logo

ममता की हार पर नहीं, 80 सीट मिल जाने पर आश्चर्य

Surprised not at Mamata's defeat, but at her winning 80 seats

 

 मुस्लिम  प्रेम, महिला विरोध, देशद्रोह तानाशाही अहंकार का मिश्रण बनी ममता बनर्जी खुद पैरों पर  कुल्हाड़ी मारी

 

2026 के बंगाल विधानसभा चुनाव के परिणाम जैसे लग रहे थे लगभग वैसे ही आये हैं। भाजपा को 200 सीटों के आसपास मिलनें का अन्दाजा उनके काडर वर्कर्स की रिपोर्ट सूचना पर आधारित था। खबर है कि इसी तरह की रिपोर्ट गोपनीय विभागों द्वारा भी दी गयी थी। हालांकि सरकारी गोपनीय रिपोर्ट कई बार गलत निकल जाती है। जिस तरह बंगाल की जनता मोदी-योगी को सुनने उन्हें देखने दौड़ पड़ती थी और ममता भीड़ भी नहीं जुटा पा रही थीं तो ममता सरकार की विदाई तो तय हो गयी थी। तृणमूल पार्टी की सर्वेसर्वा ममता बनर्जी ऊपर से चाहे कुछ भी कह रही हों अपने कार्यकर्ताओं के उत्साह बड़ाने के लिये लेकिन अन्दर से जान रही थी कि क्या होने वाला है। आखिर एक लम्बे समय से राजनीति में हैं तो हवा का रूख और जनता का मन भाजपा की तरफ झुकाव समझ ही गया होगा।

ममता पिछले चुनाव अपने गुंडों की दम पर और बंगला देश से आये मुसलमान वोटों की दम पर जीत रहीं थी, उन्हें पूरा भरोसा था कि मुस्लिम वोटर उन्हें चुनाव जिताने के लिये काफी होंगे। उन्हें खुश करने के लिये ममता ने सनातन धर्म के खिलाफ बहुस से काम किये और हिन्दुओं से बदसलूकी करने और गाली देने तक से नहीं चूकीं। उन्हें ये सोचना था कि अन्य प्रदेशों में जब भी हिन्दु इकट्ठा हुआ है तो सत्ता मुसलमानों की भारी संख्या होने के बाबजूद भी मुस्लिमों की पक्षधर पार्टी हार जाती है। हाल ही में हुये बिहार के विधान सभा चुनाव से सबक ले सकती थी कि जब मुसलमानों का अधिक तरजीह दी जाती है तो हिन्दु इकट्ठा होता है और मुस्लिम परस्त पार्टियों का सारा खेल बिगाड़ देता है। ममता ने हिन्दु समाज को हर तरह से दबाने की कोशिश की। मुसलमान और हिन्दुओं में कोई भी विवाद हो सरकारों का मुसलमानों का पक्ष लेने के निर्देश दे रखे थे। भ्रष्ट मंत्रियों और अपराधियों को परिश्रय शरण देना भी उनके खिलाफ जा रही थी। यहां तक कि रेप के अपराधियों पर तक कोई कार्यवाही नहीं करना ऐसे पचासांे कारण थे कि ममता की सरकार को डूबना ही था।

मुस्लिम वोटर के लिये हिन्दुओं पर किये जुल्म

जब भी दो समुदायों के बीच झगड़ा हो या कोई मुसलमान किसी हिन्दु की जमींन, प्लॉट या घर पर कब्जा कर ले तो हिन्दु को ही पलायन करना पड़ता था। इस तरह मोहल्ले के मोहल्ले तो क्या बांग्लादेशी मुसलमानों, घुसपैठियों की बस्तियां तक बसा डालीं। जो सनातनियों, बंगाल वासियों और देश के लिये तक खतरा बन रहीं थी। मुसलमानों के जुलूस निकलना हो तो हिन्दुओं को रोकना, उनके नमाज के दिन सनातन धर्म मानने वालों के पंडाल नहीं लगने देना, जुलूसों पर रोक लगाना तो आम बात थी। यहां तक कि शुक्रवार के दिन रामनवमी का जुलूस इसलिये नहीं जाने दिया गया क्योंकि मुसलमानों को उस सड़क पर नमाज पढ़ना थी। इसलिये ममता जान पर ,खेल कर देश की एकता पर खतरा डाल कर सनातन धर्म को नष्ट कर भी बंगलादेशी मुसलमानों को बसानें उन्हंे आधार कार्ड देने का और वोटर बनानें का काम सरकार के कर्मचारियों से करवा रही थी।

मेडिकल काॅलेज रेप कांड: मेडिकल काॅलेज मेें महिला डाॅक्टर का रेप और कत्ल नेे कलकत्ता और बंगाल को ही नहीं पूरे देश को हिला डाला। तुरन्त कार्यवाही के लिये डाक्टरों द्वारा हड़ताल, कैंडल मार्च, नारेबाजी का ममता बनर्जी पर कोई असर नहीं हुआ। उल्टा उपदेश देती रही कि महिलाओं को शाम के बाद बाहर नहीं निकलना चाहिये। रेप और कत्ल का समय भी उन्होंने गलत बताया, समय देर रात बतानें का प्रयास किया। विरोधी पार्टी भाजपा ने सरकार को तुरन्त कार्यवाही हेतु कहा, काॅलेज के हेड आदि को सस्पेंड करने की मांग की चूंकि ये मांग भाजपा ने की इसलिये ममता अपनी आदत के अनुसार उस जिद पर गयीं। जब कार्यवाही की भी तब बहुत देर हो चुकी थी। बंगाल की यंग जनरेशन विशेष तौर से महिलायें ममता सरकार के खिलाफ इकट्ठी हो कर खड़ी हो गयीं। इन लोगों ने चुनाव में जमकर भाजपा के पक्ष में प्रचार किया। भाजपा ने पीड़िता की मां को सहानुभूति और संवेदनशीलता के साथ विधान सभा चुनाव में टिकट दे दिया और वो जीत गयीं। अन्य पीड़ित परिवार की तीन और महिलाओं को टिकट देकर भाजपा ने महिलाओं की सहानुभूति प्राप्त कर ली और वे सभी चुनाव जीतीं।

भ्रष्ट मंत्रियों का बचाव: वैसे तो ममता बनर्जी की सरकार में भ्रष्ट मंत्रियों के ऊपर बराबर आरोप लगते रहे। लेकिन उनके प्रिय मंत्री पार्थ चटर्जी के यहां जब छापा पड़ा तो ममता ने उन्हें बचाने का भरपूर प्रयास किया। जब उनके निवास पर करोड़ों रूपये और बाद में उनकी महिला मित्र के यहां दौलत और सोने का खजाना पकड़ा गया तो हड़कम्प मच गया। मंत्री पर जब उन्होंने एक्शन लिया तब तक बहुत देर हो चुकी थी। जनता ने खुद ममता सरकार को भ्रष्ट मान लिया।

आर्मी को फेंस के लिये सीमा

पर जमींन नहीं दी: पिछले कई वर्षों से केन्द्र सरकार ममता बनर्जी की बंगाल सरकार से बांग्लादेश की बार्डर पर रोक (फेंस) लगाने के लिये जमींन मांग रही थी। ममता ने भारत का हित सोच कर बांग्लादेश और घुसपैठियों का हित सोचा और रोक लगाने के काम में वाधा डाली, जमींन भी केन्द्र सरकार को नहीं दी। यहां तक कि आर्मी के बार्डर पर लगे टेंट तक को भी ठीक से नहीं लगने दिया। कई बार तो उन्हें हटवाया और आर्मी के सिपाही अपने ही देश की एक प्रदेश सरकार के काम पर खून के घूंट पीते रहे। लोग ये सब देख रहे थे, धीरे धीरे इसी बात ने चुनाव से ठीक पहले तूल पकड़ लिया। बंगाली लोग इसे अपनी असुरक्षा के लिये ममता को जिम्मेंदार समझ कर ममता के विरोध में गये।

चुनाव आयोग को भी गरियाना: ममता बनर्जी को जब अपनी हार दिखाई देने लगी तो उन्होंने चुनाव आयोग पर तरह तरह के अनर्गल आरोप लगाये। उसे भाजपा का एजेंट कहा। चुनाव हारने का डर तो उन्हें अन्दर ही अन्दर शुरू से ही लग रहा था। कभी मोदी, कभी चुनाव आयोग, कभी ईडी और कभी केन्द्र की टेक्स अथाॅर्टी के खिलाफ ऊटपटांग बोलती रहीं। पर मोदी जी ने कोई जबाब नहीं दिया। सच सामनें दिखाई दे रहा था। ममता हाई कोर्ट गयीं, सुप्रीम कोर्ट गयीं दोनो जगह हार कर गयीं।

कुल मिला कर ममता का अपराधियों को प्रश्रय देना, तृणमूल कार्यकर्ताओं में अपराधियों की भर्ती, उनके द्वारा चन्दा वसूली, मुस्लिम घुसपैठियों को पनाह देना और उन्हें वोटर बनाने की पैरवी, बार्डर पर आर्मी को फेंस नहीं लगाने देना, महिलाओं को सुरक्षा नहीं दे पाना, इस्लाम धर्म माननें वालों को सनातनियों से ऊपर दर्जा देना, चुनाव आयोग को सुप्रीम कोर्ट की क्लीनचिट के बाद भी बुरा भला कहना, भ्रष्ट मंत्रियों को बचाना उन्हें भारी पड़ गया। बीच चुनाव में तृणमूल कांग्रेस का महिला आरक्षण का विरोध और पार्टी के सैकेंड मेन इन कमांड अभिषेक बनर्जी का बोलना  सबको देख लूंगा, 4 मई के बाद तुम्हें कौन दिल्ली से बचाने आता हैने आग में घी का काम किया।

इसके बाद जो जनता अपना मन भाजपा को वोट देने का मन बना रही थी उसका इरादा सख्त हो गया और चुनाव को ममता ने खुद एेसा कर दिया:-

  • देश द्रोह बनाम राष्ट्र प्रेम
  • गुंडागर्दी बनाम शान्ति
  • रेप बनाम महिला रक्षा
  • भ्रष्ट बनाम ईमानदारी
  • तानाशाही बनाम प्रजातंत्र
  • सनातन नष्ट बनाम सनातन रक्षा
  • घुसपैठिया बनाम बंगाली
  • विनाश बनाम विकास
  • और अन्त में चुनाव हो गया ममता बनाम जनता ममता हारी जनता बम्पर जीती

ममता का मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना उनको बहुत भारी पड़ेगा अगर उन्होंने इस्तीफा दे भी दिया होता या अब दे दें तो भी नये मुख्यमंत्री की शपथ तक वो नियम और परम्परा के अनुसार मुख्यमंत्री बनी रहेंगी। ये केवल उनकी नौटंकी है। बंगाली लोग तुरन्त बदलाव देखना चाहते हैं इस्तीफा देकर  उन्होंने अपनी छवि सदा के लिये बिगाड़ ली। विधान सभा का विधिवत गठन होते ही राज्यपाल बहुमत वाली पार्टी को सरकार बनानें का आमंत्रण देंगे। मुख्यमंत्री की शपथ लेते ही ये पद से हट जायेंगी नहीं तो इन्हें पुलिस उठा कर बाहर फेंक देगी या जेल भी भेजी जा सकती हैं। ये ही नहीं चुनाव की प्रक्रिया में अड़चन और जबरजस्ती कानून के खिलाफ मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने के लिये 6 वर्ष के लिये चुनाव लड़ने से वंचित की जा सकती है। इनको घसीट कर बाहर फेंकने पर रोने को मजदूर भी नहीं मिलेगा।

 


डाॅ. विजय खैरा

(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)

 

 

Leave Your Comment

 

 

Top