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चुनावी बांड पर सुप्रीम कोर्ट की रोक : एक स्वस्थ पारदर्शी व्यवस्था

Supreme Court ban on electoral bonds: A healthy transparent system

चुनाव में राजनैतिक पार्टियों को चन्दा परोक्ष और खुले रूप में दिये जाने की प्रणाली आजादी के बाद से ही चल रही थी। लोग गुपचुप चन्दा देते थे और रसीद काट कर भी कुछ चन्दा दिया जा रहा था। नम्बर दो में चन्दा देकर औद्योगिक इकाइयां, व्यापारी आदि बाद में पार्टियों से लाभ लेते रहे हैं। चुनावी बांड प्रणाली से कम से कम एक सुधार तो निश्चित हुआ कि पार्टियों को चन्दा तो मिला पर चन्दा देने वाले का नाम पता नहीं लगा। इससे साफ हो जाता है कि चुनावी बांड एक सराहनीय सुधार था जो बेइमानी को कम कर सकता था। जिस व्यक्ति या औद्योगिक इकाई, घरानों या छोटे बड़े व्यापारियों आदि की आस्था या विश्वास जिस पार्टी में होता उसको ही लोग चन्दा देते। पार्टियां सत्ता में आने पर या रहने पर उनको कोई लाभ नहीं दे पाती क्योंकि राजनैतिक पार्टियों को इसकी कोई जानकारी नहीं होती कि चन्दा किस पार्टी से लिया गया है। कोर्ट द्वारा चुनावी बांड निरस्त किया जाना एक अच्छा फैसला हो सकता है, आगे के लिये नीति निर्धारण करने की राह सुझाना में एक और अच्छी बात होती। पिछले वर्षों में संवैधानिक कानून के लागू रहते जो भी कार्य हुये, चन्दा देने के लिये खरीदे बांड के लिये हुये, उन्हें सार्वजनिक करना तभी स्वागत योग्य होता जब उसमें कुछ हेराफेरी या लूट बेईमानी स्पष्ट रूप  से उजागर होती।
 

चुनावी बांड एक सुधार पारदर्शी व्यवस्था

भारत सरकार द्वारा 2018 से शुरू किये गये चुनावी बांड, चन्दे द्वारा लिये जाने वाली नगद रकम व्यवस्था को बन्द करने के लिये उठाया गया एक सुधारक कदम था। इसके पहले चलने वाली नगद चन्दे के लिये जाने से काले धन को बढ़ावा मिलता था जो धन निजी तौर पर पार्टियों को सत्ता में आने पर चन्दा देने वाले व्यापारिक घरानों को पहुंचाया जाता था। इस तरह दोनो तरफ से काले धन की आवक जावक हो रही थी। यह किसी से छुपा हुआ नहीं है कि करोड़ों रूपया चुनावों में प्रत्याशी खर्च करते रहे हैं और करते हैं।

मुख्य चुनाव आयुक्त टी. एन. सेशन के निर्देशन में आयोग द्वारा उठाये गये एतिहासिक कदम से इसमें रोक तो लगी फिर भी इसे रोकने में पूरी सफलता नहीं मिल रही थी। इन चुनावी बांड की व्यवस्था लागू करनें में सरकार की नीयत बिल्कुल साफ लग रही है क्योंकि राजनैतिक पार्टियों को मिलनें वाले चन्दा खातों में आयेगा और उसके खर्चे का ब्योरा भी होगा। यह एक सुधारिक व्यवस्था थी पर कोर्ट के फैसले सर्वमान्य हैं। अब कोर्ट यदि इस व्यवस्था की कमियां दूर करने का रास्ता सुझाती तो यह निर्णय और भी स्वागत योग्य होता।


सभी राजनैतिक पार्टियों को समानता के अवसर

चुनावी बांड अधिनियम में सभी राजनैतिक पार्टियों को बांड के जरिये चन्दा मिलने के अवसर एक समान थे। बांड से मिलने वाले चन्दे के लिये नियम सभी पर एक जैसे थे। जो जिस पार्टी को पसंद करता था, उसमें विश्वास रखता, उसको ही चन्दा देता। पिछले पांच वर्षों में सभी पार्टियों को चन्दा मिला है और सभी पार्टियों ने खुल कर बांड का लाभ उठाया है। भाजपा चूंकि सत्ता में थी उसे अधिक रकम बांड द्वारा प्राप्त हुयी पर अन्य पार्टियों को भी खूब मिली है। यानि विपक्षी पार्टियां भी बांड द्वारा चन्दा लेने में पीछे नहीं रही। केवल उन्हीं पार्टियों को चुनावी बांड लेने की पात्रता है जो नियमानुसार पंजीकृत हों तथा जिन्हें लोक सभा या विधान सभा में एक प्रतिशत मत प्राप्त हुये हों। यानी अधिनियम में बांड लेने वाली पार्टियों के लिये काफी शिथिलता बरती गयी है। इसमें भाजपा सरकार द्वारा पारित अधिनियम में खुद के लिये कहीं कोई स्वार्थ दिखाई नहीं दे रहा है। जो पार्टी लोगों को पसंद होगी, जिसे जनता वोट करेगी वही पार्टी सत्ता में आयेगी। जिसे लोगों का विश्वास प्राप्त होगा वही चुनाव जीतेगी। जाहिर है कि लोग चुनावी बांड द्वारा उसी पार्टी को अधिक चन्दा देंगे जिस पर भरोसा होगा जो जनहित और राष्ट्रहित में कार्य कर रही होगी। जब भाजपा में लोगों का विश्वास जग रहा है, उसे जनता ने केन्द्र में दुबारा और देश के सबसे बड़े प्रदेश उत्तर प्रदेश में दुबारा अधिक मतों से और अधिक सीटें देकर चुनाव जिताया है, मतलब लोग उसके काम से खुश हैं, अधिक संतुष्ट हैं। एैसे में बांड द्वारा अधिक पैसा भाजपा को ही लोग देंगे चाहे छोटा व्यापारी हो या बड़ा औद्योगिक घराना या कोई अन्य संस्था या व्यक्ति। किसी भी वर्ग का व्यक्ति हो वो राष्ट्रहित पहले देखेगा। भाजपा को अधिक चन्दा मिलना उसकी लोकप्रियता दर्शाता है। उल्लेखनीय है कि बंगाल में सत्तारूढ़ तृणमूल पार्टी को एक हजार करोड़ से अधिक चन्दा प्राप्त हुआ है क्योंकि जनता उसे बार बार चुन रही है जहां जनता का विश्वास होगा वहीं बांड खरीदनें वालों का भी भरोसा जगेगा। कोर्ट की टिप्पणी है सत्ताधारी पार्टी को अधिकांश चन्दा मिला है।

हमारा कहना है वो तो मिलेगा ही क्योंकि लोकप्रिय पार्टी ही सत्ता में आती हे और लोकप्रियता ही उसे चन्दा दिलाती है।

विपक्षी नेताओं की टिप्पणी हाथी के दांत खाने के और दिखाने के और  राहुल गांधीः “चुनावी बांड को भाजपा ने रिश्वत और कमीशन का जरिया  बना दिया। उच्चतम न्यायालय के फैसले से इस पर मुहर लग गयी।” राहुल गांधी की उपरोक्त टिप्पणी बेहद निन्दनीय और असत्य है।

कांग्रेस पार्टी ने खुद इन पांच वर्षों में एक हजार करोड़ का चन्दा लिया यदि भाजपा ने रिश्वत और कमीशन लिया है तो कांग्रेस ने भी हजार करोड़ डकार लिये। जनता को गुमराह करने वाली धोखाधड़ी की टिप्पणी है। हाथी के दांत खाने के और लोगों को दिखाने के और। यहां राहुल गांधी ने ये कह कर कि भाजपा को कमीशन और रिश्वत खोरी पर सुप्रीम कोर्ट ने मुहर लगा दी है। फिर एक बार सुप्रीम कोर्ट के कटघरे में खड़ा कर सकती है। उन्होनें सुप्रीम कोर्ट गलत उद्धृत किया है। हो सकता है उन्हें फिर कोर्ट फटकार लगाये और एक बार फिर लिखित मांफी मांगना पड़े।

आप पार्टी के नेता और दिल्ली प्रदेश की मंत्री आतिशी ने कहा कि “जनता को पता चलेगा कि सियासी पार्टी जो सत्ता मंे है वो चन्दा देने वालों का हित ध्यान रख कर फैसला करती है।” खुद आप पार्टी ने सरकारी खजाने का लगभग एक हजार करोड़ पार्टी के लिये उपयोग कर लिया जो कोर्ट के आदेष से पार्टी को वापिस सरकार को देना होगा। दोमुंही बात खुद चन्दा भी ले, सरकारी पैसा भी लूटें और दूसरी पार्टी पर दोष मढ़ें।

योजना में खामियांः सुप्रीम कोट्र की ये बात निश्चय स्वागत योग्य है कि योजना में खामियां हो सकती है। शायद ही कोई कानून जब लोकसभा से बनता है तो फुलप्रूफ होता है। वक्त की कसौटी, उसका उपयोग और न्यायालय की टिप्पणियां, परामर्श या आदेशों को द्वारा निरंतर परिवर्तित होता रहता है। इस कानून को और अधिक पारदर्शी और सशक्त उपयोगी बनाये जाने पर शायद अधिक कारगर होता और अन्दर खाने, नम्बर दो में दिये जाने वाले चन्दे पर रोक लगती। चुनावी बांड कानून सुधारों और प्रतिबन्धों के साथ लागू रहता तो हमारी राय से अधिक लाभप्रद होता बजाय इसके कि इसे निरस्त ही कर दिया जाये।

यहां जिन लोगों ने बांड खरीदे उन्होंने एक अधिकारिक कानून के तहत खरीदे और अपनी पसंद की पार्टी के लिये या सबसे अधिक लोकप्रिय पार्टी के लिये खरीदे होंगे। इसमें गोपनीयता की शर्त भी थी। अब गोपनीयता को हटाया जाने को भी कोर्ट ने कहा है। हालंाकि बांड खरीदते समय गोपनीयता का कानून लागू था। कोर्ट यदि इस योजना के फुलप्रूफ बनाने के आदेश देती और सुधारों के परामर्श देती तो यह चुनाव सुधार में मील का पत्थर साबित होता।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी “ काले धन पर अंकुश लगाने के लिये चुनावी बांड योजना के अलावा भी कई अन्य विकल्प मौजूद हैं, भले ही इसे एक वैध उद्देश्य माना जाये। सूचना के अधिकार का उल्लंघन उचित नहीं है।

इससे स्पष्ट होता है इस सूचना के अधिकार के अन्तर्गत सरकार को सभी सूचनाएं उपलब्ध कराना चाहिये और अन्य विकल्पों पर विचार कराना चाहिये।







डॉ. विजय खैरा

(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)

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