62 मिशन अपने निर्धारित कक्षा तक नहीं पहुंच सका। 16 उपग्रहों को लेकर उड़ा यह रॉकेट, जिनमें सात विदेशी उपग्रह भी शामिल थे, उड़ान के पहले दो चरण सफलतापूर्वक पूरा करने के बाद तीसरे चरण में गड़बड़ी का शिकार हो गया। इससे भी अधिक चिंता की बात यह है कि यही पैटर्न मई 2025 की पिछली विफलता में भी देखने को मिला था। तीन दशकों से अधिक समय तक ISRO की रीढ़ रहा PSLV, लगातार दूसरी बार एक ही चरण में असफल हुआ है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है—क्या यह केवल तकनीकी संयोग है या इसके पीछे कोई गहरी वजह छिपी है?
ISRO का ट्रैक रिकॉर्ड बताता है कि PSLV दुनिया के सबसे भरोसेमंद लॉन्च व्हीकल्स में गिना जाता रहा है। कम लागत, उच्च सफलता दर और सटीकता के कारण भारत ने वैश्विक वाणिज्यिक उपग्रह प्रक्षेपण बाजार में अपनी अलग पहचान बनाई। ऐसे में एक ही चरण में बार-बार समस्या आना महज इत्तेफाक मान लेना भी उतना ही कठिन है, जितना बिना सबूत किसी साजिश का आरोप लगा देना। तकनीकी विफलताएं अंतरिक्ष अभियानों का हिस्सा होती हैं, लेकिन जब विफलता का पैटर्न दोहराया जाए, तो जांच का दायरा स्वाभाविक रूप से विस्तृत होना चाहिए।
यह भी तथ्य है कि भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम अब केवल वैज्ञानिक उपलब्धियों तक सीमित नहीं रहा। वह रणनीतिक, आर्थिक और भू-राजनीतिक महत्व भी रखता है। रक्षा, संचार, नेविगेशन और निगरानी—हर क्षेत्र में अंतरिक्ष आधारित क्षमताएं निर्णायक भूमिका निभा रही हैं। ऐसे में वैश्विक प्रतिस्पर्धा और हितों का टकराव भी बढ़ा है। भारत की बढ़ती आत्मनिर्भरता और निजी-सरकारी साझेदारी ने कई स्थापित अंतरिक्ष शक्तियों के वाणिज्यिक हितों को चुनौती दी है। इस संदर्भ में कुछ विशेषज्ञ यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या साइबर या सप्लाई-चेन स्तर पर किसी प्रकार की छेड़छाड़ की आशंका को पूरी तरह नकारा जा सकता है?
हालांकि, यह स्पष्ट करना जरूरी है कि अब तक किसी भी प्रकार के विदेशी हस्तक्षेप या sabotage के ठोस प्रमाण सामने नहीं आए हैं। ISRO जैसी संस्था अपने आंतरिक ऑडिट, गुणवत्ता नियंत्रण और मिशन-रेडीनेस प्रक्रियाओं के लिए जानी जाती है। फिर भी, आज के समय में जब हार्डवेयर से लेकर सॉफ्टवेयर तक वैश्विक सप्लाई-चेन पर निर्भरता बढ़ी है, तब जोखिम के नए आयाम भी खुलते हैं। एक छोटे से कंपोनेंट या कोड में खामी, जानबूझकर हो या अनजाने में, पूरे मिशन को प्रभावित कर सकती है।
इसलिए आवश्यकता है संतुलित और पारदर्शी जांच की—ऐसी जांच जो तकनीकी कारणों को प्राथमिकता दे, लेकिन किसी भी संभावना को पूर्वाग्रह के बिना परखे। न तो जल्दबाजी में साजिश का शोर मचाना उचित है और न ही बार-बार की विफलता को सामान्य तकनीकी चूक कहकर टाल देना। भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम की विश्वसनीयता, अंतरराष्ट्रीय साझेदारों का भरोसा और भविष्य के मिशनों की सफलता इसी पर निर्भर करती है।
अंततः, ISRO ने इतिहास में हर असफलता से सीख लेकर और मजबूत वापसी की है। PSLV-C62 की विफलता भी उसी सीख का हिस्सा बनेगी। लेकिन इस बार सबक केवल तकनीकी सुधार तक सीमित नहीं होना चाहिए। बदलते वैश्विक परिदृश्य में सुरक्षा, सप्लाई-चेन की शुद्धता और साइबर-सुरक्षा पर उतना ही ध्यान देना होगा जितना रॉकेट विज्ञान पर। सवाल पूछना राष्ट्रहित में है, पर निष्कर्ष तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर ही निकलने चाहिए—यही जिम्मेदार पत्रकारिता और मजबूत लोकतंत्र की पहचान है।

उदय इंडिया ब्यूरो

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