सुप्रीम कोर्ट का हालिया फैसला, जिसमें उसने केंद्र सरकार की उस याचिका को खारिज कर दिया जिसके तहत Prohibition of Child Marriage Act, 2006 (PCMA) को सभी धर्मों के पर्सनल लॉज़ पर लागू करने की मांग की गई थी, भारतीय न्याय व्यवस्था की धर्मनिरपेक्षता पर गंभीर प्रश्न खड़ा करता है। अदालत का कहना था कि यह मामला “संविधानिक जटिलता” से जुड़ा है और संसद को इस पर निर्णय लेना चाहिए। लेकिन यही रुख न्यायपालिका के एक गहरे रुझान की ओर संकेत करता है—जहाँ सुधार की दिशा में सबसे पहले हिन्दू कानूनों पर हस्तक्षेप होता है, जबकि अन्य धर्मों के निजी कानूनों को अक्सर “संवेदनशील” कहकर छोड़ा जाता है।
PCMA एक सर्वधर्म निरपेक्ष कानून है—इसका मूल उद्देश्य बाल विवाह को रोकना है, चाहे वह किसी भी धर्म या समुदाय में हो। इसके बावजूद, सुप्रीम कोर्ट का यह कहना कि यह कानून पर्सनल लॉ के ऊपर स्वतः लागू नहीं हो सकता, एक प्रकार की असमानता को वैधता प्रदान करता है। इससे यह संदेश जाता है कि भारत में समान नागरिक कानून की भावना अब भी धर्म के आधार पर बँटी हुई है। यदि एक हिन्दू के नाबालिग विवाह को अवैध माना जाए, लेकिन किसी अन्य धर्म में वही विवाह “मान्य” हो, तो यह संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) की आत्मा के विरुद्ध है।
भारतीय विधायी इतिहास गवाह है कि हिन्दू पर्सनल लॉ पर सुधार सबसे पहले और सबसे कठोर रूप में लागू किए गए। 1950 के दशक में हिन्दू विवाह अधिनियम, हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम, दत्तक और भरण-पोषण कानून जैसे सुधार तेजी से लागू हुए। वहीं मुस्लिम, ईसाई या अन्य धार्मिक समुदायों के निजी कानूनों को “धार्मिक स्वतंत्रता” के नाम पर छूना भी संवेदनशील माना गया।
यह प्रवृत्ति अदालतों में भी दिखती है—जहाँ विवाह, तलाक़ या उत्तराधिकार के मामलों में हिन्दू पक्ष पर कठोर व्याख्या होती है, लेकिन अन्य धर्मों के मामले “धार्मिक प्रथाओं” की आड़ में टाल दिए जाते हैं। बाल विवाह के मुद्दे पर भी यही दोहरा मापदंड सामने आया है।

सुप्रीम कोर्ट का यह कहना कि इस विषय पर संसद को निर्णय लेना चाहिए, एक संवैधानिक दृष्टिकोण से सही लग सकता है। लेकिन व्यावहारिक रूप से यह एक न्यायिक निष्क्रियता (Judicial Inertia) का उदाहरण है। अदालतें अतीत में सामाजिक सुधारों को आगे बढ़ाने में अग्रणी रही हैं—चाहे वह समलैंगिकता पर धारा 377 का मामला हो या निजता का अधिकार। तब फिर बाल विवाह जैसे मूलभूत अधिकारों से जुड़ी असमानता पर अदालत पीछे क्यों हट रही है? क्या यह “राजनीतिक संवेदनशीलता” के दबाव में लिया गया निर्णय है?
संविधान का अनुच्छेद 15 कहता है कि राज्य किसी भी नागरिक के साथ धर्म, जाति, लिंग आदि के आधार पर भेदभाव नहीं करेगा। लेकिन इस फैसले ने व्यावहारिक तौर पर एक धार्मिक भेदभाव को मान्यता दी है—जहाँ कानून की ताकत धर्म के अनुसार बदल जाती है। यह न केवल सामाजिक न्याय के सिद्धांत पर चोट करता है बल्कि यह सवाल भी उठाता है कि क्या “धर्मनिरपेक्ष भारत” में व्यक्तिगत कानून संविधान से ऊपर हो सकते हैं।
यह निर्णय इस बात की पुष्टि करता है कि भारत में Uniform Civil Code (UCC) की आवश्यकता केवल राजनीतिक नारा नहीं बल्कि सामाजिक अनिवार्यता बन चुकी है। जब तक विवाह, तलाक़, उत्तराधिकार या बाल संरक्षण जैसे विषय सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू नहीं होंगे, तब तक न्याय की समानता अधूरी रहेगी। सुप्रीम कोर्ट को इस दिशा में सक्रिय संवैधानिक संरक्षक की भूमिका निभानी चाहिए, न कि केवल संसद के फैसले की प्रतीक्षा करनी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय केवल बाल विवाह से संबंधित नहीं है—यह भारत में न्याय की धर्मनिरपेक्षता की वास्तविक परीक्षा है। जब न्यायपालिका समानता के प्रश्न पर पीछे हटती है और धार्मिक संवेदनशीलता के नाम पर भेदभाव को अप्रत्यक्ष स्वीकृति देती है, तब यह “हिन्दू-टार्गेटेड सुधार” जैसी धारणा को और गहराई से पुष्ट करती है।
भारत को यदि सच्चे अर्थों में धर्मनिरपेक्ष और समानतापूर्ण बनाना है, तो न्यायपालिका को यह साहस दिखाना होगा कि कानून सबके लिए एक है—चाहे धर्म कोई भी हो।
उदय इंडिया ब्यूरो
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