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सोमनाथ: आस्था बनाम 'इमेज'

Somnath: Faith vs. Image

मित्रों, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कल यानी 7 जनवरी को  1026 ईस्वी में सोमनाथ मंदिर पर हुए पहले हमले के 1,000 साल पूरे होने पर उसे याद किया। उन्होंने इस  मंदिर को भारत की सभ्यता की सहनशक्ति और अटूट भावना का एक कालातीत प्रतीक बताया। इस मौके पर एक लेख शेयर करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि सोमनाथ की विरासत सिर्फ एक मंदिर तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उन पीढ़ियों के साहस और विश्वास को दिखाती है जिन्होंने बार-बार हमलों के बावजूद भारत की संस्कृति और सभ्यता की रक्षा की। आज हम इसी पर चर्चा करेंगे। 
सोमनाथ मंदिर भारत की उस सभ्यतागत स्मृति का प्रतीक है, जिसे बार-बार तोड़ा गया, लेकिन कभी मिटाया नहीं जा सका। आज़ादी के बाद जब इस ऐतिहासिक मंदिर के पुनर्निर्माण का निर्णय लिया गया, तब यह केवल एक धार्मिक पहल नहीं थी, बल्कि सदियों के अपमान के बाद Restoration of self-respect का प्रयास था। लेकिन स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को यह प्रयास स्वीकार्य नहीं था। उनका विरोध इतना तीखा और असहजता से भरा हुआ था कि उन्होंने न सिर्फ देश के भीतर 17 पत्र लिखकर इस निर्माण को रोकने की कोशिश की, बल्कि इस आंतरिक भारतीय विषय को पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली खान तक ले गए।
नेहरू के शुरुआती पत्रों में तर्क दिया गया कि सोमनाथ का पुनर्निर्माण “Hindu revivalism” को बढ़ावा देगा और भारत की धर्मनिरपेक्ष छवि को नुकसान पहुँचाएगा। उनके लिए यह मंदिर आस्था या इतिहास का नहीं, बल्कि एक राजनीतिक समस्या था। वे बार-बार चेतावनी देते हैं कि राज्य की कोई भी संवैधानिक संस्था इस आयोजन से जुड़ी नहीं दिखनी चाहिए। राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद का मंदिर उद्घाटन में जाना भी उन्हें अस्वीकार्य था, क्योंकि उनके अनुसार इससे “सरकार का धार्मिक झुकाव” प्रदर्शित होता।


लेकिन नेहरू की असहजता यहीं नहीं रुकी। उन्होंने इस मुद्दे पर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली खान को पत्र लिखकर यह भरोसा दिलाने की कोशिश की कि भारत सरकार सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण को आधिकारिक समर्थन नहीं दे रही है। यह पत्र अपने आप में कई असहज सवाल खड़े करता है। आखिर एक स्वतंत्र, संप्रभु भारत को अपने ही भूभाग में स्थित एक ध्वस्त मंदिर के पुनर्निर्माण पर सफ़ाई देने की ज़रूरत पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को क्यों पड़ी? क्या भारतीय आस्था अब इस हद तक “अंतरराष्ट्रीय संवेदनशीलता” का विषय बन चुकी थी?
इस पत्र के माध्यम से नेहरू ने स्पष्ट किया कि सोमनाथ का पुनर्निर्माण सरकार की नीति नहीं, बल्कि कुछ व्यक्तियों की पहल है। यह वही नेहरू थे, जो हर मंच पर भारत की संप्रभुता और गुटनिरपेक्षता की बात करते थे, लेकिन जब बात हिंदू सभ्यता के प्रतीक की आई, तो उन्हें पड़ोसी देश को आश्वस्त करना ज़रूरी लगा। यह रवैया केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि मानसिक दासता को भी उजागर करता है—मानो भारत अपने ही इतिहास को पुनर्जीवित करने से पहले दूसरों की अनुमति का मोहताज हो।
नेहरू के अन्य पत्रों में बार-बार यह दोहराया गया कि सोमनाथ “अReturning to the past” का प्रतीक है और भारत को भविष्य की ओर देखना चाहिए। लेकिन यह तर्क खोखला प्रतीत होता है। कोई भी सभ्यता बिना अपनी जड़ों को स्वीकार किए आगे नहीं बढ़ सकती। जापान अपने मंदिरों के साथ आधुनिक बना, यूरोप अपने चर्चों के साथ प्रगतिशील हुआ, लेकिन भारत से ही यह अपेक्षा क्यों की गई कि वह अपनी सांस्कृतिक पहचान को त्यागकर ही आधुनिक कहलाए?
कुछ पत्रों में नेहरू ने यह भी आशंका जताई कि सोमनाथ के पुनर्निर्माण से देश के मुस्लिम नागरिक असहज हो सकते हैं। यह तर्क अपने आप में भारतीय मुसलमानों की समझ और आत्मविश्वास पर प्रश्नचिह्न लगाता है। क्या वे इतने असुरक्षित हैं कि एक ऐतिहासिक मंदिर का पुनर्निर्माण उन्हें疏 alienate कर देगा? या यह दरअसल नेहरू की अपनी वैचारिक असुरक्षा थी, जिसे वे “धर्मनिरपेक्षता” के आवरण में छिपा रहे थे?
आख़िरी पत्रों में नेहरू की बेचैनी और झुंझलाहट साफ़ दिखाई देती है। वे जानते थे कि सोमनाथ अब केवल एक मंदिर नहीं रहा, बल्कि यह स्वतंत्र भारत की आत्मपहचान का प्रश्न बन चुका है। सरदार पटेल और के.एम. मुंशी के लिए यह आत्मसम्मान की पुनर्स्थापना थी, जबकि नेहरू के लिए यह एक असुविधाजनक स्मृति थी, जिसे वे दबाना चाहते थे—चाहे इसके लिए देश के भीतर विरोध करना पड़े या पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को सफ़ाई देनी पड़े।
आज जब सोमनाथ मंदिर पूरे वैभव के साथ खड़ा है, तब नेहरू के वे सभी पत्र इतिहास के पन्नों में सिमट गए हैं। लेकिन वे एक सच्चाई उजागर कर गए—ख़तरा मंदिर के पुनर्निर्माण से नहीं था, ख़तरा उस मानसिकता से था, जो अपनी ही सभ्यता और आस्था से असहज महसूस करती थी।

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